20 Oct केरल उच्च न्यायालय का फैसला: मंदिरों के हाथी जुलूस के पंजीकरण में समय सीमा बढ़ाने से इनकार
✎ उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्धारित समय-सीमा (अनुच्छेद 141 के अंतर्गत बाध्यकारी) को न उच्च न्यायालय और न राज्य सरकार बढ़ा सकते हैं; हाथी वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची I में है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — राजव्यवस्था (न्यायपालिका: अनुच्छेद 141, अनुच्छेद 142 और अनुच्छेद 226 की भूमिका) | GS Paper III — पर्यावरण और जैव विविधता (वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972; एशियाई हाथी का संरक्षण; Project Elephant)
- Prelims: वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची I में हाथी का स्थान, Kerala Captive Elephant (Management and Maintenance) Rules, 2012 और जिला समिति, अनुच्छेद 141 (उच्चतम न्यायालय के निर्णय की सर्वव्यापी बाध्यता), अनुच्छेद 142 (पूर्ण न्याय करने की शक्ति), अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता), Project Elephant (MoEFCC, 1992), एशियाई हाथी (Asian Elephant) की IUCN स्थिति: लुप्तप्राय (Endangered), बंदी हाथी (Captive Elephant) की अवधारणा और पंजीकरण की अनिवार्यता
- Essay: संरक्षण और सांस्कृतिक परंपरा के बीच संतुलन: क्या धार्मिक उत्सवों में पशु-उपयोग का नियमन आवश्यक है?, न्यायिक आदेशों की समय-सीमा और विधि का शासन: न्यायिक अनुशासन का महत्व
त्वरित पुनरावृत्ति: उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्धारित समय-सीमा (अनुच्छेद 141 के अंतर्गत बाध्यकारी) को न उच्च न्यायालय और न राज्य सरकार बढ़ा सकते हैं; हाथी वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची I में है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केरल उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्धारित पंजीकरण की समय-सीमा को न तो उच्च न्यायालय बढ़ा सकता है और न ही राज्य सरकार। न्यायाधीश बेचू कुरियन थॉमस के अनुसार, उच्चतम न्यायालय द्वारा दी गई अवधि का विस्तार किए बिना उच्च न्यायालय के लिए विलंब से पंजीकरण का निर्देश देना, या विस्तार के आवेदन पर विचार करने का निर्देश देना उचित नहीं है। याचिका एक मंदिर के न्यासी और अध्यक्ष की ओर से थी, जिसमें मंदिर को जिला समिति में पंजीकृत करने और उत्सव में हाथी-जुलूस की अनुमति माँगी गई थी। न्यायालय ने माना कि उच्चतम न्यायालय ने मंदिरों और देवस्वमों के लिए पंजीकरण को प्रभावी नियंत्रण हेतु आवश्यक माना था, और समय-सीमा अगस्त 2015 से केवल छह सप्ताह की थी। यह मामला विधि के शासन, न्यायिक आदेशों की बाध्यता और पशु-संरक्षण नियमों के प्रशासनिक क्रियान्वयन, तीनों से जुड़ा है।
पृष्ठभूमि
- वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत हाथी को अनुसूची I में रखा गया है, जिसे सर्वोच्च संरक्षण प्राप्त है। बंदी हाथियों का प्रबंधन इसी अधिनियम के अंतर्गत बने नियमों से होता है।
- केरल में मंदिरों और देवस्वमों द्वारा बंदी हाथियों के उपयोग, विशेषकर उत्सवों के जुलूसों में, को लेकर न्यायिक हस्तक्षेप का लंबा इतिहास है। उच्चतम न्यायालय ने 18 अगस्त 2015 के आदेश में मंदिरों और देवस्वमों को छह सप्ताह के भीतर जिला समिति में पंजीकरण कराने का निर्देश दिया था।
- Kerala Captive Elephant (Management and Maintenance) Rules, 2012 के अंतर्गत जिला स्तर पर समिति गठित की गई, जो हाथियों के पंजीकरण, स्वास्थ्य और उपयोग की अनुमति से संबंधित है।
- राज्य सरकार ने अप्रैल 2022 में उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के सख्त क्रियान्वयन के लिए हाथी-परेड के पंजीकरण की अनुमति देने वाला आदेश जारी किया था।
- याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि नियम बनने के बाद भी वे उत्सवों में हाथी-जुलूस निकालते रहे हैं और उच्चतम न्यायालय ने केवल नियमों के क्रियान्वयन का निर्देश दिया था, कठोर समय-सीमा नहीं। वन विभाग के सहायक संरक्षक ने बताया कि विस्तारित अवधि में 84 आवेदन प्राप्त हुए, फिर भी याचिकाकर्ता के मंदिर ने कोई आवेदन नहीं दिया।
बंदी हाथी प्रबंधन और न्यायिक आदेशों की बाध्यता क्या है?
- हाथी वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची I में है, और एशियाई हाथी IUCN की रेड लिस्ट में लुप्तप्राय (Endangered) श्रेणी में है।
- Project Elephant (परियोजना हाथी) वर्ष 1992 में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) द्वारा आरंभ की गई, जिसका उद्देश्य हाथियों के आवास और गलियारों का संरक्षण है।
- बंदी हाथियों का प्रबंधन राज्य स्तर पर बने नियमों से होता है; केरल में यह Kerala Captive Elephant (Management and Maintenance) Rules, 2012 के अंतर्गत आता है।
- जिला समिति बंदी हाथियों का पंजीकरण करती है और यह सुनिश्चित करती है कि हाथी का उपयोग स्वास्थ्य और सुरक्षा मानकों के अनुरूप हो।
- अनुच्छेद 141 के अनुसार उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित विधि भारत के सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी है, इसलिए उसके द्वारा निर्धारित समय-सीमा को निचली या समकक्ष न्यायालय स्वयं नहीं बदल सकते।
- अनुच्छेद 142 उच्चतम न्यायालय को पूर्ण न्याय करने की असाधारण शक्ति देता है, परंतु उसके द्वारा निर्धारित शर्तों में बदलाव का अधिकार उसी के पास रहता है। अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय रिट अधिकारिता का प्रयोग करता है, किंतु वह उच्चतम न्यायालय के स्पष्ट आदेश का उल्लंघन नहीं कर सकता।
- अनुच्छेद 51A(छ) (मूल कर्तव्य) वन्यजीवों की रक्षा और उनके प्रति दया-भाव रखने का नागरिक कर्तव्य निर्धारित करता है, और अनुच्छेद 48A राज्य को पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण का दायित्व देता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्त्व |
|---|---|
| उच्चतम न्यायालय द्वारा तय समय-सीमा | उच्चतम न्यायालय ने 18 अगस्त 2015 से छह सप्ताह के भीतर मंदिरों और देवस्वमों (Devaswom) को जिला समिति के पास पंजीकरण कराने का निर्देश दिया था। यह समय-सीमा उसी आदेश का अभिन्न हिस्सा है। |
| केरल कैप्टिव एलिफेंट (प्रबंधन एवं रखरखाव) नियम, 2012 | केरल कैप्टिव एलिफेंट (प्रबंधन एवं रखरखाव) नियम, 2012 (Kerala Captive Elephant (Management and Maintenance) Rules, 2012) के अंतर्गत कैप्टिव हाथियों के प्रबंधन हेतु जिला समिति का गठन किया गया, जिसके पास पंजीकरण अनिवार्य है। |
| अप्रैल 2022 का राज्य सरकार का आदेश | उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के कड़े क्रियान्वयन के लिए राज्य सरकार ने हाथी जुलूस (Elephant Procession) के पंजीकरण की व्यवस्था का आदेश जारी किया। |
| विस्तारित अवधि में 84 आवेदन | विस्तारित अवधि में वन विभाग को 84 आवेदन प्राप्त हुए, जबकि याचिकाकर्ता मंदिर ने बार-बार अवसर मिलने पर भी आवेदन नहीं किया। यह प्रशासनिक प्रक्रिया की व्यावहारिक स्थिति दर्शाता है। |
| उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार | याचिका अनुच्छेद 226 के अंतर्गत दायर हुई, किंतु उच्च न्यायालय ने माना कि उसका क्षेत्राधिकार उच्चतम न्यायालय के बाध्यकारी आदेश की सीमा के भीतर ही रहता है। |
| समय-सीमा का उद्देश्य | उच्च न्यायालय ने कहा कि समय-सीमा का एक स्पष्ट उद्देश्य (Purpose) था, अर्थात् हाथियों के उपयोग पर प्रभावी और उचित नियंत्रण स्थापित करना। |
महत्व
विधिक एवं न्यायिक
- अनुच्छेद 141 के अनुसार उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित विधि सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी है। इसलिए उच्च न्यायालय उसकी समय-सीमा को विस्तार नहीं दे सकता।
- यह निर्णय न्यायिक अनुशासन (Judicial Discipline) का उदाहरण है, जिसमें निचली और समकक्ष अदालतें उच्चतम न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों की सीमा में रहती हैं।
- समय-सीमा को केवल ‘सहानुभूतिपूर्ण विचार’ के आधार पर शिथिल करने का तर्क अस्वीकार हुआ, जिससे आदेशों की निश्चितता बनी रहती है।
संवैधानिक
- अनुच्छेद 142 के अंतर्गत पूर्ण न्याय (Complete Justice) करने की शक्ति उच्चतम न्यायालय के पास है। उच्च न्यायालय अथवा राज्य सरकार इस शक्ति का प्रयोग नहीं कर सकते।
- सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची (प्रविष्टि 17ख) में वन्य जीवों का संरक्षण आता है, इसलिए केंद्रीय विधि और राज्य नियम मिलकर इस क्षेत्र को नियंत्रित करते हैं।
प्रशासनिक एवं शासन
- राज्य सरकार का 2022 का आदेश दिखाता है कि कार्यपालिका उच्चतम न्यायालय के निर्देशों को लागू करने हेतु नियमित प्रक्रिया बनाती है।
- जिला समिति और वन विभाग (सहायक संरक्षक) की भूमिका पंजीकरण, आवेदन की जाँच और निगरानी में केंद्रीय है।
पशु कल्याण एवं सामाजिक-सांस्कृतिक
- कैप्टिव हाथियों के जुलूस से संबंधित पशु कल्याण और सुरक्षा के मुद्दे नियमन के मूल में हैं। पंजीकरण से हाथियों की निगरानी और उपचार का रिकॉर्ड बनता है।
- मंदिर उत्सवों में हाथी जुलूस की परंपरा सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी है, इसलिए नियमन और परंपरा के बीच संतुलन आवश्यक है।
चुनौतियाँ
1. समय-सीमा की बाध्यकारी प्रकृति बनाम व्यावहारिक कठिनाई
- याचिकाकर्ता ने दावा किया कि वे समय-सीमा के भीतर पंजीकरण नहीं करा सके और सहानुभूतिपूर्ण विचार की माँग की।
- उच्च न्यायालय के अनुसार बिना उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए विस्तार के, विलंबित पंजीकरण या विस्तार-आवेदन पर विचार का निर्देश देना भी उचित नहीं था।
- यदि विस्तार की अनुमति दी जाती, तो अन्य मंदिर भी समान आधार पर छूट माँग सकते थे, जिससे नियम निष्प्रभावी हो जाते।
यूपीएससी लिंक: अनुच्छेद 141 एवं 142; न्यायपालिका की भूमिका तथा न्यायिक अनुशासन
2. धार्मिक परंपरा और पशु कल्याण के बीच संतुलन
- मंदिर उत्सवों में हाथी जुलूस धार्मिक परंपरा का अंग माना जाता है, जिसे अनुच्छेद 25 और 26 के अंतर्गत धार्मिक प्रथा और धार्मिक कार्यों के प्रबंधन से जोड़ा जाता है।
- इसी के साथ कैप्टिव हाथियों का कल्याण और सार्वजनिक सुरक्षा भी राज्य के दायित्व हैं, जिन्हें अनुच्छेद 48क की भावना से देखा जाता है।
- दोनों हितों में संतुलन के लिए पंजीकरण, निगरानी और नियामक शर्तों का पालन अनिवार्य हो जाता है।
यूपीएससी लिंक: मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 25-26) और राज्य नीति के निदेशक तत्व (अनुच्छेद 48क)
3. पंजीकरण प्रक्रिया का व्यावहारिक अनुपालन
- विस्तारित अवधि में 84 आवेदन प्राप्त होने के बावजूद याचिकाकर्ता मंदिर ने आवेदन नहीं किया, जो अनुपालन में कमी को दर्शाता है।
- मंत्री के समक्ष सीधे आवेदन करना और उसका अस्वीकृत होना इस बात का संकेत है कि प्रक्रिया की जानकारी और मार्ग स्पष्ट नहीं थे।
- छोटे मंदिरों और देवस्वमों के पास सीमित प्रशासनिक क्षमता होती है, जिससे समय पर औपचारिकताएँ पूरी करना कठिन होता है।
यूपीएससी लिंक: प्रशासनिक सुधार और लोक सेवा वितरण में नागरिक-केंद्रित दृष्टिकोण
4. केंद्र और राज्य के अधिकार-क्षेत्र का समन्वय
- वन्य जीव संरक्षण समवर्ती सूची का विषय है, इसलिए केंद्रीय विधि और राज्य के नियमों के बीच समन्वय आवश्यक है।
- केरल कैप्टिव एलिफेंट नियम, 2012 राज्य स्तर पर लागू हैं, जबकि उच्चतम न्यायालय के निर्देश देश की सर्वोच्च अदालत से आते हैं। दोनों के बीच स्पष्ट क्रम बनाए रखना चुनौती है।
- राज्य सरकार द्वारा विस्तार देने के प्रयास को उच्च न्यायालय ने अस्वीकार किया, जिससे कार्यपालिका की सीमाएँ स्पष्ट हुईं।
यूपीएससी लिंक: संघवाद; सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची (प्रविष्टि 17ख)
5. निगरानी और विनियमन की क्षमता
- कैप्टिव हाथियों का पंजीकरण उनके स्वास्थ्य, स्वामित्व और उपयोग की निगरानी का आधार है। पंजीकरण में विलंब से यह निगरानी प्रभावित होती है।
- जिला समिति और वन विभाग के पास निरीक्षण और अनुपालन जाँच की पर्याप्त व्यवस्था न होने पर नियम केवल कागज़ी रह जाते हैं।
यूपीएससी लिंक: वन्य जीव संरक्षण एवं सार्वजनिक प्रशासन में नियामक ढाँचा
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| समय-सीमा का विस्तार | उच्चतम न्यायालय के आदेश में विस्तार का अधिकार केवल उच्चतम न्यायालय के पास है; उच्च न्यायालय या राज्य सरकार ऐसा नहीं कर सकते, जिससे कानूनी अनिश्चितता बनी रहती है। |
| धार्मिक परंपरा का प्रश्न | हाथी जुलूस को धार्मिक उत्सव का अंग मानने वाले समुदायों की भावनाएँ और परंपरा के प्रति आग्रह नियमन में व्यावहारिक कठिनाई उत्पन्न करते हैं। |
| कैप्टिव हाथियों का कल्याण | पंजीकरण में विलंब से हाथियों के स्वास्थ्य, उपचार और कार्य-स्थितियों की निगरानी कमजोर होती है। |
| आवेदन का अनुपालन | 84 आवेदन आने के बावजूद एक मंदिर द्वारा आवेदन न करना दिखाता है कि प्रक्रिया की जानकारी और अनुपालन में अंतर है। |
| प्रशासनिक क्षमता | जिला समिति और वन विभाग के पास सीमित संसाधन हों तो निरीक्षण और सत्यापन की प्रक्रिया धीमी हो जाती है। |
| केंद्र-राज्य समन्वय | समवर्ती सूची के विषय में केंद्रीय विधि, राज्य नियम और उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के बीच तालमेल बनाए रखना आवश्यक है। |
आगे की राह
- उच्चतम न्यायालय के निर्देशों की समय-सीमा और प्रक्रिया की जानकारी मंदिरों, देवस्वमों और आयोजकों तक सरल भाषा में पहुँचाई जाए।
- जिला समिति के समक्ष पंजीकरण की ऑनलाइन या सरलीकृत प्रक्रिया बने, ताकि आवेदन की औपचारिकताएँ कम हों।
- पंजीकरण की स्थिति का नियमित सार्वजनिक रिकॉर्ड रखा जाए, जिससे अनुपालन की निगरानी संभव हो।
- कैप्टिव हाथियों के स्वास्थ्य जाँच और कल्याण मानकों को पंजीकरण की अनिवार्य शर्त बनाया जाए।
- वन विभाग और जिला समिति की क्षमता बढ़ाई जाए, जिसमें प्रशिक्षित कर्मचारी और निरीक्षण तंत्र शामिल हों।
- केंद्रीय विधि, राज्य नियमों और उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के बीच स्पष्ट समन्वय के लिए नियमित परामर्श तंत्र विकसित किया जाए।
- परंपरा और कल्याण के बीच संतुलन हेतु धार्मिक संगठनों, पशु चिकित्सकों और प्रशासन के बीच संवाद को संस्थागत रूप दिया जाए।
- समय-सीमा से संबंधित वास्तविक कठिनाइयों के लिए विधिक मार्ग, अर्थात् उच्चतम न्यायालय में उचित आवेदन, की जानकारी सुनिश्चित की जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
न्यायिक अनुशासन (Judicial Discipline) · अनुच्छेद 141 (Article 141) — उच्चतम न्यायालय के निर्णय की बाध्यता · अनुच्छेद 142 (Article 142) — पूर्ण न्याय हेतु आदेश · अनुच्छेद 226 (Article 226) — उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता · बंदी हाथी (Captive Elephant) · केरल बंदी हाथी (प्रबंधन एवं रखरखाव) नियम, 2012 (Kerala Captive Elephant (Management and Maintenance) Rules, 2012) · वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 (Wildlife (Protection) Act, 1972) · प्रोजेक्ट एलिफेंट (Project Elephant) · अनुच्छेद 25 (Article 25) — धार्मिक आचरण की स्वतंत्रता · आवश्यक धार्मिक प्रथा सिद्धांत (Essential Religious Practice Doctrine) · समय-सीमा का विधिक प्रयोजन (Legal Purpose of Time-limits)
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 141: उच्चतम न्यायालय के निर्णय बाध्यकारी
- अनुच्छेद 142: उच्चतम न्यायालय की पूर्ण न्याय शक्ति
- अनुच्छेद 226: उच्च न्यायालय की रिट शक्ति
- अनुच्छेद 25-26: धार्मिक प्रथा और धार्मिक कार्यों का प्रबंधन
- अनुच्छेद 48क: पर्यावरण और वन्य जीव संरक्षण का निर्देश
- सातवीं अनुसूची, समवर्ती सूची (प्रविष्टि 17ख): वन्य जीव संरक्षण
अवधारणा प्रवाह
2012: केरल कैप्टिव एलिफेंट (प्रबंधन एवं रखरखाव) नियम लागू हुए और जिला समिति के समक्ष पंजीकरण की व्यवस्था बनी। → 18 अगस्त 2015: उच्चतम न्यायालय ने मंदिरों और देवस्वमों को छह सप्ताह में पंजीकरण का निर्देश दिया। → अप्रैल 2022: राज्य सरकार ने उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के कड़े क्रियान्वयन हेतु हाथी जुलूस पंजीकरण का आदेश जारी किया। → विस्तारित अवधि में मंदिर ने आवेदन नहीं किया; मंत्री के समक्ष दिया गया आवेदन अस्वीकृत हुआ। → मंदिर ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर पंजीकरण और हाथी जुलूस की अनुमति माँगी। → उच्च न्यायालय ने माना कि उच्चतम न्यायालय की समय-सीमा अनुच्छेद 141 के तहत बाध्यकारी है और उसे न उच्च न्यायालय, न राज्य सरकार बढ़ा सकती है; अतः याचिका निरस्त।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 141 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित विधि भारत के सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी होती है।
2. उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्धारित समय-सीमा को अपने आदेश से विस्तारित कर सकता है।
3. संविधान का अनुच्छेद 142 उच्चतम न्यायालय को अपने समक्ष लंबित मामले में पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने हेतु आवश्यक आदेश पारित करने की शक्ति देता है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: अनुच्छेद 141 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय की घोषित विधि सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी है। कथन 2 गलत है: उच्च न्यायालय की अधिकारिता उच्चतम न्यायालय के बाध्यकारी निर्देशों के अधीन रहती है, इसलिए वह उसकी निर्धारित समय-सीमा नहीं बढ़ा सकता। कथन 3 सही है: अनुच्छेद 142 उच्चतम न्यायालय को पूर्ण न्याय हेतु आदेश देने की शक्ति प्रदान करता है। अतः केवल 1 और 3 सही हैं।
Q2. निम्नलिखित में से प्रत्येक में एक अभिकथन (A) और एक कारण (R) दिया गया है।
अभिकथन (A): केरल उच्च न्यायालय के अनुसार, उच्चतम न्यायालय द्वारा मंदिरों और देवस्वमों के पंजीकरण हेतु निर्धारित समय-सीमा को न तो उच्च न्यायालय और न ही राज्य सरकार विस्तारित कर सकती है।
कारण (R): संविधान के अनुच्छेद 141 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित विधि सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी होती है, और निचली न्यायिक इकाइयाँ उसके निर्देशों में परिवर्तन नहीं कर सकतीं।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
- (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है
- (A) और (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है
- (A) सही है, किंतु (R) गलत है
- (A) गलत है, किंतु (R) सही है
उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है — उच्चतम न्यायालय के निर्देशों में, अनुच्छेद 141 के अंतर्गत, उच्च न्यायालय या राज्य सरकार परिवर्तन नहीं कर सकते, क्योंकि वे उच्चतम न्यायालय की घोषित विधि से बंधे हैं। अतः कारण (R), अभिकथन (A) की सही व्याख्या है। अभिकथन में वर्णित निष्कर्ष इसी सिद्धांत से निकलता है।
Q3. निम्नलिखित सुमेलों पर विचार कीजिए:
सूची-I (कार्यक्रम/घटना): A. प्रोजेक्ट एलिफेंट (Project Elephant) B. वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम (Wildlife (Protection) Act) C. हाथी को राष्ट्रीय विरासत पशु घोषित किया जाना
सूची-II (वर्ष): 1. 1972 2. 1992 3. 2010
सही सुमेल चुनिए:
- A-2, B-1, C-3
- A-1, B-2, C-3
- A-3, B-1, C-2
- A-2, B-3, C-1
उत्तर: A-2, B-1, C-3 — प्रोजेक्ट एलिफेंट वर्ष 1992 में आरंभ हुआ (A-2)। वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम वर्ष 1972 में पारित हुआ (B-1)। हाथी को वर्ष 2010 में राष्ट्रीय विरासत पशु घोषित किया गया (C-3)। अतः सही सुमेल A-2, B-1, C-3 है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्धारित पंजीकरण की समय-सीमा को उच्च न्यायालय या राज्य सरकार द्वारा विस्तारित न किए जा सकने के सिद्धांत की समालोचनात्मक परीक्षा कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि क्या ऐसी समय-सीमा के भीतर पंजीकरण न करा पाने वाले धार्मिक संस्थानों के लिए अनुच्छेद 25 के आधार पर सहानुभूतिपूर्ण विचार की कोई संवैधानिक गुंजाइश बचती है। (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर संरचना (लगभग 250 शब्द): (1) भूमिका: केरल उच्च न्यायालय (न्यायमूर्ति बेचू कुरियन थॉमस) का निर्णय, जिसमें श्री मणथला शिव-पार्वती मंदिर की याचिका में उच्चतम न्यायालय द्वारा 18 अगस्त 2015 से छह सप्ताह की समय-सीमा को अविस्तारित माना गया। (2) विधिक ढाँचा: अनुच्छेद 141 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय की घोषित विधि की बाध्यता; अनुच्छेद 142 के अंतर्गत पूर्ण न्याय की शक्ति केवल उच्चतम न्यायालय के पास है, जबकि अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता उसके बाध्यकारी निर्देशों के अधीन है। न्यायिक औचित्य (Judicial Comity) और पदानुक्रम का तर्क दें। (3) समय-सीमा का प्रयोजन: उच्च न्यायालय का मत कि समय-सीमा का उद्देश्य प्रभावी नियंत्रण सुनिश्चित करना था; केरल बंदी हाथी (प्रबंधन एवं रखरखाव) नियम, 2012 और राज्य सरकार का अप्रैल 2022 का आदेश, जो उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के कठोर क्रियान्वयन हेतु पंजीकृत शोभायात्रा की अनुमति देता है। (4) तथ्य: वन विभाग के सहायक संरक्षक द्वारा विस्तारित अवधि में प्राप्त 84 आवेदनों का उल्लेख; याचिकाकर्ता द्वारा आवेदन न करना। याचिकाकर्ताओं के तर्क (निर्देश केवल कार्यान्वयन का था, कोई कठोर समय-सीमा नहीं; सहानुभूतिपूर्ण विचार से किसी को हानि नहीं) का परीक्षण। (5) धार्मिक स्वतंत्रता बनाम पशु कल्याण: अनुच्छेद 25 और आवश्यक धार्मिक प्रथा सिद्धांत (शिरूर मठ, 1954; सबरीमला निर्णय, 2018 के विवाद), वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 और प्रोजेक्ट एलिफेंट (1992) के अंतर्गत बंदी हाथियों का संरक्षण, तथा अनुच्छेद 51क(छ) के अंतर्गत नागरिकों का प्राणियों के प्रति दया-भाव का कर्तव्य। (6) विचार-संतुलन: निश्चितता और विधिक अंतिमता बनाम न्यायसंगतता; सार्वजनिक सुरक्षा व पशु-कल्याण बनाम सांस्कृतिक परंपरा। (7) निष्कर्ष: उचित मार्ग यह है कि याचिकाकर्ता उच्चतम न्यायालय में निर्देशों के संशोधन या स्पष्टीकरण हेतु आवेदन करें, या राज्य द्वारा नियमों में विधि-सम्मत संशोधन पर विचार हो; उच्च न्यायालय द्वारा स्वयं समय-सीमा बढ़ाना संवैधानिक अनुशासन के विरुद्ध होगा।
स्रोत: The Hindu
Kerala PCS (Kerala PSC (KAS)) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: केरल उच्च न्यायालय ने हाल ही में मंदिरों द्वारा हाथी जुलूस (एलीफेंट प्रोसेसन) के लिए पंजीकरण की समय सीमा बढ़ाने संबंधी याचिका पर क्या निर्णय दिया?
- उच्च न्यायालय ने स्वयं समय सीमा बढ़ाने का अधिकार रखता है।
- उच्च न्यायालय ने सरकार को समय सीमा बढ़ाने का अधिकार दिया है।
- उच्च न्यायालय ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित पंजीकरण समय सीमा को न तो उच्च न्यायालय और न ही सरकार बढ़ा सकती है।
- उच्च न्यायालय ने मंदिरों को विशेष छूट प्रदान की है।
उत्तर: उच्च न्यायालय ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित पंजीकरण समय सीमा को न तो उच्च न्यायालय और न ही सरकार बढ़ा सकती है। — केरल उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित मंदिरों के हाथी जुलूस पंजीकरण की समय सीमा को न तो उच्च न्यायालय और न ही राज्य सरकार द्वारा बढ़ाया जा सकता है।
Mains: केरल में मंदिरों द्वारा आयोजित हाथी जुलूसों के लिए पंजीकरण की समय सीमा बढ़ाने संबंधी हालिया न्यायिक निर्णय का विश्लेषण करते हुए, मंदिरों और सरकार पर इसके प्रभाव की चर्चा करें।
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