20 Sep कस्तूरीरंगन रिपोर्ट लागू करने की मांग: पश्चिमी घाट संरक्षण पर सरकार से अपील
✎ कस्तूरीरंगन रिपोर्ट पश्चिमी घाट में पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करती है, जिसमें क्षेत्र के 37% हिस्से को पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र (ESA) घोषित करने का प्रस्ताव है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भूगोल (भारत एवं विश्व का भौतिक, सामाजिक, आर्थिक भूगोल) | GS Paper III — पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी (संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव आकलन)
- Prelims: पश्चिमी घाट, कस्तूरीरंगन रिपोर्ट, गाडगिल रिपोर्ट, पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र (ESA), जैव विविधता हॉटस्पॉट, राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन, विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR)
- Essay: पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन, स्थानीय समुदायों के अधिकार और सतत विकास
त्वरित पुनरावृत्ति: कस्तूरीरंगन रिपोर्ट पश्चिमी घाट में पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करती है, जिसमें क्षेत्र के 37% हिस्से को पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र (ESA) घोषित करने का प्रस्ताव है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
अक्का फाउंडेशन ट्रस्ट नामक एक वकालत समूह ने पश्चिमी घाट के संरक्षण के लिए के. कस्तूरीरंगन समिति की रिपोर्ट को लागू करने की मांग करते हुए ‘चलो बेंगलुरु’ कार्यक्रम की योजना बनाई है। यह संगठन जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय चिंताओं को दूर करने के लिए सरकार से कई उपाय करने का आग्रह कर रहा है, जिसमें पश्चिमी घाट में लगभग 38 परियोजनाओं को वापस लेना भी शामिल है।
पृष्ठभूमि
- पश्चिमी घाट भारत के पश्चिमी तट के समानांतर चलने वाली एक पर्वत श्रृंखला है, जो गुजरात से लेकर केरल तक फैली हुई है। इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल (UNESCO World Heritage Site) घोषित किया गया है और यह दुनिया के आठ ‘सर्वाधिक जैव विविधता वाले हॉटस्पॉट’ में से एक है।
- पश्चिमी घाट में जैव विविधता के संरक्षण के लिए, पर्यावरण और वन मंत्रालय (Ministry of Environment and Forests) ने 2010 में माधव गाडगिल की अध्यक्षता में पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल (Western Ghats Ecology Expert Panel – WGEEP) का गठन किया था।
- गाडगिल समिति ने अपनी रिपोर्ट 2011 में प्रस्तुत की, जिसमें पश्चिमी घाट के पूरे क्षेत्र को पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र (Ecologically Sensitive Area – ESA) घोषित करने और इसे विभिन्न श्रेणियों में विभाजित करने की सिफारिश की गई थी। इस रिपोर्ट को स्थानीय समुदायों और राज्य सरकारों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा।
- गाडगिल रिपोर्ट की समीक्षा के लिए, सरकार ने 2012 में के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में एक उच्च-स्तरीय कार्य समूह (High-Level Working Group – HLWG) का गठन किया।
- कस्तूरीरंगन समिति ने अपनी रिपोर्ट 2013 में प्रस्तुत की, जिसमें पश्चिमी घाट के लगभग 37% क्षेत्र को पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र (ESA) के रूप में नामित करने की सिफारिश की गई थी। इस रिपोर्ट का उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाना था।
- कस्तूरीरंगन रिपोर्ट में खनन, ताप विद्युत संयंत्रों और अत्यधिक प्रदूषणकारी उद्योगों पर प्रतिबंध लगाने का सुझाव दिया गया था, जबकि स्थानीय समुदायों की आजीविका और विकास संबंधी चिंताओं को भी ध्यान में रखा गया था।
कस्तूरीरंगन रिपोर्ट क्या है?
- कस्तूरीरंगन रिपोर्ट पश्चिमी घाट के संरक्षण के लिए एक उच्च-स्तरीय कार्य समूह द्वारा प्रस्तुत की गई थी।
- इसने पश्चिमी घाट के कुल भौगोलिक क्षेत्र के लगभग 37% (लगभग 60,000 वर्ग किलोमीटर) को पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र (ESA) के रूप में नामित करने की सिफारिश की।
- रिपोर्ट ने ESA के भीतर खनन, उत्खनन, रेत खनन, ताप विद्युत संयंत्रों और अत्यधिक प्रदूषणकारी उद्योगों पर प्रतिबंध लगाने का सुझाव दिया।
- इसने मौजूदा वन भूमि को वन ग्रामों में बदलने और वन अधिकार अधिनियम (Forest Rights Act), 2006 के तहत स्थानीय समुदायों के अधिकारों को मान्यता देने की भी सिफारिश की।
- रिपोर्ट का उद्देश्य गाडगिल रिपोर्ट की तुलना में अधिक व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना था, ताकि पर्यावरण संरक्षण और क्षेत्र में रहने वाले लोगों की विकास संबंधी आकांक्षाओं के बीच संतुलन स्थापित किया जा सके।
- रिपोर्ट में कहा गया है कि ESA में आने वाले गांवों में विकास गतिविधियों की अनुमति ग्राम सभा (Gram Sabha) की सहमति से ही दी जानी चाहिए।
- यह रिपोर्ट पश्चिमी घाट के छह राज्यों (गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु) से संबंधित है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| पश्चिमी घाट का पारिस्थितिकीय महत्व | यह क्षेत्र जैव विविधता के हॉटस्पॉट के रूप में जाना जाता है और भारत की लगभग 30% पादप प्रजातियों का घर है। यह कई नदियों का उद्गम स्थल भी है। |
| कस्तूरीरंगन समिति की सिफारिशें | समिति ने पश्चिमी घाट के पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों (Ecologically Sensitive Areas – ESAs) के संरक्षण का सुझाव दिया, जिसमें खनन, उत्खनन और अत्यधिक प्रदूषणकारी उद्योगों पर प्रतिबंध शामिल है। |
| स्थानीय समुदायों की चिंताएँ | रिपोर्ट के कार्यान्वयन से प्रभावित होने वाले स्थानीय किसानों और निवासियों को अपनी आजीविका और भूमि अधिकारों के संबंध में चिंताएँ हैं। |
| जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संरक्षण | संगठन जलवायु आपातकाल घोषित करने, एकल-उपयोग प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाने और विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (Extended Producer Responsibility – EPR) प्रणाली को सख्ती से लागू करने की मांग कर रहा है। |
महत्व
पर्यावरण संरक्षण
- पश्चिमी घाट भारत के सबसे महत्वपूर्ण जैव विविधता हॉटस्पॉट में से एक है। इसका संरक्षण न केवल पारिस्थितिकी संतुलन के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में भी सहायक है।
- कस्तूरीरंगन रिपोर्ट का कार्यान्वयन इस क्षेत्र की नाजुक पारिस्थितिकी को बचाने और सतत विकास (Sustainable Development) सुनिश्चित करने में मदद करेगा।
सामाजिक-आर्थिक प्रभाव
- रिपोर्ट के कार्यान्वयन से स्थानीय समुदायों, विशेषकर किसानों की आजीविका पर पड़ने वाले प्रभावों को संतुलित करना महत्वपूर्ण है। भूमि स्वामित्व और सरकारी लाभों तक पहुँच सुनिश्चित करना आवश्यक है।
- विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) जैसी प्रणालियों का सख्त कार्यान्वयन प्लास्टिक कचरा प्रबंधन में सुधार करेगा, जिससे पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य दोनों को लाभ होगा।
शासन और नीति निर्माण
- यह मामला पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाने की चुनौती को उजागर करता है। सरकार को ऐसी नीतियाँ बनानी होंगी जो दोनों उद्देश्यों को एक साथ प्राप्त कर सकें।
- वन-संबंधी कानूनों में संशोधन की मांग भूमिहीन किसानों को अधिकार प्रदान करने और उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने में सक्षम बनाने के लिए महत्वपूर्ण है।
चुनौतियाँ
1. पर्यावरण बनाम विकास
- पश्चिमी घाट में प्रस्तावित विकास परियोजनाएँ (जैसे नदी-जोड़ो परियोजनाएँ, रेलवे परियोजनाएँ) पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती हैं, जबकि इन परियोजनाओं को अक्सर क्षेत्रीय विकास के लिए आवश्यक माना जाता है।
- पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाना एक जटिल नीतिगत चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण संरक्षण; सतत विकास
2. स्थानीय समुदायों की आजीविका और अधिकार
- कस्तूरीरंगन रिपोर्ट के कार्यान्वयन से पश्चिमी घाट में रहने वाले किसानों और आदिवासी समुदायों की आजीविका प्रभावित होने की आशंका है।
- वन-संबंधी कानूनों के कारण भूमि स्वामित्व के दस्तावेज़ों की कमी से किसानों को सरकारी योजनाओं और बैंक ऋणों तक पहुँचने में समस्या होती है।
यूपीएससी लिंक: आदिवासी अधिकार; भूमि सुधार
3. जलवायु परिवर्तन के प्रभाव
- जलवायु परिवर्तन के कारण सुपारी, कॉफी और काली मिर्च जैसी फसलों को प्रभावित करने वाले रोगों में वृद्धि हुई है, जिससे कृषि समुदाय प्रभावित हो रहे हैं।
- जलवायु आपातकाल की घोषणा और ठोस उपायों का अभाव इस क्षेत्र की संवेदनशीलता को और बढ़ा रहा है।
यूपीएससी लिंक: जलवायु परिवर्तन; कृषि पर प्रभाव
4. कचरा प्रबंधन
- एकल-उपयोग प्लास्टिक पर प्रतिबंध का सख्त प्रवर्तन और विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) प्रणाली का प्रभावी कार्यान्वयन एक चुनौती बना हुआ है।
- बाजार में प्लास्टिक की आसान उपलब्धता और वैकल्पिक उत्पादों को बढ़ावा देने में कमी एक बड़ी समस्या है।
यूपीएससी लिंक: ठोस अपशिष्ट प्रबंधन; प्लास्टिक प्रदूषण
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| कस्तूरीरंगन रिपोर्ट का कार्यान्वयन | स्थानीय समुदायों की आजीविका पर संभावित नकारात्मक प्रभाव और भूमि अधिकारों का मुद्दा। |
| विकास परियोजनाएँ | शरावती पंप स्टोरेज परियोजना, नदी-जोड़ो परियोजनाएँ और रेलवे परियोजनाएँ पश्चिमी घाट की पारिस्थितिकी को नुकसान पहुँचा सकती हैं। |
| भूमि स्वामित्व | वन-संबंधी कानूनों के कारण किसानों के पास उचित भूमि स्वामित्व दस्तावेज़ों की कमी, जिससे उन्हें सरकारी लाभों से वंचित होना पड़ता है। |
| एकल-उपयोग प्लास्टिक | प्रतिबंध का अपर्याप्त प्रवर्तन और बाजार में प्लास्टिक की आसान उपलब्धता। |
| जलवायु परिवर्तन | कृषि फसलों पर बढ़ते रोग और जलवायु आपातकाल से निपटने के लिए ठोस उपायों का अभाव। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (Extended Producer Responsibility – EPR)
आगे की राह
- कस्तूरीरंगन रिपोर्ट की सिफारिशों को स्थानीय समुदायों के साथ परामर्श करके, उनकी चिंताओं को दूर करते हुए और उनकी आजीविका को सुरक्षित रखते हुए लागू किया जाना चाहिए।
- पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्रों में प्रस्तावित विकास परियोजनाओं का गहन पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment – EIA) किया जाना चाहिए और केवल उन्हीं परियोजनाओं को अनुमति दी जानी चाहिए जो न्यूनतम पर्यावरणीय क्षति पहुँचाती हों।
- वन-संबंधी कानूनों में संशोधन करके भूमिहीन किसानों को उचित भूमि स्वामित्व अधिकार प्रदान किए जाने चाहिए, जिससे वे सरकारी योजनाओं और वित्तीय सहायता का लाभ उठा सकें।
- एकल-उपयोग प्लास्टिक पर प्रतिबंध को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए और इसके विकल्पों (जैसे कपड़े के थैले) को बढ़ावा देने के लिए व्यापक जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए।
- विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) प्रणाली को प्रभावी ढंग से लागू किया जाना चाहिए, जिसमें निर्माताओं को उनके उत्पादों से उत्पन्न प्लास्टिक कचरे के संग्रह और पुनर्चक्रण के लिए जवाबदेह ठहराया जाए।
- जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का सामना करने के लिए कृषि क्षेत्र में अनुसंधान और विकास को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, ताकि फसलों को रोगों से बचाने और जलवायु-लचीली कृषि पद्धतियों को अपनाया जा सके।
- केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय स्थापित कर पश्चिमी घाट के संरक्षण और स्थानीय समुदायों के कल्याण के लिए एक समग्र नीति ढाँचा विकसित किया जाना चाहिए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
पश्चिमी घाट · कस्तूरीरंगन समिति रिपोर्ट · पर्यावरण संरक्षण · पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र · वन अधिकार अधिनियम · जलवायु परिवर्तन · सतत विकास · स्थानीय समुदायों के अधिकार · नदी जोड़ो परियोजनाएँ · विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘अनुच्छेद 48A’: ‘पर्यावरण का संरक्षण और सुधार’}
- {‘अनुच्छेद 51A(g)’: ‘प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और संवर्धन’}
- {‘सातवीं अनुसूची (समवर्ती सूची)’: ‘वन, वन्य जीवों और पक्षियों का संरक्षण’}
अवधारणा प्रवाह
पश्चिमी घाट का पारिस्थितिकीय महत्व और संवेदनशीलता → कस्तूरीरंगन समिति की रिपोर्ट में संरक्षण की सिफारिशें → स्थानीय समुदायों की आजीविका और भूमि अधिकारों पर संभावित प्रभाव → पर्यावरण संरक्षण बनाम विकास का द्वंद्व → जलवायु परिवर्तन और कचरा प्रबंधन की चुनौतियाँ → सरकार द्वारा संतुलित नीतियों और कार्यान्वयन की आवश्यकता
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. पश्चिमी घाट एक यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है और जैव विविधता के हॉटस्पॉट के रूप में जाना जाता है।
2. माधव गाडगिल समिति की रिपोर्ट ने पश्चिमी घाट के संरक्षण के लिए कस्तूरीरंगन समिति की रिपोर्ट की तुलना में अधिक कठोर सिफारिशें की थीं।
3. कस्तूरीरंगन समिति ने पश्चिमी घाट के लगभग 37% क्षेत्र को पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र (Ecologically Sensitive Area – ESA) के रूप में नामित करने का सुझाव दिया था।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीनों
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीनों — कथन 1 सही है। पश्चिमी घाट भारत के आठ जैव विविधता हॉटस्पॉट में से एक है और इसे यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया है।
कथन 2 सही है। माधव गाडगिल समिति (पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल) की रिपोर्ट ने कस्तूरीरंगन समिति की तुलना में अधिक व्यापक और कठोर संरक्षण उपायों का सुझाव दिया था, जिसमें पूरे पश्चिमी घाट को पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र घोषित करना शामिल था।
कथन 3 सही है। कस्तूरीरंगन समिति ने पश्चिमी घाट के लगभग 37% क्षेत्र को पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र के रूप में नामित करने की सिफारिश की थी, जिसमें खनन और कुछ उद्योगों पर प्रतिबंध लगाने का सुझाव दिया गया था।
Q2. कस्तूरीरंगन समिति की रिपोर्ट, जो हाल ही में खबरों में थी, निम्नलिखित में से किससे संबंधित है?
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति में सुधार
- पश्चिमी घाट का संरक्षण
- भारत में अंतरिक्ष अनुसंधान का विकास
- कृषि ऋण माफी योजना
उत्तर: पश्चिमी घाट का संरक्षण — कस्तूरीरंगन समिति की रिपोर्ट पश्चिमी घाट के संरक्षण और प्रबंधन से संबंधित है। इसने पश्चिमी घाट के पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान करने और उनके संरक्षण के लिए सिफारिशें की थीं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ पश्चिमी घाट के संरक्षण के संबंध में कस्तूरीरंगन समिति की रिपोर्ट की प्रमुख सिफारिशों का परीक्षण कीजिए। क्या आपको लगता है कि यह रिपोर्ट पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय समुदायों की आजीविका के बीच संतुलन स्थापित करने में सफल रही है? समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर कंकाल:
1. **परिचय:** पश्चिमी घाट के महत्व और कस्तूरीरंगन समिति के गठन का संक्षिप्त उल्लेख।
2. **कस्तूरीरंगन समिति की प्रमुख सिफारिशें:**
* पश्चिमी घाट के 37% क्षेत्र को पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र (ESA) घोषित करना।
* ESA में खनन, ताप विद्युत संयंत्रों और अत्यधिक प्रदूषणकारी उद्योगों पर प्रतिबंध।
* नदी जोड़ो परियोजनाओं और बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर प्रतिबंध या सख्त विनियमन।
* स्थानीय समुदायों की भागीदारी और ग्राम सभाओं को सशक्त बनाना।
* वन अधिकार अधिनियम (Forest Rights Act – FRA), 2006 का प्रभावी कार्यान्वयन।
3. **पर्यावरण संरक्षण और आजीविका के बीच संतुलन पर विश्लेषण:**
* **सफलता के पक्ष में तर्क:** जैव विविधता संरक्षण, पारिस्थितिकीय अखंडता की रक्षा, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करना।
* **चुनौतियाँ/आलोचनाएँ:** स्थानीय समुदायों, विशेषकर किसानों की चिंताएँ (भूमि स्वामित्व, विकास परियोजनाओं का विरोध), विकास बनाम संरक्षण का द्वंद्व, रिपोर्ट के कार्यान्वयन में देरी और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी।
* माधव गाडगिल समिति की रिपोर्ट से तुलना और उसके अधिक कठोर सुझावों का उल्लेख।
4. **निष्कर्ष:** एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करें जिसमें पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता और स्थानीय समुदायों के अधिकारों एवं आजीविका की सुरक्षा के बीच सामंजस्य स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया गया हो।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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