कैबिनेट ने ग्राम स्वराज योजना को 2026-31 तक दी मंजूरी, जानें मुख्य बिंदु

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पीएम विकसित ग्राम स्वराज योजना प्रक्रियाकेंद्र सरकार नीति निर्पाँच वर्षीय कार्यक्रमकेंद्र-राज्य वित्तीय ढ60:40/90:10राज्य स्तर अनुकूलननिधि हस्तांतरणग्राम पंचायत विकास योजग्राम सभा अनुमोदन
पीएम विकसित ग्राम स्वराज योजना प्रक्रिया

✎ केंद्र प्रायोजित योजना वह योजना है जिसका वित्त-पोषण केंद्र और राज्य साझा करते हैं (अनुच्छेद 282 के अंतर्गत); प्रधानमंत्री विकसित ग्राम स्वराज योजना इसे 2026-27 से 2030-31 की अवधि के लिए लागू करने हेतु अनुमोदित हुई है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — राजव्यवस्था एवं शासन (पंचायती राज, संघवाद, सरकारी योजनाएँ)  |  GS Paper III — अर्थव्यवस्था (सार्वजनिक वित्त, राजकोषीय संघवाद, केंद्र प्रायोजित योजनाएँ)
  • Prelims: केंद्र प्रायोजित योजना (Centrally Sponsored Scheme), अनुच्छेद 243G और ग्यारहवीं अनुसूची, अनुच्छेद 243A (ग्राम सभा), अनुच्छेद 282 (संघ और राज्यों द्वारा अनुदान), 16वाँ वित्त आयोग (Sixteenth Finance Commission) और उसकी अवधि, ग्राम पंचायत विकास योजना (Gram Panchayat Development Plan), ई-ग्राम स्वराज पोर्टल, राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान (Rashtriya Gram Swaraj Abhiyan)
  • Essay: सहकारी संघवाद और विकेंद्रीकृत शासन: ग्राम स्वराज की संकल्पना, केंद्र प्रायोजित योजनाएँ: राजकोषीय संघवाद में उनकी भूमिका और चुनौतियाँ

त्वरित पुनरावृत्ति: केंद्र प्रायोजित योजना वह योजना है जिसका वित्त-पोषण केंद्र और राज्य साझा करते हैं (अनुच्छेद 282 के अंतर्गत); प्रधानमंत्री विकसित ग्राम स्वराज योजना इसे 2026-27 से 2030-31 की अवधि के लिए लागू करने हेतु अनुमोदित हुई है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने प्रधानमंत्री विकसित ग्राम स्वराज योजना (Pradhan Mantri Viksit Gram Swaraj Yojana) को केंद्र प्रायोजित योजना (Centrally Sponsored Scheme) के रूप में वित्तीय वर्ष 2026-27 से 2030-31 की अवधि के लिए अनुमोदित किया है। यह अवधि 16वें वित्त आयोग के कार्यकाल से मेल खाती है, इसलिए यह निर्णय राज्यों के साथ वित्तीय साझेदारी के नए चक्र की शुरुआत का संकेत देता है। ग्रामीण स्तर पर विकास योजनाओं को स्थानीय शासन से जोड़ने की दृष्टि से यह परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। योजना के घटक, वित्तीय परिव्यय और कार्यान्वयन ढाँचे के विस्तृत विवरण मूल प्रेस विज्ञप्ति में देखें।

पृष्ठभूमि

  • भारत में पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा मिला, जो 1993 से लागू हुआ। इसके द्वारा संविधान में भाग IX जोड़ा गया और ग्यारहवीं अनुसूची में 29 विषय सूचीबद्ध किए गए।
  • संविधान के अनुच्छेद 40 में ग्राम पंचायतों को स्वशासन की इकाई के रूप में संगठित करने का निर्देश राज्य नीति के निदेशक तत्वों में दिया गया है।
  • केंद्र प्रायोजित योजनाएँ वे योजनाएँ होती हैं जिनका वित्त-पोषण केंद्र और राज्य सरकारों के बीच साझा रूप से होता है, जबकि क्रियान्वयन प्रायः राज्य सरकारें करती हैं। इनकी वित्तीय हिस्सेदारी का अनुपात सामान्यतः सामान्य श्रेणी के राज्यों के लिए 60:40 और विशेष श्रेणी के राज्यों के लिए 90:10 रखा जाता है।
  • वित्त आयोग प्रत्येक पाँच वर्ष के लिए गठित होता है। केंद्र और राज्यों के बीच करों के वितरण तथा अनुदान की सिफारिशें उसी चक्र के अनुरूप होती हैं, इसलिए केंद्र प्रायोजित योजनाओं की समय-सीमा को भी प्रायः इसी चक्र से जोड़ा जाता है।
  • 2015 में केंद्र प्रायोजित योजनाओं के युक्तिकरण के बाद इन्हें प्रमुख श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया, ताकि अनावश्यक योजनाओं की संख्या घटे और राज्यों को अधिक लचीलापन मिले।

केंद्र प्रायोजित योजना क्या है?

  • केंद्र प्रायोजित योजना वह योजना है जो केंद्र सरकार द्वारा राज्य सूची या समवर्ती सूची के विषयों पर राज्यों के माध्यम से लागू की जाती है और जिसमें वित्तीय भार केंद्र व राज्य साझा करते हैं।
  • संवैधानिक आधार अनुच्छेद 282 है, जो संघ और राज्यों को सार्वजनिक प्रयोजन के लिए अनुदान देने की शक्ति प्रदान करता है।
  • इन योजनाओं में केंद्र सरकार दिशा-निर्देश, मानक और निगरानी तंत्र तय करती है, जबकि राज्य योजना का चयन, प्राथमिकता निर्धारण और क्रियान्वयन करते हैं।
  • स्वीकृति का सामान्य क्रम यह है कि योजना को मंत्रिमंडल की मंजूरी मिलती है और उसकी अवधि, परिव्यय तथा साझेदारी अनुपात पहले से निर्धारित होते हैं।
  • पंचायती राज के संदर्भ में अनुच्छेद 243G राज्य विधानमंडल को पंचायतों को आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय की योजनाएँ बनाने तथा लागू करने की शक्ति व दायित्व देने का अधिकार देता है।
  • अनुच्छेद 243A के अंतर्गत ग्राम सभा को राज्य विधानमंडल द्वारा निर्धारित शक्तियाँ दी जाती हैं, और ग्राम पंचायत विकास योजना के माध्यम से स्थानीय आवश्यकताओं को योजना में शामिल करने की प्रक्रिया चलती है।
  • ई-ग्राम स्वराज पोर्टल पंचायतों की योजना, लेखा और निगरानी के लिए डिजिटल मंच है, जिसे पंचायती राज मंत्रालय ने विकसित किया है।
  • केंद्र प्रायोजित योजनाओं की प्रभावशीलता के लिए राजकोषीय संघवाद, राज्यों की क्षमता और उपयोगिता प्रमाण-पत्र जैसे प्रशासनिक उपाय महत्वपूर्ण होते हैं।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
योजना की प्रकृति यह केंद्र प्रायोजित योजना (Centrally Sponsored Scheme) है, जिसमें केंद्र और राज्य संसाधनों की साझेदारी करते हैं। राज्यों की भागीदारी इसके कार्यान्वयन-ढाँचे का मूल आधार है।
अवधि 2026-27 से 2030-31 तक की पाँच वर्षीय अवधि, जो सोलहवें वित्त आयोग (Sixteenth Finance Commission) के अनुदान-चक्र के साथ मेल खाती है।
लक्ष्य-क्षेत्र ग्राम स्तर पर विकास नियोजन और ग्राम पंचायतों की संस्थागत क्षमता को सुदृढ़ करना, जो पंचायती राज संस्थाओं (Panchayati Raj Institutions) की मूल भावना से जुड़ा है।
संवैधानिक आधार अनुच्छेद 243G के अंतर्गत पंचायतों को आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय से जुड़ी योजनाएँ तैयार करने की शक्ति दी गई है। यह योजना इसी संवैधानिक ढाँचे में कार्य करती है।
विस्तृत प्रावधान परिव्यय, मानदंड और राज्यवार अंश की जानकारी इस प्रेस विज्ञप्ति के उपलब्ध अंश में नहीं है। परीक्षा की दृष्टि से मंत्रिमंडलीय निर्णय के आधिकारिक पाठ और दिशानिर्देशों को अवश्य देखें।

महत्व

शासन एवं संघवाद (Governance and Federalism)

  • केंद्र और राज्यों की साझेदारी से सहकारी संघवाद की भावना को व्यावहारिक रूप मिलता है, क्योंकि ग्राम स्तर की योजनाएँ राज्य सरकारों के माध्यम से लागू होती हैं।
  • पंचायतों को नियोजन की इकाई मानने से विकेंद्रीकरण (Decentralisation) की प्रक्रिया आगे बढ़ती है और अनुच्छेद 243G की भावना सुदृढ़ होती है।
  • पाँच वर्षीय अवधि से नीति में निरंतरता आती है और योजना-चक्र को वित्त आयोग के अनुदान-चक्र के साथ जोड़ा जा सकता है।

आर्थिक (Economic)

  • ग्रामीण अवसंरचना और स्थानीय सेवाओं में निवेश से आर्थिक संवृद्धि के समावेशी स्वरूप को बल मिलता है।
  • ग्राम पंचायत विकास योजना (Gram Panchayat Development Plan) जैसे स्थानीय नियोजन उपकरणों से संसाधनों का उपयोग मांग-आधारित हो सकता है।
  • ग्रामीण क्षेत्र में परियोजनाओं के माध्यम से स्थानीय रोजगार और सेवा-क्षेत्र की गतिविधियों को प्रोत्साहन मिल सकता है।

सामाजिक (Social)

  • ग्राम सभा (अनुच्छेद 243A) की भागीदारी से योजनाओं में जनसहभागिता और पारदर्शिता बढ़ती है।
  • वंचित वर्गों की आवश्यकताओं को स्थानीय स्तर पर पहचानने से सामाजिक न्याय के लक्ष्य अधिक प्रभावी ढंग से पूरे हो सकते हैं।

चुनौतियाँ

1. राज्यों का वित्तीय अंश और भुगतान में विलंब

  • केंद्र प्रायोजित योजनाओं में राज्यों को अपना अंश समय पर उपलब्ध कराना होता है। राज्यों की वित्तीय स्थिति भिन्न होने से कार्यान्वयन असमान हो सकता है।
  • निधि जारी होने में देरी से परियोजनाएँ अधूरी रह सकती हैं और लागत बढ़ सकती है।

2. ग्राम पंचायतों की प्रशासनिक एवं तकनीकी क्षमता

  • कई ग्राम पंचायतों में प्रशिक्षित कर्मचारियों और तकनीकी विशेषज्ञता की कमी है, जिससे योजना-निर्माण और परियोजना-निगरानी प्रभावित होती है।
  • पंचायतों के पास हस्तांतरित कार्यों के अनुरूप पर्याप्त वित्तीय और प्रशासनिक संसाधन न होने की शिकायत बनी रहती है।

3. विभिन्न योजनाओं के बीच अभिसरण (Convergence)

  • ग्रामीण क्षेत्र में कई मंत्रालयों की योजनाएँ एक साथ चलती हैं। उनके बीच समन्वय न होने से दोहराव और संसाधनों का अपव्यय हो सकता है।
  • एक ही गाँव में विभिन्न विभागों की गतिविधियों को एक योजना के अंतर्गत लाना प्रशासनिक चुनौती है।

4. राज्यों के बीच विकास-असमानता

  • संसाधन-संपन्न और संसाधन-सीमित राज्यों की क्षमता में अंतर से योजना के परिणामों में क्षेत्रीय असमानता बढ़ सकती है।
  • सामान्य मानदंडों और स्थानीय आवश्यकताओं के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है।

5. निगरानी, डेटा और जवाबदेही

  • ग्राम स्तर के आँकड़ों की विश्वसनीयता और समयबद्धता सुनिश्चित करना कठिन है, जिससे प्रगति का सही आकलन प्रभावित होता है।
  • सामाजिक अंकेक्षण और सार्वजनिक जानकारी के प्रावधानों का प्रभावी उपयोग अभी सभी क्षेत्रों में समान नहीं है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
राज्यों का अंश समय पर निधि उपलब्ध न होने से परियोजनाओं की गति धीमी पड़ सकती है।
पंचायतों की क्षमता तकनीकी और प्रशासनिक कर्मियों की कमी से योजना की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
अभिसरण विभिन्न योजनाओं के बीच समन्वय न होने से दोहराव और अपव्यय की आशंका रहती है।
क्षेत्रीय असमानता कम क्षमता वाले राज्यों में परिणाम अपेक्षा से पीछे रह सकते हैं।
निगरानी और डेटा विश्वसनीय ग्राम-स्तरीय आँकड़ों के अभाव में मूल्यांकन कठिन होता है।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • प्रधानमंत्री विकसित ग्राम स्वराज योजना (Pradhan Mantri Viksit Gram Swaraj Yojana)

आगे की राह

  • राज्यों के अंश की निधि-जारी प्रक्रिया को समयबद्ध और पूर्वानुमेय बनाया जाए, ताकि परियोजनाओं में विलंब न हो।
  • ग्राम पंचायतों के सचिवों और निर्वाचित प्रतिनिधियों के लिए नियमित प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता की व्यवस्था हो।
  • ग्राम पंचायत विकास योजना को वास्तविक स्थानीय नियोजन का आधार बनाया जाए और ग्राम सभा की स्वीकृति को अनिवार्य प्रक्रिया माना जाए।
  • विभिन्न ग्रामीण योजनाओं के बीच अभिसरण के लिए एकीकृत योजना-ढाँचा और साझा डैशबोर्ड विकसित किए जाएँ।
  • आँकड़ों की गुणवत्ता के लिए ग्राम-स्तरीय डेटा संग्रह में प्रौद्योगिकी का उपयोग बढ़ाया जाए और सार्वजनिक प्रकटीकरण सुनिश्चित हो।
  • सामाजिक अंकेक्षण को नियमित और स्वतंत्र बनाया जाए, ताकि जवाबदेही और पारदर्शिता बनी रहे।
  • कम क्षमता वाले राज्यों को तकनीकी सहायता और विशेष प्रबंधन-सहयोग दिया जाए, ताकि क्षेत्रीय असमानता घटे।
  • योजना के मूल्यांकन के लिए स्पष्ट संकेतक निर्धारित हों और उनकी स्वतंत्र समीक्षा की व्यवस्था हो।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

पंचायती राज संस्थाएँ · ग्राम स्वराज · केंद्र प्रायोजित योजना (Centrally Sponsored Scheme) · सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) · 73वाँ संविधान संशोधन · वित्त आयोग (Finance Commission) · राजकोषीय विकेंद्रीकरण · अनुच्छेद 243G और ग्यारहवीं अनुसूची · अनुच्छेद 282 · ग्राम सभा · विकेंद्रीकृत योजना निर्माण · ग्रामीण विकास में राज्य की भूमिका

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 243G — पंचायतों की शक्तियाँ और दायित्व
  • अनुच्छेद 243I — वित्त आयोग द्वारा पंचायतों हेतु अनुदान
  • अनुच्छेद 243H — पंचायतों का कराधान और निधि
  • ग्यारहवीं अनुसूची — पंचायतों के 29 विषय

अवधारणा प्रवाह

केंद्र सरकार द्वारा ग्रामीण विकास हेतु नीतिगत दिशा और पाँच वर्षीय कार्यक्रम-अवधि का निर्धारण  →  केंद्र प्रायोजित योजना के रूप में केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय साझेदारी का ढाँचा तय होना  →  राज्य स्तर पर योजना का अनुकूलन और पंचायतों को निधि का हस्तांतरण  →  ग्राम पंचायतों द्वारा ग्राम पंचायत विकास योजना तैयार करना और ग्राम सभा से अनुमोदन लेना  →  स्थानीय परियोजनाओं का क्रियान्वयन, जिसमें अवसंरचना और सेवाएँ शामिल होती हैं  →  सामाजिक अंकेक्षण और निगरानी के माध्यम से परिणामों का मूल्यांकन और जवाबदेही सुनिश्चित होना  →  मूल्यांकन के आधार पर अगले चक्र की नीति में सुधार और ग्रामीण विकास में दीर्घकालिक प्रभाव

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान का अनुच्छेद 243G राज्य विधानमंडल को पंचायतों को ऐसी शक्तियाँ और अधिकार प्रदान करने की शक्ति देता है जो ग्यारहवीं अनुसूची में सूचीबद्ध विषयों से संबंधित हों।
2. अनुच्छेद 243-I के अंतर्गत राज्यपाल प्रत्येक पाँच वर्ष में राज्य वित्त आयोग गठित करता है।
3. अनुच्छेद 280 के अंतर्गत गठित वित्त आयोग राज्य की संचित निधि के संवर्धन हेतु ऐसे उपायों की अनुशंसा कर सकता है, जिनसे पंचायतों और नगरपालिकाओं के संसाधनों की पूर्ति हो।
4. स्थानीय शासन (Local Government) संघ सूची का विषय है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी चार

उत्तर: केवल तीन — कथन 1 सही है: अनुच्छेद 243G पंचायतों को ग्यारहवीं अनुसूची के 29 विषयों से संबंधित शक्तियाँ देने का आधार है। कथन 2 सही है: राज्य वित्त आयोग का गठन राज्यपाल द्वारा प्रति पाँच वर्ष पर होता है (अनुच्छेद 243-I)। कथन 3 सही है: अनुच्छेद 280(3)(bb) के अंतर्गत वित्त आयोग पंचायतों और नगरपालिकाओं के संसाधनों के पूरक हेतु राज्य की संचित निधि के संवर्धन के उपाय सुझाता है। कथन 4 गलत है: स्थानीय शासन राज्य सूची की प्रविष्टि 5 का विषय है, संघ सूची का नहीं।

Q2. निम्नलिखित दो कथनों पर विचार कीजिए, जिनमें एक अभिकथन (A) और एक कारण (R) दिया गया है:
अभिकथन (A): केंद्र प्रायोजित योजनाएँ ऐसे क्षेत्रों में लागू होती हैं जो मुख्यतः राज्य सूची के विषय हैं, और उनका वित्तपोषण केंद्र तथा राज्यों द्वारा साझा रूप से किया जाता है।
कारण (R): संविधान का अनुच्छेद 282 केंद्र और राज्य सरकारों को ऐसे सार्वजनिक प्रयोजन के लिए अनुदान देने की अनुमति देता है, जो उनकी विधायी क्षमता के अंतर्गत न आता हो।
उपर्युक्त के संदर्भ में सही विकल्प चुनिए:

  1. (a) A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है
  2. (b) A और R दोनों सही हैं, परंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है
  3. (c) A सही है, परंतु R गलत है
  4. (d) A गलत है, परंतु R सही है

उत्तर: (a) A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है — केंद्र प्रायोजित योजनाएँ राज्य सूची के विषयों में केंद्र के वित्तीय सहयोग से चलती हैं, और इनका वित्तपोषण सामान्यतः साझा होता है, इसलिए A सही है। अनुच्छेद 282 के अंतर्गत संघ या राज्य किसी भी सार्वजनिक प्रयोजन के लिए अनुदान दे सकते हैं, भले ही वह उनकी विधायी क्षमता से बाहर हो। इसी प्रावधान पर केंद्र द्वारा राज्य-विषयों में अनुदान का वैधानिक आधार टिकता है, अतः R, A की सही व्याख्या है।

Q3. भारत में विकेंद्रीकृत शासन के इतिहास के संदर्भ में, किस समिति ने त्रि-स्तरीय पंचायती राज ढाँचे (ग्राम, खंड और जिला स्तर) की सिफारिश की थी?

  1. अशोक मेहता समिति (1978)
  2. बलवंत राय मेहता समिति (1957)
  3. जी.वी.के. राव समिति (1985)
  4. एल.एम. सिंघवी समिति (1986)

उत्तर: बलवंत राय मेहता समिति (1957) — बलवंत राय मेहता समिति (1957) ने सामुदायिक विकास कार्यक्रम की समीक्षा के बाद त्रि-स्तरीय पंचायती राज ढाँचे की सिफारिश की, जिसे आगे चलकर 73वें संशोधन में अपनाया गया। अशोक मेहता समिति (1978) ने द्वि-स्तरीय ढाँचा सुझाया। जी.वी.के. राव समिति ने जिला स्तर पर योजना और विकास प्रशासन पर बल दिया, जबकि एल.एम. सिंघवी समिति ने ग्राम सभा और पंचायतों को संवैधानिक मान्यता देने की बात कही।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ पंचायती राज संस्थाओं को 73वें संविधान संशोधन से संवैधानिक दर्जा प्राप्त हुआ, फिर भी उनकी वित्तीय स्वायत्तता सीमित रही है। केंद्र प्रायोजित योजनाओं के माध्यम से ग्रामीण विकास के वित्तपोषण की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। क्या ऐसी योजनाएँ स्थानीय स्वशासन को सशक्त करती हैं, या उन्हें केंद्र-निर्देशित कार्यक्रमों के निष्पादन-तंत्र तक सीमित कर देती हैं? (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल उत्तर-कंकाल (Model Answer Skeleton):
1. भूमिका: 73वें संविधान संशोधन (1992) द्वारा भाग IX जोड़ा गया और अनुच्छेद 243 से 243-O तक पंचायती राज का ढाँचा बना। अनुच्छेद 40 (राज्य नीति का निदेशक तत्व) की पृष्ठभूमि और गांधी जी की हिंद स्वराज (1909) की ग्राम स्वराज अवधारणा का उल्लेख करें।
2. संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 243G (ग्यारहवीं अनुसूची के 29 विषय), अनुच्छेद 243H (कर, शुल्क और फीस लगाने की शक्ति), अनुच्छेद 243-I (राज्य वित्त आयोग, प्रति पाँच वर्ष), अनुच्छेद 243ZD (जिला योजना समिति), अनुच्छेद 243A (ग्राम सभा की शक्तियाँ राज्य विधि द्वारा)।
3. वित्तीय ढाँचा: राज्य वित्त आयोग के माध्यम से राज्य-स्तरीय हस्तांतरण; अनुच्छेद 280(3)(bb) के अंतर्गत संघीय वित्त आयोग की अनुशंसाएँ; स्वयं के राजस्व स्रोतों की सीमितता और अनुदान पर निर्भरता।
4. केंद्र प्रायोजित योजनाओं की भूमिका: अनुच्छेद 282 के अंतर्गत अनुदान; सार्वजनिक वित्त में पूरक भूमिका, मानकीकृत ढाँचा और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं की पूर्ति; उदाहरण के रूप में राज्य सूची के विषयों में साझा वित्तपोषण।
5. समितियों के दृष्टिकोण: बलवंत राय मेहता समिति (1957) का त्रि-स्तरीय ढाँचा; अशोक मेहता समिति (1978) की द्वि-स्तरीय सिफारिश; जी.वी.के. राव समिति (1985) और एल.एम. सिंघवी समिति (1986) की ग्राम सभा व स्थानीय योजना संबंधी सिफारिशें; द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2007) की चौथी रिपोर्ट ‘Local Governance’ का निष्कर्ष।
6. संतुलित दृष्टिकोण: (क) सशक्तीकरण पक्ष: मानकों, जवाबदेही और न्यूनतम सेवा स्तर के कारण केंद्र प्रायोजित योजनाएँ संसाधन-असमानता घटाती हैं और राष्ट्रीय उद्देश्यों को स्थानीय स्तर तक पहुँचाती हैं। (ख) केंद्रीकरण पक्ष: निधि के साथ निर्देशों की अधिकता, समान ढाँचे से स्थानीय प्राथमिकताओं का सीमित होना, कार्य-निष्पादन में पंचायतों की भूमिका का ‘एजेंसी’ बन जाना, और राज्यों के बीच सहकारी संघवाद की भावना पर प्रभाव।
7. निष्कर्ष व समाधान: निधि-हस्तांतरण में पूर्वानुमेयता, पंचायतों की योजना-क्षमता का विकास, ग्राम सभा के माध्यम से जन-योजना और स्थानीय कर-आधार का विस्तार; केंद्र और राज्य के बीच भूमिका-स्पष्टता के साथ ‘स्वराज’ की मूल भावना को संवैधानिक ढाँचे में व्यावहारिक रूप देना।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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