26 Oct सुप्रीम कोर्ट में बढ़ते विशेष अनुमति याचिकाओं (एसएलपी) का बोझ: कारण और समाधान
✎ विशेष अनुमति याचिका (SLP) अनुच्छेद 136 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय की विवेकाधीन शक्ति है, अपील का अधिकार नहीं; इसका अत्यधिक उपयोग लंबित मामलों का प्रमुख कारण है, और समाधान के लिए प्रवेश-स्तरीय छंटनी तथा न्याय तक पहुँच के बीच…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — राजव्यवस्था (Polity): न्यायपालिका की संरचना, उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता और न्यायिक सुधार | GS Paper II — शासन (Governance): न्याय वितरण प्रणाली, ई-न्यायालय और न्यायिक आँकड़ों का प्रबंधन
- Prelims: अनुच्छेद 136 — विशेष अनुमति (Special Leave) की शक्ति, अनुच्छेद 124 — उच्चतम न्यायालय की संरचना और न्यायाधीशों की संख्या, अनुच्छेद 141 — उच्चतम न्यायालय के निर्णय की बाध्यकारी प्रकृति, अनुच्छेद 32 बनाम अनुच्छेद 226 — मौलिक अधिकार हेतु रिट और उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता, राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (National Judicial Data Grid — NJDG), विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 (Legal Services Authorities Act, 1987), उत्प्रेषण लेख (Certiorari) और अमेरिकी उच्चतम न्यायालय में विवेकाधीन प्रवेश, अनुच्छेद 39A और अनुच्छेद 21 — निःशुल्क विधिक सहायता और न्याय तक पहुँच
- Essay: न्याय में विलंब न्याय से इनकार है: संस्थागत क्षमता बनाम न्यायिक गुणवत्ता, सर्वोच्च न्यायालय का दोहरा दायित्व: संवैधानिक व्याख्याकार और अंतिम अपीलीय न्यायालय
त्वरित पुनरावृत्ति: विशेष अनुमति याचिका (SLP) अनुच्छेद 136 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय की विवेकाधीन शक्ति है, अपील का अधिकार नहीं; इसका अत्यधिक उपयोग लंबित मामलों का प्रमुख कारण है, और समाधान के लिए प्रवेश-स्तरीय छंटनी तथा न्याय तक पहुँच के बीच संतुलन आवश्यक है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
उच्चतम न्यायालय की स्वीकृत न्यायाधीश संख्या मई 2026 में 34 से बढ़ाकर 38 की गई, फिर भी लंबित मामलों का दबाव कम नहीं हुआ है। राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड के नवीनतम उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार उच्चतम न्यायालय में 96,000 से अधिक मामले 38 न्यायाधीशों के पास हैं, अर्थात प्रति न्यायाधीश लगभग 2,500 मामले। विश्लेषण बताता है कि न्यायाधीशों की संख्या बढ़ने के बावजूद स्वीकृत मामलों की संख्या भी बढ़ रही है। इसका एक बड़ा कारण विशेष अनुमति याचिकाएँ (SLP) हैं, जो अनुमानतः उच्चतम न्यायालय में नए दाखिल होने वाले मामलों के लगभग 80 प्रतिशत हिस्से में हैं। इसी संदर्भ में यह प्रश्न उठा है कि क्या प्रवेश-स्तर पर अधिक कठोर छंटनी से लंबित मामलों को कम किया जा सकता है, और यह कैसे किया जाए कि न्याय तक पहुँच प्रभावित न हो।
पृष्ठभूमि
- संविधान सभा में विशेष अनुमति की शक्ति को इस तर्क के साथ रखा गया था कि भारत में राजा के न्याय-प्रधान स्वरूप जैसी कोई संस्था नहीं होगी, इसलिए अंतिम संरक्षक के रूप में उच्चतम न्यायालय को विवेकाधीन शक्ति देना आवश्यक है। एच.वी. पतंजलि शास्त्री ने इसी आशय को रखा था।
- यह शक्ति मूलतः असाधारण परिस्थितियों के लिए अंतिम उपाय के रूप में कल्पित थी, परंतु व्यवहार में यह उच्चतम न्यायालय के दैनिक कार्यभार का सबसे बड़ा स्रोत बन गई है।
- उच्चतम न्यायालय की स्वीकृत संख्या पहले 34 थी और मई 2026 में इसे 38 किया गया। संख्या का निर्धारण संसद द्वारा विधि बनाकर किया जाता है, जैसा अनुच्छेद 124 की व्यवस्था है।
- अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में शीर्ष न्यायालय प्रवेश-स्तर पर कठोर छंटनी करते हैं। अमेरिका में उत्प्रेषण लेख के माध्यम से सीमित मामले सुने जाते हैं, जबकि ब्रिटेन के उच्चतम न्यायालय ने 2025-26 में 207 में से केवल 45 अपील-अनुमति आवेदन स्वीकार किए।
विशेष अनुमति याचिका (Special Leave Petition — SLP) क्या है?
- अनुच्छेद 136 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय किसी भी न्यायालय या अधिकरण के निर्णय, आदेश या दंड के विरुद्ध विशेष अनुमति दे सकता है। यह अपील का अधिकार नहीं, बल्कि न्यायालय का विवेकाधीन क्षेत्राधिकार है।
- सामान्य अपील (जैसे अनुच्छेद 132 से 134 के अंतर्गत संवैधानिक अपील) और विशेष अनुमति में अंतर है: पहली में अपील का अधिकार निश्चित होता है, जबकि दूसरी में न्यायालय स्वयं तय करता है कि सुनवाई करनी है या नहीं।
- उच्चतम न्यायालय सामान्यतः वही मामले स्वीकार करता है जिनमें विधि का प्रश्न, संवैधानिक महत्व या गंभीर न्याय-हानि शामिल हो। सामान्य तथ्य-आधारित विवादों में अनुमति देने से इनकार किया जा सकता है।
- अनुच्छेद 136 की शक्ति को अनुच्छेद 32 की रिट याचिका से अलग समझना आवश्यक है। अनुच्छेद 32 मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन का अधिकार है, जबकि SLP पर न्यायालय का निर्णय विवेकाधीन होता है।
- उच्चतम न्यायालय के नियम 2013 के अंतर्गत SLP की प्रक्रिया, दस्तावेज़ और प्रवेश-स्तर की जाँच निर्धारित होती है। बढ़ते बोझ के कारण प्रवेश-स्तरीय छंटनी के उपायों पर विचार होता रहा है।
- राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड ई-न्यायालय परियोजना का हिस्सा है, जो देश भर की अदालतों के लंबित मामलों के आँकड़े एकत्र और प्रदर्शित करता है। इससे नीति-निर्माण और संसाधन आवंटन में सहायता मिलती है।
- प्रवेश-स्तरीय छंटनी का तर्क यह है कि यह न्यायालय का समय उन मामलों पर केंद्रित करे जो संवैधानिक या व्यापक सार्वजनिक महत्व के हैं। इसके विरुद्ध चिंता यह है कि अत्यधिक कठोर छंटनी से गरीब और वंचित वादकारियों की न्याय तक पहुँच सीमित हो सकती है, जिसकी रक्षा अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 39A के संदर्भ में आवश्यक है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्त्व |
|---|---|
| स्वीकृत संख्या (Sanctioned Strength) | मई में उच्चतम न्यायालय की स्वीकृत न्यायाधीश संख्या 34 से बढ़ाकर 38 की गई |
| कुल लंबित भार | राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (National Judicial Data Grid) के अनुसार लगभग 96,000 मामले, यानी प्रति न्यायाधीश लगभग 2,500 मामले |
| विशेष अनुमति याचिका (Special Leave Petition – SLP) का हिस्सा | नए दाखिलों में SLP का अनुपात लगभग 80 प्रतिशत बताया जाता है, इसलिए यही सबसे बड़ा प्रवाह-स्रोत है |
| अनुच्छेद 136 की प्रकृति | यह उच्चतम न्यायालय को किसी भी न्यायालय या अधिकरण के निर्णय के विरुद्ध विशेष अनुमति देने का विवेकाधीन अधिकार देता है; अपील का अधिकार नहीं, बल्कि सुनवाई का विवेक है |
| ऐतिहासिक उद्देश्य | संविधान सभा में इसे ‘अंतिम उपाय’ के रूप में देखा गया था, जो ब्रिटिश सम्राट के न्याय-विशेषाधिकार के स्थान पर एक संरक्षक की भूमिका निभाए |
| तुलनात्मक स्थिति | अमेरिका के उच्चतम न्यायालय में हर वर्ष हजारों याचिकाओं में से लगभग 70-80 पर सुनवाई होती है; ब्रिटेन के उच्चतम न्यायालय ने 2025-26 में 207 आवेदनों में से केवल 45 को अपील की अनुमति दी |
महत्व
संवैधानिक एवं विधिक महत्त्व
- अनुच्छेद 136 उच्चतम न्यायालय को विधि के प्रश्नों पर अंतिम और सर्वोच्च निर्णय की शक्ति देता है, जिससे न्यायिक एकरूपता बनी रहती है
- उच्चतम न्यायालय द्वारा स्वीकृत मामलों में निर्णय अनुच्छेद 141 के अंतर्गत सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी होता है, इसलिए SLP का चयन विधि के विकास को भी प्रभावित करता है
- अनुच्छेद 136 में विवेकाधिकार होने के कारण न्यायालय अपनी प्रक्रिया नियमों के माध्यम से तय करता है, जिसका आधार अनुच्छेद 145 है
न्याय तक पहुँच (Access to Justice)
- SLP ऐसी व्यवस्था है जिसके माध्यम से गंभीर अन्याय के मामलों में भी उच्चतम न्यायालय तक पहुँचा जा सकता है, इसलिए इसका संतुलित उपयोग नागरिकों के अधिकारों की रक्षा से जुड़ा है
- यह व्यवस्था उन मामलों में उपयोगी है जहाँ उच्च न्यायालय के निर्णय में विधिक त्रुटि हो, परंतु इसका अनियंत्रित उपयोग वास्तविक मामलों की सुनवाई में विलंब कर सकता है
न्यायिक प्रशासन और क्षमता नियोजन
- न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना क्षमता बढ़ाने का एक उपाय है, किंतु नए दाखिलों की बढ़ती दर इससे लाभ को सीमित कर देती है
- राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड जैसे डिजिटल आँकड़े लंबित भार के वास्तविक विश्लेषण और नीति-निर्माण के लिए आधार प्रदान करते हैं
तुलनात्मक संस्थागत दृष्टि
- अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में प्रवेश-स्तर पर कड़ी छन्नी (filter) व्यवस्था है, जिससे सर्वोच्च न्यायालय का कार्य केवल विधि-महत्त्व वाले प्रश्नों तक सीमित रहता है
- भारत की स्थिति यह दर्शाती है कि अपील-प्रणाली की संरचना, उच्च न्यायालयों की भूमिका और सर्वोच्च न्यायालय के दायित्व में संतुलन आवश्यक है
चुनौतियाँ
1. विवेकाधीन शक्ति और मनमानी का जोखिम
- अनुच्छेद 136 में प्रवेश के स्पष्ट वैधानिक मानदंड नहीं हैं, इसलिए एक ही प्रकार के मामलों में अलग-अलग परिणाम संभव हैं
- ‘सार्वजनिक महत्त्व’ या ‘संवैधानिक प्रश्न’ जैसे मानदंडों की व्याख्या में एकरूपता बनाना कठिन है
यूपीएससी लिंक: GS-2: न्यायपालिका की संरचना, कार्य और शक्तियाँ
2. मामूली मामलों का सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचना
- उदाहरण के लिए, एक कार्यालयी विवाद से जुड़ी आपराधिक कार्यवाही का निर्णय नौ वर्ष बाद उच्चतम न्यायालय में हुआ और न्यायालय ने आरोपों को ‘तुच्छ’ माना
- ऐसे मामले संवैधानिक प्रश्न न होते हुए भी सर्वोच्च न्यायालय का समय लेते हैं, जिससे गंभीर मामलों में विलंब बढ़ता है
यूपीएससी लिंक: GS-2: न्याय वितरण प्रणाली की समस्याएँ और सुधार
3. न्याय तक पहुँच बनाम प्रवेश-छन्नी का संतुलन
- कड़े फिल्टर से गरीब और सीमित साधनों वाले वादियों की पहुँच प्रभावित हो सकती है
- इसलिए ऐसी व्यवस्था चाहिए जो विधि-प्रश्नों की गुणवत्ता जाँचे, पर वादी के मूल अधिकार को हानि न पहुँचाए
यूपीएससी लिंक: GS-2: सामाजिक न्याय और मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21 से संबंधित न्याय तक पहुँच)
4. उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के बीच भूमिका-विभाजन
- यदि उच्च न्यायालय का निर्णय अंतिम माना जाए, तो सर्वोच्च न्यायालय पर भार घटेगा, किंतु त्रुटि-निवारण के अवसर कम होंगे
- उच्च न्यायालयों में भी लंबित मामलों का भारी बोझ है, इसलिए यह विभाजन क्षमता पर भी निर्भर है
यूपीएससी लिंक: GS-2: संघवाद और न्यायिक ढाँचे की संस्थागत व्यवस्था
5. न्यायिक नियुक्ति और क्षमता-विस्तार की सीमाएँ
- केवल न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने से कार्य-बोझ का मूल कारण, अर्थात नए दाखिलों की प्रवृत्ति, नहीं बदलता
- न्यायिक नियुक्तियों में समय लगना और रिक्तियों का बने रहना क्षमता-वृद्धि के लाभ को धीमा कर देता है
यूपीएससी लिंक: GS-2: संवैधानिक निकाय और न्यायिक नियुक्ति प्रक्रिया
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| विवेकाधीन प्रवेश | अनुच्छेद 136 के अंतर्गत स्पष्ट और समान मानदंडों के अभाव में निर्णय में असमानता की आशंका |
| बढ़ता भार | प्रति न्यायाधीश लगभग 2,500 मामले, जिससे गंभीर संवैधानिक प्रश्नों की सुनवाई पर भी असर |
| मामूली मामलों का प्रवेश | कार्यालयी या सामान्य विवादों से जुड़ी SLP का सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचना, जिसमें वर्षों का विलंब |
| न्याय तक पहुँच | कठोर छन्नी से वंचित वर्ग के वादियों का मूल अधिकार प्रभावित होने की संभावना |
| तुलनात्मक अंतर | अमेरिका और ब्रिटेन की तुलना में भारत में अधिक मामलों पर पूर्ण सुनवाई, जिससे संस्थागत दबाव बढ़ना |
आगे की राह
- प्रवेश के लिए स्पष्ट, पारदर्शी और समान मानदंड नियमों के माध्यम से तय किए जाएँ, ताकि अनुच्छेद 136 का विवेक नियंत्रित रूप से प्रयोग हो
- ‘संवैधानिक प्रश्न’ और ‘सार्वजनिक महत्त्व’ की व्याख्या के लिए न्यायिक दृष्टांतों का संकलन और प्रकाशन किया जाए
- राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड के आँकड़ों के आधार पर SLP दाखिलों का प्रकार-वार विश्लेषण कर नीति-निर्णय लिए जाएँ
- उच्च न्यायालयों की क्षमता और उनके निर्णयों की गुणवत्ता बढ़ाई जाए, ताकि अनावश्यक अपीलों की संख्या स्वाभाविक रूप से घटे
- न्यायाधीशों की रिक्तियाँ समय पर भरी जाएँ और सहायक न्यायिक कर्मचारियों तथा प्रक्रियात्मक सुधारों पर ध्यान दिया जाए
- वैकल्पिक विवाद समाधान, जैसे मध्यस्थता, को निचली अदालतों और उच्च न्यायालयों में प्रोत्साहित किया जाए
- न्याय तक पहुँच की रक्षा के लिए वंचित वादियों हेतु प्रक्रियात्मक सहायता और सरल दाखिला-प्रणाली सुनिश्चित की जाए
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
विशेष अनुमति याचिका (Special Leave Petition) · अनुच्छेद 136 (Article 136) · सर्वोच्च न्यायालय की स्वीकृत संख्या (Sanctioned Strength) · अनुच्छेद 124 (Article 124) · न्यायिक विवेकाधिकार (Judicial Discretion) · लंबित मामले (Pendency of Cases) · राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (National Judicial Data Grid) · न्याय तक पहुँच (Access to Justice) · संवैधानिक प्रश्न (Substantial Question of Constitutional Law) · न्यायिक सक्रियता और न्यायिक संयम (Judicial Activism and Judicial Restraint) · अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 226 (Writ Jurisdiction) · अपील का अधिकार बनाम विवेकाधीन अपील (Right of Appeal vs Discretionary Appeal)
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 136: विशेष अनुमति देने की विवेकाधीन शक्ति
- अनुच्छेद 124: सर्वोच्च न्यायालय की संरचना और न्यायाधीशों की संख्या
- अनुच्छेद 145: न्यायालय की प्रक्रिया-नियम बनाने की शक्ति
- अनुच्छेद 141: उच्चतम न्यायालय के निर्णय की बाध्यकारी प्रकृति
- अनुच्छेद 21: न्याय तक पहुँच से जुड़ा जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार
अवधारणा प्रवाह
उच्च न्यायालय द्वारा अपील खारिज होने या निर्णय देने के बाद पक्षकार अनुच्छेद 136 के अंतर्गत SLP दाखिल करता है → प्रवेश-मानदंड स्पष्ट न होने के कारण बड़ी संख्या में SLP दाखिल होती हैं, जिनमें से कई संवैधानिक प्रश्न नहीं उठातीं → SLP की संख्या बढ़ने से उच्चतम न्यायालय के समक्ष कुल लंबित मामलों का भार बढ़ता है, जो प्रति न्यायाधीश लगभग 2,500 मामलों तक पहुँचता है → न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 34 से 38 करने से क्षमता बढ़ती है, परंतु नए दाखिलों की प्रवृत्ति इस लाभ को सीमित करती है → इसलिए नियम-आधारित छन्नी, उच्च न्यायालयों की सशक्त भूमिका और डिजिटल आँकड़ों पर आधारित नीति के माध्यम से भार और न्याय तक पहुँच में संतुलन की आवश्यकता होती है
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए, जो भारत में विशेष अनुमति याचिका (Special Leave Petition) से संबंधित हैं:
1. यह व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 136 में दी गई है।
2. उच्चतम न्यायालय किसी उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध दायर प्रत्येक विशेष अनुमति याचिका को सुनने के लिए बाध्य है।
3. इसमें अपील की अनुमति देने का अंतिम विवेकाधिकार उच्चतम न्यायालय के पास होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: विशेष अनुमति (Special Leave to Appeal) अनुच्छेद 136 में वर्णित है। कथन 2 गलत है, क्योंकि उच्चतम न्यायालय इन याचिकाओं को सुनने के लिए बाध्य नहीं है और वह अनुमति देने से इनकार कर सकता है। कथन 3 सही है, क्योंकि अनुमति देना उच्चतम न्यायालय का विवेकाधीन अधिकार है। अतः उत्तर “केवल दो” है।
Q2. निम्नलिखित दो कथनों पर विचार कीजिए:
अभिकथन (A): भारत में उच्चतम न्यायालय की स्वीकृत न्यायाधीश संख्या संसद द्वारा विधि बनाकर निर्धारित की जाती है।
कारण (R): संविधान के अनुच्छेद 124(1) के अनुसार उच्चतम न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश और संसद द्वारा विधि द्वारा निर्धारित संख्या में अन्य न्यायाधीश होंगे।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
- (A) और (R) दोनों सत्य हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
- (A) और (R) दोनों सत्य हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
- (A) सत्य है, किंतु (R) असत्य है।
- (A) असत्य है, किंतु (R) सत्य है।
उत्तर: (A) और (R) दोनों सत्य हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — अनुच्छेद 124(1) संसद को न्यायाधीशों की संख्या विधि द्वारा निर्धारित करने का अधिकार देता है। इसी प्रावधान के आधार पर संसद ने उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अधिनियम, 2019 द्वारा संख्या 34 (मुख्य न्यायाधीश सहित 34 से अन्य 33) निर्धारित की थी। अतः (R), (A) की सही व्याख्या है।
Q3. निम्नलिखित सुमेलित युग्मों पर विचार कीजिए:
सूची-I (संवैधानिक प्रावधान)
1. अनुच्छेद 136
2. अनुच्छेद 32
3. अनुच्छेद 226
4. अनुच्छेद 134A
सूची-II (विषय)
a. उच्च न्यायालय से अपील के लिए प्रमाण-पत्र
b. उच्च न्यायालय द्वारा रिट जारी करने की शक्ति
c. उच्चतम न्यायालय द्वारा विशेष अनुमति से अपील
d. मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन हेतु उच्चतम न्यायालय में रिट याचिका
सही सुमेलन चुनिए:
- 1-c, 2-d, 3-b, 4-a
- 1-a, 2-b, 3-c, 4-d
- 1-c, 2-b, 3-d, 4-a
- 1-d, 2-c, 3-a, 4-b
उत्तर: 1-c, 2-d, 3-b, 4-a — अनुच्छेद 136 उच्चतम न्यायालय की विशेष अनुमति से अपील (c) से संबंधित है। अनुच्छेद 32 मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन हेतु उच्चतम न्यायालय में रिट (d) देता है। अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों की रिट जारी करने की शक्ति (b) है। अनुच्छेद 134A उच्च न्यायालय द्वारा अपील हेतु प्रमाण-पत्र (a) से संबंधित है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ “विशेष अनुमति याचिका (Special Leave Petition) को मूलतः अंतिम उपाय के रूप में कल्पित किया गया था, किंतु आज यह उच्चतम न्यायालय के कुल नए मामलों का बड़ा हिस्सा बन चुकी है।” अनुच्छेद 136 के अंतर्गत न्यायिक विवेकाधिकार के संदर्भ में इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही बताइए कि प्रवेश-स्तर पर कठोर छानबीन लागू करने से न्याय तक पहुँच पर क्या प्रभाव पड़ सकता है। (15 Marks)
रूपरेखा: MODEL-ANSWER SKELETON:
(1) परिचय: अनुच्छेद 136 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय को भारत के किसी भी न्यायालय या अधिकरण के निर्णय के विरुद्ध विशेष अनुमति देने की शक्ति है। यह अपील का अधिकार नहीं, बल्कि विवेकाधीन शक्ति है। उच्चतम न्यायालय की स्वीकृत संख्या 34 से बढ़ाकर 38 किए जाने का उल्लेख करें।
(2) संवैधानिक पृष्ठभूमि: संविधान सभा में एच.वी. पतंजकर (H.V. Pataskar) का तर्क कि ब्रिटिश सम्राट के न्याय-विशेषाधिकार (prerogative) के स्थान पर एक संरक्षक आवश्यक था। यह भी स्पष्ट करें कि अनुच्छेद 134A (प्रमाण-पत्र) और अनुच्छेद 133 (संवैधानिक मामलों में अपील) के साथ इसका संबंध क्या है।
(3) मूल उद्देश्य बनाम वर्तमान उपयोग: ‘अंतिम उपाय’ की धारणा और व्यवहार में अंतर। उदाहरण के रूप में Sunil Kumar बनाम उत्तर प्रदेश मामला (2014 की घटना, 2018 में उच्च न्यायालय द्वारा याचिका खारिज, 2023 में अपील स्वीकृत) देकर यह दिखाएँ कि तुच्छ विवादों में भी उच्चतम न्यायालय का समय लिया जाता है।
(4) आँकड़े: लगभग 96,000 लंबित मामले, प्रति न्यायाधीश लगभग 2,500 मामले (राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड, National Judicial Data Grid); SLP लगभग 80 प्रतिशत नए दाखिलों में बताए गए अनुमान; तुलना में अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय (लगभग 70–80 मामले प्रति वर्ष सुनवाई हेतु) और यूके सुप्रीम कोर्ट (2025–26 में 207 में से 45 अनुमति)।
(5) सुधार-विकल्प: (क) प्रवेश-स्तर पर ‘संवैधानिक या सार्वजनिक महत्व के प्रश्न’ की कसौटी को स्पष्ट और कठोर करना; (ख) उच्च न्यायालयों की भूमिका को सुदृढ़ करना; (ग) न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ प्रक्रियात्मक सुधार; (घ) डिजिटल केस-प्रबंधन और NJDG जैसे तंत्रों से निगरानी। संदर्भ: विधि आयोग की लंबित मामलों पर रिपोर्टों का उल्लेख।
(6) संतुलित दृष्टिकोण: एक पक्ष मानता है कि कठोर छानबीन से गरीब और सीमित साधनों वाले वादियों के लिए अंतिम न्यायालय के द्वार बंद होंगे (अनुच्छेद 14 और 21 के संदर्भ में); दूसरा पक्ष मानता है कि बिना छानबीन के उच्चतम न्यायालय संवैधानिक व्याख्या का कार्य नहीं कर पाएगा। विवेकपूर्ण निष्कर्ष यह हो सकता है कि मौलिक प्रश्नों और सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण मामलों के लिए द्वार खुले रहें, जबकि व्यक्तिगत तुच्छ विवादों की छानबीन सख्त हो। Kunhayammed बनाम केरल राज्य (2000) में SLP खारिज होने के प्रभाव (doctrine of merger) का उल्लेख भी उपयोगी है।
(7) निष्कर्ष: न्याय की गुणवत्ता और पहुँच के बीच संतुलन, संस्थागत क्षमता और प्रक्रिया-सुधार की आवश्यकता।
स्रोत: The Indian Express
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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