30 Oct केरल के कासरगोड में पारंपरिक सुरंगम पुनर्जीवित करने की पहल, जानिए कैसे होगा लाभ
✎ सुरंगम लेटेराइट पहाड़ियों में खोदी गई क्षैतिज भूमिगत जल-सुरंगें हैं, जो मानसून के वर्षा-जल को धीरे-धीरे शुष्क मौसम में उपलब्ध कराती हैं; कासरगोड में इनका पुनरुद्धार जल-संसाधन के राज्य-विषय होने के बावजूद ग्राम पंचायतों (अनुच्छेद…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भूगोल (लेटेराइट चट्टानें, भू-आकृतिक विशेषताएँ और स्थानीय जल-स्रोत) | GS Paper II — शासन एवं राजनीति (पंचायती राज संस्थाएँ, संविधान का 73वाँ संशोधन, ग्रामीण रोज़गार योजनाएँ) | GS Paper III — पर्यावरण एवं आपदा प्रबंधन (भूजल प्रबंधन, वर्षा जल संचयन, सूखा जोखिम न्यूनीकरण)
- Prelims: सुरंगम (Surangam) — लेटेराइट पहाड़ियों में खोदी गई क्षैतिज सुरंगें, लेटेराइट (Laterite) — उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों की निक्षालन (Leaching) से बनी चट्टान, केंद्रीय भूजल बोर्ड (Central Groundwater Board — CGWB), भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge), अनुच्छेद 243G एवं संविधान की ग्यारहवीं अनुसूची (लघु सिंचाई, जल प्रबंधन और जलसंभर विकास), राज्य सूची की प्रविष्टि 17 (जल, अर्थात् जलापूर्ति, सिंचाई, जल निकास), विकसित भारत–रोज़गार और आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) (VB-G RAM G), महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम, 2005 (MGNREGA)
- Essay: परंपरागत ज्ञान और आधुनिक जल प्रबंधन: स्थानीय समाधानों की प्रासंगिकता, ग्रामीण रोज़गार को जल संरक्षण से जोड़ने की सम्भावनाएँ और सीमाएँ
त्वरित पुनरावृत्ति: सुरंगम लेटेराइट पहाड़ियों में खोदी गई क्षैतिज भूमिगत जल-सुरंगें हैं, जो मानसून के वर्षा-जल को धीरे-धीरे शुष्क मौसम में उपलब्ध कराती हैं; कासरगोड में इनका पुनरुद्धार जल-संसाधन के राज्य-विषय होने के बावजूद ग्राम पंचायतों (अनुच्छेद 243G) और रोज़गार योजना के समन्वय का उदाहरण है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केरलम (Keralam) के कासरगोड ज़िले में आठ ग्राम पंचायतों, अर्थात् कायूर-चीमेनी, कोडोम-बेलूर, कल्लार, पल्लिक्कर, बेदडका, पुथिगे, चेंगाला और कुंबला, में पारंपरिक भूमिगत जल-सुरंगों ‘सुरंगम’ के पुनरुद्धार की व्यापक परियोजना प्रस्तावित है। इसका उद्देश्य घटती वर्षा और बढ़ते सूखा जोखिम के बीच भूजल पुनर्भरण बढ़ाना, वर्षा जल का संरक्षण करना और नदियों में जल-प्रवाह बनाए रखना है। परियोजना में विकसित भारत–रोज़गार और आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) (Viksit Bharat–Guarantee for Rozgar and Ajeevika Mission (Gramin) — VB-G RAM G) के अंतर्गत कार्यरत श्रमिकों का व्यापक उपयोग होगा। यह मिशन महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (MGNREGS) का स्थान लेता है। केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) के केरल क्षेत्रीय कार्यालय के विशेषज्ञ पुनरुद्धार, संरक्षण और वैज्ञानिक रखरखाव पर तकनीकी सहयोग दे रहे हैं। साथ ही, केरल केंद्रीय विश्वविद्यालय के भूविज्ञान विभाग के छात्र स्वयंसेवक सुरंगों की विस्तृत सूची तैयार करने में सहायता करेंगे।
पृष्ठभूमि
- सुरंगम पारंपरिक जल-संचयन प्रणाली है, जो मुख्यतः कासरगोड ज़िले में पाई जाती है। बोरवेल और गहरे कुएँ व्यापक होने से पहले स्थानीय निवासी और किसान पेयजल और कृषि के लिए इन पर काफी निर्भर थे।
- कासरगोड की भू-आकृति में लेटेराइट पहाड़ियाँ प्रमुख हैं और यहाँ की जल-उपलब्धता मुख्यतः मानसूनी वर्षा पर निर्भर है। मानसून में वर्षा का जल भूमि में रिसता है और गर्मियों में सुरंगों के माध्यम से धीरे-धीरे निकलता है।
- ग्रीष्म ऋतु में भूमिगत जल-भंडार के घटने को नदियों में घटते प्रवाह के प्रमुख कारणों में गिना गया है। इसलिए भूजल पुनर्भरण को नदी-बेसिन प्रबंधन से जोड़ना नीति-दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है।
- जल संसाधनों का प्रबंधन संविधान में मुख्यतः राज्य सूची की प्रविष्टि 17 के अंतर्गत राज्य का विषय है। वहीं ग्राम पंचायतों को अनुच्छेद 243G और संविधान की ग्यारहवीं अनुसूची के अंतर्गत लघु सिंचाई, जल प्रबंधन और जलसंभर विकास जैसे विषय सौंपे गए हैं।
- यह परियोजना रोज़गार सृजन और जल-आधारभूत संरचना को साथ जोड़ती है। इस प्रकार यह ग्रामीण रोज़गार योजनाओं को परिसंपत्ति-निर्माण (Asset Creation) से जोड़ने के सामान्य सिद्धांत का उदाहरण है।
सुरंगम क्या है?
- सुरंगम (Surangam) लेटेराइट पहाड़ियों में क्षैतिज रूप से खोदी गई भूमिगत जल-सुरंगें हैं, जिनमें भूजल प्राकृतिक रूप से रिसकर एकत्र होता है और बाहर प्रवाहित होता है।
- लेटेराइट (Laterite) उष्णकटिबंधीय और मानसूनी जलवायु में तीव्र रासायनिक अपक्षय और निक्षालन से बनने वाली चट्टान है, जिसमें लौह और एल्युमीनियम के ऑक्साइड का सांद्रण होता है। यह चट्टान जल को रिसने देती है, इसलिए सुरंग-निर्माण के लिए उपयुक्त मानी जाती है।
- यह प्रणाली जल-संचयन की पारंपरिक विधि है, जिसमें मानसून का जल भूमि में समाकर धीरे-धीरे शुष्क मौसम में उपलब्ध होता है। इससे वर्षा-जल का समय-अंतराल में वितरण होता है।
- सुरंगम जल-स्तर को स्थिर रखने और नदी-बेसिन के आधार-प्रवाह (Base Flow) को बनाए रखने में सहायक हो सकते हैं, क्योंकि ये भूजल-निकास को धीमा और निरंतर बनाते हैं।
- भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) का अर्थ है वर्षा या सतही जल का भूमिगत जलभृतों (Aquifers) तक पहुँचना। सुरंगों की मरम्मत और वर्षा-जल के भूमि में रिसाव को बढ़ाने वाले उपाय इसी उद्देश्य से जुड़े हैं।
- केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) जल शक्ति मंत्रालय के अधीन भूजल संसाधनों के आकलन, निगरानी और प्रबंधन से संबंधित संस्था है। इसके तकनीकी परामर्श से सुरंगों के वैज्ञानिक संरक्षण की योजना बनाई जा रही है।
- सुरंगों का सूचीकरण (Inventory) इस परियोजना का प्रथम चरण है, जिसमें संख्या, स्थान, वर्तमान स्थिति और जल-उपलब्धता का दस्तावेज़ीकरण होगा। निजी भूमि पर स्थित सुरंगें भी इसमें शामिल हैं।
- परियोजना के प्रथम चरण में क्षतिग्रस्त सुरंगों की मरम्मत और वर्षा-जल के भूमि में रिसाव को बढ़ाने के उपाय प्रमुख होंगे, तथा उपयुक्त स्थानों पर जल-भंडारण संरचनाएँ भी विकसित की जाएँगी।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| सुरंगम (Surangam) की संरचना | लेटेराइट (Laterite) पहाड़ियों में क्षैतिज सुरंगें खोदी जाती हैं, जिनमें से भूजल प्राकृतिक रूप से रिसकर बाहर आता है। इसके लिए पंप की आवश्यकता नहीं होती। |
| भौगोलिक आधार | कासरगोड की लेटेराइट भू-आकृति और मानसूनी वर्षा का संयोजन भूजल के संचयन और निकास को सम्भव बनाता है। यह पद्धति इसी क्षेत्र की भू-वैज्ञानिक परिस्थितियों के अनुरूप विकसित हुई है। |
| जल-चक्र की भूमिका | मानसून में वर्षा का जल ज़मीन में रिसता है और गर्मियों में सुरंगों के माध्यम से निकलता है। इस प्रकार यह सूखे मौसम में जलापूर्ति को बनाए रखने का पारंपरिक साधन है। |
| ऐतिहासिक उपयोग | बोरवेल और गहरे कुएँ व्यापक होने से पहले पेयजल और कृषि के लिए लोग इन्हीं पर निर्भर थे। यह स्थानीय समुदायों की पारंपरिक जल-प्रबंधन प्रणाली का उदाहरण है। |
| संस्थागत सहभागिता | केंद्रीय भूजल बोर्ड (Central Groundwater Board) के केरल क्षेत्रीय कार्यालय के विशेषज्ञ पुनरुद्धार और वैज्ञानिक रखरखाव पर तकनीकी सहायता दे रहे हैं। यह ग्रामीण रोज़गार योजना के साथ जोड़ा गया है। |
महत्व
जल सुरक्षा और भूजल प्रबंधन
- सुरंगों के पुनरुद्धार से भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) बढ़ने की अपेक्षा है, जिससे नदी बेसिनों में जल उपलब्धता सुधर सकती है।
- गर्मियों में भूजल भंडार घटने से कई नदियों का प्रवाह कम हो जाता है। सुरंगों का संरक्षण इस प्रवाह को बनाए रखने में सहायक हो सकता है।
- वर्षा जल संचयन के पारंपरिक तरीकों को पुनर्जीवित करने से स्थानीय स्तर पर जल-सुरक्षा मज़बूत होती है।
पर्यावरणीय महत्व
- भूजल के प्राकृतिक प्रवाह पर आधारित यह प्रणाली ऊर्जा-आधारित पंपिंग पर निर्भर नहीं है, इसलिए इसका कार्बन पदचिह्न अपेक्षाकृत कम है।
- अत्यधिक बोरवेल खनन के दबाव को कम करने में यह पारंपरिक विकल्प सहायक हो सकता है।
सामाजिक-आर्थिक और रोज़गार पक्ष
- वीबी-जी राम जी (VB-G RAM G) के अंतर्गत श्रमिकों के उपयोग से ग्रामीण रोज़गार सृजित होता है और परिसंपत्ति निर्माण को बढ़ावा मिलता है।
- सुरंगों के पुनरुद्धार से कृषि सिंचाई और पेयजल की उपलब्धता बढ़ने से ग्रामीण आजीविका पर सकारात्मक असर पड़ सकता है।
शासन और सहभागी नियोजन
- ग्राम पंचायतों की भागीदारी से स्थानीय ज्ञान और सामुदायिक संपत्ति के प्रबंधन का अवसर मिलता है।
- विश्वविद्यालय के छात्रों की सहायता से सूचीकरण (Inventory) वैज्ञानिक आधार पर योजना बनाने में मदद करता है।
चुनौतियाँ
1. घटती वर्षा और सूखे का बढ़ता जोखिम
- वर्षा में कमी से सुरंगों में जल-प्रवाह घट सकता है, जिससे पुनरुद्धार के बावजूद अपेक्षित परिणाम सीमित रह सकते हैं।
- लेटेराइट क्षेत्र में भूजल का संचयन मानसूनी वर्षा के वितरण पर निर्भर करता है, इसलिए जल-उपलब्धता अनिश्चित रहती है।
यूपीएससी लिंक: GS-I: भारत का भूगोल (मानसून, जलवायु परिवर्तन का स्थानीय प्रभाव)
2. निजी स्वामित्व वाली सुरंगें
- 1,000 से अधिक सुरंगों में से कई निजी भूमि पर हैं, जिससे उनके पुनरुद्धार और रखरखाव के लिए सहमति और समन्वय आवश्यक होता है।
- भूमि-स्वामित्व से जुड़े विवाद पुनरुद्धार कार्य में विलंब कर सकते हैं।
यूपीएससी लिंक: GS-II: स्थानीय शासन और सामुदायिक भागीदारी; सामान्य प्रशासन में संपत्ति-अधिकार के प्रश्न
3. सूची-निर्माण और आँकड़ों की कमी
- सुरंगों की संख्या, स्थान, वर्तमान स्थिति और जल-उपलब्धता का अब तक व्यवस्थित दस्तावेज़ीकरण नहीं है।
- बिना ठोस आँकड़ों के प्राथमिकता तय करना और संसाधनों का आवंटन कठिन होता है।
यूपीएससी लिंक: GS-III: जल संसाधन प्रबंधन; शासन में डेटा-आधारित नीति निर्माण
4. पारंपरिक ज्ञान का क्षरण
- बोरवेल के प्रसार के बाद सुरंग-आधारित जल-प्रणाली की देखभाल की परंपरा कमज़ोर हुई है।
- वैज्ञानिक रखरखाव और पुराने ढाँचों की मरम्मत के कौशल की कमी पुनरुद्धार में बाधा बन सकती है।
यूपीएससी लिंक: GS-I: पारंपरिक ज्ञान प्रणालियाँ; GS-III: जल संरक्षण की पारंपरिक पद्धतियाँ
5. अति-दोहन और बोरवेल का दबाव
- बोरवेल से अत्यधिक भूजल निकासी जारी रहने पर सुरंगों के पुनरुद्धार के लाभ सीमित हो सकते हैं।
- भूजल के नियमन और उपयोग पर स्पष्ट नियंत्रण के बिना संरक्षण के प्रयास अधूरे रह सकते हैं।
यूपीएससी लिंक: GS-III: भूजल का सतत प्रबंधन; पर्यावरण संरक्षण
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| वर्षा में कमी | सुरंगों में जल-प्रवाह घटने से पुनरुद्धार के परिणाम अनिश्चित हो सकते हैं। |
| निजी स्वामित्व | कई सुरंगें निजी भूमि पर होने से सहमति और रखरखाव में कठिनाई आती है। |
| आँकड़ों का अभाव | सुरंगों की स्थिति और जल-उपलब्धता का व्यवस्थित विवरण अभी तैयार हो रहा है। |
| पारंपरिक ज्ञान का ह्रास | बोरवेल के प्रसार से सुरंग-आधारित प्रणाली की देखभाल की परंपरा कमज़ोर हुई है। |
| बोरवेल का दबाव | भूजल की अत्यधिक निकासी पुनर्भरण के लाभों को सीमित कर सकती है। |
| मरम्मत की तकनीकी चुनौती | क्षतिग्रस्त सुरंगों की मरम्मत के लिए वैज्ञानिक तरीकों और विशेषज्ञ निगरानी की आवश्यकता है। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- विकसित भारत–रोज़गार और आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) (Viksit Bharat–Guarantee for Rozgar and Ajeevika Mission (Gramin)), जिसे VB-G RAM G कहा गया है
- महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Scheme), जिसे VB-G RAM G ने प्रतिस्थापित किया है
आगे की राह
- सुरंगों की व्यापक सूची (Inventory) शीघ्र पूरी कर उनकी स्थिति के आधार पर प्राथमिकता तय की जाए।
- निजी स्वामित्व वाली सुरंगों के लिए भूमि-स्वामियों के साथ सहमति-आधारित समझौते और सामुदायिक भागीदारी का तंत्र बनाया जाए।
- केंद्रीय भूजल बोर्ड के तकनीकी मार्गदर्शन में लेटेराइट क्षेत्र के लिए मानक मरम्मत और रखरखाव प्रोटोकॉल तैयार किए जाएँ।
- पुनरुद्धार के साथ भूजल निकासी के नियमन पर भी ध्यान दिया जाए, ताकि पुनर्भरण के लाभ टिक सकें।
- वर्षा जल के अंतःस्यंदन (Infiltration) बढ़ाने के उपाय और जल-भंडारण संरचनाएँ उपयुक्त स्थानों पर विकसित की जाएँ।
- ग्राम पंचायतों की क्षमता-वृद्धि कर उन्हें जल-संसाधन प्रबंधन की योजना और निगरानी में सशक्त किया जाए।
- विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों के सहयोग से निरंतर अध्ययन और प्रभाव-मूल्यांकन की व्यवस्था की जाए।
- सुरंगों के पुनरुद्धार को स्थानीय पारंपरिक ज्ञान के दस्तावेज़ीकरण और जन-जागरूकता से जोड़ा जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
सुरंगम (Surangam) · भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) · पारंपरिक जल संचयन प्रणाली · लेटराइट शैल (Laterite) · केंद्रीय भूजल बोर्ड (Central Groundwater Board) · ग्राम पंचायत और 73वाँ संविधान संशोधन · ग्यारहवीं अनुसूची (Eleventh Schedule) · विकसित भारत–गारंटी फॉर रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण) (VB-G RAM G) · नदी आधार प्रवाह (Base Flow) · वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) · साझा संसाधन प्रबंधन (Common Pool Resource Management) · सामुदायिक भागीदारी और जल सुरक्षा
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 243G — पंचायतों को आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय की योजना का अधिकार
- ग्यारहवीं अनुसूची — लघु सिंचाई, जल प्रबंधन और जलसंभर विकास पंचायतों के दायित्व में
- अनुच्छेद 48A — पर्यावरण की रक्षा और सुधार का राज्य का दायित्व
- अनुच्छेद 51A(छ) — नदियों और प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा का नागरिक कर्तव्य
अवधारणा प्रवाह
लेटेराइट पहाड़ियों में मानसूनी वर्षा का जल ज़मीन में रिसकर भूजल भंडार में जाता है। → भूजल धीरे-धीरे सुरंगों में प्रवाहित होकर गर्मियों में बाहर निकलता है और जल-आपूर्ति बनाए रखता है। → बोरवेल के प्रसार और वर्षा में कमी से भूजल भंडार घटने लगे और सुरंगों का प्रवाह कम हुआ। → भूजल भंडार घटने से नदियों का प्रवाह कम होने लगा, जिससे जल-सुरक्षा पर दबाव बढ़ा। → सुरंगों के सर्वेक्षण और मरम्मत से पुनर्भरण बढ़ाने का प्रयास होता है, और VB-G RAM G के श्रमिक इस कार्य में लगाए जाते हैं। → वैज्ञानिक रखरखाव और जल-भंडारण संरचनाओं से जल-उपलब्धता में सुधार की अपेक्षा की जाती है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. सुरंगम ऐसी क्षैतिज सुरंगें हैं जो लेटराइट पहाड़ियों में खोदी जाती हैं और जिनमें से भूजल प्राकृतिक रूप से रिसकर बाहर निकलता है।
2. सुरंगम मुख्यतः राजस्थान के थार मरुस्थल में पाई जाती हैं।
3. लेटराइट निर्माण के लिए उच्च तापमान और वर्षा के साथ आर्द्र तथा शुष्क मौसमों का एक-एक करके आना अनुकूल माना जाता है।
4. संविधान की ग्यारहवीं अनुसूची के अंतर्गत पेयजल और लघु सिंचाई से जुड़े कार्य ग्राम पंचायतों को सौंपे जा सकते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल तीन — कथन 1 सही है: सुरंगम लेटराइट पहाड़ियों में खुदी क्षैतिज सुरंगें हैं, जिनमें भूजल रिसकर प्रवाहित होता है। कथन 2 गलत है, क्योंकि ये मुख्यतः केरल के कासरगोड जिले में पाई जाती हैं, न कि थार में। कथन 3 सही है, क्योंकि लेटराइटीकरण उष्णकटिबंधीय आर्द्र-शुष्क जलवायु में होता है। कथन 4 सही है: ग्यारहवीं अनुसूची की मद 3 (लघु सिंचाई, जल प्रबंधन) और मद 11 (पेयजल) पंचायतों से जुड़ी हैं।
Q2. निम्नलिखित दो कथनों (A और R) पर विचार कीजिए:
अभिकथन (A): कासरगोड में सुरंगम वर्षा के बाद के सूखे महीनों में भी जल आपूर्ति बनाए रखने में सहायक रही हैं।
कारण (R): मानसून में वर्षा जल लेटराइट पहाड़ियों में समाकर धीरे-धीरे रिसता है और गर्मियों में सुरंगों के माध्यम से बाहर निकलता है।
उपर्युक्त के संदर्भ में सही उत्तर चुनिए:
- A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है
- A और R दोनों सही हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है
- A सही है, परंतु R गलत है
- A गलत है, परंतु R सही है
उत्तर: A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है — A सही है, क्योंकि सुरंगम पारंपरिक रूप से सूखे काल में जल उपलब्ध कराती रही हैं। R भी सही है और सीधे उसी प्रक्रिया की व्याख्या करता है: पुनर्भरण मानसून में होता है और जल का निकास शुष्क मौसम में होता है। इसलिए R, A की सही व्याख्या है।
Q3. निम्नलिखित सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए:
सूची-I
A. केंद्रीय भूजल बोर्ड
B. अनुच्छेद 243G
C. अनुच्छेद 48A
D. अनुच्छेद 51A(छ)
सूची-II
1. भूजल संसाधनों के वैज्ञानिक आकलन और निगरानी से जुड़ी केंद्रीय एजेंसी
2. पंचायतों को स्व-शासन की संस्थाओं के रूप में कार्य करने के लिए शक्तियाँ और अधिकार प्रदान करने का संवैधानिक प्रावधान
3. राज्य के लिए पर्यावरण संरक्षण और सुधार हेतु नीति-निदेशक तत्त्व
4. नागरिकों का मूल कर्तव्य, जिसके अंतर्गत नदियों, झीलों और वनों की रक्षा और संवर्धन आता है
सही सुमेलन चुनिए:
- A-1, B-2, C-4, D-3
- A-2, B-1, C-3, D-4
- A-1, B-2, C-3, D-4
- A-3, B-4, C-1, D-2
उत्तर: A-1, B-2, C-3, D-4 — A-1: केंद्रीय भूजल बोर्ड जल शक्ति मंत्रालय के अधीन भूजल आकलन करता है। B-2: अनुच्छेद 243G पंचायतों को शक्तियाँ प्रदान करने का प्रावधान करता है। C-3: अनुच्छेद 48A पर्यावरण संरक्षण का नीति-निदेशक तत्त्व है। D-4: मूल कर्तव्य सूची में नदियों, झीलों और वनों की रक्षा का कर्तव्य अनुच्छेद 51A(छ) में वर्णित है। ध्यान दें कि भारतीय संविधान में पर्यावरण से जुड़ा मूल कर्तव्य अनुच्छेद 51A के खंड (छ) में है, जबकि खंड (ज) वैज्ञानिक दृष्टिकोण से संबंधित है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ केरल के कासरगोड में सुरंगम जैसी पारंपरिक भूमिगत जल प्रणालियों के पुनरुद्धार को ग्राम पंचायत-स्तरीय रोजगार योजना से जोड़ने का प्रयास भूजल पुनर्भरण और जल सुरक्षा की दृष्टि से कितना प्रभावी हो सकता है, इसकी समालोचनात्मक परीक्षा कीजिए। साथ ही बताइए कि भूजल प्रबंधन में पारंपरिक ज्ञान और वैज्ञानिक सर्वेक्षण के बीच संतुलन क्यों आवश्यक है। (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर की संरचना: (1) प्रस्तावना: कासरगोड में सुरंगम की भूमिका, नलकूपों के प्रसार से पहले इनका उपयोग, और गर्मियों में नदियों के घटते प्रवाह का संदर्भ। (2) संवैधानिक और संस्थागत ढाँचा: जल राज्य सूची की प्रविष्टि 17 के अंतर्गत आता है, जबकि संघ सूची की प्रविष्टि 56 अंतरराज्यीय नदियों के विनियमन से संबंधित है। अनुच्छेद 243G के अंतर्गत ग्यारहवीं अनुसूची की मद 3 (लघु सिंचाई, जल प्रबंधन और जलसंभर विकास) और मद 11 (पेयजल) पंचायतों को सौंपी जा सकती हैं। अनुच्छेद 40 ग्राम पंचायतों के संगठन से जुड़ा है। अनुच्छेद 48A (राज्य का पर्यावरण संरक्षण का दायित्व) और अनुच्छेद 51A(छ) (नागरिकों का मूल कर्तव्य) पृष्ठभूमि देते हैं। (3) योजना का विश्लेषण: VB-G RAM G, जो महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना का स्थान लेती है, श्रम-आधारित परिसंपत्ति निर्माण के माध्यम से रोजगार और जल संरक्षण को जोड़ती है। सकारात्मक पक्ष: मजदूरी-आधारित कार्य, स्थानीय भागीदारी, और जलसंभर विकास। चुनौतियाँ: कार्य का मापन, परिसंपत्ति रखरखाव, और निजी स्वामित्व वाली सुरंगों पर सहमति। (4) वैज्ञानिक पक्ष: केंद्रीय भूजल बोर्ड (जल शक्ति मंत्रालय) के केरल क्षेत्रीय कार्यालय की भागीदारी; केरल विश्वविद्यालय/केंद्रीय विश्वविद्यालय केरल के भूविज्ञान विभाग के छात्र स्वयंसेवकों द्वारा सूची-निर्माण; भूजल का गतिशील संसाधन आकलन; नदी आधार प्रवाह से भूजल का संबंध। (5) विचारों का संतुलन: एलिनॉर ऑस्ट्रोम के साझा संसाधन प्रबंधन के आठ सिद्धांत (स्थानीय नियम, सामूहिक निर्णय, निगरानी) बनाम हार्डिन की ‘कॉमन्स की त्रासदी’ (1968), जो बताती है कि साझा संसाधन का खुला उपयोग अति-दोहन करता है। अनुपम मिश्र के ‘आज भी खरे हैं तालाब’ जैसे लेखन पारंपरिक ज्ञान का समर्थन करते हैं; तथापि अनियंत्रित नलकूप-खनन जैसी आधुनिक समस्याओं का समाधान वैज्ञानिक आकलन से ही संभव है। केरल का जनकेंद्रित विकेंद्रीकरण (1996 का जन-योजना अभियान) इस मॉडल के लिए उपयोगी उदाहरण है। (6) निष्कर्ष: दोनों पक्षों के समन्वय, सतत निगरानी और स्थानीय संस्थाओं की क्षमता-वृद्धि पर बल, तथा भूजल को सार्वजनिक विश्वास के संसाधन के रूप में देखने की आवश्यकता।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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