14 Oct बंगाल का उद्योग नीति: निवेशकों के लिए नए अवसर, जानिए क्या होंगे बदलाव
✎ राज्य की औद्योगिक नीति = प्रोत्साहन + भूमि नीति + नीतिगत निश्चितता; उद्योग राज्य सूची की प्रविष्टि 24 में है और भूमि अधिग्रहण समवर्ती सूची की प्रविष्टि 42 में; भूतलक्षी आर्थिक कानून की जाँच अनुच्छेद 14, 19(1)(g), 300A और…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — संघवाद, राज्य के विधायी अधिकार, मूल अधिकार और विधि का शासन (अनुच्छेद 14, 19(1)(g), 300A) | GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था: औद्योगिक नीति, निवेश, भूमि अधिग्रहण, अवसंरचना और रोज़गार | GS Paper III — औद्योगिक विकास में राज्यों की भूमिका और प्रतिस्पर्धी संघवाद
- Prelims: राज्य औद्योगिक नीति, राजकोषीय प्रोत्साहन (Fiscal Incentives), भूतलक्षी विधान (Retrospective Legislation), वचन-विबंध का सिद्धांत (Promissory Estoppel), वैध प्रत्याशा (Legitimate Expectation), अनुच्छेद 300A — संपत्ति का अधिकार, RFCTLARR अधिनियम, 2013, हल्दिया पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड, फीनॉल और एसीटोन, सातवीं अनुसूची — राज्य सूची की प्रविष्टि 24 (उद्योग)
- Essay: निवेश आकर्षित करने में नीतिगत स्थिरता और भरोसे की भूमिका: राज्य की विश्वसनीयता ही उसकी सबसे बड़ी पूँजी है, औद्योगिक विकास और भूमि अधिग्रहण के बीच संतुलन: आजीविका, पुनर्वास और निवेश की चुनौती
त्वरित पुनरावृत्ति: राज्य की औद्योगिक नीति = प्रोत्साहन + भूमि नीति + नीतिगत निश्चितता; उद्योग राज्य सूची की प्रविष्टि 24 में है और भूमि अधिग्रहण समवर्ती सूची की प्रविष्टि 42 में; भूतलक्षी आर्थिक कानून की जाँच अनुच्छेद 14, 19(1)(g), 300A और वचन-विबंध/वैध प्रत्याशा के आधार पर होती है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ने 14 अक्टूबर 2026 को हल्दिया में घोषणा की कि राज्य की नई औद्योगिक नीति दीवाली से पहले जारी की जाएगी। उन्होंने बताया कि नीति का मसौदा प्रस्तुत किया जा चुका है और उसमें नई भूमि नीति तथा उद्योगों के लिए प्रोत्साहन शामिल हैं। इसी अवसर पर हल्दिया पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड की देश की सबसे बड़ी एकीकृत फीनॉल-एसीटोन इकाई का उद्घाटन हुआ। इसमें लगभग 6,000 करोड़ रुपये का निवेश है और लगभग 600 लोगों को प्रत्यक्ष तथा 1,000 को अप्रत्यक्ष रोज़गार मिलने का अनुमान है। नीति की चर्चा इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि राज्य के पूर्ववर्ती कानून ‘पश्चिम बंगाल प्रोत्साहन योजना एवं अनुदान-प्रोत्साहन संबंधी दायित्व निरसन अधिनियम, 2025’ ने 1993 से 2021 के बीच दिए गए औद्योगिक प्रोत्साहनों को भूतलक्षी प्रभाव से समाप्त कर दिया था। उद्योग समूहों ने इसे कलकत्ता उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। इसलिए नई नीति निवेशकों का भरोसा बहाल करने की दृष्टि से अहम मानी जा रही है।
पृष्ठभूमि
- भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची में ‘उद्योग’ राज्य सूची की प्रविष्टि 24 में है, परंतु संघ सूची की प्रविष्टि 7 और 52 के अंतर्गत जिन उद्योगों को संसद ने लोकहित में नियंत्रण योग्य घोषित किया है, वे इसके अपवाद हैं। भूमि राज्य सूची की प्रविष्टि 18 में है, जबकि भूमि का अधिग्रहण समवर्ती सूची की प्रविष्टि 42 में आता है। इस कारण राज्य अपनी औद्योगिक और भूमि नीति स्वयं बना सकते हैं।
- 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद राज्यों के बीच निवेश के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ी। राज्य कर-रियायत, पूँजीगत सब्सिडी, स्टांप शुल्क में छूट और रियायती भूमि जैसे प्रोत्साहन देकर निवेशकों को आकर्षित करते हैं। इसे प्रतिस्पर्धी संघवाद का आर्थिक पक्ष माना जाता है।
- निवेश-निर्णय में भूमि की उपलब्धता निर्णायक होती है। भूमि अधिग्रहण में उचित मुआवज़ा और पारदर्शिता अधिनियम, 2013 (RFCTLARR Act) सहमति, सामाजिक प्रभाव आकलन तथा पुनर्वास की व्यवस्था करता है। भूमि-अधिग्रहण विवादों का एक उदाहरण सिंगूर है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2016 में अधिग्रहण को रद्द किया था।
- राज्य द्वारा पूर्व में दिए गए प्रोत्साहनों को भूतलक्षी कानून से वापस लेने पर निवेशकों के वैध प्रत्याशा और वचन-विबंध के तर्क सामने आते हैं। ऐसे विवाद न्यायिक समीक्षा के दायरे में आते हैं और निवेश के माहौल पर भी असर डालते हैं।
- हल्दिया पूर्वी भारत का प्रमुख औद्योगिक और बंदरगाह-आधारित केंद्र है। यहाँ श्यामा प्रसाद मुखर्जी पोर्ट (कोलकाता) का हल्दिया गोदी परिसर और पेट्रोकेमिकल उद्योग स्थित हैं। पेट्रोकेमिकल इकाइयाँ प्लास्टिक, रेज़िन और विलायक जैसे कई उद्योगों को कच्चा माल देती हैं।
राज्य औद्योगिक नीति और प्रोत्साहनों की भूतलक्षी वापसी: क्या है मामला?
- राज्य औद्योगिक नीति एक सरकारी दस्तावेज़ है। इसमें प्राथमिकता वाले क्षेत्र, प्रोत्साहन का ढाँचा, भूमि आवंटन के नियम, अनुमोदन की प्रक्रिया और रोज़गार-संबंधी अपेक्षाएँ तय की जाती हैं। इसका उद्देश्य निवेश, रोज़गार और क्षेत्रीय संतुलित विकास को बढ़ावा देना है।
- प्रोत्साहन मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं: राजकोषीय (पूँजीगत सब्सिडी, SGST की प्रतिपूर्ति, बिजली शुल्क व स्टांप शुल्क में छूट) और गैर-राजकोषीय (भूमि की उपलब्धता, एकल खिड़की मंज़ूरी, अवसंरचना)। निवेशक आमतौर पर इन्हें दीर्घकालीन वचन मानकर निवेश की योजना बनाते हैं।
- भूतलक्षी विधान वह कानून है जो अपने लागू होने से पहले की अवधि पर भी प्रभाव डालता है। अनुच्छेद 20(1) केवल आपराधिक मामलों में भूतलक्षी दंड को रोकता है। दीवानी, कर और आर्थिक मामलों में विधायिका भूतलक्षी कानून बना सकती है, बशर्ते वह विधायी क्षमता के भीतर हो और मूल अधिकारों का उल्लंघन न करे।
- न्यायालय भूतलक्षी कानून की जाँच अनुच्छेद 14 (मनमानेपन का निषेध), अनुच्छेद 19(1)(g) (व्यापार का अधिकार) और अनुच्छेद 300A (विधि के प्राधिकार के बिना संपत्ति से वंचित न किया जाना) के आधार पर करते हैं। यदि कानून प्रत्यक्षतः मनमाना या अनुचित पाया जाए, तो उसे अवैध घोषित किया जा सकता है।
- वचन-विबंध का सिद्धांत यह है कि यदि सरकार ने कोई स्पष्ट वचन दिया हो और किसी व्यक्ति ने उस पर भरोसा करके अपनी स्थिति बदली हो, तो सरकार सामान्यतः उस वचन से पीछे नहीं हट सकती। मोतीलाल पदमपत शुगर मिल्स बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1979) में सर्वोच्च न्यायालय ने इसे सरकार पर भी लागू माना। परंतु लोकहित और विधायी नीति के प्रश्न इसकी सीमा तय करते हैं।
- भूमि नीति के प्रमुख पक्ष हैं: भूमि बैंक, औद्योगिक पार्क, अधिग्रहण में सहमति, मुआवज़ा तथा पुनर्वास। पश्चिम बंगाल जैसे सघन आबादी और छोटी जोतों वाले राज्य में कृषि-भूमि का औद्योगिक उपयोग संवेदनशील विषय है। इसलिए पारदर्शी और विवाद-मुक्त भूमि व्यवस्था निवेश के लिए निर्णायक मानी जाती है।
- हल्दिया की फीनॉल-एसीटोन इकाई पेट्रोकेमिकल मूल्य-शृंखला में कच्चा माल बनाती है। फीनॉल का उपयोग रेज़िन, पॉलीकार्बोनेट और दवा उद्योग में होता है, जबकि एसीटोन मुख्यतः विलायक है। घरेलू उत्पादन से आयात-निर्भरता घटती है, जो आत्मनिर्भर भारत के उद्देश्य से जुड़ता है।
- परीक्षा-दृष्टि से मुख्य सीख यह है कि निवेश आकर्षित करने के लिए प्रोत्साहनों के साथ नीतिगत निश्चितता, कारोबार सुगमता और विधिसम्मत प्रक्रिया भी उतनी ही आवश्यक है। नीति के प्रभाव की पुष्टि वास्तविक निवेश, रोज़गार और क्रियान्वयन से ही होगी।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्त्व |
|---|---|
| नई औद्योगिक नीति का प्रारूप (Draft) | राज्य की औद्योगिक नीति का प्रारूप तैयार होकर प्रस्तुत हो चुका है और दीपावली से पहले इसे जारी करने की बात कही गई है। इससे निवेशकों को नीतिगत दिशा का संकेत मिलता है। |
| नई भूमि नीति | औद्योगिक परियोजनाओं के लिए भूमि की उपलब्धता सबसे बड़ी बाधा रही है। स्पष्ट भूमि नीति से भूमि का अधिग्रहण, आवंटन और भू-बैंक (Land Bank) की व्यवस्था पारदर्शी हो सकती है। |
| उद्योगों के लिए नए प्रोत्साहन | पूँजी-सब्सिडी, कर-रियायत और शुल्क-छूट जैसे प्रोत्साहन निवेश-निर्णय की लागत घटाते हैं। यह राज्यों के बीच निवेश आकर्षित करने की प्रतिस्पर्धा का मुख्य उपकरण है। |
| पूर्व प्रोत्साहनों की वापसी का विधिक प्रश्न | पश्चिम बंगाल प्रोत्साहन योजनाओं एवं अनुदान-रूपी दायित्वों का निरसन अधिनियम, 2025 ने 1993 से 2021 तक की प्रोत्साहन योजनाओं को पूर्वप्रभावी रूप से वापस लिया। इसे कलकत्ता उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है। नई नीति की विश्वसनीयता इस विवाद के समाधान से जुड़ी है। |
| हल्दिया में फिनॉल-एसीटोन संयंत्र | लगभग 6,000 करोड़ रुपये के निवेश वाला यह संयंत्र 600 प्रत्यक्ष और 1,000 अप्रत्यक्ष रोजगार देगा। यह पेट्रोरसायन क्षेत्र में आयात-प्रतिस्थापन और मूल्य-वर्धन का उदाहरण है। |
| बड़े निवेश प्रस्ताव और अवसंरचना की घोषणाएँ | हल्दिया में भूमि-आवंटन, डेटा सेंटर का सुझाव और ट्रॉमा केंद्र जैसी घोषणाएँ औद्योगिक पारितंत्र (Ecosystem) के साथ सामाजिक अवसंरचना के महत्त्व को दिखाती हैं। |
महत्व
आर्थिक
- औद्योगिक नीति से विनिर्माण का हिस्सा बढ़ाने, पूँजी-निर्माण और राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) की संवृद्धि को गति मिलती है।
- पेट्रोरसायन जैसे आधारभूत उद्योग वस्त्र, पैकेजिंग, औषधि और प्लास्टिक जैसे अनेक डाउनस्ट्रीम उद्योगों को कच्चा माल देते हैं। इससे आयात-निर्भरता घटती है।
- बड़े निवेश के साथ सहायक इकाइयाँ और MSME आपूर्ति-शृंखला (Supply Chain) विकसित होती है।
सामाजिक एवं रोजगार
- विनिर्माण निवेश से औपचारिक रोजगार बढ़ता है और कृषि पर निर्भर श्रमशक्ति को वैकल्पिक आजीविका मिलती है।
- औद्योगिक क्षेत्रों के आसपास स्वास्थ्य सुविधाएँ, जैसे ट्रॉमा और बर्न इकाई, श्रमिकों और स्थानीय समुदाय की सुरक्षा बढ़ाती हैं।
संघीय एवं प्रतिस्पर्धात्मक
- उद्योग राज्य सूची का विषय है, इसलिए राज्य अपनी औद्योगिक नीति स्वयं बनाते हैं। इससे प्रतिस्पर्धी संघवाद (Competitive Federalism) को बल मिलता है।
- पूर्वी भारत के बंदरगाह-आधारित औद्योगिक केंद्र, जैसे हल्दिया, राष्ट्रीय आपूर्ति-शृंखला और निर्यात के लिए रणनीतिक महत्त्व रखते हैं।
शासन एवं संस्थागत
- नीति की पूर्व-घोषणा और निश्चित समय-सीमा से नीतिगत पूर्वानुमेयता (Predictability) बढ़ती है।
- भूमि और प्रोत्साहन के नियम स्पष्ट होने पर विवेकाधीन निर्णय और बिचौलियों की भूमिका घटती है। इससे व्यापार सुगमता (Ease of Doing Business) में सुधार होता है।
चुनौतियाँ
1. पूर्वप्रभावी विधान और निवेशकों का विश्वास
- 1993 से 2021 तक के प्रोत्साहनों की पूर्वप्रभावी वापसी को उद्योग समूहों ने असंवैधानिक बताकर कलकत्ता उच्च न्यायालय में चुनौती दी है।
- सरकार द्वारा दिए गए वचन से पीछे हटने की धारणा बनने पर निवेशक नई नीति के प्रोत्साहनों पर भी भरोसा नहीं करेंगे।
- न्यायालय का निर्णय और नई नीति का तालमेल निवेशक-विश्वास के लिए निर्णायक होगा।
यूपीएससी लिंक: GS-2: विधायी शक्ति की सीमाएँ, अनुच्छेद 14 और 19(1)(g); वैधानिक अपेक्षा (Legitimate Expectation) का सिद्धांत
2. भूमि अधिग्रहण और भू-उपलब्धता
- घनी आबादी वाले राज्य में औद्योगिक भूमि जुटाना कठिन है, और अधिग्रहण में सामाजिक विरोध तथा मुआवजे के विवाद आते हैं।
- बहुफसली कृषि भूमि के अधिग्रहण से खाद्य-सुरक्षा और आजीविका के प्रश्न उठते हैं।
- भूमि-अभिलेखों की अस्पष्टता से परियोजनाओं में विलंब होता है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: भूमि-सुधार, अवसंरचना और निवेश; RFCTLARR अधिनियम, 2013
3. राजकोषीय बोझ और प्रोत्साहनों की प्रतिस्पर्धा
- उदार प्रोत्साहन राज्य के राजस्व पर बोझ डालते हैं और भविष्य में देयताओं का संचय करते हैं।
- राज्यों के बीच प्रोत्साहनों की होड़ (Race to the Bottom) से लाभ कम और लागत अधिक हो सकती है।
- पूर्व दायित्वों के विवाद से राज्य का राजकोषीय प्रबंधन और अनिश्चित हो जाता है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: राजकोषीय घाटा, राज्य वित्त, संघवाद
4. श्रम-संबंध और स्थानीय अवरोध
- निवेश-आकर्षण के लिए श्रम-संबंधों में स्थिरता और स्थानीय स्तर पर अवैध वसूली या दबाव-तंत्र (सिंडिकेट) का अंत आवश्यक है।
- केवल नीति-घोषणा पर्याप्त नहीं है; स्थानीय प्रशासन और कानून-व्यवस्था में एकरूपता चाहिए।
यूपीएससी लिंक: GS-2: शासन, कानून-व्यवस्था; GS-3: औद्योगिक संबंध
5. पर्यावरणीय और सुरक्षा जोखिम
- पेट्रोरसायन जैसे उद्योग प्रदूषण, खतरनाक रसायनों और औद्योगिक दुर्घटनाओं का जोखिम रखते हैं।
- तटीय और नदी-मुहाना क्षेत्र हल्दिया में पारिस्थितिकी संवेदनशील है, इसलिए पर्यावरणीय स्वीकृति और अनुपालन आवश्यक हैं।
यूपीएससी लिंक: GS-3: पर्यावरण प्रभाव आकलन, सतत विकास
6. घोषणा से क्रियान्वयन तक का अंतराल
- निवेश-घोषणाएँ वास्तविक निवेश और रोजगार में तभी बदलती हैं जब स्वीकृतियाँ, बिजली, जल और संपर्क-मार्ग समय पर उपलब्ध हों।
- नीति का प्रभाव उसके प्रवर्तन की गुणवत्ता और एकल-खिड़की प्रणाली पर निर्भर करता है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: नीति-क्रियान्वयन, शासन की दक्षता
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| पूर्वप्रभावी निरसन | वचन-आधारित प्रोत्साहनों की वापसी से नीतिगत विश्वसनीयता और संपत्ति-अधिकार पर प्रश्न उठते हैं। |
| भूमि नीति | अधिग्रहण, उचित मुआवजा और पुनर्वास के बीच संतुलन कठिन है। |
| प्रोत्साहन-ढाँचा | राजकोषीय लागत और राज्यों की आपसी होड़ से सीमित संसाधनों पर दबाव पड़ता है। |
| स्थानीय अवरोध | सिंडिकेट-प्रथा और अवैध वसूली से परियोजना-लागत और जोखिम बढ़ते हैं। |
| पर्यावरण | पेट्रोरसायन संयंत्रों से प्रदूषण और दुर्घटना का जोखिम रहता है। |
| क्रियान्वयन | घोषणा और वास्तविक निवेश के बीच का अंतराल निवेश के लाभ को घटाता है। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- आत्मनिर्भर भारत अभियान (Atmanirbhar Bharat Abhiyan) — स्रोत में उल्लिखित; फिनॉल-एसीटोन जैसे आयात-प्रतिस्थापन वाले संयंत्र इसी लक्ष्य से जुड़े हैं।
आगे की राह
- नई औद्योगिक नीति में प्रोत्साहनों की पात्रता, अवधि और भुगतान-प्रक्रिया स्पष्ट रूप से लिखी जाए। साथ ही भविष्य में बदलाव की स्थिति में पूर्व-निवेशकों के संरक्षण का प्रावधान (संक्रमणकालीन या ग्रैंडफादरिंग व्यवस्था) हो।
- पूर्व प्रोत्साहनों से जुड़े विवादों का न्यायालय के निर्णय के अनुरूप, या मध्यस्थता/समझौते से समाधान हो, ताकि निवेशकों का भरोसा बहाल हो।
- भूमि नीति में भू-बैंक, डिजिटल भूमि-अभिलेख, बंजर या अनुपयोगी भूमि को वरीयता और स्वैच्छिक भूमि-पूलिंग जैसे उपाय अपनाए जाएँ। अधिग्रहण में RFCTLARR अधिनियम, 2013 के मुआवजे और पुनर्वास मानकों का पालन हो।
- एकल-खिड़की मंजूरी प्रणाली को समय-सीमा और स्वतः-मंजूरी की व्यवस्था के साथ मजबूत किया जाए।
- प्रोत्साहनों का राजकोषीय प्रभाव आकलन कर बजट में दायित्वों का पारदर्शी प्रकटीकरण हो।
- पेट्रोरसायन जैसे उद्योगों के लिए कड़े पर्यावरणीय और औद्योगिक सुरक्षा मानक तथा स्वतंत्र निगरानी सुनिश्चित हो।
- कौशल-विकास और स्थानीय MSME आपूर्तिकर्ताओं को जोड़ा जाए, ताकि बड़े निवेश का लाभ स्थानीय रोजगार तक पहुँचे।
- औद्योगिक क्षेत्रों में कानून-व्यवस्था और अवैध वसूली पर कार्रवाई के लिए स्पष्ट शिकायत-निवारण तंत्र बनाया जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
औद्योगिक नीति और भूमि नीति · प्रोत्साहन योजनाएँ (Incentives) और निवेश आकर्षण · पूर्वव्यापी विधान (Retrospective Legislation) · वचन-विबंध (Promissory Estoppel) और वैध अपेक्षा (Legitimate Expectation) · अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 19(1)(g) · अनुच्छेद 300A (संपत्ति का अधिकार) · भूमि अधिग्रहण और RFCTLARR अधिनियम, 2013 · प्रतिस्पर्धी संघवाद (Competitive Federalism) · नीतिगत निरंतरता और निवेशक विश्वास · पेट्रोरसायन और विनिर्माण-आधारित रोज़गार · आत्मनिर्भर भारत · व्यापार सुगमता (Ease of Doing Business)
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- सातवीं अनुसूची, राज्य सूची की प्रविष्टि 24 — राज्य का उद्योगों पर विधायी अधिकार
- सातवीं अनुसूची, राज्य सूची की प्रविष्टि 18 — भूमि और भू-धृति राज्य विषय
- सातवीं अनुसूची, समवर्ती सूची की प्रविष्टि 42 — संपत्ति का अधिग्रहण
- अनुच्छेद 14 — मनमानी और समानता की कसौटी
- अनुच्छेद 19(1)(g) — व्यापार-व्यवसाय की स्वतंत्रता
- अनुच्छेद 300A — विधि के बिना संपत्ति-वंचन निषिद्ध
- अनुच्छेद 226 — उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता
अवधारणा प्रवाह
पूर्व प्रोत्साहनों की पूर्वप्रभावी वापसी और विधिक चुनौती से निवेशकों में अनिश्चितता → नई औद्योगिक नीति का प्रारूप, भूमि नीति और नए प्रोत्साहनों की तैयारी → भूमि की उपलब्धता और प्रोत्साहनों की स्पष्टता से निवेश-लागत में कमी → हल्दिया जैसे केंद्रों में बड़े संयंत्र और भूमि-आवंटन से निवेश का क्रियान्वयन → प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार तथा सहायक उद्योगों का विकास → आयात-प्रतिस्थापन, मूल्य-वर्धन और राज्य की औद्योगिक संवृद्धि में वृद्धि → नीतिगत स्थिरता और प्रवर्तन की गुणवत्ता से निवेशकों का दीर्घकालिक विश्वास
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. भूमि अधिग्रहण में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन अधिनियम, 2013 (RFCTLARR Act) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. निजी कंपनी के लिए भूमि अधिग्रहण में प्रभावित परिवारों में से कम-से-कम 80 प्रतिशत की सहमति आवश्यक है, जबकि सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) परियोजनाओं में यह सीमा 70 प्रतिशत है।
2. सामान्यतः अधिग्रहण से पूर्व सामाजिक प्रभाव आकलन (Social Impact Assessment) कराना आवश्यक है।
3. सातवीं अनुसूची में ‘संपत्ति का अधिग्रहण और अधिगृहण’ राज्य सूची का विषय है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: निजी परियोजनाओं में 80 प्रतिशत और PPP में 70 प्रतिशत सहमति का प्रावधान है। कथन 2 सही है: सामाजिक प्रभाव आकलन सामान्य नियम है, कुछ अपवादों को छोड़कर। कथन 3 गलत है: ‘संपत्ति का अधिग्रहण और अधिगृहण’ समवर्ती सूची की प्रविष्टि 42 है। राज्य सूची की प्रविष्टि 18 भूमि-अधिकारों से संबंधित है।
Q2. अभिकथन (A): भारत में सरकार के विरुद्ध भी वचन-विबंध (Promissory Estoppel) का सिद्धांत लागू किया जा सकता है।
कारण (R): जहाँ सरकार यह सिद्ध कर दे कि वचन का पालन करने से व्यापक लोकहित प्रभावित होगा, वहाँ यह सिद्धांत लागू नहीं होता।
निम्नलिखित में से कौन-सा सही है?
- A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है
- A और R दोनों सही हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है
- A सही है, किंतु R गलत है
- A गलत है, किंतु R सही है
उत्तर: A और R दोनों सही हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है — मोतीलाल पदमपत शुगर मिल्स बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1979) में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि वचन-विबंध सरकार पर भी लागू होता है, इसलिए A सही है। यह भी स्थापित है कि लोकहित की स्थिति में सरकार को छूट मिल सकती है, इसलिए R भी सही है। परंतु R, A की व्याख्या नहीं करता, वह उसकी सीमा बताता है।
Q3. सातवीं अनुसूची की प्रविष्टियों को उनके विषयों से सुमेलित कीजिए:
स्तंभ-I (प्रविष्टि) — स्तंभ-II (विषय)
A. राज्य सूची, प्रविष्टि 18 — 1. भूमि संबंधी अधिकार
B. राज्य सूची, प्रविष्टि 24 — 2. उद्योग (संघ सूची की प्रविष्टि 7 और 52 के अधीन)
C. समवर्ती सूची, प्रविष्टि 42 — 3. संपत्ति का अधिग्रहण और अधिगृहण
D. संघ सूची, प्रविष्टि 52 — 4. वे उद्योग जिन पर संघ का नियंत्रण संसद द्वारा लोकहित में समीचीन घोषित हो
सही सुमेल चुनिए:
- A-2, B-1, C-3, D-4
- A-1, B-3, C-2, D-4
- A-3, B-2, C-1, D-4
- A-1, B-2, C-3, D-4
उत्तर: A-1, B-2, C-3, D-4 — भूमि संबंधी अधिकार राज्य सूची की प्रविष्टि 18 में हैं। उद्योग राज्य सूची की प्रविष्टि 24 में हैं, पर संघ सूची की प्रविष्टि 7 और 52 के अधीन। संपत्ति का अधिग्रहण समवर्ती सूची की प्रविष्टि 42 में है। संसद द्वारा लोकहित में घोषित उद्योग संघ सूची की प्रविष्टि 52 में आते हैं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ राज्य सरकारों द्वारा पूर्व में दी गई औद्योगिक प्रोत्साहन योजनाओं को पूर्वव्यापी रूप से वापस लेना निवेशकों के विश्वास और संवैधानिक सिद्धांतों, दोनों के लिए चुनौती है। पश्चिम बंगाल के हालिया घटनाक्रम (प्रोत्साहन-निरसन अधिनियम, 2025 और प्रस्तावित नई औद्योगिक एवं भूमि नीति) के संदर्भ में आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही बताइए कि निवेश-अनुकूल औद्योगिक नीति में भूमि-उपलब्धता और नीतिगत निरंतरता को कैसे संतुलित किया जा सकता है। (15 Marks)
रूपरेखा: भूमिका: समाचार के अनुसार 2025 के अधिनियम से 1993 से 2021 के बीच की प्रोत्साहन योजनाओं को पूर्वव्यापी रूप से वापस लिया गया था। उद्योग समूहों ने कलकत्ता उच्च न्यायालय में चुनौती दी। नई सरकार दीवाली से पहले नई औद्योगिक नीति और भूमि नीति लाने की बात कर रही है। इसी से प्रश्न उठता है कि राजकोषीय स्वायत्तता और निवेशक भरोसे में संतुलन कैसे हो। (नोट: विधि की वैधता का अंतिम निर्णय न्यायालय के विचाराधीन माना जाए, उसका पूर्वनिर्णय न करें।)
भाग 1 (संवैधानिक और विधिक पक्ष):
– विधायी क्षमता: राज्य सूची की प्रविष्टि 24 (उद्योग) और अनुच्छेद 246 के अंतर्गत राज्य को कानून बनाने की शक्ति है। पूर्वव्यापी विधान सिद्धांततः वैध हो सकता है, पर मौलिक अधिकारों के अधीन है।
– अनुच्छेद 14: मनमानेपन (Manifest Arbitrariness) की कसौटी (शायरा बानो, 2017)। प्रश्न यह कि क्या बिना युक्तिसंगत वर्गीकरण के पूरी अवधि की योजनाएँ वापस ली गईं।
– अनुच्छेद 19(1)(g) और अनुच्छेद 300A: प्रोत्साहन की संपत्ति के रूप में प्रकृति विवादित है, पर अर्जित लाभ और निवेश-निर्णय प्रभावित होते हैं।
– वचन-विबंध और वैध अपेक्षा: मोतीलाल पदमपत शुगर मिल्स (1979) के अनुसार सरकार वचन से बँधी है, पर लोकहित और राजकोषीय दबाव में अपवाद संभव है। राज्य का तर्क राजकोषीय बोझ और अनुचित लाभ रोकना हो सकता है।
भाग 2 (आर्थिक और संघीय पक्ष):
– प्रतिस्पर्धी संघवाद: राज्य निवेश के लिए प्रोत्साहन, भूमि बैंक और एकल खिड़की व्यवस्था से प्रतिस्पर्धा करते हैं। नीतिगत अनिश्चितता से निवेश की लागत बढ़ती है।
– समाचार में उल्लिखित उदाहरण: हल्दिया में 6,000 करोड़ रुपये का फीनॉल-एसीटोन संयंत्र (लगभग 600 प्रत्यक्ष रोज़गार), जो पेट्रोरसायन आयात-निर्भरता घटाने और आत्मनिर्भर भारत से जुड़ता है।
– ‘सिंडिकेट राज’, श्रम-संबंध और भूमि-नीति जैसे संस्थागत कारक निवेश-निर्णय को प्रभावित करते हैं।
भाग 3 (भूमि और संतुलन के उपाय):
– भूमि राज्य सूची की प्रविष्टि 18 में है, जबकि अधिग्रहण समवर्ती सूची की प्रविष्टि 42 में। RFCTLARR अधिनियम, 2013 के सहमति (80 प्रतिशत/70 प्रतिशत), सामाजिक प्रभाव आकलन और प्रतिकर संबंधी प्रावधान लागू होंगे।
– सिंगूर प्रकरण: केदार नाथ यादव बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (2016) में सर्वोच्च न्यायालय ने अधिग्रहण को निरस्त किया। इसका सबक है कि अधिग्रहण में प्रक्रियागत वैधता और सहमति आवश्यक है।
– सुझाव: भूमि बैंक और औद्योगिक पार्क, स्पष्ट पात्रता और समय-सीमा वाली प्रोत्साहन योजनाएँ, भविष्य में बदलाव के लिए ‘ग्रैंडफादरिंग’ (पूर्व लाभों की रक्षा), कारगर विवाद-समाधान तंत्र और प्रोत्साहनों का राजकोषीय प्रकटीकरण।
निष्कर्ष: संतुलित मत रखें। राज्य को राजकोषीय विवेक का अधिकार है, पर विधिसम्मत अपेक्षाओं की रक्षा और पारदर्शी भूमि प्रक्रिया ही दीर्घकालिक निवेश आकर्षित करती है। किसी दल या नेता के पक्ष-विपक्ष में टिप्पणी न करें।
स्रोत: The Indian Express
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