पश्चिम बंगाल की नई भूमि नीति: ‘सिंगूर या नंदीग्राम नहीं’

पश्चिम बंगाल की नई भूमि नीति: 'सिंगूर या नंदीग्राम नहीं'

पश्चिम बंगाल की नई भूमि नीति: ‘सिंगूर या नंदीग्राम नहीं’

पश्चिम बंगाल की नई भूमि नीति: 'सिंगूर या नंदीग्राम नहीं' — पश्चिम बंगाल की नई भूमि नीति
आरेख: पश्चिम बंगाल की नई भूमि नीति

✎ प्रत्यक्ष भूमि क्रय, भूमि पूलिंग और समयबद्ध उपयोग की शर्त औद्योगिक भूमि की उपलब्धता बढ़ाने के उपाय हैं, जबकि भूमि राज्य सूची का विषय होने के कारण इनकी नीति राज्य स्तर पर तय होती है और भूस्वामियों के हित तथा उचित प्रतिकार का…

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — राजव्यवस्था एवं शासन (संघीय ढाँचा, राज्य सूची का विषय, भूमि अधिग्रहण और संपत्ति का अधिकार)  |  GS Paper III — अर्थव्यवस्था (औद्योगिक नीति, निवेश को बढ़ावा, भूमि सुधार, MSME)
  • Prelims: भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकार और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 (RFCTLARR Act, 2013), अनुच्छेद 300A (संपत्ति का अधिकार: संवैधानिक विधिक अधिकार), सातवीं अनुसूची — राज्य सूची की प्रविष्टि 18 (भूमि) और समवर्ती सूची की प्रविष्टि 42 (संपत्ति का अधिग्रहण और उपयोजन), प्रत्यक्ष भूमि क्रय (Direct Land Purchase) बनाम भूमि अधिग्रहण में अंतर, भूमि पूलिंग (Land Pooling) और भूमि बैंक (Land Bank), विशेष आर्थिक क्षेत्र अधिनियम, 2005 (SEZ Act, 2005), पूर्व-उपयोगित औद्योगिक भूमि (Brownfield) और हरित क्षेत्र (Greenfield) परियोजनाएँ, भूमि अभिलेखों का GIS आधारित डिजिटल प्रबंधन
  • Essay: औद्योगिक विकास और किसानों के अधिकार: भूमि अधिग्रहण से भूमि सहमति तक, राज्यों की भूमि नीति और सहकारी संघवाद: निवेश आकर्षण के लिए प्रशासनिक सुधार की सीमाएँ

त्वरित पुनरावृत्ति: प्रत्यक्ष भूमि क्रय, भूमि पूलिंग और समयबद्ध उपयोग की शर्त औद्योगिक भूमि की उपलब्धता बढ़ाने के उपाय हैं, जबकि भूमि राज्य सूची का विषय होने के कारण इनकी नीति राज्य स्तर पर तय होती है और भूस्वामियों के हित तथा उचित प्रतिकार का संरक्षण भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 2013 के सिद्धांतों से जुड़ा रहता है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

पश्चिम बंगाल सरकार ने निवेश संवर्धन नीति, 2026 (Investment Promotion Policy, 2026) के माध्यम से उद्योगों के लिए भूमि उपलब्ध कराने की व्यवस्था में बदलाव का प्रस्ताव रखा है। राज्य में औद्योगिक निवेश की एक प्रमुख बाधा भूमि की अनुपलब्धता बताई गई है। इसके समाधान के रूप में प्रत्यक्ष भूमि क्रय, भूमि पूलिंग और अप्रयुक्त औद्योगिक भूमि की पुनर्प्राप्ति का प्रावधान प्रस्तावित है। नीति में यह शर्त भी रखी गई है कि भूमि आवंटन के तीन वर्ष के भीतर उत्पादन शुरू होना चाहिए। सिंगूर और नंदीग्राम के भूमि अधिग्रहण आंदोलनों के अनुभव को ध्यान में रखते हुए यह नीति विकसित की जा रही है। विस्तृत प्रक्रियाएँ, भूस्वामियों के साथ समझौते की शर्तें और सरकार की भूमिका बाद में स्पष्ट की जाएँगी।

पृष्ठभूमि

  • सिंगूर (2006-07) में औद्योगिक परियोजना के लिए बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण हुआ, जिसका विरोध किसानों के आंदोलन के रूप में सामने आया। बाद में वहाँ भूमि लौटाने से संबंधित विधिक प्रावधान बनाए गए और मामला न्यायालय तक पहुँचा।
  • नंदीग्राम (2007) का भूमि विरोध भी औद्योगिक भूमि अधिग्रहण से जुड़ा था। इन दोनों घटनाओं ने भारत में भूमि अधिग्रहण और किसान हितों के बीच संतुलन पर व्यापक बहस को जन्म दिया।
  • भूमि अधिग्रहण के पुराने ढाँचे (भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894) में सुधार के लिए भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 2013 लाया गया, जिसमें सामाजिक प्रभाव आकलन, सहमति और उचित प्रतिकार के प्रावधान जोड़े गए।
  • भूमि राज्य सूची का विषय है, इसलिए औद्योगिक भूमि की उपलब्धता और भूमि आवंटन की नीति मुख्यतः राज्य सरकारें तय करती हैं; जबकि संपत्ति के अधिग्रहण से संबंधित विधि समवर्ती सूची में आती है।
  • भारत में औद्योगिक परियोजनाओं के लिए भूमि की उपलब्धता को लंबे समय से निवेश की प्रमुख बाधा माना जाता रहा है, जिसके कारण राज्यों ने भूमि बैंक, औद्योगिक पार्क और भूमि पूलिंग जैसे विकल्प अपनाए हैं।

भूमि आधारित औद्योगिक नीति क्या है?

  • भूमि आधारित औद्योगिक नीति का उद्देश्य उद्योगों को समय पर, पारदर्शी और विधिसम्मत तरीके से भूमि उपलब्ध कराना है, ताकि निवेश के लिए आवश्यक भूखंड सुलभ हों।
  • प्रत्यक्ष भूमि क्रय (Direct Land Purchase) में सरकार भूस्वामियों से सीधे सहमति के आधार पर भूमि खरीदकर उद्योगों को आवंटित करती है। इसमें सार्वजनिक अधिग्रहण की बाध्यकारी प्रक्रिया नहीं अपनाई जाती।
  • भूमि पूलिंग (Land Pooling) में छोटे-छोटे भूखंडों को मिलाकर एक सुसंगत और बड़ा क्षेत्र तैयार किया जाता है, ताकि बड़े उद्योगों के लिए सतत भूभाग उपलब्ध हो सके। भूस्वामियों के हिस्से और प्रतिफल की शर्तें स्पष्ट होना आवश्यक है।
  • भूमि बैंक (Land Bank) सरकार द्वारा पहचानी और सुरक्षित रखी गई औद्योगिक भूमि का डिजिटल भंडार होता है, जिससे निवेशक उपलब्ध भूखंडों की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
  • अप्रयुक्त औद्योगिक भूमि की पुनर्प्राप्ति का अर्थ है कि आवंटित भूमि का उपयोग न होने पर उसे वापस लेकर अन्य उपयोग में लाया जाए, ताकि भूमि संसाधन का दुरुपयोग रोका जा सके।
  • उत्पादन आरंभ करने की समयसीमा (इस मामले में तीन वर्ष) और आवंटन रद्द करने का प्रावधान भूमि के दीर्घकालिक और वास्तविक औद्योगिक उपयोग को सुनिश्चित करने के उपकरण हैं।
  • भूमि सुधार का यह प्रयास संपत्ति के अधिकार (अनुच्छेद 300A) और भूस्वामियों के हितों के संरक्षण के साथ संतुलित होना चाहिए, क्योंकि भूमि अधिग्रहण से जुड़े विवाद सामाजिक और विधिक दोनों दृष्टियों से संवेदनशील रहे हैं।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
प्रत्यक्ष भूमि क्रय (Direct Land Purchase) सरकार उद्योगों के लिए भूमि सीधे खरीदकर निवेशकों को आवंटित करेगी, जिससे अधिग्रहण के विवादों वाली प्रक्रिया से बचने का प्रयास है।
भूमि पूलिंग (Land Pooling) बिखरे छोटे भू-खंडों को मिलाकर बड़े और सटे हुए भू-क्षेत्र बनाए जाएँगे, जो बड़े उद्योगों की प्रमुख आवश्यकता है।
सरकारी अप्रयुक्त औद्योगिक भूमि की वापसी पहले से आवंटित पर अनुपयोगी पड़ी भूमि को पुनः उपयोग में लाकर भूमि की उपलब्धता बढ़ाई जाएगी।
उत्पादन आरंभ की तीन वर्ष की समय-सीमा भूमि आवंटन के बाद तय अवधि में उत्पादन शुरू न होने पर आवंटन रद्द करने का प्रस्ताव है, जिससे भूमि के दुरुपयोग पर रोक लगेगी।
श्रम-प्रधान उद्योग और ब्राउनफील्ड पुनर्विकास को प्राथमिकता रोज़गार-सृजन की दृष्टि से श्रम-प्रधान उद्योगों को और पुराने औद्योगिक स्थलों के पुनर्विकास को वरीयता दी गई है, जिससे नई भूमि की मांग घटती है।
GIS-सक्षम औद्योगिक भूमि सूची भू-सूचना प्रणाली (GIS) के माध्यम से भूमि के उपयोग की निगरानी और पारदर्शिता सुनिश्चित होगी।

महत्व

आर्थिक

  • भूमि की उपलब्धता को निवेश के प्रमुख अवरोध के रूप में पहचानकर उसे हल करना औद्योगिक निवेश और उत्पादन क्षमता के विस्तार के लिए आवश्यक है।
  • श्रम-प्रधान उद्योगों को प्राथमिकता देने से रोज़गार सृजन और निर्यात-आधारित विनिर्माण को बल मिल सकता है।
  • अप्रयुक्त भूमि को पुनः उपयोग में लाने से संसाधनों का कुशल उपयोग होता है और आर्थिक संवृद्धि की गति बढ़ती है।

सामाजिक

  • MSME को महिलाओं और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को रोज़गार देने के लिए प्रोत्साहित करना समावेशी विकास के लक्ष्य से जुड़ा है।
  • भूमि अधिग्रहण से प्रभावित परिवारों के हितों की सुरक्षा और सहमति की प्रक्रिया भी सामाजिक न्याय का विषय है।

शासन और प्रशासनिक

  • भूमि प्रबंधन में पारदर्शिता, स्पष्ट नियम और डिजिटल अभिलेख (GIS) से नौकरशाही में विवेकाधिकार की गुंजाइश घटती है।
  • उत्पादन न होने पर आवंटन रद्द करने का प्रावधान सरकारी संपत्ति के दुरुपयोग को रोकने के लिए एक प्रशासनिक उपाय है।

संघीय और संवैधानिक

  • भूमि राज्य सूची का विषय है, इसलिए राज्य सरकार को भूमि नीति बनाने और लागू करने का व्यापक अधिकार है।
  • भूमि नीति में संपत्ति के अधिकार और जन-हित के संतुलन का प्रश्न संवैधानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

चुनौतियाँ

1. सहमति और मुआवज़े का प्रश्न

  • प्रत्यक्ष क्रय और भूमि पूलिंग में भू-स्वामियों से सहमति का स्वरूप, मूल्य-निर्धारण और शर्तें अभी स्पष्ट नहीं हैं।
  • स्वैच्छिक क्रय के बावजूद दबाव या असमान सौदेबाज़ी की आशंका बनी रहती है, जिससे विवाद दोबारा उभर सकते हैं।

2. भूमि की खंडित प्रकृति

  • छोटे और बिखरे भू-खंडों के कारण बड़े औद्योगिक प्रोजेक्ट के लिए सटी हुई भूमि मिलना कठिन होता है।
  • भूमि पूलिंग से बड़े क्षेत्र बनाने में भू-स्वामियों के हितों, लगान और अधिकारों के बीच समन्वय आवश्यक होगा।

3. पूर्व के विवादों की स्मृति और सामाजिक विरोध

  • सिंगूर और नंदीग्राम जैसे भूमि अधिग्रहण विवादों से सरकार और जनता दोनों में भूमि नीति को लेकर संवेदनशीलता बनी हुई है।
  • जन-विरोध से परियोजनाओं में देरी और निवेश पर अनिश्चितता बढ़ सकती है, इसलिए परामर्श की व्यवस्था आवश्यक है।

4. पर्यावरण और कृषि-उत्पादकता

  • कृषि-योग्य भूमि का औद्योगिक उपयोग में बदलना खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका पर प्रभाव डाल सकता है।
  • औद्योगिक भूमि के चयन में पारिस्थितिकी और जल-संसाधनों पर पड़ने वाले प्रभाव का मूल्यांकन आवश्यक है।

5. प्रशासनिक क्षमता और अनुपालन

  • उत्पादन-समय-सीमा और आवंटन-रद्दीकरण जैसे प्रावधानों को लागू करने के लिए मज़बूत निगरानी तंत्र चाहिए।
  • विस्तृत प्रक्रियाएँ, मानक-संचालन प्रक्रिया और समय-बद्ध निर्णय न होने पर नीति के लक्ष्य पूरे नहीं हो पाते।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
सहमति और मुआवज़ा भू-स्वामियों की स्वैच्छिक सहमति और उचित मूल्य सुनिश्चित करने के मानक अभी स्पष्ट नहीं हैं।
भूमि पूलिंग की जटिलता बिखरे भू-खंडों को एकत्र करने में कानूनी, राजस्व और स्वामित्व संबंधी बाधाएँ आ सकती हैं।
सामाजिक विरोध अतीत के भूमि-विवादों की स्मृति से जन-विरोध और परियोजना में विलंब का खतरा बना रहता है।
कृषि-भूमि का रूपांतरण उपजाऊ कृषि-भूमि के औद्योगिक उपयोग से खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका प्रभावित हो सकती है।
आवंटन का दुरुपयोग अप्रयुक्त भूमि लेने की प्रवृत्ति पर रोक के लिए तीन वर्ष की सीमा और रद्दीकरण का प्रभावी क्रियान्वयन आवश्यक है।

आगे की राह

  • प्रत्यक्ष भूमि क्रय और भूमि पूलिंग की प्रक्रिया, मुआवज़ा-मानक और भू-स्वामियों के साथ अनुबंध की शर्तें सार्वजनिक रूप से स्पष्ट की जाएँ।
  • भू-स्वामियों की स्वैच्छिक सहमति को दस्तावेज़ों द्वारा प्रमाणित करने और स्वतंत्र शिकायत निवारण तंत्र की व्यवस्था हो।
  • भूमि उपयोग के लिए GIS-आधारित औद्योगिक भूमि सूची को नियमित रूप से अद्यतन कर सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध कराया जाए।
  • तीन वर्ष में उत्पादन आरंभ न होने वाले आवंटनों की समीक्षा के लिए स्पष्ट समय-सारणी, नोटिस और अपील का प्रावधान हो।
  • कृषि-योग्य और पारिस्थितिकी-संवेदनशील भूमि को औद्योगिक उपयोग से बचाने के लिए भूमि-उपयोग योजना और पर्यावरण प्रभाव आकलन को अनिवार्य किया जाए।
  • ब्राउनफील्ड पुनर्विकास और अप्रयुक्त सरकारी भूमि के उपयोग को प्राथमिकता देकर नई कृषि-भूमि पर दबाव कम किया जाए।
  • निवेश नीति और भूमि नीति के बीच समन्वय के लिए राज्य स्तर पर एकीकृत निगरानी और समय-बद्ध अनुमोदन प्रणाली अपनाई जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

भूमि अधिग्रहण (Land Acquisition) · प्रत्यक्ष भूमि क्रय (Direct Land Purchase) · भूमि समेकन (Land Pooling) · भूमि बैंक (Land Bank) · ब्राउनफील्ड पुनर्विकास (Brownfield Redevelopment) · भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 (RFCTLARR Act, 2013) · सहमति-आधारित भूमि प्रक्रिया · अनुच्छेद 300A (Article 300A) · राज्य सूची की प्रविष्टि 18 (State List Entry 18) · राष्ट्रीय भूमि अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम (NLRMP) · औद्योगिक भूमि का उपयोग-निगरानी तंत्र (GIS Inventory) · सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME)

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 300A: संपत्ति का संवैधानिक अधिकार, मौलिक नहीं
  • सातवीं अनुसूची, राज्य सूची की प्रविष्टि 18: भूमि राज्य का विषय

अवधारणा प्रवाह

राज्य में औद्योगिक निवेश के लिए भूमि की उपलब्धता एक प्रमुख बाधा के रूप में पहचानी गई।  →  बिखरे भू-खंडों और अतीत के भूमि अधिग्रहण विवादों से भूमि-प्राप्ति कठिन और विवादास्पद बनी।  →  नीति में प्रत्यक्ष भूमि क्रय, भूमि पूलिंग और अप्रयुक्त सरकारी भूमि की वापसी के उपाय प्रस्तावित हुए।  →  आवंटित भूमि पर तीन वर्ष में उत्पादन, केवल औद्योगिक उपयोग और GIS-आधारित निगरानी की शर्तें जोड़ी गईं।  →  भूमि की समय पर और पारदर्शी उपलब्धता से औद्योगिक निवेश और उत्पादन बढ़ने की अपेक्षा है।  →  श्रम-प्रधान उद्योगों और MSME में रोज़गार-सृजन से आर्थिक संवृद्धि और रोज़गार पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 के अंतर्गत निजी कंपनियों के लिए अधिग्रहण में प्रभावित परिवारों की कम-से-कम 70 प्रतिशत सहमति अपेक्षित है।
2. ‘भूमि’ (Land) संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची की प्रविष्टि 18 में आती है।
3. संविधान के अनुच्छेद 19(1)(च) द्वारा संपत्ति का अर्जन, धारण और व्ययन मूल अधिकार के रूप में गारंटीकृत है।

उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. इनमें से कोई नहीं, क्योंकि सभी गलत हैं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: RFCTLARR अधिनियम, 2013 की धारा 2(2) के अनुसार निजी कंपनी के लिए प्रभावित परिवारों की 70 प्रतिशत और सार्वजनिक-निजी भागीदारी के लिए 80 प्रतिशत सहमति आवश्यक है। कथन 2 सही है: भूमि राज्य सूची का विषय है। कथन 3 गलत है, क्योंकि 44वें संविधान संशोधन (1978) द्वारा संपत्ति का मूल अधिकार हटाया गया और उसे अनुच्छेद 300A के अंतर्गत संवैधानिक अधिकार बनाया गया।

Q2. कथन (A): किसी राज्य में बड़े और सटे हुए औद्योगिक भूखंड भूमि समेकन (Land Pooling) के माध्यम से बिना अनिवार्य अधिग्रहण के भी उपलब्ध कराए जा सकते हैं।
कारण (R): भूमि समेकन में भूस्वामी अपनी भूमि स्वैच्छिक रूप से योगदान करते हैं और बदले में विकसित भूखंडों का हिस्सा प्राप्त करते हैं।

सही विकल्प चुनिए:

  1. (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है
  2. (A) और (R) दोनों सही हैं, परंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है
  3. (A) सही है, परंतु (R) गलत है
  4. (A) गलत है, परंतु (R) सही है

उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है — भूमि समेकन सहमति-आधारित व्यवस्था है, जिसमें भूस्वामी भूमि का एक भाग सामूहिक योजना हेतु देते हैं और बदले में विकसित भूखंड पाते हैं। इसी कारण यह अनिवार्य अधिग्रहण के बिना बड़े सटे हुए भूखंड बनाने का साधन बनता है। गुजरात नगर नियोजन (टाउन प्लानिंग) योजना तथा आंध्र प्रदेश राजधानी क्षेत्र में भूमि समेकन इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

Q3. निम्नलिखित में से कौन-सा अधिनियम नगर नियोजन की ‘टाउन प्लानिंग स्कीम’ के अंतर्गत भूमि समेकन (Land Pooling) की व्यवस्था के लिए प्रसिद्ध है?

  1. भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894
  2. गुजरात नगर नियोजन और शहरी विकास अधिनियम, 1976
  3. नगरीय भूमि (सीमा और विनियमन) अधिनियम, 1976
  4. भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन अधिनियम, 2013

उत्तर: गुजरात नगर नियोजन और शहरी विकास अधिनियम, 1976 — गुजरात नगर नियोजन और शहरी विकास अधिनियम, 1976 के अंतर्गत टाउन प्लानिंग स्कीम में भूस्वामियों की भूमि समेकित करके पुनः विभाजित की जाती है और कुछ भाग सार्वजनिक उपयोग हेतु रखा जाता है। भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 अनिवार्य अधिग्रहण का कानून है। नगरीय भूमि (सीमा और विनियमन) अधिनियम, 1976 भूमि-सीमा से संबंधित था और अब निरस्त है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत में भूमि अधिग्रहण को औद्योगिक निवेश की प्रमुख बाधा और कृषि-संघर्षों का एक बड़ा स्रोत माना जाता रहा है। अनिवार्य अधिग्रहण से हटकर प्रत्यक्ष भूमि क्रय और भूमि समेकन को औद्योगिक भूमि-प्राप्ति की रणनीति के रूप में अपनाने का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि यह सुनिश्चित करने के लिए कौन-से सुरक्षा-उपाय आवश्यक हैं कि अधिगृहीत या प्राप्त भूमि का समय पर और उत्पादक उपयोग हो। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
(1) भूमिका: समाचार का संदर्भ—पश्चिम बंगाल की प्रस्तावित निवेश संवर्धन नीति, 2026 में प्रत्यक्ष भूमि क्रय, भूमि समेकन, अप्रयुक्त औद्योगिक भूमि की वापसी और उत्पादन आरंभ की तीन-वर्षीय शर्त; सिंगूर और नंदीग्राम के भूमि-आंदोलनों का तथ्यात्मक संदर्भ (निष्पक्ष रूप से)।
(2) संवैधानिक ढाँचा: भूमि राज्य सूची की प्रविष्टि 18 का विषय है; भूमि अधिग्रहण, राज्य सूची और समवर्ती सूची (प्रविष्टि 42) दोनों में आता है; अनुच्छेद 300A के अंतर्गत संपत्ति का अधिकार संवैधानिक किंतु मूल अधिकार नहीं है। इंदौर विकास प्राधिकरण बनाम मनोहरलाल (2020) में सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 300A के अंतर्गत बिना विधि-सम्मत प्रक्रिया के संपत्ति से वंचित करने के विरुद्ध संरक्षण पर बल दिया।
(3) विधिक उपकरण: भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की पृष्ठभूमि; RFCTLARR अधिनियम, 2013 में सामाजिक प्रभाव आकलन (SIA), उचित प्रतिकर, निजी कंपनियों के लिए 70 प्रतिशत और सार्वजनिक-निजी भागीदारी हेतु 80 प्रतिशत सहमति; प्रत्यक्ष क्रय बाजार-आधारित सौदा है, अतः यह अधिग्रहण अधिनियम के दायरे से बाहर है।
(4) मॉडल तुलना: टाउन प्लानिंग स्कीम (गुजरात नगर नियोजन अधिनियम, 1976) तथा आंध्र प्रदेश राजधानी क्षेत्र भूमि समेकन (APCRDA अधिनियम, 2014 के अंतर्गत, 2015 से) के अनुभव; भूमि समेकन की सफलता के लिए सहभागिता, भूमि-मूल्य निर्धारण और विवाद-निवारण।
(5) समालोचनात्मक बिंदु—पक्ष में: खंडित भूखंडों का एकीकरण, गति, पारदर्शिता, पुनर्वास-विवादों में कमी, भूमि बैंक से उपलब्धता। विपक्ष में: प्रत्यक्ष क्रय में मोलभाव की असमानता, छोटे भूस्वामियों के दबाव, दलालों की भूमिका, सहमति-आधारित व्यवस्था में ‘सहमति’ की वास्तविकता, तथा भूमि-मूल्य सट्टे का खतरा।
(6) सुरक्षा-उपाय: उत्पादन आरंभ की समय-सीमा (तीन वर्ष) और आवंटन-निरस्तीकरण; गैर-औद्योगिक उपयोग पर रोक; GIS-आधारित औद्योगिक भूमि-सूची; राष्ट्रीय भूमि अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम (NLRMP) के माध्यम से डिजिटल अभिलेख; ब्राउनफील्ड पुनर्विकास को प्राथमिकता, जिससे ग्रीनफील्ड दबाव घटे; MSME और श्रम-गहन उद्योगों पर बल, तथा सामाजिक प्रभाव आकलन।
(7) संतुलित निष्कर्ष: विकास और भूस्वामी-हित में संतुलन; नीति की सफलता विस्तृत प्रक्रिया-नियमों, पारदर्शी सहमति-तंत्र और निगरानी-तंत्र पर निर्भर है, जिन्हें अभी स्पष्ट किया जाना शेष है।

स्रोत: The Indian Express


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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