01 Nov मद्रास हाईकोर्ट अधिवक्ताओं ने 1965 के फैसले को चुनौती दी, जानिए क्या है पूरा मामला
✎ अनुच्छेद 348 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों की कार्यवाही की भाषा अंग्रेज़ी है, और राज्यपाल राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से उच्च न्यायालय में हिन्दी या राज्य की राजभाषा के प्रयोग का प्राधिकार दे सकता है, परंतु निर्णय…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — Polity and Governance (संविधान की मुख्य विशेषताएँ, संघ और राज्य की भाषा नीति, न्यायपालिका की संरचना और कार्य, जनहित याचिका) | GS Paper II — Polity and Governance (मूल अधिकार और उनके न्यायिक निर्वचन, सूचना का अधिकार)
- Prelims: अनुच्छेद 348 (उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों की भाषा), अनुच्छेद 343 (संघ की राजभाषा), अनुच्छेद 344 (राजभाषा आयोग), अनुच्छेद 345 (राज्य की राजभाषा), राजभाषा अधिनियम, 1963 (Official Languages Act, 1963), अनुच्छेद 226 और अनुच्छेद 32 (रिट क्षेत्राधिकार और जनहित याचिका), सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (Right to Information Act, 2005), मूल अधिकार: अनुच्छेद 14, 19 और 21
- Essay: भाषा नीति और राष्ट्रीय एकता: क्या न्यायिक एकरूपता और स्थानीय भाषा में न्याय के बीच संतुलन संभव है?, न्याय तक पहुँच: भाषा बाधा और संवैधानिक समता का प्रश्न
त्वरित पुनरावृत्ति: अनुच्छेद 348 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों की कार्यवाही की भाषा अंग्रेज़ी है, और राज्यपाल राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से उच्च न्यायालय में हिन्दी या राज्य की राजभाषा के प्रयोग का प्राधिकार दे सकता है, परंतु निर्णय अंग्रेज़ी में ही होंगे।
यह खबर चर्चा में क्यों?
मद्रास उच्च न्यायालय अधिवक्ता संघ (Madras High Court Advocates Association) ने जनहित याचिका दायर कर 1965 के उस केंद्रीय मंत्रिमंडलीय समिति के निर्णय को चुनौती दी है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय और सभी उच्च न्यायालयों के लिए अंग्रेज़ी को सामान्य भाषा के रूप में जारी रखने की बात कही गई थी, जब तक हिन्दी उसका स्थान लेने योग्य न हो जाए। संघ का तर्क है कि उच्च न्यायालयों में क्षेत्रीय भाषाओं के प्रयोग पर लगी रोक अनुच्छेद 14, 19 और 21 का उल्लंघन करती है। संघ के सचिव के शपथ-पत्र के अनुसार यह निर्णय उन्हें हाल ही में एक अधिवक्ता से सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अंतर्गत प्राप्त जानकारी से ज्ञात हुआ। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन की प्रथम खंडपीठ कर रही है। यह प्रकरण संवैधानिक वैधता, राजभाषा नीति और न्याय तक पहुँच, तीनों दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है।
पृष्ठभूमि
- संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार संघ की राजभाषा देवनागरी लिपि में हिन्दी है, और अंग्रेज़ी का प्रयोग प्रारंभ में 15 वर्षों के लिए अनुमत था। 1963 के राजभाषा अधिनियम ने अंग्रेज़ी को सरकारी कार्यों में हिन्दी के साथ बनाए रखने का प्रावधान किया।
- मार्च 1965 में भारत के मुख्य न्यायाधीश पी.बी. गजेंद्रगडकर की अध्यक्षता में सभी उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों का सम्मेलन हुआ। इसके प्रस्ताव प्रेस को सार्वजनिक नहीं किए गए, किंतु 26 मार्च 1965 को प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और सभी मुख्यमंत्रियों को भेजे गए।
- सम्मेलन के सुझाव के अनुसार अंग्रेज़ी को तब तक सामान्य भाषा रहना था जब तक हिन्दी “समय के साथ” इस योग्य न हो जाए, और उच्च न्यायालयों में क्षेत्रीय भाषाओं को प्रारंभ नहीं किया जाना था।
- 17 मई 1965 को गृह मंत्रालय ने मंत्रिमंडलीय समिति के समक्ष एक टिप्पणी रखी, जिसमें न्यायाधीशों के स्थानांतरण, अधिवक्ताओं के अखिल भारतीय उपस्थिति और “एकीकृत न्यायिक व्यवस्था” का तर्क दिया गया।
- संविधान का अनुच्छेद 348 उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों की कार्यवाही की भाषा अंग्रेज़ी निर्धारित करता है, और इसमें संशोधन के लिए संसद की विशेष प्रक्रिया अपनाई जाती है। यह विषय अब भी संवैधानिक और नीतिगत दोनों स्तरों पर विवाद का केंद्र है।
अनुच्छेद 348 और न्यायालयों में भाषा का संवैधानिक ढाँचा क्या है?
- अनुच्छेद 348(1) के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय और प्रत्येक उच्च न्यायालय की समस्त कार्यवाही अंग्रेज़ी में होगी, जब तक संसद विधि द्वारा अन्यथा उपबंध न करे।
- अनुच्छेद 348(1) के अंतर्गत संसद और राज्य विधानमंडलों में प्रस्तुत विधेयक, अधिनियम तथा अध्यादेश भी अंग्रेज़ी में होंगे।
- अनुच्छेद 348(2) राज्यपाल को, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से, उच्च न्यायालय की कार्यवाही में हिन्दी या राज्य की राजभाषा के प्रयोग का प्राधिकार देने की शक्ति देता है, परंतु उस उच्च न्यायालय के निर्णय, डिक्री और आदेश अंग्रेज़ी में होने चाहिए।
- अनुच्छेद 343 संघ की राजभाषा से और अनुच्छेद 345 राज्य विधानमंडल द्वारा राज्य की राजभाषा चुने जाने से संबंधित है; अनुच्छेद 348 इन दोनों से भिन्न, न्यायिक कार्यवाही की भाषा का उपबंध करता है।
- अनुच्छेद 344 के अंतर्गत राजभाषा आयोग का गठन होता है, जो संघ में हिन्दी के प्रगामी प्रयोग पर राष्ट्रपति को सिफ़ारिश करता है।
- जनहित याचिका (Public Interest Litigation) वह उपाय है जिसमें कोई व्यक्ति या संस्था वंचित वर्ग या सार्वजनिक हित से जुड़े प्रश्न को न्यायालय में उठा सकती है; उच्चतम न्यायालय अनुच्छेद 32 के अंतर्गत और उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 के अंतर्गत इसकी सुनवाई करते हैं।
- मूल अधिकारों की दृष्टि से अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समता), अनुच्छेद 19 (वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता) के अंतर्गत न्याय तक प्रभावी पहुँच का प्रश्न भी उठता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्त्व |
|---|---|
| याचिकाकर्ता और माध्यम | मद्रास उच्च न्यायालय अधिवक्ता संघ (MHAA) ने जनहित याचिका (Public Interest Litigation – PIL) दायर की है, जो उच्च न्यायालय में संविधान की वैधता की चुनौती का सामान्य माध्यम है। |
| चुनौती का विषय | 1965 में केंद्रीय मंत्रिमंडल की समिति का वह निर्णय, जिसमें उच्चतम न्यायालय और सभी उच्च न्यायालयों के लिए अंग्रेज़ी को सामान्य भाषा के रूप में जारी रखने की बात कही गई थी, जब तक हिन्दी उसका स्थान लेने योग्य न हो जाए। |
| निर्णय की जानकारी का स्रोत | संघ के अनुसार यह निर्णय उन्हें 2025 में सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (Right to Information Act, 2005) के अंतर्गत प्राप्त विवरणों से ज्ञात हुआ, इसलिए चुनौती अब दी गई है। |
| उठाए गए मौलिक अधिकार | याचिका में अनुच्छेद 14 (समता का अधिकार), अनुच्छेद 19 (वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) तथा अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के उल्लंघन का तर्क दिया गया है। |
| 1965 की पृष्ठभूमि | 1965 के मार्च में सभी उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों का सम्मेलन भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश पी.बी. गजेंद्रगडकर की अध्यक्षता में हुआ था, जिसके प्रस्तावों के आधार पर मंत्रालयी नोट और मंत्रिमंडल समिति का विचार आगे बढ़ा। |
| सुनवाई की संरचना | मुख्य न्यायाधीश सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन की प्रथम खंडपीठ इस मामले की सुनवाई करेगी; यह उच्च न्यायालय के स्तर पर संवैधानिक प्रश्न का न्यायिक परीक्षण है। |
महत्व
संवैधानिक एवं विधिक
- अनुच्छेद 348 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों की कार्यवाही की भाषा अंग्रेज़ी है, जब तक संसद विधि द्वारा अन्यथा उपबंध न करे। यह मामला इसी उपबंध की व्याख्या और उसकी संवैधानिक वैधता से जुड़ा है।
- प्रश्न यह है कि क्या प्रशासनिक या मंत्रिमंडलीय निर्णय, संसद द्वारा पारित विधि या संवैधानिक संशोधन का स्थान ले सकता है। यह विधि के शासन और संसदीय सर्वोच्चता के सिद्धांत की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है।
- न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के अंतर्गत उच्च न्यायालय यह परख सकता है कि कोई कार्यपालिका निर्णय संविधान के मौलिक अधिकारों के अनुरूप है या नहीं।
सामाजिक और सांस्कृतिक
- संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाएँ सम्मिलित हैं। क्षेत्रीय भाषाओं में न्यायिक कार्यवाही की माँग इस बहस का केंद्र है कि न्याय तक पहुँच भाषा के कारण सीमित न हो।
- याचिका में मातृभाषा में न्याय सुलभ होने को अनुच्छेद 21 के जीवन के अधिकार की व्यापक व्याख्या से जोड़ा गया है, जिसकी न्यायिक व्याख्या भविष्य में विकसित हो सकती है।
प्रशासनिक और पारदर्शिता
- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के माध्यम से दशकों पुराने प्रशासनिक निर्णय सार्वजनिक चर्चा में आए, जो पारदर्शिता और नागरिक सहभागिता का उदाहरण है।
- उच्च न्यायालय की भाषा से जुड़े निर्णयों में राज्य सरकार, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति और केंद्र सरकार के बीच समन्वय की प्रक्रिया भी प्रशासनिक दृष्टि से अध्ययन योग्य है।
चुनौतियाँ
1. संवैधानिक उपबंध और कार्यपालिका निर्णय का अंतर
- अनुच्छेद 348 संसद को उच्च न्यायालय की भाषा तय करने का अधिकार देता है। ऐसे में मंत्रिमंडल समिति के 1965 के निर्णय की वैधानिक स्थिति पर प्रश्न उठता है।
- संविधान की भावना और विधायी प्रक्रिया के बीच संतुलन बनाना एक जटिल विधिक प्रश्न है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: संविधान के प्रमुख उपबंध; संसद और कार्यपालिका की भूमिका
2. मौलिक अधिकारों पर प्रभाव
- याचिका के अनुसार क्षेत्रीय भाषाओं पर रोक अनुच्छेद 14 की समानता और अनुच्छेद 21 की न्याय तक पहुँच को प्रभावित करती है।
- अनुच्छेद 19 के अंतर्गत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में भाषा का चुनाव भी आता है; इस पर न्यायालय का दृष्टिकोण आगे की दिशा तय करेगा।
यूपीएससी लिंक: GS-2: मौलिक अधिकार; न्यायपालिका की भूमिका
3. न्याय तक पहुँच और भाषाई विविधता
- अधीनस्थ न्यायालयों में अधिकांश कार्यवाही स्थानीय भाषाओं में होती है, जबकि उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय में अंग्रेज़ी प्रधान है। इससे पक्षकारों के लिए भाषायी दूरी उत्पन्न होती है।
- भाषाई विविधता और एकीकृत न्याय व्यवस्था के बीच संतुलन की चुनौती बनी रहती है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: शासन; सामाजिक न्याय; भाषा और सुशासन
4. राजभाषा नीति और संघीय संतुलन
- अनुच्छेद 343 और 344 के अंतर्गत संघ की राजभाषा और उसके विकास के लिए आयोग और समितियों की व्यवस्था है। हिन्दी के प्रचार और अंग्रेज़ी के प्रयोग के बीच नीति-संतुलन संवेदनशील विषय है।
- राज्यों की भाषा नीति और केंद्र की भाषा नीति के बीच सहमति बनाना संघवाद (Federalism) की दृष्टि से चुनौतीपूर्ण है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: संघवाद; केंद्र-राज्य संबंध; राजभाषा नीति
5. पुराने निर्णयों की वैधता और समय-सीमा
- 1965 का निर्णय लगभग छह दशक पुराना है। पुराने प्रशासनिक निर्णयों की संवैधानिक वैधता और उनके वर्तमान प्रभाव का परीक्षण न्यायिक प्रक्रिया की जटिलता बढ़ाता है।
- विलंब से पहुँचे प्रश्नों पर परिसीमा और याचिका की स्वीकार्यता जैसे प्रक्रियात्मक मुद्दे भी उठ सकते हैं।
यूपीएससी लिंक: GS-2: न्यायपालिका; जनहित याचिका की भूमिका
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| विधि बनाम प्रशासनिक निर्णय | कार्यपालिका निर्णय को संसद द्वारा निर्मित विधि के स्थान पर लागू करने की वैधता पर प्रश्न |
| मौलिक अधिकार | समानता, अभिव्यक्ति और जीवन के अधिकार पर भाषायी बाधा का प्रभाव |
| न्याय तक पहुँच | स्थानीय भाषा न जानने वाले पक्षकारों के लिए न्यायिक प्रक्रिया की दूरी |
| संघीय संतुलन | केंद्र की राजभाषा नीति और राज्यों की भाषा संबंधी आकांक्षाओं के बीच सामंजस्य |
| प्रक्रियात्मक विलंब | छह दशक पुराने निर्णय पर वर्तमान में चुनौती और उसकी प्रासंगिकता का निर्धारण |
आगे की राह
- संसद द्वारा अनुच्छेद 348 के अंतर्गत भाषा संबंधी स्पष्ट विधिक उपबंध पर व्यापक विचार-विमर्श हो, ताकि प्रशासनिक निर्णयों पर निर्भरता घटे।
- उच्च न्यायालयों में क्षेत्रीय भाषाओं के प्रयोग के लिए अनुच्छेद 348(2) में निहित प्रक्रिया की व्यावहारिक समीक्षा की जाए, जिसमें राज्यपाल की अनुमति और राष्ट्रपति की पूर्व सहमति जैसे चरण शामिल हैं।
- न्यायिक निर्णयों और आदेशों के अनुवाद की व्यवस्था को संस्थागत रूप दिया जाए, ताकि पक्षकारों को भाषा के आधार पर बाधा न हो।
- अधीनस्थ और उच्च न्यायालयों के बीच भाषा नीति का समन्वय हो, जिससे न्याय व्यवस्था की एकरूपता और सुलभता दोनों बनी रहें।
- भाषा नीति से जुड़े निर्णयों में संघीय परामर्श की प्रक्रिया सुदृढ़ हो, जिसमें राज्य सरकारों की भागीदारी सुनिश्चित हो।
- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के माध्यम से पुराने प्रशासनिक निर्णयों की सार्वजनिक समीक्षा को नीति-निर्माण की नियमित प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जाए।
- राजभाषा विकास के लिए अनुच्छेद 351 के अंतर्गत हिन्दी के प्रसार का लक्ष्य भाषाई विविधता के सम्मान के साथ संतुलित रखा जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
अनुच्छेद 348 (Article 348) · उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों की कार्यवाही की भाषा · राजभाषा (Official Language) · अनुच्छेद 343 और 344 (Articles 343 and 344) · राजभाषा आयोग (Official Language Commission) · अनुच्छेद 350 (Article 350) · अनुच्छेद 14, 19 और 21 की कसौटी (Articles 14, 19 and 21) · न्याय तक पहुँच (Access to Justice) · संघवाद (Federalism) · आठवीं अनुसूची (Eighth Schedule) · विधि आयोग की 216वीं रिपोर्ट (216th Law Commission Report) · कार्यपालिका निर्णय की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review of Executive Decision)
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 348: उच्च न्यायालय की कार्यवाही की भाषा
- अनुच्छेद 343: संघ की राजभाषा का उपबंध
- अनुच्छेद 14: समता का अधिकार, याचिका का आधार
- अनुच्छेद 19: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, याचिका का आधार
- अनुच्छेद 21: जीवन का अधिकार, याचिका का आधार
- अनुच्छेद 226: उच्च न्यायालय में रिट क्षेत्राधिकार
अवधारणा प्रवाह
1965 में मुख्य न्यायाधीशों के सम्मेलन में अंग्रेज़ी को सामान्य भाषा बनाए रखने की अनुशंसा हुई। → सम्मेलन के प्रस्ताव प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और मुख्यमंत्रियों को भेजे गए। → गृह मंत्रालय ने 17 मई 1965 को मंत्रिमंडल समिति के समक्ष नोट रखा, जिसमें एकीकृत न्यायिक व्यवस्था की आवश्यकता बताई गई। → मंत्रिमंडल समिति के निर्णय के आधार पर अंग्रेज़ी का प्रयोग जारी रहा। → सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के माध्यम से 2025 में यह निर्णय सार्वजनिक चर्चा में आया। → मद्रास उच्च न्यायालय अधिवक्ता संघ ने अनुच्छेद 14, 19 और 21 के उल्लंघन के आधार पर जनहित याचिका दायर की। → उच्च न्यायालय की खंडपीठ इसकी संवैधानिक वैधता का परीक्षण करेगी, और निर्णय भाषा नीति की दिशा तय करेगा।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए :
1. संविधान के अनुच्छेद 348 (1) के अनुसार, जब तक संसद विधि द्वारा अन्यथा उपबंध न करे, उच्चतम न्यायालय की समस्त कार्यवाही अंग्रेज़ी में होगी।
2. अनुच्छेद 348 (2) के अंतर्गत किसी राज्य का राज्यपाल, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से, उस राज्य में मुख्य पीठ वाले उच्च न्यायालय की कार्यवाही में हिन्दी या राज्य की राजभाषा के प्रयोग को प्राधिकृत कर सकता है।
3. अनुच्छेद 348 (2) के अंतर्गत प्राधिकृत उच्च न्यायालय के निर्णय, डिक्री और आदेश बिना अंग्रेज़ी अनुवाद के केवल क्षेत्रीय भाषा में जारी किए जा सकते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 और 2 सही हैं। अनुच्छेद 348 (1) उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों की कार्यवाही की भाषा अंग्रेज़ी रखता है, जब तक संसद विधि द्वारा अन्यथा न करे। अनुच्छेद 348 (2) राज्यपाल को राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से हिन्दी या राज्य की राजभाषा के प्रयोग की अनुमति देता है। कथन 3 गलत है, क्योंकि 348 (2) के परंतुक के अनुसार ऐसे उच्च न्यायालय के निर्णय, डिक्री और आदेश अंग्रेज़ी में ही होने चाहिए या उनका अंग्रेज़ी अनुवाद साथ होना चाहिए।
Q2. निम्नलिखित अभिकथन (A) और कारण (R) पर विचार कीजिए :
अभिकथन (A) : संघ की राजभाषा हिन्दी (देवनागरी लिपि में) है, फिर भी संघ के कुछ शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेज़ी का प्रयोग संवैधानिक रूप से जारी रह सकता है।
कारण (R) : संविधान के अनुच्छेद 343 (2) के अंतर्गत संसद को यह उपबंध करने की शक्ति है कि आरंभिक पंद्रह वर्षों की अवधि के बाद भी शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेज़ी का प्रयोग जारी रह सकता है।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए :
- (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है
- (A) और (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है
- (A) सही है, किंतु (R) गलत है
- (A) गलत है, किंतु (R) सही है
उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है — अनुच्छेद 343 (1) संघ की राजभाषा हिन्दी (देवनागरी लिपि) घोषित करता है। अनुच्छेद 343 (2) के अंतर्गत आरंभ में पंद्रह वर्षों तक अंग्रेज़ी के प्रयोग की व्यवस्था थी, और संसद को इसके बाद भी उपबंध करने की शक्ति दी गई, जिसके आधार पर राजभाषा अधिनियम, 1963 बना। इसलिए कारण अभिकथन की सही व्याख्या करता है।
Q3. निम्नलिखित सुमेलन कीजिए :
सूची-I (संवैधानिक अनुच्छेद) : सूची-II (विषय)
A. अनुच्छेद 344 : 1. राज्य की राजभाषा का निर्धारण
B. अनुच्छेद 348 : 2. उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों की कार्यवाही की भाषा
C. अनुच्छेद 345 : 3. राजभाषा आयोग और संसदीय समिति का गठन
D. अनुच्छेद 351 : 4. हिन्दी भाषा के विकास के लिए निदेश
सही सुमेलन चुनिए :
- A-3, B-2, C-1, D-4
- A-2, B-3, C-4, D-1
- A-1, B-4, C-3, D-2
- A-4, B-1, C-2, D-3
उत्तर: A-3, B-2, C-1, D-4 — अनुच्छेद 344 के अंतर्गत राजभाषा आयोग और संसद की समिति का गठन होता है (3)। अनुच्छेद 348 उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों की भाषा से संबंधित है (2)। अनुच्छेद 345 राज्य विधानमंडल को राज्य की राजभाषा चुनने की शक्ति देता है (1)। अनुच्छेद 351 संघ को हिन्दी के प्रसार और विकास का निदेश देता है (4)।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ संविधान के अनुच्छेद 348 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों की कार्यवाही की भाषा अंग्रेज़ी बनी हुई है, जिसका आधार 1965 का कैबिनेट समिति का निर्णय बताया जाता है। इस व्यवस्था को अनुच्छेद 14, 19 और 21 की कसौटी पर संवैधानिक रूप से चुनौती देने के तर्कों की समीक्षा कीजिए। साथ ही बताइए कि क्या ऐसी कार्यपालिका-नीति न्यायिक समीक्षा के दायरे में आती है और कौन-से संवैधानिक या प्रशासनिक विकल्प न्याय तक पहुँच और एकरूप न्यायिक व्यवस्था, दोनों में संतुलन बना सकते हैं। (15 Marks)
रूपरेखा: MODEL-ANSWER SKELETON: (1) भूमिका : मद्रास उच्च न्यायालय अधिवक्ता संघ (MHAA) की जनहित याचिका; 1965 का निर्णय आरटीआई अधिनियम, 2005 के माध्यम से सामने आना; मुख्य न्यायाधीश और प्रधान न्यायाधीश सम्मेलन (मार्च 1965, मुख्य न्यायाधीश पी. बी. गजेंद्रगडकर की अध्यक्षता); गृह मंत्रालय का नोट (17 मई 1965) जिसमें एकरूप न्यायिक व्यवस्था को राष्ट्रीय एकता का कारक बताया गया। (2) संवैधानिक प्रावधान : अनुच्छेद 348 (1) और (2) तथा उसका परंतुक (निर्णय और आदेश अंग्रेज़ी में); अनुच्छेद 343 (हिन्दी राजभाषा, 15 वर्षीय अवधि और संसद की शक्ति); अनुच्छेद 344 (राजभाषा आयोग); अनुच्छेद 345 (राज्य की राजभाषा); अनुच्छेद 350 (भाषाई शिकायत निवारण का अधिकार); अनुच्छेद 351 (हिन्दी का विकास); आठवीं अनुसूची के 22 भाषाएँ। राजभाषा अधिनियम, 1963 का संदर्भ। (3) विश्लेषण : कार्यपालिका निर्णय बनाम संवैधानिक पाठ का अंतर; कैबिनेट निर्णय की वैधता पर प्रश्न; अनुच्छेद 14 में मनमानापन (Arbitrariness) की कसौटी, जिसका विस्तार मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) और अजय हसिया बनाम खालिद मुजीब (1981) में हुआ; अनुच्छेद 19 (1) (क) और 21 के अंतर्गत न्याय तक पहुँच, जिसे हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य (1979) में मूल अधिकार के रूप में मान्यता मिली। (4) विविध मत : एकरूपता, न्यायाधीशों और अधिवक्ताओं की अंतर-राज्यीय गतिशीलता और उच्चतम न्यायालय में स्थानांतरण के पक्ष में तर्क; क्षेत्रीय भाषा में न्याय, संघवाद और आम नागरिक की पहुँच के पक्ष में तर्क। विधि आयोग की 216वीं रिपोर्ट (2009) का अनुच्छेद 348 में संशोधन पर सुझाव। (5) समाधान : अनुवाद और डिजिटल तकनीक; उच्च न्यायालयों में क्षेत्रीय भाषा के सीमित प्रयोग के लिए अनुच्छेद 348 (2) की प्रक्रिया का सक्रिय उपयोग; अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संशोधन का विकल्प। (6) निष्कर्ष : संतुलित और तर्कसंगत राय, जिसमें यह स्पष्ट हो कि चुनौती का केंद्र कार्यपालिका निर्णय और संवैधानिक पाठ दोनों हैं।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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