30 Oct डीपीडीपी कानून 2023: मीडिया की स्वतंत्रता पर खतरा या गोपनीयता का हनन?
✎ निजता का अधिकार पूर्ण नहीं है और प्रेस की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19(1)(a)) तथा लोक हित के बीच संतुलन के बिना डेटा संरक्षण कानून भ्रष्टाचार की खोजी पत्रकारिता को बाधित कर सकता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II — शासन एवं संविधान (मौलिक अधिकार, प्रेस की स्वतंत्रता, सूचना का अधिकार, वैधानिक निकाय) | सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र IV — सार्वजनिक प्रशासन में नैतिकता (लोक सेवकों की जवाबदेही, पारदर्शिता और सत्यनिष्ठा)
- Prelims: डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 (Digital Personal Data Protection Act, 2023), डेटा फिड्यूशरी (Data Fiduciary) और डेटा प्रिंसिपल (Data Principal), डेटा संरक्षण बोर्ड (Data Protection Board of India), धारा 17 — राज्य की संस्थाओं और शोध/सांख्यिकीय प्रयोजनों के लिए छूट, धारा 44(3) — सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 8(1)(j) में संशोधन, अनुच्छेद 19(1)(a) और अनुच्छेद 19(2) — अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और युक्तियुक्त निर्बंधन, अनुच्छेद 21 और पुट्टस्वामी मामला, 2017 — निजता मौलिक अधिकार
- Essay: सूचना का अधिकार और निजता का अधिकार: लोकतंत्र में संतुलन की कसौटी, सार्वजनिक पद पर आसीन व्यक्ति की निजता की सीमाएँ और जवाबदेही
त्वरित पुनरावृत्ति: निजता का अधिकार पूर्ण नहीं है और प्रेस की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19(1)(a)) तथा लोक हित के बीच संतुलन के बिना डेटा संरक्षण कानून भ्रष्टाचार की खोजी पत्रकारिता को बाधित कर सकता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
डिजिटल न्यूज़ पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) ने डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 और उसके नियमों को चुनौती दी है। याचिका का मूल तर्क यह है कि अधिनियम में पत्रकारीय गतिविधियों के लिए कोई स्पष्ट छूट नहीं दी गई है, जिससे खोजी पत्रकार भी डेटा फिड्यूशरी की भाँति सूचना देने और सहमति लेने की बाध्यता में आ सकते हैं। इससे भ्रष्टाचार या प्रशासनिक कदाचार की जाँच करने वाले पत्रकारों के लिए गंभीर भयोत्पादक प्रभाव (Chilling Effect) की आशंका पैदा हुई है। याचिका में अधिनियम की धारा 44(3) को भी चुनौती दी गई है, जिसने सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 में संशोधन कर लोक हित पर आधारित वह प्रावधान हटा दिया जो व्यक्तिगत सूचना के प्रकटीकरण का आधार था। उच्चतम न्यायालय ने याचिका पर नोटिस जारी करते हुए प्रेस की स्वतंत्रता और निजता के अधिकार के बीच संतुलन की आवश्यकता पर बल दिया है। केंद्र सरकार ने भी इस चिंता को संज्ञान में लेने की बात कही है, और संबंधित मंत्री द्वारा संपादकों से परामर्श की पहल को सहमति निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
पृष्ठभूमि
- निजता पर न्यायिक मान्यता: उच्चतम न्यायालय ने पुट्टस्वामी (निजता) मामले, 2017 में निजता को अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मौलिक अधिकार घोषित किया, साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि यह अधिकार पूर्ण नहीं है और वैध राज्य हित में इस पर युक्तियुक्त निर्बंधन लगाए जा सकते हैं।
- डेटा संरक्षण विधान का विकास: न्यायमूर्ति बी.एन. श्रीकृष्ण समिति (2017) की सिफारिशों के आधार पर वर्ष 2018, 2019 और 2021 में विधेयक के मसौदे आए। इनमें से 2018, 2019 और 2021 के मसौदों में पत्रकारीय प्रयोजनों के लिए छूट का प्रावधान था, जबकि अंतिम अधिनियम में यह छूट शामिल नहीं हुई।
- सूचना का अधिकार और निजता का टकराव: सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 8(1)(j) व्यक्तिगत सूचना को प्रकटीकरण से छूट देती थी, परंतु लोक हित का अधिभावी प्रावधान उसमें निहित था। इस प्रावधान में परिवर्तन से सार्वजनिक अभिलेखों तक पहुँच पर प्रभाव पड़ने की चिंता उठी है।
- प्रेस की स्वतंत्रता की संवैधानिक स्थिति: भारत में पत्रकारों के लिए कोई पृथक वैधानिक संरक्षण नहीं है। प्रेस की स्वतंत्रता अनुच्छेद 19(1)(a) में निहित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से व्युत्पन्न मानी गई है, और उच्चतम न्यायालय ने रोमेश थापर (1950) व सकाल पेपर्स (1962) जैसे मामलों में इसे संरक्षित किया है।
- भ्रष्टाचार की जाँच में डेटा का उपयोग: परिसंपत्ति विवरण, निविदा दस्तावेज़ और सार्वजनिक खरीद अभिलेखों में व्यक्तिगत डेटा सम्मिलित होता है। इन स्रोतों तक सीमित पहुँच से पत्रकारिता केवल सरकारी विज्ञप्तियों के पुनः प्रस्तुतीकरण तक सिमट सकती है।
डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 क्या है?
- यह अधिनियम व्यक्तिगत डिजिटल डेटा के प्रसंस्करण को नियंत्रित करता है और डेटा प्रिंसिपल (जिस व्यक्ति का डेटा है) के अधिकारों तथा डेटा फिड्यूशरी (जो डेटा के प्रयोजन और साधन तय करता है) के दायित्वों को परिभाषित करता है।
- डेटा प्रसंस्करण के लिए सामान्यतः सूचित सहमति आवश्यक है, किंतु कुछ परिस्थितियों में वैध प्रयोजन के आधार पर सहमति के बिना प्रसंस्करण की अनुमति दी गई है।
- डेटा संरक्षण बोर्ड (Data Protection Board of India) अधिनियम के उल्लंघन की जाँच करता है और दंड के संबंध में निर्णय देता है। कुछ उल्लंघनों पर अधिकतम ₹250 करोड़ तक का आर्थिक दंड निर्धारित है।
- अधिनियम में धारा 17 के अंतर्गत कुछ छूटें दी गई हैं, जैसे राज्य की संस्थाओं के लिए विशिष्ट प्रयोजन और शोध, अभिलेखीय तथा सांख्यिकीय प्रयोजन, जिनके लिए निर्धारित मानकों का पालन आवश्यक है।
- पत्रकारीय गतिविधियों के लिए अधिनियम में कोई स्पष्ट छूट नहीं है, जो इस विवाद का केंद्रीय बिंदु है।
- धारा 44(3) द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 8(1)(j) में संशोधन किया गया, जिससे व्यक्तिगत सूचना के संबंध में लोक हित आधारित प्रकटीकरण का प्रावधान समाप्त हुआ।
- संवैधानिक दृष्टि से निजता अनुच्छेद 21 का हिस्सा है, जबकि प्रेस की स्वतंत्रता अनुच्छेद 19(1)(a) से जुड़ी है; दोनों के बीच संतुलन न्यायिक समीक्षा के माध्यम से तय होता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्त्व |
|---|---|
| डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 (Digital Personal Data Protection Act, 2023) | व्यक्तियों की सूचनात्मक निजता की रक्षा के लिए डिजिटल रूप में संसाधित व्यक्तिगत डेटा पर विधिक ढाँचा प्रदान करता है |
| डेटा फिड्यूशियरी (Data Fiduciary) | व्यक्तिगत डेटा के उद्देश्य और साधन तय करने वाली संस्था पर सूचना देने, सहमति लेने और सुरक्षा उपाय करने के दायित्व डालता है |
| पत्रकारीय गतिविधि के लिए छूट का अभाव | इस अधिनियम में पत्रकारीय कार्य के लिए कोई विशिष्ट छूट नहीं है, जबकि 2018, 2019 और 2021 के मसौदों में ऐसी छूट थी |
| शोध और सांख्यिकीय प्रयोजनों के लिए छूट | अधिनियम में कुछ प्रकार के डेटा प्रसंस्करण को छूट दी गई है, जिससे पत्रकारों को छूट न देने का तर्क कमज़ोर पड़ता है |
| धारा 44(3) द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 में संशोधन | सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(j) में से लोकहित वाला प्रावधान हटाया गया, जिससे व्यक्तिगत सूचना के प्रकटीकरण की गुंजाइश घटी |
| अनुपालन न करने पर दंड | अधिकतम ₹250 करोड़ तक का दंड निर्धारित है, जो छोटे और स्वतंत्र समाचार संस्थानों के लिए गंभीर वित्तीय जोखिम है |
महत्व
संवैधानिक महत्त्व
- निजता को अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन और वैयक्तिक स्वतंत्रता के अधिकार का अभिन्न अंग माना गया है, जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय के पुट्टस्वामी निर्णय (2017) में स्थापित हुआ
- प्रेस की स्वतंत्रता अनुच्छेद 19(1)(a) में वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अंतर्गत संरक्षित है, और इसके प्रतिबंध अनुच्छेद 19(2) के आधारों तक सीमित हैं
- दोनों मूल्यों, अर्थात निजता और प्रेस की स्वतंत्रता, के बीच संतुलन ही इस विवाद का केंद्रीय संवैधानिक प्रश्न है
शासन और पारदर्शिता
- भ्रष्टाचार की जाँच में प्रायः संपत्ति विवरण और निविदा दस्तावेज़ जैसे रिकॉर्ड प्रयोग होते हैं, जिनमें व्यक्तिगत डेटा शामिल होता है
- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 लोक प्राधिकारियों के कार्यों में जवाबदेही का प्रमुख साधन है, इसलिए उसमें संशोधन का प्रभाव शासन की पारदर्शिता पर पड़ता है
- लोक पदाधिकारियों और सार्वजनिक निधि संभालने वालों को निजता के नाम पर जाँच से बचाव न मिले, यह सुशासन की बुनियादी अपेक्षा है
लोकतांत्रिक और सामाजिक महत्त्व
- स्वतंत्र पत्रकारिता लोकतंत्र में चौथे स्तंभ की भूमिका निभाती है और प्रशासनिक त्रुटियों को उजागर करती है
- सोशल मीडिया और स्वतंत्र कंटेंट निर्माताओं के उदय से समाचार-स्रोतों का स्वरूप बदला है; 2026 की रॉयटर्स इंस्टीट्यूट रिपोर्ट के अनुसार 18 से 24 वर्ष आयु वर्ग में सोशल मीडिया को प्राथमिक समाचार स्रोत मानने वालों का अनुपात 2015 के 21 प्रतिशत से बढ़कर 2025 में 39 प्रतिशत हो गया
चुनौतियाँ
1. भयोत्पादक प्रभाव (Chilling Effect) का खतरा
- खोजी पत्रकार यदि भ्रष्टाचार की जाँच में संबंधित व्यक्ति को सूचित करने और सहमति लेने के लिए बाध्य हों, तो जाँच की गोपनीयता और प्रभावशीलता दोनों प्रभावित होती हैं
- सामान्य समाचार संकलन में भी व्यक्तिगत सूचना अनिवार्य होती है, इसलिए अनुपालन का बोझ दैनिक पत्रकारिता तक फैलता है
यूपीएससी लिंक: प्रेस की स्वतंत्रता बनाम निजता, GS-2 (शासन) और GS-2 (संविधान)
2. पत्रकारीय छूट का अभाव
- 2018, 2019 और 2021 के मसौदों में पत्रकारीय छूट थी, किंतु अंतिम अधिनियम में उसे शामिल नहीं किया गया
- शोध और सांख्यिकीय प्रयोजनों को छूट मिलना और पत्रकारिता को छूट न मिलना असंगत प्रतीत होता है, जिससे नीति-निर्माण की पारदर्शिता पर प्रश्न उठते हैं
यूपीएससी लिंक: विधायी प्रक्रिया और डेटा शासन, GS-2 (शासन)
3. सूचना का अधिकार पर प्रभाव
- धारा 44(3) द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(j) से लोकहित वाला प्रावधान हटाने से व्यक्तिगत सूचना के प्रकटीकरण की संभावना सिमटती है
- निजता पूर्णतः अबाध्य नहीं हो सकती; लोक प्राधिकारियों के पास रखी सूचना पर लोकहित की प्रधानता बनी रहनी चाहिए
यूपीएससी लिंक: सूचना का अधिकार और पारदर्शिता, GS-2 (शासन)
4. अनुपालन बोझ और लघु समाचार संस्थान
- अधिकतम ₹250 करोड़ तक के दंड का प्रावधान बड़े प्रकाशकों की तुलना में छोटे और स्वतंत्र संस्थानों के लिए अस्तित्व का संकट बन सकता है
- बहुमत में अनुपालन ढाँचा अपनाने पर विविध स्वरों वाली पत्रकारिता सीमित हो सकती है
यूपीएससी लिंक: विनियामक ढाँचा और आर्थिक प्रभाव, GS-3 (अर्थव्यवस्था) और GS-2 (शासन)
5. पत्रकार की पहचान की चुनौती
- मुख्यधारा मीडिया पर अविश्वास बढ़ने और स्वतंत्र कंटेंट निर्माताओं के उदय से यह तय करना कठिन है कि कौन पत्रकार माना जाए और किसे संरक्षण मिले
- श्रेणी-निर्धारण में मनमानी या अधिक व्यापक छूट, दोनों के अपने जोखिम हैं
यूपीएससी लिंक: डिजिटल मीडिया और अनुच्छेद 19(1)(a), GS-2 (संविधान)
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| समस्या | चिंता |
|---|---|
| भयोत्पादक प्रभाव | खोजी पत्रकारिता और भ्रष्टाचार की जाँच धीमी या बाधित हो सकती है |
| पत्रकारीय छूट का अभाव | 2018 से 2021 के मसौदों की तुलना में संरक्षण में कमी दिखती है |
| धारा 44(3) का संशोधन | सूचना का अधिकार अधिनियम में लोकहित का आधार हटने से लोक-सूचना तक पहुँच घटती है |
| भारी दंड | ₹250 करोड़ तक के दंड से छोटे और स्वतंत्र संस्थानों पर अस्तित्व का संकट |
| पत्रकार की परिभाषा | स्वतंत्र कंटेंट निर्माताओं के कारण संरक्षण के पात्र वर्ग की पहचान कठिन |
| निजता और प्रेस की स्वतंत्रता में संतुलन | अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 19(1)(a) के बीच स्पष्ट मानक का अभाव |
आगे की राह
- पत्रकारीय गतिविधि के लिए सीमित और स्पष्ट छूट का प्रावधान किया जाए, जिसमें लोकहित और सार्वजनिक जवाबदेही को प्रमुखता मिले
- पत्रकार की परिभाषा ऐसी हो जो पारंपरिक और डिजिटल दोनों माध्यमों के कार्य को समान रूप से शामिल करे
- धारा 44(3) के संशोधन की समीक्षा की जाए और लोक प्राधिकारियों के पास रखी सूचना पर लोकहित का आधार पुनः स्थापित किया जाए
- सार्वजनिक पदाधिकारियों और सार्वजनिक निधि संभालने वालों की संपत्ति और निविदा से जुड़ी सूचना पर सूचना का अधिकार की पहुँच सुनिश्चित हो
- छोटे और स्वतंत्र समाचार संस्थानों के लिए अनुपालन के सरल दिशानिर्देश और चरणबद्ध लागू करने की व्यवस्था हो
- निजता और प्रेस की स्वतंत्रता के संतुलन पर हितधारकों, जिनमें संपादक, नागरिक समाज और नियामक शामिल हों, के बीच परामर्श की स्पष्ट प्रक्रिया बने
- सर्वोच्च न्यायालय में लंबित याचिका पर संतुलित निर्णय से विधिक स्पष्टता और विनियामक निश्चितता दोनों मिलें
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 (Digital Personal Data Protection Act, 2023) · डेटा न्यासी (Data Fiduciary) · डेटा प्रधान (Data Principal) · सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (Right to Information Act, 2005) · धारा 8(1)(j) और लोक हित का अपवाद · अनुच्छेद 19(1)(a) और पत्रकारिता की स्वतंत्रता · अनुच्छेद 21 और निजता का अधिकार · आनुपातिकता परीक्षण (Proportionality Test) · ठंडा प्रभाव (Chilling Effect) · न्यायमूर्ति के.एस. पुट्टस्वामी मामला, 2017 · शोध एवं सांख्यिकी हेतु छूट (धारा 17) · लोक कार्यकर्ता एवं पारदर्शिता
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 19(1)(a): प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मूल आधार
- अनुच्छेद 19(2): प्रेस की स्वतंत्रता पर युक्तियुक्त प्रतिबंधों की सीमा
- अनुच्छेद 21: निजता का अधिकार, पुट्टस्वामी निर्णय के अनुसार
अवधारणा प्रवाह
डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 में पत्रकारीय छूट का अभाव → पत्रकार भी डेटा फिड्यूशियरी के रूप में सूचना देने और सहमति लेने के दायित्व में आते हैं → खोजी पत्रकारिता और भ्रष्टाचार की जाँच में भयोत्पादक प्रभाव उत्पन्न होता है → धारा 44(3) के माध्यम से सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 में लोकहित का आधार घटता है, जिससे लोक-सूचना तक पहुँच सीमित होती है → अनुच्छेद 19(1)(a) और अनुच्छेद 21 के बीच संतुलन का प्रश्न सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष उठता है → हितधारकों के बीच सहमति से संतुलित ढाँचा बनाना ही समाधान माना जाता है
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए, जो डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 से संबंधित हैं:
1. यह अधिनियम ‘डेटा न्यासी’ को ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित करता है जो अकेले या अन्य के साथ मिलकर व्यक्तिगत डेटा के संसाधन (Processing) का उद्देश्य और साधन तय करता है।
2. इसमें पत्रकारीय गतिविधियों के लिए स्पष्ट और विशिष्ट छूट का प्रावधान है।
3. इसमें शोध, अभिलेखन (Archiving) और सांख्यिकीय उद्देश्यों के लिए कुछ शर्तों के अधीन व्यक्तिगत डेटा के संसाधन को छूट दी गई है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: धारा 2 में डेटा न्यासी की परिभाषा यही है। कथन 2 गलत है, क्योंकि अधिनियम में पत्रकारीय गतिविधियों के लिए विशिष्ट छूट नहीं है, जिसे लेकर ही DNPA ने चुनौती दी है। कथन 3 सही है: धारा 17(2)(ख) शोध, अभिलेखन और सांख्यिकीय उद्देश्यों के लिए नियमों में निर्धारित मानकों के अधीन छूट देती है। अतः सही उत्तर ‘केवल दो’ है।
Q2. निम्नलिखित में से कथन (A) और कारण (R) पर विचार कीजिए:
कथन (A): भारत में प्रेस की स्वतंत्रता अनुच्छेद 19(1)(a) के अंतर्गत संरक्षित है।
कारण (R): संविधान में ‘प्रेस की स्वतंत्रता’ शब्द का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, फिर भी न्यायालयों ने वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अंतर्गत इसे मान्यता दी है।
नीचे दिए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
- (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
- (A) और (R) दोनों सही हैं, परंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
- (A) सही है, परंतु (R) गलत है।
- (A) गलत है, परंतु (R) सही है।
उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — अनुच्छेद 19(1)(a) वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, और रोमेश थापर (1950) तथा इंडियन एक्सप्रेस न्यूज़पेपर्स बनाम भारत संघ (1985) जैसे निर्णयों में न्यायालय ने प्रेस की स्वतंत्रता को इसी के अंतर्गत माना। संविधान में ‘प्रेस’ शब्द का अलग उल्लेख नहीं है, इसलिए कारण (R) कथन (A) की सही व्याख्या है।
Q3. सूची-I (न्यायिक निर्णय) को सूची-II (निर्णय में निहित सिद्धांत/परिणाम) से सुमेलित कीजिए:
सूची-I
A. रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य (1950)
B. के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017)
C. इंडियन एक्सप्रेस न्यूज़पेपर्स बनाम भारत संघ (1985)
D. सकाल पेपर्स बनाम भारत संघ (1962)
सूची-II
1. निजता का अधिकार अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मौलिक अधिकार है।
2. राज्य द्वारा समाचार-पत्र के राज्य में प्रवेश पर प्रतिबंध को अनुच्छेद 19(1)(a) का उल्लंघन माना गया।
3. समाचार-पत्र के मूल्य और पृष्ठ-संख्या को नियंत्रित करने वाले आदेश को असंवैधानिक ठहराया गया।
4. समाचार-पत्र-उद्योग पर लगाए गए शुल्क/आयात-नियंत्रण को प्रेस की स्वतंत्रता का उल्लंघन माना गया।
सही कूट चुनिए:
- A-2, B-1, C-4, D-3
- A-3, B-1, C-2, D-4
- A-2, B-4, C-1, D-3
- A-4, B-1, C-2, D-3
उत्तर: A-2, B-1, C-4, D-3 — A-2: रोमेश थापर मामले में मद्रास सरकार का ‘क्रॉस रोड्स’ के राज्य में प्रवेश पर प्रतिबंध रद्द हुआ। B-1: पुट्टस्वामी (2017) ने निजता को अनुच्छेद 21 का भाग माना। C-4: इंडियन एक्सप्रेस (1985) में न्यूज़प्रिंट पर लगे शुल्क और आयात-नियंत्रण को रद्द किया गया। D-3: सकाल पेपर्स (1962) में न्यूज़पेपर (मूल्य और पृष्ठ) आदेश, 1960 को असंवैधानिक माना गया।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 में पत्रकारीय गतिविधियों के लिए विशिष्ट छूट का अभाव और सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 8(1)(j) में संशोधन, निजता के अधिकार और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच संतुलन पर प्रश्न उठाते हैं। इस संतुलन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि क्या पत्रकारीय छूट ऐसे ढंग से तैयार की जा सकती है जिससे लोक पदाधिकारियों की जवाबदेही कमज़ोर न हो। (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर-कंकाल (Model-answer skeleton):
1. भूमिका: DNPA की चुनौती (2026), डेटा न्यासी के दायित्वों से पत्रकारों पर पड़ने वाला ठंडा प्रभाव, और निजता बनाम प्रेस स्वतंत्रता का प्रश्न।
2. संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 19(1)(a) में प्रेस की स्वतंत्रता का अंतर्निहित समावेश; रोमेश थापर (1950), सकाल पेपर्स (1962) और इंडियन एक्सप्रेस (1985) के निर्णय; अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत युक्तियुक्त निर्बंध। निजता को पुट्टस्वामी (2017) में अनुच्छेद 21 का भाग माना गया, और उसकी आनुपातिकता परीक्षण (वैधता, वैध उद्देश्य, तार्किक संबंध, न्यूनतम अवरोध, संतुलन) के आधार पर जाँच।
3. अधिनियम का विश्लेषण: डेटा प्रधान और डेटा न्यासी की अवधारणा; सहमति का प्रावधान; धारा 17 में शोध, सांख्यिकी आदि के लिए छूट का तर्क; पत्रकारीय छूट का अभाव, जबकि 2018 (श्रीकृष्ण समिति), 2019 और 2021 के मसौदों में ऐसा प्रावधान होने का उल्लेख; ₹250 करोड़ तक का दंड और लघु/स्वतंत्र newsrooms पर वित्तीय दबाव।
4. RTI पर प्रभाव: धारा 44(3) द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(j) से लोक हित के अपवाद का हटना; भूमि, निविदा और संपत्ति-विवरण जैसे अभिलेखों में व्यक्तिगत डेटा से पारदर्शिता पर प्रभाव; लोक हित को सर्वोपरि मानने का न्यायिक सिद्धांत।
5. विविध मत: (क) डेटा संरक्षण समर्थक: व्यक्तिगत गोपनीयता को पूर्ण संरक्षण; (ख) प्रेस संगठनों का मत: जाँच-पत्रकारिता और लोक हित की रक्षा; (ग) केंद्र की चिंता और मंत्री द्वारा संपादकों से परामर्श की पहल।
6. समसामयिक आयाम: ‘पत्रकार’ की परिभाषा की कठिनाई, क्योंकि स्वतंत्र कंटेंट क्रिएटर बढ़े हैं; Reuters Institute 2026 रिपोर्ट के अनुसार 18–24 वर्ष आयु वर्ग में सोशल मीडिया को प्राथमिक समाचार स्रोत मानने वालों का अनुपात 2015 के 21% से बढ़कर 2025 में 39% हुआ।
7. परिणाम-प्रश्न का उत्तर: छूट कार्यात्मक हो (प्रकाशन-उद्देश्य, लोक हित, न्यूनतम डेटा, आंतरिक नैतिक मानक) और उसका दुरुपयोग रोकने के उपाय हों; लोक पदाधिकारियों और सार्वजनिक धन के उपयोग में निजता का आवरण न बने; सहमति-आधारित ढाँचे में संतुलन।
8. निष्कर्ष: सर्वसम्मत, पारदर्शी और आनुपातिक ढाँचा; विधायी स्पष्टता, न्यायिक समीक्षा और हितधारक परामर्श की आवश्यकता।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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