03 Nov ई-फाइलिंग 3.0 कार्यशाला: न्यायपालिका में डिजिटल परिवर्तन और सुलभता
✎ ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना राष्ट्रीय ई-शासन योजना के अंतर्गत न्यायिक प्रक्रिया के डिजिटलीकरण की परियोजना है, और तीसरा चरण न्यायालयों को शुरू से अंत तक कागज-रहित बनाकर नागरिक-केंद्रित न्याय सेवाएं देने का लक्ष्य रखता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — राजव्यवस्था एवं शासन (न्यायपालिका, ई-शासन, न्याय तक पहुँच, सरकारी मुकदमेबाजी) | GS Paper III — विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी (सूचना प्रौद्योगिकी का शासन में अनुप्रयोग, डिजिटल अवसंरचना)
- Prelims: ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना (e-Courts Mission Mode Project) — राष्ट्रीय ई-शासन योजना (NeGP) के अंतर्गत मिशन मोड परियोजना, ई-कोर्ट परियोजना का तीसरा चरण (Phase III) — कागज-रहित न्यायालय का लक्ष्य, राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) — ई-कोर्ट परियोजना के तकनीकी क्रियान्वयन में भूमिका, भारत के सर्वोच्च न्यायालय की ई-समिति (e-Committee), राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG) — मामलों की ऑनलाइन निगरानी, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 — इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों की वैधता, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 — इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों के साक्ष्य संबंधी प्रावधान, राष्ट्रीय मुकदमेबाजी नीति, 2010 (National Litigation Policy) — सरकार को प्रमुख वादी के रूप में प्रबंधन
- Essay: प्रौद्योगिकी और न्याय वितरण: क्या डिजिटल न्यायालय न्याय तक पहुँच को वास्तविक रूप से सुलभ बना सकते हैं?, शासन में डिजिटल परिवर्तन: प्रक्रिया-सुधार से व्यवहार-परिवर्तन तक की चुनौती
त्वरित पुनरावृत्ति: ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना राष्ट्रीय ई-शासन योजना के अंतर्गत न्यायिक प्रक्रिया के डिजिटलीकरण की परियोजना है, और तीसरा चरण न्यायालयों को शुरू से अंत तक कागज-रहित बनाकर नागरिक-केंद्रित न्याय सेवाएं देने का लक्ष्य रखता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
विधि एवं न्याय मंत्रालय के न्याय विभाग ने 4 नवंबर 2026 को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में ‘ई-फाइलिंग 3.0: प्रक्रिया से व्यवहार तक’ विषय पर एक कार्यशाला आयोजित करने की घोषणा की है। यह कार्यशाला ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना की एक पहल है, जिसका उद्देश्य सरकारी अधिकारियों को ई-फाइलिंग 3.0 प्लेटफॉर्म से परिचित कराना है। इसमें राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) द्वारा ई-कोर्ट सिंगल साइन-ऑन (SSO), ई-कोर्ट सर्विसेज मोबाइल ऐप और ई-फाइलिंग 3.0 की विशेषताओं पर तकनीकी सत्र प्रस्तावित हैं। विशेष रूप से सरकारी विभागों, उनके अधीनस्थ कार्यालयों, स्वायत्त निकायों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU) की मुकदमेबाजी में बड़ी हिस्सेदारी को देखते हुए इन संस्थाओं द्वारा ई-फाइलिंग अपनाने पर विशेष बल दिया गया है। यह कार्यशाला ई-कोर्ट परियोजना के तीसरे चरण के उस लक्ष्य से जुड़ी है, जिसमें न्यायालयों को शुरू से अंत तक डिजिटल और कागज-रहित बनाना है।
पृष्ठभूमि
- ई-कोर्ट परियोजना की शुरुआत 2007 में राष्ट्रीय ई-शासन योजना के अंतर्गत एक मिशन मोड परियोजना के रूप में हुई, जिसका उद्देश्य देश भर की अदालतों में सूचना प्रौद्योगिकी का समावेश करना था।
- सर्वोच्च न्यायालय ने 2005 में ई-समिति का गठन किया, जिसने न्यायिक प्रक्रिया के डिजिटलीकरण के लिए नीति और तकनीकी दिशा प्रदान की।
- ई-कोर्ट परियोजना के प्रथम और द्वितीय चरण में न्यायालय भवनों, कंप्यूटरीकरण, डेटा प्रबंधन और वादियों के लिए ऑनलाइन सेवाओं पर मुख्य जोर रहा।
- तीसरे चरण का अनुमोदन 2023 में हुआ, जिसमें न्यायालयों को कागज-रहित बनाने, नागरिक-केंद्रित ई-सेवाओं और उन्नत तकनीकों के उपयोग पर बल दिया गया है।
- लंबित मामलों की भारी संख्या और सरकारी मुकदमों का बड़ा हिस्सा न्यायालयों पर भार बढ़ाता है, इसलिए सरकारी संस्थाओं द्वारा ई-फाइलिंग अपनाना न्यायिक दक्षता के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
ई-फाइलिंग 3.0 और ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना क्या है?
- ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना भारत में न्यायिक प्रक्रिया के डिजिटलीकरण के लिए राष्ट्रीय ई-शासन योजना के तहत चलाई जा रही एक केंद्र-प्रायोजित परियोजना है, जिसका क्रियान्वयन विधि एवं न्याय मंत्रालय के न्याय विभाग द्वारा किया जाता है।
- इलेक्ट्रॉनिक दाखिलाकरण (ई-फाइलिंग) का अर्थ है वादपत्र, आवेदन और अन्य न्यायिक दस्तावेजों को भौतिक रूप में प्रस्तुत किए बिना ऑनलाइन दाखिल करना।
- ई-फाइलिंग 3.0 में सरकारी अधिवक्ताओं और सरकारी विभागों की विशेष आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए सुविधाएं शामिल की गई हैं, जिससे सरकारी मुकदमेबाजी का प्रबंधन सरल हो।
- ई-कोर्ट सिंगल साइन-ऑन (SSO) से अधिवक्ता और वादी एकल प्रवेश के माध्यम से विभिन्न ई-कोर्ट सेवाओं तक पहुँच पा सकते हैं।
- ई-कोर्ट परियोजना के तीसरे चरण का मुख्य उद्देश्य न्यायालयों को शुरू से अंत तक डिजिटल बनाना, नागरिक-केंद्रित न्यायिक सेवाएं देना और न्यायिक प्रक्रिया में तकनीक को संस्थागत रूप देना है।
- संवैधानिक दृष्टि से यह पहल अनुच्छेद 21 में निहित शीघ्र न्याय के अधिकार और अनुच्छेद 39A में निर्दिष्ट न्याय तक समान पहुँच के राज्य के दायित्व से जुड़ी है।
- सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों को मान्यता देते हैं, जिससे डिजिटल दस्तावेजों की कानूनी वैधता सुनिश्चित होती है।
- राष्ट्रीय मुकदमेबाजी नीति, 2010 सरकार को एक बड़े वादी के रूप में मुकदमों के प्रभावी और समन्वित प्रबंधन की दिशा देती है, और ई-फाइलिंग इसी लक्ष्य को व्यावहारिक रूप देती है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता (Feature) | महत्व (Significance) |
|---|---|
| ई-फाइलिंग 3.0 (e-Filing 3.0) | सरकारी मंत्रालयों, विभागों, संबद्ध कार्यालयों, स्वायत्त निकायों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU) को न्यायालयों में ऑनलाइन मुकदमे दाखिल करने की सुविधा देता है, जिससे भौतिक प्रक्रियाओं पर निर्भरता घटती है। |
| सरकारी अधिवक्ताओं के लिए सुविधाएं | सरकारी अधिवक्ताओं को डिजिटल मंच पर मामलों का प्रबंधन करने में सक्षम बनाती हैं, जिससे सरकारी मुकदमों की प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित और समयबद्ध होती है। |
| ई-कोर्ट एकल साइन-ऑन (Single Sign-On/SSO) | एक ही लॉगिन से कई ई-कोर्ट सेवाओं तक पहुंच देती है, जिससे उपयोगकर्ता के लिए प्रवेश सरल होता है और सेवाओं का समेकित उपयोग संभव होता है। |
| ई-कोर्ट सर्विसेज मोबाइल ऐप | वादियों और अधिवक्ताओं को मामलों की स्थिति, सुनवाई की तिथि और अन्य सेवाओं की जानकारी मोबाइल पर उपलब्ध कराकर न्याय की सुलभता बढ़ाता है। |
| तीसरा चरण (फेज-III) | न्यायालयों को शुरू से अंत तक डिजिटल और कागज-रहित बनाने तथा नागरिक-केंद्रित ई-सेवाएं देने का लक्ष्य रखता है। |
| राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) की भूमिका | प्लेटफॉर्म के तकनीकी विकास, संचालन और अधिकारियों के प्रशिक्षण सत्रों के माध्यम से व्यावहारिक क्रियान्वयन सुनिश्चित करता है। |
महत्व
प्रशासनिक और संस्थागत महत्व
- सरकारी मुकदमेबाजी में मंत्रालयों, विभागों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की बड़ी हिस्सेदारी है, इसलिए इनका ई-फाइलिंग अपनाना न्यायिक प्रक्रिया की दक्षता पर सीधा प्रभाव डालता है।
- फाइलों के डिजिटल प्रवाह से कार्यालयों के बीच समन्वय, रिकॉर्ड का रखरखाव और मामलों की निगरानी अधिक पारदर्शी होती है।
- सरकारी विभागों के अधिकारियों को प्रशिक्षित करने से प्रशासन में तकनीक को संस्थागत रूप से अपनाने की क्षमता बढ़ती है।
नागरिक-केंद्रित और सामाजिक महत्व
- ऑनलाइन सेवाएं न्यायालय तक पहुंच को सरल बनाती हैं, जिससे दूरस्थ क्षेत्रों के नागरिकों को भी सुविधा मिलती है।
- मामलों की प्रगति की जानकारी सुलभ होने से वादियों का विश्वास और न्याय प्रणाली की पारदर्शिता बढ़ती है।
- संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित शीघ्र न्याय के अधिकार की भावना को डिजिटल माध्यम से व्यावहारिक आधार मिलता है।
विधिक और प्रक्रियात्मक महत्व
- सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के अंतर्गत इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों और डिजिटल हस्ताक्षरों को विधिक मान्यता दी गई है, जो ई-फाइलिंग की वैधानिक नींव है।
- भारतीय साक्ष्य अधिनियम के स्थान पर लागू भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (भारतीय साक्ष्य अधिनियम) में इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों की स्वीकार्यता से डिजिटल साक्ष्यों के उपयोग को और स्पष्टता मिली है।
आर्थिक महत्व
- मुकदमों के तेजी से निपटान से विवादों की लागत घटती है और व्यापार तथा निवेश के माहौल में सुधार होता है।
- कागज और भौतिक भंडारण पर होने वाला व्यय कम होता है, जिससे सार्वजनिक संसाधनों की बचत होती है।
चुनौतियाँ
1. डिजिटल विभाजन और अवसंरचना
- सभी न्यायालयों और अधिकारियों तक समान रूप से विश्वसनीय इंटरनेट और कंप्यूटर सुविधा पहुंचना अभी चुनौतीपूर्ण है।
- ग्रामीण और सीमित संसाधन वाले क्षेत्रों में तकनीक तक पहुंच की असमानता न्याय की सुलभता के लक्ष्य को प्रभावित कर सकती है।
यूपीएससी लिंक: शासन में ई-गवर्नेंस; समावेशी विकास और डिजिटल विभाजन
2. डेटा सुरक्षा और साइबर सुरक्षा
- न्यायिक अभिलेखों में संवेदनशील व्यक्तिगत और सरकारी जानकारी होती है, इसलिए उसकी सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है।
- डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 (Digital Personal Data Protection Act, 2023) के प्रावधानों के साथ प्लेटफॉर्म की सुरक्षा व्यवस्था का तालमेल आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: साइबर सुरक्षा; डेटा संरक्षण और गोपनीयता का अधिकार
3. अधिकारियों की क्षमता और प्रशिक्षण
- ई-फाइलिंग की सफलता इस पर निर्भर है कि सरकारी अधिकारी प्लेटफॉर्म की कार्यप्रणाली को व्यवहार में कितनी अच्छी तरह समझते और अपनाते हैं।
- पुरानी भौतिक प्रक्रियाओं से डिजिटल कार्यप्रणाली की ओर बदलाव में संस्थागत प्रतिरोध और प्रशिक्षण की कमी बाधा बन सकती है।
यूपीएससी लिंक: प्रशासनिक सुधार; लोक सेवा में क्षमता निर्माण
4. प्रक्रियात्मक सामंजस्य और विधिक स्पष्टता
- विभिन्न न्यायालयों में अलग-अलग नियम और प्रक्रियाएं होने से एकरूप डिजिटल व्यवस्था लागू करना कठिन होता है।
- डिजिटल दस्तावेजों की प्रामाणिकता, हस्ताक्षर और सेवा की प्रक्रिया से जुड़े प्रश्नों पर स्पष्ट मानक आवश्यक हैं।
यूपीएससी लिंक: न्यायपालिका की भूमिका; विधि और प्रशासन में सुधार
5. भाषा और पहुंच
- बहुभाषी देश में सामान्य नागरिकों के लिए स्थानीय भाषाओं में इंटरफेस और मार्गदर्शन उपलब्ध कराना जरूरी है।
- तकनीकी शब्दावली की जटिलता से आम वादियों और छोटे अधिवक्ताओं को प्रक्रिया समझने में कठिनाई हो सकती है।
यूपीएससी लिंक: समावेशी ई-सेवाएं; भाषा और सुलभता
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| समस्या (Issue) | चिंता (Concern) |
|---|---|
| डिजिटल पहुंच | ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में इंटरनेट और उपकरणों की कमी से ई-सेवाओं का लाभ सीमित रह सकता है। |
| डेटा सुरक्षा | न्यायिक अभिलेखों में संवेदनशील जानकारी होने से साइबर खतरों और दुरुपयोग का जोखिम बना रहता है। |
| अधिकारियों का प्रशिक्षण | नई प्रणाली की व्यावहारिक समझ के बिना ई-फाइलिंग अपेक्षित गति से लागू नहीं हो सकती। |
| संस्थागत बदलाव | भौतिक फाइलों की पुरानी आदतों से डिजिटल कार्यप्रणाली की ओर संक्रमण में समय और प्रबंधन की आवश्यकता होगी। |
| विधिक मानक | डिजिटल दस्तावेजों की प्रामाणिकता और प्रक्रियात्मक एकरूपता पर स्पष्ट दिशा-निर्देश आवश्यक हैं। |
| भाषा और सुलभता | बहुभाषी उपयोगकर्ताओं के लिए सरल भाषा और स्थानीय विकल्प उपलब्ध कराना चुनौती है। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना (e-Courts Mission Mode Project)
आगे की राह
- सभी न्यायालयों में ई-फाइलिंग अपनाने के लिए समयबद्ध लक्ष्य और नियमित निगरानी तंत्र स्थापित किया जाए।
- सरकारी अधिकारियों, सरकारी अधिवक्ताओं और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के कर्मचारियों के लिए व्यावहारिक और नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जाएं।
- ग्रामीण और कम संसाधन वाले क्षेत्रों में इंटरनेट, उपकरण और सहायता केंद्रों की उपलब्धता बढ़ाई जाए।
- डेटा संरक्षण और साइबर सुरक्षा के मानकों को लगातार अद्यतन किया जाए तथा अभिलेखों की सुरक्षित भंडारण व्यवस्था सुनिश्चित हो।
- न्यायालयों की प्रक्रियाओं में एकरूपता लाने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश और मानक संचालन प्रक्रियाएं (SOP) जारी की जाएं।
- क्षेत्रीय भाषाओं में उपयोगकर्ता-अनुकूल इंटरफेस और सहायता सामग्री विकसित की जाए, ताकि आम वादी भी प्रक्रिया समझ सकें।
- ई-फाइलिंग के उपयोग से प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण कर प्रक्रियागत बाधाओं की पहचान और सुधार किया जाए।
- नागरिकों और अधिवक्ताओं से प्रतिक्रिया लेने का नियमित तंत्र बनाया जाए, ताकि सेवाएं व्यवहार की आवश्यकताओं के अनुरूप बनी रहें।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना (e-Courts Mission Mode Project) · ई-फाइलिंग (e-Filing) · कागज-रहित न्यायालय (Paperless Courts) · न्यायिक सुलभता (Access to Justice) · डिजिटल विभाजन (Digital Divide) · राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (National Judicial Data Grid – NJDG) · राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना (National e-Governance Plan – NeGP) · अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 39A (Articles 21 and 39A) · इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य (Electronic Evidence) · डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 (Digital Personal Data Protection Act, 2023)
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 21: शीघ्र न्याय का अधिकार
- अनुच्छेद 39क: समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता
अवधारणा प्रवाह
ई-कोर्ट परियोजना का तीसरा चरण: न्यायालयों को पूरी तरह डिजिटल और कागज-रहित बनाने का लक्ष्य → सभी न्यायालयों में ई-फाइलिंग अपनाने पर बल → सरकारी मंत्रालयों, विभागों, स्वायत्त निकायों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों द्वारा ई-फाइलिंग का उपयोग → भौतिक प्रक्रियाओं पर निर्भरता में कमी और कार्यक्षमता में सुधार → मुकदमों के निपटान में तेजी और नागरिकों के लिए न्याय की सुलभता में वृद्धि
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना (NeGP) के अंतर्गत पहचानी गई मिशन मोड परियोजनाओं में से एक है।
2. राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) ई-कोर्ट परियोजना से संबंधित तकनीकी सत्रों और अनुप्रयोगों के संचालन में सहयोग करता है।
3. ई-कोर्ट परियोजना का तीसरा चरण केवल आपराधिक मामलों वाले न्यायालयों तक सीमित है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है, क्योंकि ई-कोर्ट को NeGP की मिशन मोड परियोजनाओं में गिना गया है। कथन 2 सही है, क्योंकि कार्यशाला में NIC द्वारा तकनीकी सत्र आयोजित किए जा रहे हैं। कथन 3 गलत है, क्योंकि फेज-III का उद्देश्य सभी न्यायालयों में ई-फाइलिंग को अपनाना और न्यायालयों को शुरू से अंत तक डिजिटल बनाना है, किसी एक प्रकार के मामले तक सीमित नहीं है।
Q2. निम्नलिखित कथनों में दिए गए अभिकथन (A) और कारण (R) पर विचार कीजिए:
अभिकथन (A): भारत के न्यायालयों में इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों को साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत करना अब विधिक रूप से संभव है।
कारण (R): सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 4 इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों को विधिक मान्यता प्रदान करती है।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
- (A) और (R) दोनों सत्य हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है
- (A) और (R) दोनों सत्य हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है
- (A) सत्य है, किंतु (R) असत्य है
- (A) असत्य है, किंतु (R) सत्य है
उत्तर: (A) और (R) दोनों सत्य हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है — सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 4 इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों को विधिक मान्यता देती है, जिससे उनकी स्वीकार्यता का आधार बनता है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65B (जिसका स्थान अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 63 ने लिया है) इनके प्रमाणन की प्रक्रिया बताती है। अतः (R), (A) की सही व्याख्या है।
Q3. निम्नलिखित सूचियों का सही मिलान कीजिए:
सूची I (संवैधानिक/विधिक प्रावधान)
A. अनुच्छेद 39A
B. अनुच्छेद 21
C. अनुच्छेद 137
D. सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 4
सूची II (विषय)
1. समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता
2. शीघ्र विचारण सहित प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण
3. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपने निर्णयों का पुनर्विलोकन
4. इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों को विधिक मान्यता
सही उत्तर चुनिए:
- A-1, B-2, C-3, D-4
- A-2, B-1, C-3, D-4
- A-1, B-2, C-4, D-3
- A-1, B-3, C-2, D-4
उत्तर: A-1, B-2, C-3, D-4 — अनुच्छेद 39A राज्य को समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता सुनिश्चित करने का निर्देश देता है (1)। अनुच्छेद 21 के अंतर्गत शीघ्र विचारण का अधिकार न्यायिक व्याख्या से विकसित हुआ है (2)। अनुच्छेद 137 सर्वोच्च न्यायालय को अपने निर्णयों के पुनर्विलोकन की शक्ति देता है (3)। IT अधिनियम की धारा 4 इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों को विधिक मान्यता देती है (4)।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ ई-कोर्ट परियोजना के तीसरे चरण में सभी न्यायालयों में ई-फाइलिंग को पूरी तरह अपनाने पर बल दिया गया है। न्यायिक सुलभता और प्रक्रियागत दक्षता की दृष्टि से इस डिजिटल रूपांतरण का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि डिजिटल विभाजन और डेटा सुरक्षा की चिंताओं का समाधान किए बिना कागज-रहित न्यायालय संवैधानिक न्याय के आदर्श को किस सीमा तक सुदृढ़ कर पाएगा। (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर की संरचना: (1) परिचय: ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना का विकास, राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना (NeGP) की मिशन मोड परियोजना के रूप में पहचान, 2005 में ई-समिति का गठन (सर्वोच्च न्यायालय), और ई-फाइलिंग 3.0 पर 4 नवंबर 2026 की कार्यशाला का संदर्भ। (2) संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 21 (त्वरित और निष्पक्ष विचारण; हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य, 1979), अनुच्छेद 39A (समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता), और अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समानता)। (3) ई-कोर्ट के चरण: फेज-I और फेज-II की उपलब्धियाँ, राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG) द्वारा लंबित मामलों की निगरानी, और फेज-III के लक्ष्य: शुरू से अंत तक डिजिटल प्रक्रिया, नागरिक-केंद्रित ई-सेवाएँ, सिंगल साइन-ऑन (SSO) और मोबाइल ऐप। (4) प्रक्रियागत दक्षता के पक्ष में तर्क: सरकारी मंत्रालयों, PSU और नियामक निकायों की बड़ी मुकदमेबाजी का भार कम करना, भौतिक प्रक्रियाओं पर निर्भरता घटाना, पारदर्शिता। (5) विधिक मान्यता: सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 4; भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 63; अर्जुन पंडितराव खोटकर बनाम कैलाश कुशनराव गोरंत्याल (2020) में धारा 65B के प्रमाणपत्र की अनिवार्यता पर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय। (6) चुनौतियाँ और चिंताएँ: डिजिटल साक्षरता और इंटरनेट पहुँच का अभाव (ग्रामीण और वंचित वादकारी), अधिवक्ताओं और निचली अदालतों की क्षमता, साइबर सुरक्षा, डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 के अंतर्गत डेटा संरक्षण, और पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017) द्वारा मान्य निजता के अधिकार (अनुच्छेद 21) का प्रश्न। (7) संतुलित दृष्टिकोण: दक्षता बनाम प्रक्रियागत न्याय; वैकल्पिक भौतिक मार्ग (हाइब्रिड मॉडल) का महत्व, जन-जागरूकता और सहायता केंद्रों की भूमिका। (8) निष्कर्ष: डिजिटल रूपांतरण तभी संवैधानिक न्याय को सुदृढ़ करेगा जब पहुँच, सुरक्षा और निष्पक्षता तीनों सुनिश्चित हों।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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