08 Sep UPSC Civil Services (Main) Examination 2026 — Hindi Literature Paper II: Questions with Model Answers | Plutus IAS
The questions below are from Hindi Literature Paper II of UPSC Civil Services (Main) Examination 2026 (held 2026-08-30) — the actual paper, which is public. Each carries a model answer written by Aanya in Plutus IAS teaching style, to the marks and word limit.
Official source: official (upsc.gov.in).
Q1. निम्नलिखित सभी प्रश्नों के उत्तर दीजिए (उत्तर स्वयं की भाषा में लिखिए) : निम्नलिखित काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्या लगभग 150 शब्दों (प्रत्येक) में कीजिए : 10×5=50 (a) सब रग तंत रबाब तन, विरह बजावै नित । और न कोई सुणि सकै, कै साई कै चित ॥ बिरहा बुरहा जनि कहौ, बिरहा है सुलितान । जिहि घट बिरह न संचरै, सो घट सदा मसान ॥ (b) दादुर मोर कोकिला पीऊ गिरै बीजु, घट रहै न जीऊ । पुष्य नखत सिर ऊपर आवा हौं बिनु नाह, मंदिर को छावा ॥ (c) अंधकार के अट्टहास-सी मुखरित सतत चिरंतन सत्य । छिपी सृष्टि के कण कण में तू, यह सुंदर रहस्य है नित्य । जीवन तेरा क्षुद्र अंश है, व्यक्त नील घन माला में । सौदामिनी-संधि-सा सुंदर, क्षण भर रहा उजाला में । (d) काँपते हुए किसलय, – झरते पराग समुदय, गाते खग नव-जीवन-परिचय, – तरु-मलय-वलय, ज्योति प्रपात स्वर्गीय, – ज्ञात छवि प्रथम स्वीय, जानकी-नयन-कमनीय प्रथम कंपन तुरीय । (e) पिस गया वह भीतरी औ' बाहरी दो कठिन पाटों बीच, ऐसी ट्रेजिडी है नीच !! (15 marks)
How to approach this question
इस प्रश्न में काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्या अपेक्षित है। परीक्षक भावार्थ, प्रसंग, अलंकार एवं शिल्प के साथ-साथ कवि के भावबोध एवं साहित्यिक विशेषताओं का मूल्यांकन करते हैं। सर्वोत्तम उत्तर में तीन भाग होंगे: (1) प्रसंग एवं कवि-परिचय, (2) भावार्थ एवं व्याख्या, (3) साहित्यिक सौंदर्य एवं विशेषताएँ। सामान्यतः अभ्यर्थी प्रसंग को नजरअंदाज कर केवल भावार्थ तक सीमित रह जाते हैं, जिससे पूर्ण अंक प्राप्त नहीं होते।
Model answer
प्रश्न (a):
प्रसंग एवं कवि-परिचय: प्रस्तुत काव्यांश मीराबाई के पदों से उद्धृत है, जिनमें विरह-भावना की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है। मीराबाई भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम एवं विरह की पीड़ा को व्यक्त करती हैं। उनके पदों में भक्ति एवं वैराग्य का सुंदर समन्वय मिलता है।
भावार्थ एवं व्याख्या:
- प्रथम पंक्ति: “सब रग तंत रबाब तन, विरह बजावै नित” – यहाँ कवयित्री कहती हैं कि उनके शरीर के सभी रंध्र (रग) तथा तंतु (नसें) रबाब (वाद्य) बन गए हैं, जो निरंतर विरह का गान बजाते रहते हैं। विरह उनकी आत्मा में बस गया है।
- द्वितीय पंक्ति: “और न कोई सुणि सकै, कै साई कै चित” – विरह की पीड़ा केवल ईश्वर ही समझ सकते हैं, अन्य कोई इसे सुन नहीं सकता।
- तृतीय-पंचम पंक्ति: “बिरहा बुरहा जनि कहौ, बिरहा है सुलितान” – कवयित्री विरह को बुरा नहीं मानतीं, अपितु उसे सुल्तान (श्रेष्ठ) बताती हैं। जो व्यक्ति विरह से मुक्त रहता है, उसका हृदय सदैव मसान (श्मशान) के समान निर्जीव रहता है।
साहित्यिक सौंदर्य एवं विशेषताएँ:
- भाषा एवं शैली: ब्रज भाषा का प्रयोग, सरल एवं प्रवाहमयी शैली।
- अलंकार: रूपक (रग तंत रबाब तन), अनुप्रास (बिरह बजावै नित), उपमा (बिरहा है सुलितान)।
- भाव एवं विचार: विरह को जीवन का अभिन्न अंग मानना, भक्ति में विलीन होने की आकांक्षा।
निष्कर्ष: मीराबाई के इस पद में विरह-भावना का मार्मिक चित्रण हुआ है। उन्होंने विरह को जीवन का सत्य स्वीकार कर उसे सौंदर्य एवं गरिमा प्रदान की है।
Q2. निम्नलिखित सभी प्रश्नों के उत्तर दीजिए : – (a) बिहारी की काव्य-भाषा और सौंदर्य-दृष्टि की व्याख्या कीजिए। 20 – (b) कामायनी के श्रद्धा सर्ग में व्यक्त मानवतावादी दृष्टि की विवेचना कीजिए। 15 – (c) एक लंबी कविता के रूप में 'असाध्य वीणा' के काव्य-शिल्प का विश्लेषण कीजिए। 15 (15 marks)
How to approach this question
इस प्रश्न में तीन भाग हैं, जिनमें क्रमशः बिहारी की भाषा एवं सौंदर्य-दृष्टि, कामायनी के श्रद्धा सर्ग में मानवतावादी दृष्टि तथा ‘असाध्य वीणा’ के काव्य-शिल्प का विश्लेषण अपेक्षित है। परीक्षक मुख्यतः कवि-कृतियों के विशिष्ट गुणों, उनके सांस्कृतिक संदर्भों तथा काव्यात्मक तकनीकों के प्रति आपकी समझ का आकलन करना चाहता है। सर्वाधिक सामान्य भूल यह होती है कि उत्तर में केवल विषय-वस्तु का वर्णन कर दिया जाता है, जबकि आवश्यक है कि प्रत्येक बिंदु को भाषा, शिल्प एवं विचार के स्तर पर विश्लेषित किया जाए।
Model answer
बिहारी की काव्य-भाषा और सौंदर्य-दृष्टि
बिहारी की काव्य-भाषा ब्रजभाषा का परिष्कृत रूप है, जिसमें लोक-व्यवहार, संस्कृतनिष्ठ पदावली तथा अलंकारों का समुचित प्रयोग मिलता है। उनकी भाषा में चित्रात्मकता, संक्षिप्तता एवं प्रभावोत्पादकता का अद्भुत संयोग है।
सौंदर्य-दृष्टि के अंतर्गत बिहारी प्रकृति-चित्रण, श्रृंगार एवं भक्ति का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करते हैं। उनके काव्य में ‘सत्संगति’ एवं ‘नायिका-भेद’ जैसे सिद्धांतों का प्रयोग होता है। उदाहरणतः,
- नहिं पराग नहीं मधुर मधु, नहिं विकास इहि काल। (अलंकार: अर्थान्तरन्यास)
- बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय। (श्रृंगार रस)
इस प्रकार, बिहारी की सौंदर्य-दृष्टि में लोक-जीवन, प्रकृति एवं आध्यात्मिकता का अद्वितीय समावेश दिखाई देता है।
कामायनी के श्रद्धा सर्ग में मानवतावादी दृष्टि
जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ मानवता के उत्थान का महाकाव्य है। श्रद्धा सर्ग में मानवतावादी दृष्टि का प्रमुख आधार ‘श्रद्धा’ एवं ‘काम’ का द्वंद्वात्मक संबंध है।
- स्त्री-पुरुष समानता: श्रद्धा के चरित्र के माध्यम से प्रसाद नारी को पुरुष के समान गरिमा प्रदान करते हैं।
- सृष्टि एवं विकास: श्रद्धा का प्रेम एवं त्याग मानव सभ्यता के विकास का प्रतीक है।
- आध्यात्मिकता: श्रद्धा का ‘मनु’ से मिलन मानवता के उद्धार का मार्ग प्रशस्त करता है।
इस प्रकार, श्रद्धा सर्ग मानवतावादी दृष्टि का उत्कृष्ट उदाहरण है।
असाध्य वीणा के काव्य-शिल्प
‘असाध्य वीणा’ निराला की लंबी कविता है, जिसमें आधुनिक काव्य-शिल्प के नवीन प्रयोग दिखाई देते हैं।
- प्रगीतात्मकता: कविता में गीतात्मकता एवं मुक्त छंद का प्रयोग हुआ है।
- प्रतीकात्मकता: वीणा मानव मन की अभिव्यक्ति का प्रतीक है।
- भाषा एवं अलंकार: तत्सम पदावली तथा रूपक, उत्प्रेक्षा जैसे अलंकारों का सुंदर प्रयोग।
इस प्रकार, ‘असाध्य वीणा’ निराला के काव्य-शिल्प का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसमें आधुनिकता एवं परंपरा का समन्वय दिखाई देता है।
निष्कर्ष
उपर्युक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि बिहारी, प्रसाद एवं निराला के काव्य में भाषा, शिल्प एवं विचार के स्तर पर उत्कृष्टता विद्यमान है। इन कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से मानवता, सौंदर्य एवं आधुनिकता के नवीन आयाम प्रस्तुत किए हैं।
Q3. निम्नलिखित सभी प्रश्नों के उत्तर दीजिए : – (a) कबीर की भक्ति और उनकी सामाजिक दृष्टि के बीच के अंतर्संबंध की विवेचना कीजिए। 20 – (b) "राम की शक्तिपूजा" एक युद्ध-विरोधी कविता है।" इस कथन की समीक्षा कीजिए। 15 – (c) 'ब्रह्मराक्षस' कविता में व्यक्त जीवन दर्शन की समीक्षा कीजिए। 15 (15 marks)
How to approach this question
इस प्रश्न में तीनों भागों का उत्तर देते हुए स्पष्ट अंतर्संबंध स्थापित करना है। (a) में कबीर की भक्ति एवं सामाजिक दृष्टि के द्वंद्व को सिद्ध करना है; (a) में ‘राम की शक्तिपूजा’ की युद्ध-विरोधी प्रवृत्ति को प्रमाणित करना है; तथा (c) में ‘ब्रह्मराक्षस’ के जीवन-दर्शन को विश्लेषित करना है। सबसे बड़ी गलती यह होती है कि तीनों भागों को अलग-अलग बाँटकर लिख दिया जाता है, जबकि उत्तर में एक प्रवाह एवं अंतर्संबंध होना चाहिए।
Model answer
कबीर की भक्ति और उनकी सामाजिक दृष्टि के अंतर्संबंध
कबीर की भक्ति निराकार निर्गुण ब्रह्म में विश्वास करती है, किंतु उनकी सामाजिक दृष्टि में यह भक्ति समाज सुधार का माध्यम बन जाती है। कबीर ने भक्ति को जाति, धर्म एवं बाह्य आडंबरों से मुक्त किया। उनके अनुसार ‘सब घट राम’ की भावना समाज में समानता स्थापित करती है। ‘मोको कहाँ ढूँढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास में’ जैसी रचनाओं में उन्होंने बाह्य पूजा का विरोध किया तथा अंतरात्मा की शुद्धता पर बल दिया।
‘राम की शक्तिपूजा’ : एक युद्ध-विरोधी कविता
‘राम की शक्तिपूजा’ निराला की ऐसी कविता है जो युद्ध के परिणामों को गहराई से चित्रित करती है। इसमें राम की शक्ति पूजा के माध्यम से युद्ध की विभीषिका को दिखाया गया है। ‘राम की शक्तिपूजा’ में युद्ध के बाद के शोक और मानवीय पीड़ा को प्रमुखता दी गई है। निराला ने युद्ध को महिमामंडित करने के बजाय उसके विनाशकारी प्रभावों को उजागर किया है।
‘ब्रह्मराक्षस’ में व्यक्त जीवन-दर्शन
‘ब्रह्मराक्षस’ निराला की एक प्रमुख कविता है जिसमें जीवन-दर्शन के रूप में निराशा एवं आशा का द्वंद्व प्रस्तुत किया गया है। इसमें ब्रह्मराक्षस के माध्यम से मानव जीवन की क्षणिकता और मृत्यु के बाद की स्थिति को दर्शाया गया है। निराला ने इस कविता में जीवन के प्रति निराशावादी दृष्टिकोण अपनाया है, किंतु साथ ही मानव जीवन की गरिमा को भी रेखांकित किया है।
निष्कर्ष
कबीर की भक्ति एवं सामाजिक दृष्टि, निराला की युद्ध-विरोधी कविता एवं ‘ब्रह्मराक्षस’ का जीवन-दर्शन तीनों ही भारतीय साहित्य के महत्वपूर्ण पहलुओं को प्रतिबिंबित करते हैं। इनके माध्यम से साहित्यकारों ने समाज, युद्ध एवं जीवन के प्रति अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट किया है।
Q4. निम्नलिखित सभी प्रश्नों के उत्तर दीजिए : – (a) 'पद्मावत' के आधार पर जायसी की स्त्री-दृष्टि का विश्लेषण कीजिए। 20 – (b) कुरुक्षेत्र "अन्ततः एक साधारण मनुष्य का शंकाकुल हृदय ही है, जो मस्तिष्क के स्तर पर चढ़कर बोल रहा है।" इस कथन की व्याख्या कीजिए। 15 – (c) दलित विमर्श के परिप्रेक्ष्य में 'हरिजन गाथा' कविता की समीक्षा कीजिए। 15 (15 marks)
How to approach this question
इस प्रश्न के तीन भाग हैं – (a) ‘पद्मावत’ में जायसी की स्त्री-दृष्टि, (b) ‘कुरुक्षेत्र’ में मनुष्य की शंकाओं का उद्घाटन, तथा (c) ‘हरिजन गाथा’ का दलित विमर्श की रोशनी में मूल्यांकन। प्रत्येक भाग में कवि की अन्तर्दृष्टि, शिल्पगत विशेषताएँ और सामाजिक संदर्भ को जोड़ना अपेक्षित है। सामान्यतः विद्यार्थी केवल साहित्यिक विश्लेषण तक सीमित रह जाते हैं और सामाजिक-ऐतिहासिक संदर्भ को पर्याप्त स्थान नहीं देते।
Model answer
स्त्री-दृष्टि के बहुआयामी स्वरूप का चित्रण
मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित ‘पद्मावत’ में स्त्री-दृष्टि केवल पारम्परिक दास्य भाव तक सीमित नहीं, अपितु वह स्वतंत्रता, प्रेम और आत्म-सम्मान की पक्षधर है। पद्मावती के चरित्र में जहाँ त्याग, धैर्य और पतिव्रत धर्म की परम्परागत छवि है, वहीं ‘कुछ दिन बीति गये, कुछ दिन बीति गये’ जैसे उद्गारों से उसके अन्तर्मन की व्यथा भी मुखरित होती है। जायसी ने स्त्री को केवल प्रेमिका या पत्नी के रूप में चित्रित न कर उसे आत्मनिर्णय का अधिकार दिया है। पद्मावती का ‘जायसी’ को सम्बोधित कथन—‘तुम्हारे काव्य में मेरी कथा है’—इस बात का प्रमाण है कि उन्होंने स्त्री-कथा को पुरुष-प्रधान समाज में स्थान दिलाया।
‘कुरुक्षेत्र’ में मनुष्य का शंकाकुल हृदय
‘कुरुक्षेत्र’ में रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने युद्ध के पश्चात् मनुष्य के अन्तर्द्वन्द्व को अत्यन्त सहजता से प्रस्तुत किया है। यहाँ कृष्ण का उपदेश केवल दार्शनिक सिद्धान्त नहीं, अपितु एक साधारण मनुष्य की पीड़ा का स्वरूप ग्रहण करता है। ‘क्या हुआ जो युद्ध हुआ? क्या हुआ जो लाखों मरे?’ जैसे प्रश्नों के माध्यम से दिनकर युद्ध की निरर्थकता को रेखांकित करते हैं। कृष्ण का कथन—‘अहिंसा परमो धर्मः’—अन्ततः एक ऐसे मनुष्य की आवाज़ है जो युद्ध के पश्चात् स्वयं से ही सवाल कर रहा है। यह कृति मनुष्य की संवेदनशीलता और नैतिक द्वन्द्व का जीवंत दस्तावेज है।
‘हरिजन गाथा’ में दलित विमर्श
नागार्जुन की ‘हरिजन गाथा’ दलित समाज की पीड़ा और संघर्ष का जीवंत चित्रण है। इस कविता में हरिजन समाज की गरीबी, अपमान और सामाजिक बहिष्कार को अत्यन्त मार्मिकता से प्रस्तुत किया गया है। ‘काला है सो काला है, पर काला क्यों है?’ जैसे प्रश्नों के माध्यम से नागार्जुन ने जातिगत भेदभाव के मूल कारणों की ओर संकेत किया है। ‘हरिजन गाथा’ केवल एक कविता नहीं, अपितु दलित मुक्ति का आह्वान है। इस कृति के माध्यम से नागार्जुन ने दलित समाज की आवाज़ को राष्ट्रीय स्तर पर पहुँचाया।
Q5. निम्नलिखित सभी प्रश्नों के उत्तर दीजिए : निम्नलिखित अवतरणों की सप्रसंग व्याख्या लगभग 150 शब्दों (प्रत्येक) में कीजिए : $10 \times 5 = 50$ (a) वह न बैकुंठ जाएगी तो क्या ये मोटे-मोटे लोग जाएँगे, जो गरीबों को दोनों हाथों से लूटते हैं, और अपने पाप को धोने के लिए गंगा में नहाते हैं और मंदिरों में जल चढ़ाते हैं। 10 (b) उन्हें आसन से उठते देख, हाथ जोड़कर उसने निवेदन किया – “परंतु देव, भगवान तथागत ने तो वेश्या अंबपाली को भी संघ में शरण दी थी।” “वेश्या स्वतंत्र नारी है, देवी।” स्थविर ने आसन से उठते हुए उत्तर दिया। 10 (c) बावन ने दो आजाद देशों की, हिंदुस्तान और पाकिस्तान की ईमानदारी को, इंसानियत को बस दो डग में ही नाप लिया। 10 (d) छायावादी मुहावरे में कहा जाता है कि ‘मरकत शिला पर हीरक कण’ बिखरे हैं। लेकिन मैं छायावादी नहीं हूँ और मुझे दूब की हरियाली पर ओस मरकत शिला पर हीरक कण की अपेक्षा कहीं अधिक सुंदर और प्राणवान दिखती है। 10 (e) जिस मीरा को मैंने वर्षों जाना है, वह अब पास-सी नहीं लगती, अपनी-सी नहीं लगती। उसे मैंने छू-छू कर छुआ था, चूम-चूम कर चूमा था, पर मन पर जब मोह और प्यार की उछलन आती है, तो मीरा नहीं मन्नों की आँखें ही सगी दिखती हैं। 10 (15 marks)
How to approach this question
इस प्रश्न में सप्रसंग व्याख्या की माँग है—अर्थात् दिए गए अवतरण के संदर्भ को स्पष्ट करते हुए उसकी व्याख्या करना। परीक्षक यहाँ साहित्यिक बोध, संदर्भ ज्ञान, एवं भाषायी सूक्ष्मता का परीक्षण करते हैं। सर्वोत्तम उत्तर में तीन बातें अनिवार्य हैं: (1) अवतरण का शाब्दिक अर्थ, (2) साहित्यिक/ऐतिहासिक/दार्शनिक संदर्भ (जैसे लेखक, रचना, पात्र, विचारधारा), तथा (3) निहितार्थ एवं आधुनिक प्रासंगिकता। सबसे बड़ी गलती है संदर्भ को छोड़कर केवल शब्दार्थ तक सीमित रह जाना।
Model answer
अवतरण (a):
यह अवतरण प्रसिद्ध कथाकार मोहन राकेश के उपन्यास ‘अंधेरे बंद कमरे’ से लिया गया है। इसमें नायक विजय समाज के धनी वर्ग के पाखंड पर तीखा प्रहार करता है। वह कहता है कि समाज के वे लोग स्वर्ग नहीं जाएँगे जो गरीबों का शोषण करते हैं, फिर धर्म के नाम पर स्वयं को पवित्र साबित करने के लिए गंगा-स्नान और मंदिरों में जल चढ़ाते हैं। यहाँ विडंबना यह है कि शोषणकर्ता अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए बाहरी आडंबर रचते हैं, जबकि वास्तविक पाप उनके कर्मों में है। यह अवतरण वर्ग संघर्ष और सामाजिक असमानता को उजागर करता है तथा धार्मिक आडंबर पर व्यंग्य करता है।
अवतरण (b):
यह अवतरण भगवतीचरण वर्मा के उपन्यास ‘भूले-बिसरे लोग’ से लिया गया है। इसमें बुद्ध संघ में प्रवेश के लिए एक महिला द्वारा की गई प्रार्थना का वर्णन है। स्थविर (बुद्ध संघ के सदस्य) उसे आश्वस्त करते हुए कहते हैं कि भगवान बुद्ध ने स्वयं वेश्या अंबपाली को संघ में स्थान दिया था। यहाँ स्त्री स्वतंत्रता और सामाजिक समावेशिता का प्रश्न उठाया गया है। स्थविर का उत्तर इस बात का प्रतीक है कि बुद्ध धर्म में सभी वर्गों के लिए समान स्थान है। यह अवतरण बौद्ध दर्शन की उदारता को रेखांकित करता है।
अवतरण (c):
यह अवतरण यशपाल के उपन्यास ‘झूठा सच’ से लिया गया है। इसमें पात्र बावन द्वारा भारत और पाकिस्तान के विभाजन के बाद उत्पन्न मानवीय संकट का चित्रण किया गया है। वह दोनों देशों की ईमानदारी और मानवता को केवल दो डग में ही नाप लेता है—अर्थात् विभाजन के बाद दोनों देशों में फैले दंगे, हिंसा और शरणार्थी संकट को देखकर उसका विश्वास टूट जाता है। यह अवतरण विभाजन के दर्द और मानवता के क्षरण को व्यक्त करता है।
अवतरण (d):
यह अवतरण सुमित्रानंदन पंत की कविता ‘ग्राम्या’ से लिया गया है। यहाँ कवि छायावादी सौंदर्यबोध से स्वयं को अलग करते हुए ग्रामीण प्रकृति की सरलता और जीवंतता को महत्त्व देते हैं। वह कहते हैं कि छायावादी कवियों के अनुसार ‘मरकत शिला पर हीरक कण’ (पन्ने पर हीरे के कण) सुंदर होते हैं, परंतु उन्हें दूब की हरियाली और ओस कहीं अधिक सुंदर और प्राणवान लगती है। यह अवतरण प्रकृति के प्रति कवि के दृष्टिकोण में आए बदलाव को दर्शाता है।
अवतरण (e):
यह अवतरण महादेवी वर्मा की रचना ‘मेरा परिवार’ से लिया गया है। इसमें कवयित्री मीरा के प्रति अपने प्रेम और मोह का वर्णन करती हैं। वह कहती हैं कि मीरा अब उन्हें पास-सी नहीं लगती, स्वयं की नहीं लगती—अर्थात् उनके मन में मीरा के प्रति जो प्रेम था, वह अब वास्तविकता से दूर हो गया है। यह अवतरण स्मृति और वर्तमान के द्वंद्व को व्यक्त करता है तथा आध्यात्मिक प्रेम और मानवीय संबंधों के बीच के अंतर को स्पष्ट करता है।
निष्कर्ष: ये अवतरण भारतीय साहित्य के विविध आयामों—सामाजिक विषमता, धार्मिक आडंबर, मानवता का क्षरण, प्रकृति प्रेम, और स्मृति के द्वंद्व—को उजागर करते हैं। इनकी व्याख्या करते समय साहित्यिक संदर्भ, पात्रों के मनोभाव, और निहितार्थों को स्पष्ट करना अनिवार्य है।
Q6. निम्नलिखित सभी प्रश्नों के उत्तर दीजिए : (a) ‘गोदान’ के आधार पर प्रेमचंद के उपन्यास-विषयक दृष्टिकोण की विवेचना कीजिए। 20 (b) “स्कन्दगुप्त” ऐतिहासिक कथानक के बावजूद अपने समय के राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रश्नों पर विचार करता है।” इस कथन की सोदाहरण समीक्षा कीजिए। 15 (c) ‘कविता क्या है’ निबंध के आधार पर रामचंद्र शुक्ल की सौंदर्य दृष्टि की विवेचना कीजिए। 15 (15 marks)
How to approach this question
इस प्रश्न में ‘गोदान’ के आधार पर प्रेमचंद के उपन्यास-विषयक दृष्टिकोण की विवेचना करने को कहा गया है। परीक्षक यहाँ प्रेमचंद के साहित्यिक दृष्टिकोण, उनकी सामाजिक चेतना तथा उपन्यास-विधा के प्रति उनकी अवधारणा का मूल्यांकन करना चाहता है। एक पूर्ण उत्तर में तीन भाग अनिवार्य हैं: (1) प्रेमचंद के उपन्यासों के प्रमुख विषय-वस्तु एवं पात्र, (2) उनकी शिल्पगत विशेषताएँ एवं शैली, (3) उनके साहित्यिक दृष्टिकोण का सामाजिक-ऐतिहासिक संदर्भ। अधिकांश अभ्यर्थी प्रेमचंद के उपन्यासों को केवल सामाजिक यथार्थवाद तक सीमित कर देते हैं, जबकि उनकी दृष्टि में मानवीय करुणा, ग्रामीण जीवन की विडंबनाएँ तथा राष्ट्रीय चेतना का त्रिवेणी प्रवाह भी शामिल है।
Model answer
प्रेमचंद के उपन्यास-विषयक दृष्टिकोण का ‘गोदान’ के आलोक में विवेचन
प्रेमचंद हिंदी उपन्यास के जनक माने जाते हैं। उनका उपन्यास ‘गोदान’ केवल एक कथात्मक रचना नहीं, अपितु भारतीय ग्रामीण समाज की जीवंत तस्वीर है। प्रेमचंद के उपन्यास-विषयक दृष्टिकोण में मानवतावाद, सामाजिक यथार्थवाद तथा राष्ट्रीय चेतना के तत्त्व प्रमुख हैं। ‘गोदान’ में इन्हीं तत्त्वों की अभिव्यक्ति होती है।
1. मानवतावाद एवं करुणा
‘गोदान’ में प्रेमचंद ने मानवतावादी दृष्टिकोण अपनाया है। गोबर, धनिया, होरी जैसे पात्रों के माध्यम से उन्होंने मानवीय करुणा एवं संवेदनशीलता को प्रस्तुत किया है। होरी का चरित्र मानवीय दुर्बलताओं एवं संघर्षों का प्रतीक है। प्रेमचंद ने मानवीय करुणा को समाज सुधार का आधार माना है।
2. सामाजिक यथार्थवाद
‘गोदान’ में प्रेमचंद ने ग्रामीण समाज की विडंबनाओं, जाति-व्यवस्था, आर्थिक शोषण तथा सामंती व्यवस्था की कटु आलोचना की है। उन्होंने किसानों की दुर्दशा, साहूकारों के शोषण तथा सामाजिक असमानताओं को बखूबी चित्रित किया है। प्रेमचंद का सामाजिक यथार्थवाद केवल वर्णनात्मक नहीं, अपितु सुधारात्मक भी है।
3. राष्ट्रीय चेतना
‘गोदान’ में प्रेमचंद ने राष्ट्रीय चेतना को भी स्थान दिया है। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की है। प्रेमचंद के उपन्यासों में राष्ट्रीयता का स्वर स्पष्ट दिखाई देता है, जो उनकी साहित्यिक दृष्टि का महत्वपूर्ण पक्ष है।
निष्कर्ष
इस प्रकार, ‘गोदान’ प्रेमचंद के उपन्यास-विषयक दृष्टिकोण का जीवंत उदाहरण है। उन्होंने मानवतावाद, सामाजिक यथार्थवाद तथा राष्ट्रीय चेतना को अपने उपन्यासों का आधार बनाया। प्रेमचंद का साहित्यिक दृष्टिकोण आज भी प्रासंगिक है, क्योंकि उन्होंने समाज के यथार्थ को उद्घाटित कर सुधार की दिशा दिखाई है।
Q7. निम्नलिखित सभी प्रश्नों के उत्तर दीजिए : – (a) “मैला आँचल” आंचलिक उपन्यास होते हुए भी अपने समय के बदलते हुए राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य को प्रस्तुत करता है।” इस कथन की समीक्षा कीजिए। 20 – (b) “आषाढ़ का एक दिन” साहित्यकार और राजसत्ता के बीच के जटिल संबंध का परीक्षण करता है।” इस कथन की समीक्षा कीजिए। 15 – (c) ‘कुटज’ में व्यक्त जीवन-दृष्टि और उसकी निबंध-शैली का विश्लेषण कीजिए। 15 (15 marks)
How to approach this question
यह प्रश्न समीक्षा (Evaluation) की माँग करता है, जिसका अर्थ है — दिए गए कथन की सत्यता, उसकी विशेषताओं एवं सीमाओं को तर्कसंगत ढंग से प्रस्तुत करना। परीक्षक यहाँ विश्लेषणात्मक क्षमता (Analytical Skill), साहित्यिक बोध (Literary Understanding) तथा तार्किक प्रस्तुति (Logical Presentation) का मूल्यांकन करता है। सर्वोत्तम उत्तर में तीन भाग होंगे: (1) कथन की मूल भावना को समझना, (2) उसके पक्ष में प्रमाण प्रस्तुत करना, (3) विपक्ष में तर्क देते हुए संतुलित निष्कर्ष निकालना। सर्वाधिक सामान्य गलती है — केवल पक्ष में ही तर्क देना अथवा उद्धरणों का अभाव।
Model answer
‘आषाढ़ का एक दिन’ में साहित्यकार और राजसत्ता के द्वंद्व को नाटकीय रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह नाटक केवल व्यक्तिगत संघर्ष नहीं, अपितु साहित्य और सत्ता के बीच के अंतर्संबंध का प्रतीकात्मक चित्रण है।
साहित्यकार की स्वतंत्रता का संघर्ष: नाटक का नायक कालिदास, राजसत्ता द्वारा नियुक्त कवि होने के बावजूद स्वयं को स्वतंत्र रखना चाहता है। राजदरबार की चकाचौंध और दरबारी कवियों की चापलूसी के बीच वह अपनी रचनाधर्मिता को बचाए रखने का प्रयास करता है। कालिदास का वह संवाद, “मैं कवि हूँ, दरबारी नहीं”, साहित्यिक स्वतंत्रता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
राजसत्ता का दबाव: राजसत्ता साहित्यकार को अपने हित में इस्तेमाल करना चाहती है। राजा द्वारा कालिदास को राजकवि नियुक्त करने का प्रस्ताव और उसके बाद की घटनाएँ इस बात को प्रमाणित करती हैं कि सत्ता साहित्यकार को अपने नियंत्रण में रखना चाहती है। नाटक में राजसत्ता के प्रतिनिधि के रूप में आए पात्रों के माध्यम से यह दर्शाया गया है कि साहित्यकार को अपनी रचनात्मकता के लिए सत्ता से संघर्ष करना पड़ता है।
संतुलित निष्कर्ष: इस प्रकार, ‘आषाढ़ का एक दिन’ साहित्यकार और राजसत्ता के बीच के जटिल संबंध को सफलतापूर्वक प्रस्तुत करता है। यह नाटक केवल ऐतिहासिक कथा नहीं, अपितु साहित्यिक स्वतंत्रता और सत्ता के दबाव के बीच के द्वंद्व का सार्वकालिक चित्रण है।
Q8. निम्नलिखित सभी प्रश्नों के उत्तर दीजिए : – (a) “बदबू” औद्योगिक-पूँजीवादी सभ्यता की आलोचना करने वाली कहानी है।” इस कथन की समीक्षा कीजिए। 20 – (b) ‘टूटना’ कहानी के आधार पर राजेन्द्र यादव की कथा-दृष्टि का विश्लेषण कीजिए। 15 – (c) गुलाब राय के निबंध ‘भारतीय संस्कृति’ में व्यक्त सांस्कृतिक दृष्टि की विवेचना कीजिए। 15 (15 marks)
How to approach this question
यह प्रश्न तीन भागों में विभाजित है: (a) ‘बदबू’ कहानी में औद्योगिक-पूँजीवादी सभ्यता की आलोचना का मूल्यांकन, (b) ‘टूटना’ कहानी के माध्यम से राजेन्द्र यादव की कथा-दृष्टि का विश्लेषण, और (c) गुलाब राय के निबंध ‘भारतीय संस्कृति’ में निहित सांस्कृतिक दृष्टि की विवेचना। परीक्षक यहाँ साहित्यिक विश्लेषण, सैद्धांतिक समझ, और सांस्कृतिक बोध की जाँच कर रहा है। सबसे बड़ी गलती होती है उत्तर को केवल कथानक तक सीमित कर देना—अर्थ की गहराई, लेखकीय दृष्टि, और सन्दर्भों का समावेश आवश्यक है।
Model answer
प्रस्तुत प्रश्नों के उत्तर निम्नलिखित हैं:
(a) “बदबू” औद्योगिक-पूँजीवादी सभ्यता की आलोचना करने वाली कहानी है।” इस कथन की समीक्षा
‘बदबू’ कहानी में मनोहर श्याम जोशी ने औद्योगिक पूँजीवाद के अमानवीय चेहरे को ‘बदबू’ के प्रतीक के माध्यम से उजागर किया है। कहानी का कथानक एक औद्योगिक नगर में फैले प्रदूषण और मानवीय संवेदनाओं के क्षरण को दर्शाता है। ‘बदबू’ केवल दुर्गन्ध नहीं, बल्कि पूँजीवाद की उस व्यवस्था का प्रतीक है जो मनुष्य को वस्तु में बदल देती है। कहानी में वर्णित कारखानों का धुआँ, गंदगी, और मानवीय अस्मिता का हनन इस बात का प्रमाण है कि औद्योगिक विकास मानवीय मूल्यों का बलिदान कर रहा है। जोशी जी की यह कहानी न केवल पर्यावरणीय चेतना जगाती है, बल्कि पूँजीवाद के अन्तर्निहित शोषणकारी तंत्र को भी चुनौती देती है।
(b) ‘टूटना’ कहानी के आधार पर राजेन्द्र यादव की कथा-दृष्टि का विश्लेषण
राजेन्द्र यादव की कहानी ‘टूटना’ आधुनिक मनुष्य की टूटन और अस्मिता के संकट को केंद्र में रखती है। कहानी का नायक एक ऐसे व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है जो पारम्परिक मूल्यों और आधुनिकता के द्वन्द्व में फँसा हुआ है। यादव जी की कथा-दृष्टि मनुष्य की अन्तर्द्वन्द्वात्मक स्थिति को उजागर करती है—जहाँ वह स्वतंत्रता चाहता है, परन्तु सामाजिक बन्धनों से मुक्त नहीं हो पाता। ‘टूटना’ में वर्णित परिवार, समाज, और व्यक्तिगत आकांक्षाओं का संघर्ष आधुनिक मनुष्य की अस्मिता के विघटन का प्रतीक है। यादव जी की यह कहानी मनुष्य की टूटन को केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक विघटन के रूप में प्रस्तुत करती है।
(c) गुलाब राय के निबंध ‘भारतीय संस्कृति’ में व्यक्त सांस्कृतिक दृष्टि की विवेचना
गुलाब राय के निबंध ‘भारतीय संस्कृति’ में भारतीय संस्कृति की समग्रता और उसकी निरन्तरता पर बल दिया गया है। राय जी का मानना है कि भारतीय संस्कृति की विशेषता उसकी सहिष्णुता, विविधता, और आध्यात्मिकता में निहित है। वे भारतीय संस्कृति को एक जीवंत प्रवाह के रूप में देखते हैं, जो समय के साथ स्वयं को नवीनीकृत करती रही है। निबंध में वर्णित ‘एकात्मता’, ‘समन्वय’, और ‘अहिंसा’ जैसे सिद्धान्त भारतीय संस्कृति की मूलभूत विशेषताएँ हैं। राय जी का यह दृष्टिकोण भारतीय संस्कृति को केवल अतीत का नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य का भी मार्गदर्शक मानता है।
निष्कर्ष
उपर्युक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि ‘बदबू’ औद्योगिक पूँजीवाद की आलोचना करती है, ‘टूटना’ आधुनिक मनुष्य की अस्मिता के संकट को उजागर करती है, और गुलाब राय का निबंध भारतीय संस्कृति की निरन्तरता एवं समग्रता को रेखांकित करता है। ये सभी रचनाएँ साहित्य और संस्कृति के माध्यम से समाज के अन्तर्निहित द्वन्द्वों और मूल्यों की गहराई से पड़ताल करती हैं।
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