07 Nov बॉम्बे हाई कोर्ट ने अनन्या पांडे के व्यक्तित्व अधिकारों की रक्षा की
✎ व्यक्तित्व अधिकार भारत में अनुच्छेद 21 के अंतर्गत निजता और गरिमा के अधिकार से निकलता है और इसकी रक्षा मुख्यतः उच्च न्यायालयों के निषेधाज्ञा आदेशों के माध्यम से होती है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — राजव्यवस्था (मौलिक अधिकार, न्यायपालिका की भूमिका और न्यायिक समीक्षा) | GS Paper II — शासन (सूचना प्रौद्योगिकी से संबंधित नीतियाँ और मध्यस्थ दायित्व) | GS Paper III — विज्ञान और प्रौद्योगिकी (साइबर सुरक्षा और डिजिटल अपराध)
- Prelims: व्यक्तित्व अधिकार (Personality Rights), अनुच्छेद 21 और निजता का अधिकार (के.एस. पुट्टस्वामी मामला, 2017), अनुच्छेद 19(1)(a) और अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत युक्तियुक्त निर्बंधन, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 66C (पहचान की चोरी) और धारा 66E (निजता का उल्लंघन), सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 और सामग्री हटाने की प्रक्रिया, धारा 79 (मध्यवर्ती संस्थाओं के लिए सुरक्षित आश्रय / Safe Harbour), पासिंग ऑफ़ (Passing Off) का सिद्धांत, गतिशील निषेधाज्ञा (Dynamic Injunction)
- Essay: प्रसिद्धि, निजता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: डिजिटल युग में व्यक्ति की गरिमा की रक्षा, इंटरनेट पर पहचान का दुरुपयोग और न्यायिक उपचार की सीमाएँ
त्वरित पुनरावृत्ति: व्यक्तित्व अधिकार भारत में अनुच्छेद 21 के अंतर्गत निजता और गरिमा के अधिकार से निकलता है और इसकी रक्षा मुख्यतः उच्च न्यायालयों के निषेधाज्ञा आदेशों के माध्यम से होती है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
बॉम्बे उच्च न्यायालय ने अभिनेत्री अनन्या पांडे के व्यक्तित्व अधिकारों की रक्षा के लिए आदेश दिया है और उनकी पहचान से जुड़ी आपत्तिजनक सामग्री को हटाने का निर्देश दिया है। समाचार स्रोत में पूरा निर्णय उपलब्ध नहीं है, इसलिए इस मामले को मुख्य रूप से एक संवैधानिक और विधिक दृष्टिकोण से समझना आवश्यक है। यह निर्णय इस प्रश्न को रेखांकित करता है कि किसी व्यक्ति का नाम, छवि, आवाज़ और पहचान के अन्य तत्व डिजिटल माध्यमों पर अनधिकृत उपयोग से कैसे सुरक्षित रखे जा सकते हैं। उच्च न्यायालयों ने हाल के वर्षों में कई सार्वजनिक हस्तियों के मामलों में इसी प्रकार के अंतरिम और स्थायी आदेश दिए हैं, जिससे व्यक्तित्व अधिकार न्यायिक विमर्श का एक महत्वपूर्ण विषय बन गया है।
पृष्ठभूमि
- भारत में व्यक्तित्व अधिकार के लिए कोई अलग और व्यापक विधिक संहिता अब तक नहीं बनी है; इसका विकास मुख्यतः न्यायिक निर्णयों के माध्यम से हुआ है।
- अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन और वैयक्तिक स्वतंत्रता के अधिकार में निजता का अधिकार शामिल है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने के.एस. पुट्टस्वामी मामले (2017) में मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी।
- अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, किंतु यह असीम नहीं है और अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत युक्तियुक्त निर्बंधनों के अधीन है; इसीलिए व्यक्तित्व अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन आवश्यक होता है।
- सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 और उसके अंतर्गत बने नियम, विशेषकर 2021 के मध्यवर्ती नियम, ऑनलाइन मंचों से आपत्तिजनक सामग्री हटाने की प्रक्रिया निर्धारित करते हैं।
- पारंपरिक विधि में पासिंग ऑफ़ का सिद्धांत और ट्रेडमार्क संबंधी उपचार भी व्यक्ति की व्यावसायिक पहचान की रक्षा के लिए प्रयोग होते रहे हैं।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता से निर्मित नकली सामग्री (Deepfake) और अनधिकृत उपयोग के बढ़ते मामलों ने व्यक्तित्व अधिकारों के संरक्षण को अधिक तात्कालिक बना दिया है।
व्यक्तित्व अधिकार (Personality Rights) क्या हैं?
- व्यक्तित्व अधिकार वह विधिक अधिकार है जिसके अंतर्गत किसी व्यक्ति को अपने नाम, छवि, आवाज़, हस्ताक्षर और अन्य पहचान-चिह्नों के वाणिज्यिक और अवांछित उपयोग को नियंत्रित करने का अधिकार प्राप्त होता है।
- इसका मूल आधार निजता और गरिमा का अधिकार है, जो अनुच्छेद 21 के अंतर्गत आता है; इसके साथ व्यावसायिक मूल्य की रक्षा का पहलू भी जुड़ा है।
- अमेरिका जैसे देशों में इसे प्रचार अधिकार (Right of Publicity) के रूप में विकसित किया गया है, जबकि भारत में यह मुख्यतः न्यायिक व्याख्या पर आधारित है।
- व्यक्तित्व अधिकार का उल्लंघन तब होता है जब किसी की पहचान का उपयोग उसकी सहमति के बिना विज्ञापन, व्यापार, भ्रामक सामग्री या अपमानजनक प्रस्तुति के लिए किया जाए।
- उच्च न्यायालय अंतरिम निषेधाज्ञा देकर अनधिकृत सामग्री को तुरंत हटाने या उसके प्रसार को रोकने का आदेश दे सकते हैं।
- गतिशील निषेधाज्ञा (Dynamic Injunction) के माध्यम से ऐसे आदेश उन नए वेब पतों और मंचों पर भी लागू किए जा सकते हैं जहाँ सामग्री बाद में स्थानांतरित की जाती है।
- सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66C और 66E पहचान की चोरी और निजता के उल्लंघन से संबंधित दंडात्मक प्रावधान हैं, जबकि सिविल उपचार के लिए न्यायालय में वाद दायर किया जाता है।
- मध्यवर्ती संस्थाओं को धारा 79 के अंतर्गत सुरक्षित आश्रय प्राप्त है, किंतु न्यायालय या सक्षम प्राधिकारी के आदेश के बाद सामग्री न हटाने पर यह संरक्षण समाप्त हो सकता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्त्व |
|---|---|
| न्यायालय का आदेश | बॉम्बे उच्च न्यायालय ने एक अभिनेत्री के नाम, छवि और पहचान के अनधिकृत उपयोग पर रोक लगाई और आपत्तिजनक सामग्री हटाने का निर्देश दिया। इससे व्यक्तिगत पहचान की सुरक्षा का न्यायिक स्वरूप सामने आता है। |
| व्यक्तित्व अधिकार (Personality Rights) | किसी व्यक्ति को अपने नाम, छवि, आवाज़ और अन्य विशिष्ट पहचान के व्यावसायिक उपयोग को नियंत्रित करने का अधिकार। यह गोपनीयता के अधिकार और प्रचार के अधिकार (Right of Publicity) दोनों से जुड़ा है। |
| अंतरिम निषेधाज्ञा (Interim Injunction) | मुकदमे के अंतिम निर्णय से पहले हानि रोकने के लिए जारी अस्थायी आदेश। इसमें न्यायालय प्रथम दृष्टया (Prima Facie) मामले की सत्यता और अपूरणीय हानि की संभावना देखता है। |
| मध्यवर्ती संस्थाओं की भूमिका (Intermediaries) | ऑनलाइन मंच हटाने के आदेश का पालन करने के लिए उत्तरदायी होते हैं। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79 और सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 इस संदर्भ में प्रासंगिक हैं। |
| डिजिटल दुरुपयोग | एआई-जनित डीपफेक और बिना अनुमति के व्यावसायिक उत्पादों में किसी व्यक्ति की पहचान का उपयोग। ऐसे मामलों में त्वरित उपचार की आवश्यकता बढ़ रही है। |
महत्व
कानूनी (Legal)
- व्यक्तित्व अधिकार के लिए भारत में कोई एक संहिताबद्ध कानून नहीं है। इसका विकास मुख्यतः न्यायिक निर्णयों और अपकृत्य विधि (Tort Law) के अंतर्गत पासिंग ऑफ (Passing Off) जैसे सिद्धांतों से हुआ है।
- ट्रेडमार्क अधिनियम, 1999 के अंतर्गत नाम और चिह्न की सुरक्षा भी इस विषय से सीमित रूप में जुड़ी है।
- ऐसे आदेश भविष्य के मामलों में मिसाल (Precedent) का कार्य करते हैं, जिससे विधिक निश्चितता बढ़ती है।
संवैधानिक (Constitutional)
- के. एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017) के निर्णय में गोपनीयता को अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मौलिक अधिकार माना गया। व्यक्तित्व अधिकार की न्यायिक व्याख्या इसी आधार पर विकसित हुई है।
- अनुच्छेद 19(1)(क) की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 19(2) के तर्कसंगत प्रतिबंधों के बीच संतुलन बनाना इस मामले का केंद्रीय प्रश्न है।
आर्थिक (Economic)
- सार्वजनिक व्यक्तियों की पहचान उनकी आर्थिक साख (Goodwill) का आधार होती है। अनधिकृत उपयोग से विज्ञापन और समर्थन (Endorsement) बाज़ार पर सीधा प्रभाव पड़ता है।
- सामग्री-निर्माण (Content Creation) की अर्थव्यवस्था में व्यक्तिगत ब्रांड का संरक्षण रोज़गार और उद्यमिता से जुड़ा विषय बन गया है।
डिजिटल शासन (Digital Governance)
- ऑनलाइन सामग्री हटाने की प्रक्रिया में मंच-स्तरीय उत्तरदायित्व और शिकायत निवारण तंत्र की भूमिका स्पष्ट होती है।
- न्यायालय के आदेश और प्रशासनिक नियामक ढाँचे के बीच समन्वय आवश्यक है।
चुनौतियाँ
1. संहिताबद्ध कानून का अभाव
- व्यक्तित्व अधिकार पर समान और पूर्वानुमेय नियम न होने से हर मामला अलग न्यायिक प्रक्रिया से तय होता है।
- एक ही प्रकार के विवादों में अलग-अलग न्यायालयों के आदेशों में भिन्नता आ सकती है।
यूपीएससी लिंक: संसद द्वारा विधि-निर्माण और न्यायपालिका की भूमिका (भारतीय राजव्यवस्था)
2. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम व्यक्तित्व अधिकार
- व्यंग्य, समीक्षा, आलोचना और पैरोडी जैसी वैध अभिव्यक्तियाँ भी व्यापक निषेधाज्ञा से प्रभावित हो सकती हैं।
- सार्वजनिक हित और निजी प्रतिष्ठा के बीच संतुलन हर मामले में अलग विश्लेषण माँगता है।
यूपीएससी लिंक: मौलिक अधिकार: अनुच्छेद 19 और अनुच्छेद 21 के बीच संतुलन (भारतीय राजव्यवस्था)
3. डीपफेक और एआई-जनित दुरुपयोग
- एआई तकनीक से किसी व्यक्ति की आवाज़ और चेहरे की नकली सामग्री बनाना आसान हो गया है।
- ऐसी सामग्री की पहचान और उसका प्रसार रोकना तकनीकी रूप से जटिल है।
यूपीएससी लिंक: सूचना प्रौद्योगिकी, साइबर सुरक्षा और उभरती तकनीक का शासन पर प्रभाव (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, शासन)
4. मध्यवर्ती संस्थाओं की जवाबदेही
- बड़े मंचों पर लाखों सामग्री-इकाइयों की निगरानी व्यावहारिक रूप से कठिन है।
- हटाने के आदेश का पालन समय पर न होने से हानि बढ़ सकती है, जबकि अधिक जल्दबाज़ी में वैध सामग्री भी हट सकती है।
यूपीएससी लिंक: डिजिटल शासन और विनियामक संस्थाओं की भूमिका (शासन, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम)
5. व्यक्तिगत डेटा और पहचान की सुरक्षा
- किसी व्यक्ति की छवि और आवाज़ भी व्यक्तिगत डेटा के दायरे में आ सकती है, जिसका प्रसंस्करण डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 के अंतर्गत नियंत्रित होता है।
- सहमति के बिना डेटा के उपयोग पर प्रभावी निगरानी और दंड का तंत्र अभी विकसित हो रहा है।
यूपीएससी लिंक: डेटा संरक्षण और गोपनीयता की चुनौतियाँ (शासन, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी)
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| संहिताबद्ध कानून का अभाव | न्यायिक निर्णयों पर अत्यधिक निर्भरता से विधिक एकरूपता कमज़ोर होती है। |
| अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रभाव | व्यापक आदेश वैध आलोचना और व्यंग्य को भी रोक सकते हैं। |
| डीपफेक और एआई दुरुपयोग | नकली सामग्री की तेज़ी से बढ़ती संख्या पहचान पहचानना कठिन बनाती है। |
| मंचों की जवाबदेही | सामग्री हटाने में देरी या अत्यधिक हटाव, दोनों ही समस्या हैं। |
| सीमा-पार प्रसार | इंटरनेट पर सामग्री कई देशों के सर्वरों पर होने से आदेश का प्रवर्तन जटिल होता है। |
| व्यक्तिगत डेटा का दुरुपयोग | सहमति के बिना छवि और आवाज़ के उपयोग पर प्रभावी दंडात्मक ढाँचे की कमी। |
आगे की राह
- व्यक्तित्व अधिकार पर स्पष्ट विधिक ढाँचा बनाने के लिए विधि आयोग या संसदीय समिति के स्तर पर व्यापक विचार-विमर्श किया जाए।
- डीपफेक और एआई-जनित सामग्री की पहचान के लिए तकनीकी मानक और लेबलिंग की अनिवार्यता पर विचार किया जाए।
- मध्यवर्ती संस्थाओं के लिए सामग्री हटाने की समय-सीमा और पारदर्शी शिकायत निवारण प्रक्रिया निर्धारित की जाए।
- न्यायिक आदेशों में वैध अभिव्यक्ति की सुरक्षा का स्पष्ट उल्लेख हो, ताकि अनुच्छेद 19 के अधिकार अनावश्यक रूप से प्रभावित न हों।
- डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 के नियमों में छवि और आवाज़ के सहमति-आधारित उपयोग के प्रावधान स्पष्ट किए जाएँ।
- सेलिब्रिटी, कलाकारों और सामग्री-निर्माताओं में डिजिटल अधिकारों और शिकायत के उपायों के प्रति जागरूकता बढ़ाई जाए।
- सीमा-पार प्रवर्तन के लिए अंतरराष्ट्रीय मंचों और प्लेटफॉर्म के साथ सहयोग तंत्र को सुदृढ़ किया जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
व्यक्तित्व अधिकार (Personality Rights) · निजता का अधिकार (Right to Privacy) · अनुच्छेद 21 (Article 21) · पासिंग ऑफ़ (Passing Off) सिद्धांत · सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (Information Technology Act, 2000) · मध्यस्थ दायित्व (Intermediary Liability) · सुरक्षित आश्रय (Safe Harbour) · अंतरिम निषेधाज्ञा (Interim Injunction) · अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उसके युक्तियुक्त निर्बंधन · डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 (Digital Personal Data Protection Act, 2023) · न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) · संहिताकरण की आवश्यकता (Need for Codification)
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 21 — गोपनीयता और गरिमा का अधिकार
- अनुच्छेद 19(1)(क) — अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संतुलन
- अनुच्छेद 19(2) — अभिव्यक्ति पर तर्कसंगत प्रतिबंध
अवधारणा प्रवाह
किसी व्यक्ति की पहचान (नाम, छवि, आवाज़) का अनधिकृत उपयोग, विशेषकर डिजिटल मंचों पर। → व्यक्ति द्वारा न्यायालय में वाद दायर कर व्यक्तित्व अधिकार के उल्लंघन की शिकायत। → न्यायालय द्वारा प्रथम दृष्टया मामले और अपूरणीय हानि की जाँच के बाद अंतरिम निषेधाज्ञा जारी। → आदेश के अनुसार मंचों और मध्यवर्ती संस्थाओं द्वारा आपत्तिजनक सामग्री हटाना। → अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और गोपनीयता के बीच संतुलन सुनिश्चित करते हुए भविष्य के मामलों के लिए न्यायिक मिसाल स्थापित होना।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारतीय संविधान में ‘व्यक्तित्व अधिकार’ (Personality Rights) का शब्दशः उल्लेख नहीं है, किंतु न्यायालयों ने इसे अनुच्छेद 21 के अंतर्गत संरक्षित जीवन और निजता के अधिकार से जोड़ा है।
2. के. एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017) में उच्चतम न्यायालय ने निजता को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी।
3. कॉपीराइट अधिनियम, 1957 स्पष्ट रूप से कलाकारों के व्यक्तित्व अधिकारों को ट्रेडमार्क के एक रूप में मान्यता देता है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: व्यक्तित्व अधिकार किसी एक संविधि में परिभाषित नहीं हैं और न्यायिक व्याख्या में अनुच्छेद 21 से जोड़े जाते हैं। कथन 2 भी सही है, क्योंकि पुट्टस्वामी निर्णय (2017) में निजता को अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मौलिक अधिकार माना गया। कथन 3 गलत है, क्योंकि कॉपीराइट अधिनियम, 1957 में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है।
Q2. अभिकथन (A): भारत में किसी विशिष्ट संविधि के अभाव में भी न्यायालय सेलिब्रिटी के व्यक्तित्व अधिकारों की रक्षा के लिए अंतरिम निषेधाज्ञा जारी कर सकते हैं।
कारण (R): न्यायालय पासिंग ऑफ़ के सिद्धांत तथा अनुच्छेद 21 के अंतर्गत गरिमा और निजता की सुरक्षा के आधार पर ऐसा राहत-आदेश दे सकते हैं।
नीचे दिए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
(a) A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है।
(b) A और R दोनों सही हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है।
(c) A सही है, किंतु R गलत है।
(d) A गलत है, किंतु R सही है।
- A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सही हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सही है, किंतु R गलत है।
- A गलत है, किंतु R सही है।
उत्तर: A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन सही है, क्योंकि व्यक्तित्व अधिकार पर भारतीय न्यायालय अंतरिम राहत देते रहे हैं, भले ही इसके लिए कोई एक विशिष्ट संविधि न हो। कारण भी सही है और अभिकथन की व्याख्या करता है, क्योंकि ऐसे राहत-आदेश पासिंग ऑफ़ के सिद्धांत और अनुच्छेद 21 की गरिमा-निजता की व्याख्या पर आधारित होते हैं।
Q3. निम्नलिखित सुमेलित कीजिए:
सूची I (प्रावधान)
1. अनुच्छेद 21
2. सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 69क
3. सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79
सूची II (विषय)
a. सरकारी आदेश द्वारा सार्वजनिक पहुँच से सूचना को अवरुद्ध करने की शक्ति
b. प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण
c. मध्यस्थों को उनके निर्धारित दायित्वों के पालन की शर्त पर दायित्व से सशर्त छूट
सही सुमेलन चुनिए:
- 1-a, 2-b, 3-c
- 1-b, 2-a, 3-c
- 1-c, 2-a, 3-b
- 1-b, 2-c, 3-a
उत्तर: 1-b, 2-a, 3-c — अनुच्छेद 21 प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण करता है, इसलिए 1-b सही है। धारा 69क सरकार को सार्वजनिक पहुँच से सूचना अवरुद्ध करने का अधिकार देती है (2-a), जबकि धारा 79 मध्यस्थों को शर्तों के अधीन दायित्व-छूट (safe harbour) देती है (3-c)।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत में व्यक्तित्व अधिकार (Personality Rights) को किसी एक विशिष्ट संविधि में परिभाषित नहीं किया गया है, फिर भी न्यायालय इन्हें लगातार संरक्षित करते रहे हैं। इस न्यायिक प्रवृत्ति का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही बताइए कि डिजिटल माध्यमों पर ऐसे अधिकारों के प्रवर्तन में मध्यस्थों की भूमिका और उनके सुरक्षित आश्रय (Safe Harbour) के प्रावधान किस प्रकार सहायक या बाधक हो सकते हैं। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. प्रारंभ: हाल में बंबई उच्च न्यायालय द्वारा एक अभिनेत्री के व्यक्तित्व अधिकारों की रक्षा हेतु आपत्तिजनक सामग्री हटाने के निर्देश का उल्लेख, यह स्पष्ट करते हुए कि यह एक अंतरिम राहत है और आदेश के विस्तृत तर्कों पर अंतिम टिप्पणी से बचा जाए।
2. व्यक्तित्व अधिकार की अवधारणा: नाम, छवि, आवाज़ और पहचान के व्यावसायिक उपयोग पर नियंत्रण का अधिकार। अमेरिकी विधि में ‘right of publicity’ से तुलना (राज्य-स्तरीय विधि और Haelan Laboratories बनाम Topps Chewing Gum, 1953 का उल्लेख)।
3. संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 21 के अंतर्गत निजता का अधिकार, के. एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017) द्वारा इसे मौलिक अधिकार घोषित करना; आर. राजगोपाल बनाम तमिलनाडु राज्य (1994) में ‘अकेले छोड़े जाने के अधिकार’ और सहमति के बिना व्यक्तिगत जीवन के प्रकाशन पर सीमाएँ; सार्वजनिक व्यक्तियों के लिए सीमित अपवाद।
4. विरोधी संवैधानिक मूल्य: अनुच्छेद 19(1)(क) में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा अनुच्छेद 19(2) के युक्तियुक्त निर्बंधन; व्यंग्य, पैरोडी, समाचार और आलोचना जैसे वैध उपयोगों का संरक्षण; श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015) में मनमानी सेंसरशिप और अस्पष्ट प्रतिबंधों पर न्यायिक दृष्टिकोण।
5. विधिक उपकरण: भारतीय न्याय संहिता, 2023 की मानहानि संबंधी धारा (धारा 356); कॉपीराइट अधिनियम, 1957 की नैतिक अधिकार संबंधी धारा 57 (सीमित दायरा); ट्रेडमार्क अधिनियम, 1999 के माध्यम से नाम या चिह्न के दुरुपयोग पर रोक; पासिंग ऑफ़ का सामान्य विधि सिद्धांत; डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 के अंतर्गत व्यक्तिगत डेटा पर सहमति की शर्त।
6. मध्यस्थ दायित्व: सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79 के अंतर्गत सशर्त सुरक्षित आश्रय; सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 के अंतर्गत शिकायत निवारण और सामग्री हटाने की बाध्यता; न्यायालय के आदेश पर मध्यस्थों की अनुपालन-चुनौतियाँ।
7. तुलनात्मक दृष्टि: ब्रिटेन में पृथक व्यक्तित्व-अधिकार का अभाव, वहाँ निजी सूचना के दुरुपयोग (misuse of private information) और पासिंग ऑफ़ पर निर्भरता (Fenty बनाम Arcadia, 2015)।
8. संतुलित मत: (क) समर्थन पक्ष: प्रसिद्धि के व्यावसायिक शोषण और डीपफेक जैसे डिजिटल दुरुपयोग से सुरक्षा हेतु तत्काल राहत आवश्यक। (ख) आलोचक पक्ष: अस्पष्ट परिभाषा से सेंसरशिप, व्यंग्य व समाचार पर प्रभाव तथा न्यायिक विवेक पर अत्यधिक निर्भरता।
9. निष्कर्ष: संहिताकरण या स्पष्ट विधायी ढाँचे की आवश्यकता, जिसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अपवाद, मध्यस्थों की स्पष्ट जिम्मेदारी और प्रक्रियात्मक सुरक्षा शामिल हों, ताकि संवैधानिक संतुलन बना रहे।
स्रोत: LiveLaw
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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