29 Oct भारत ने क्यूबा पर अमेरिकी प्रतिबंध खत्म करने के लिए संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव का किया समर्थन
✎ संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव सिफ़ारिशी और गैर-बाध्यकारी होते हैं, जबकि सुरक्षा परिषद के निर्णय चार्टर के अनुच्छेद 25 के अंतर्गत बाध्यकारी होते हैं; अतिरिक्त-क्षेत्रीय प्रभाव वाले प्रतिबंध संप्रभुता के सिद्धांत के लिए चुनौती…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — अंतरराष्ट्रीय संबंध (भारत और संयुक्त राष्ट्र; संयुक्त राष्ट्र महासभा की भूमिका; एकपक्षीय प्रतिबंधों का प्रभाव) | GS Paper II — अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ एवं मंच (संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांत, बहुपक्षवाद)
- Prelims: संयुक्त राष्ट्र महासभा (UN General Assembly) के प्रस्ताव की गैर-बाध्यकारी प्रकृति, संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 10 (महासभा की सिफ़ारिशें) और सुरक्षा परिषद के बाध्यकारी निर्णय (अनुच्छेद 25), अतिरिक्त-क्षेत्रीय प्रभाव (Extraterritorial Effect) वाले कानून, हेल्म्स-बर्टन अधिनियम, 1996 (Helms-Burton Act), क्यूबा की क्रांति (1959) और फिदेल कास्त्रो, संप्रभु समानता और राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का सिद्धांत, वाणिज्यिक प्रतिबंध और वित्तीय प्रतिबंध में अंतर, मानवीय सहायता और आर्थिक प्रतिबंधों का संबंध
- Essay: प्रतिबंध कूटनीति की प्रभावशीलता और उसकी मानवीय कीमत: क्या आर्थिक दबाव शासन परिवर्तन का साधन बन सकता है?, एक-दूसरे पर निर्भर विश्व में संप्रभुता और अतिरिक्त-क्षेत्रीय कानूनों की सीमाएँ
त्वरित पुनरावृत्ति: संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव सिफ़ारिशी और गैर-बाध्यकारी होते हैं, जबकि सुरक्षा परिषद के निर्णय चार्टर के अनुच्छेद 25 के अंतर्गत बाध्यकारी होते हैं; अतिरिक्त-क्षेत्रीय प्रभाव वाले प्रतिबंध संप्रभुता के सिद्धांत के लिए चुनौती हैं।
यह खबर चर्चा में क्यों?
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने क्यूबा के विरुद्ध संयुक्त राज्य अमेरिका के आर्थिक, वाणिज्यिक एवं वित्तीय प्रतिबंध को समाप्त करने की माँग वाला प्रस्ताव अपनाया, जिसके पक्ष में 130 देशों ने मतदान किया, 17 देश विपक्ष में रहे और 25 देश अनुपस्थित रहे। भारत ने इस प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया। भारतीय प्रतिनिधि ने अपने वक्तव्य में कहा कि महासभा बार-बार प्रतिबंध समाप्त करने का आह्वान कर चुकी है और ऐसे कानूनों तथा उपायों को निरस्त करने की अपील दोहराई गई है जिनके अतिरिक्त-क्षेत्रीय प्रभाव दूसरे देशों की संप्रभुता और उनके लोगों की प्रगति पर प्रतिकूल असर डालते हैं। भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव की रिपोर्ट का हवाला देते हुए क्यूबा की स्वास्थ्य व्यवस्था में आवश्यक दवाओं की 60 प्रतिशत से अधिक कमी और पिछले पाँच वर्षों में खाद्य उत्पादन में 50 प्रतिशत से अधिक गिरावट की ओर ध्यान दिलाया। यह प्रस्ताव गैर-बाध्यकारी है, फिर भी इसका राजनयिक और नैतिक महत्त्व है।
पृष्ठभूमि
- क्यूबा में 1959 की क्रांति के बाद फिदेल कास्त्रो के नेतृत्व में सरकार बनी, जो अमेरिका-समर्थित सरकार के पतन के बाद सोवियत संघ के निकट चली गई। इसके बाद अमेरिका और क्यूबा के बीच राजनीतिक, आर्थिक और वैचारिक तनाव गहराता गया।
- अमेरिका ने 1960 के दशक की शुरुआत में क्यूबा पर व्यापक व्यापारिक प्रतिबंध लागू किए। इनका उद्देश्य क्यूबा की साम्यवादी सरकार पर राजनीतिक और आर्थिक दबाव बनाना बताया जाता है।
- 1992 में अमेरिका के क्यूबा डेमोक्रेसी अधिनियम (Cuban Democracy Act) के बाद प्रतिबंधों के कई पहलू संस्थागत रूप में आए। 1996 के हेल्म्स-बर्टन अधिनियम ने तीसरे देशों की कंपनियों पर भी असर डालने वाले प्रावधान जोड़े, जिन्हें अतिरिक्त-क्षेत्रीय प्रभाव का उदाहरण माना जाता है।
- संयुक्त राष्ट्र महासभा में क्यूबा के विरुद्ध प्रतिबंध समाप्त करने का प्रस्ताव 1992 से प्रतिवर्ष लाया जाता रहा है, और अधिकांश वर्षों में बहुमत इसके पक्ष में रहा है।
- भारत की नीति बहुपक्षवाद, संप्रभु समानता और संवाद व कूटनीति के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय विवादों के समाधान पर आधारित रही है, जो इस मतदान में भी परिलक्षित होती है।
अमेरिका का क्यूबा पर आर्थिक प्रतिबंध क्या है?
- यह एक आर्थिक, वाणिज्यिक और वित्तीय प्रतिबंध (Embargo) है, जिसमें क्यूबा के साथ व्यापार, निवेश, वित्तीय लेन-देन और कुछ वस्तुओं के निर्यात-आयात पर रोक या सीमाएँ शामिल हैं।
- प्रतिबंध का स्वरूप व्यापक है, इसलिए इसे केवल एक देश के विरुद्ध अपनाया गया दंडात्मक उपाय माना जाता है, जबकि प्रभाव तीसरे देशों की कंपनियों और बैंकों तक पहुँच सकता है।
- अतिरिक्त-क्षेत्रीय प्रभाव (Extraterritorial Effect) का अर्थ है कि किसी देश का कानून उसकी सीमाओं के बाहर की गतिविधियों को प्रभावित करे। अंतरराष्ट्रीय विधि में इसे राज्यों की संप्रभु समानता के लिए चिंता का विषय माना जाता है।
- संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव सामान्यतः सिफ़ारिशी प्रकृति के होते हैं। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 10 के अंतर्गत महासभा सिफ़ारिशें कर सकती है, परंतु उनके पालन के लिए बाध्यता नहीं होती।
- सुरक्षा परिषद के निर्णय चार्टर के अनुच्छेद 25 के अंतर्गत सदस्य देशों पर बाध्यकारी होते हैं, और चैप्टर VII के अंतर्गत प्रवर्तनीय उपाय भी लागू किए जा सकते हैं। इसलिए महासभा और सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों की कानूनी हैसियत में अंतर समझना आवश्यक है।
- मानवीय दृष्टि से प्रतिबंधों की बहस का केंद्र यह प्रश्न है कि क्या आवश्यक दवाओं, भोजन और ईंधन जैसी वस्तुओं की आपूर्ति पर इसका प्रभाव नागरिकों तक पहुँचता है।
- भारत का संयुक्त राष्ट्र में रुख आमतौर पर संवाद और कूटनीति द्वारा विवादों के समाधान, तथा संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय विधि के पालन पर केंद्रित रहा है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्त्व |
|---|---|
| प्रस्ताव का शीर्षक | “क्यूबा के विरुद्ध संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा लगाए गए आर्थिक, वाणिज्यिक और वित्तीय अवरोध (Embargo) की समाप्ति की आवश्यकता” शीर्षक वाला यह प्रस्ताव अवरोध हटाने की लगातार माँग को दोहराता है। |
| मतदान परिणाम | 193 सदस्यीय महासभा में 130 देशों ने पक्ष में, 17 ने विपक्ष में और 25 ने मतदान से अनुपस्थित रहकर (Abstain) समर्थन किया। भारत ने पक्ष में मत दिया। |
| कानूनी स्थिति | महासभा के प्रस्ताव सदस्य देशों पर विधिक रूप से बाध्यकारी नहीं होते। ये नैतिक और राजनयिक दबाव बनाते हैं, जबकि सुरक्षा परिषद के निर्णय संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 25 के अंतर्गत बाध्यकारी होते हैं। |
| क्षेत्राधिकार-बाह्य प्रभाव (Extraterritorial Effect) पर आपत्ति | प्रस्ताव उन कानूनों और उपायों की निंदा करता है जो किसी देश की सीमा के बाहर के व्यक्तियों और कंपनियों पर लागू होते हैं। इसे राज्यों की संप्रभुता के प्रति चिंता के रूप में देखा गया है। |
| मानवीय प्रभाव का आकलन | संयुक्त राष्ट्र महासचिव की रिपोर्ट के अनुसार क्यूबा में आवश्यक दवाओं की लगभग 60 प्रतिशत से अधिक कमी है और पिछले पाँच वर्षों में खाद्य उत्पादन में 50 प्रतिशत से अधिक गिरावट आई है। |
| ऐतिहासिक पृष्ठभूमि | 1959 की क्रांति के बाद फिदेल कास्त्रो के नेतृत्व में क्यूबा सोवियत संघ के निकट गया। इसके बाद से अमेरिका के व्यापार अवरोध और प्रतिबंध छह दशकों से अधिक समय से लागू हैं। |
महत्व
राजनयिक महत्त्व
- भारत का समर्थन बहुपक्षवाद (Multilateralism) और संवाद-कूटनीति की उस नीति को दर्शाता है जिसे भारत संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुरूप मानता है।
- गुटनिरपेक्ष आंदोलन (Non-Aligned Movement) की परंपरा में भारत का रुख संप्रभु समानता और उपनिवेशोत्तर विकास के पक्ष में रहा है।
विधिक और अंतरराष्ट्रीय कानून से जुड़ा पक्ष
- प्रस्ताव में क्षेत्राधिकार-बाह्य प्रभाव वाले कानूनों की वैधता पर प्रश्न उठाया गया है, जो अंतरराष्ट्रीय कानून में राज्यों की समानता और गैर-हस्तक्षेप के सिद्धांतों से जुड़ा है।
- अवरोध और प्रतिबंध के बीच अंतर समझना उपयोगी है। प्रतिबंध किसी विशेष व्यक्ति या संस्था पर लक्षित हो सकते हैं, जबकि व्यापक अवरोध पूरे देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है।
आर्थिक और मानवीय आयाम
- ईंधन निर्यात पर प्रतिबंधों ने क्यूबा के ऊर्जा संकट को बढ़ाया है, जिससे स्वास्थ्य, शिक्षा, जल आपूर्ति, खाद्य वितरण और परिवहन जैसी आवश्यक सेवाएँ प्रभावित हुई हैं।
- सतत विकास लक्ष्यों (Sustainable Development Goals) में स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा और स्वच्छ जल जैसे लक्ष्य सीधे मानवीय आवश्यकताओं से जुड़े हैं, इसलिए ऐसे अवरोधों को विकास के संदर्भ में भी देखा जाता है।
चुनौतियाँ
1. प्रस्ताव की गैर-बाध्यकारी प्रकृति
- महासभा के प्रस्ताव सिफारिशी (Recommendatory) होते हैं, इसलिए इनके पालन की कोई विधिक बाध्यता नहीं होती।
- वर्षों से समर्थन मिलने के बावजूद प्रस्ताव अवरोध हटाने में प्रत्यक्ष सफलता नहीं दिला सका है, जिससे इसकी व्यावहारिक सीमा स्पष्ट होती है।
यूपीएससी लिंक: अंतरराष्ट्रीय संगठन, संयुक्त राष्ट्र की संरचना और महासभा की शक्तियाँ
2. क्षेत्राधिकार-बाह्य कानूनों का संघर्ष
- जब एक देश के कानून दूसरे देश की कंपनियों और व्यक्तियों पर लागू होते हैं, तो अधिकार-क्षेत्र का टकराव उत्पन्न होता है।
- इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार, निवेश और वित्तीय लेन-देन में अनिश्चितता बढ़ती है और तीसरे देशों की कंपनियाँ सावधानी बरतने लगती हैं।
यूपीएससी लिंक: अंतरराष्ट्रीय संबंध, संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानून
3. मानवीय संकट और अवरोध का अंतर
- व्यापक अवरोध का प्रभाव केवल सरकार पर नहीं, बल्कि आम नागरिकों की दवा, भोजन और ईंधन तक पहुँच पर पड़ता है।
- मानवीय सहायता और वैध व्यापार के लिए छूट की व्यवस्था की प्रभावशीलता पर विचार करना आवश्यक हो जाता है।
यूपीएससी लिंक: मानव विकास, सार्वजनिक स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा
4. ऊर्जा और आवश्यक सेवाओं पर दबाव
- ईंधन आपूर्ति बाधित होने से बिजली कटौती, परिवहन में व्यवधान और जल वितरण की समस्याएँ बढ़ती हैं।
- ऊर्जा सुरक्षा का प्रश्न किसी भी अर्थव्यवस्था की संवृद्धि और सामाजिक स्थिरता से जुड़ा रहता है।
यूपीएससी लिंक: ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक संवृद्धि
5. शीत युद्ध के बाद की भू-राजनीतिक जटिलता
- छह दशक पुराना यह विवाद वैचारिक, आर्थिक और सामरिक कारकों के मिश्रण से बना है, इसलिए इसका समाधान केवल प्रस्तावों से कठिन है।
- विभिन्न देशों के बीच हितों के अलग-अलग होने से सर्वसम्मति तक पहुँचना कठिन रहता है।
यूपीएससी लिंक: शीत युद्ध के बाद का विश्व और भारत की विदेश नीति
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| प्रस्ताव का प्रभाव | महासभा का प्रस्ताव विधिक रूप से बाध्यकारी नहीं है, इसलिए उसके परिणाम राजनयिक दबाव तक सीमित रहते हैं। |
| क्षेत्राधिकार-बाह्य कानून | तीसरे देशों की कंपनियों पर लागू होने वाले कानून व्यापार और निवेश में अनिश्चितता पैदा करते हैं। |
| मानवीय आवश्यकताएँ | दवाओं और खाद्य उत्पादन में गिरावट से स्वास्थ्य और पोषण पर सीधा असर पड़ता है। |
| ऊर्जा संकट | ईंधन की कमी से बिजली, परिवहन और जल आपूर्ति जैसी सेवाएँ बाधित होती हैं। |
| सर्वसम्मति का अभाव | 25 सदस्यों का मतदान से अनुपस्थित रहना दर्शाता है कि इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय मत पूरी तरह एकमत नहीं है। |
आगे की राह
- प्रस्ताव के मानवीय पहलू पर संवाद बढ़ाने के लिए संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों के माध्यम से दवा और खाद्य आपूर्ति की व्यवस्था पर चर्चा को प्रोत्साहित किया जाए।
- क्षेत्राधिकार-बाह्य कानूनों के विधिक पहलुओं पर अंतरराष्ट्रीय कानून के विशेषज्ञों के बीच संवाद को गहरा किया जाए।
- बहुपक्षीय मंचों पर संप्रभु समानता और गैर-हस्तक्षेप के सिद्धांतों को लेकर सर्वसम्मति बनाने के प्रयास जारी रखे जाएँ।
- संघर्ष-समाधान के लिए द्विपक्षीय और बहुपक्षीय राजनयिक चैनल सक्रिय रखे जाएँ, ताकि विवाद केवल प्रस्तावों तक सीमित न रहे।
- विकासशील देशों के लिए आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति सुनिश्चित करने हेतु अंतरराष्ट्रीय मानवीय तंत्र को सुदृढ़ किया जाए।
- वैश्विक व्यापार में अधिकार-क्षेत्र के टकराव से बचने के लिए नियम-आधारित व्यवस्था और पारस्परिक परामर्श की प्रक्रिया विकसित की जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
संयुक्त राष्ट्र महासभा (UN General Assembly) · आर्थिक, वाणिज्यिक एवं वित्तीय प्रतिबंध (Economic, Commercial and Financial Embargo) · एकपक्षीय प्रतिबंध (Unilateral Coercive Measures) · बाह्य-क्षेत्रीय प्रभाव (Extraterritorial Effect) · संप्रभु समानता (Sovereign Equality) · घरेलू अधिकार क्षेत्र (Domestic Jurisdiction) · गैर-बाध्यकारी प्रस्ताव (Non-binding Resolutions) · बहुपक्षवाद (Multilateralism) · अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) · मानवीय प्रभाव और आवश्यक सेवाएँ · राजनयिक नैतिकता (Diplomatic Morality) · संयुक्त राष्ट्र चार्टर (UN Charter)
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 51(ग): अंतरराष्ट्रीय कानून और संधि-दायित्वों का सम्मान
अवधारणा प्रवाह
1959 की क्रांति के बाद क्यूबा सोवियत संघ के निकट गया और अमेरिका ने व्यापार अवरोध लागू किए। → अवरोध से क्यूबा में ईंधन, दवा और खाद्य आपूर्ति प्रभावित हुई और ऊर्जा संकट गहराया। → क्यूबा ने इन उपायों को अपनी आर्थिक दुर्दशा का कारण बताते हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रस्ताव लाया। → महासभा में 130 देशों के पक्ष में मत से प्रस्ताव पारित हुआ, जो सिफारिशी और गैर-बाध्यकारी है। → भारत ने पक्ष में मत देकर संप्रभुता, बहुपक्षवाद और अंतरराष्ट्रीय कानून के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव सामान्यतः सदस्य राज्यों पर कानूनी रूप से बाध्यकारी होते हैं।
2. संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रत्येक सदस्य राज्य का एक ही मत होता है।
3. संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 10 के अंतर्गत महासभा चार्टर के दायरे में आने वाले किसी भी विषय पर सिफारिशें कर सकती है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 गलत है, क्योंकि महासभा के प्रस्ताव सामान्यतः सिफारिशी (Recommendatory) होते हैं, जबकि सुरक्षा परिषद के निर्णय अनुच्छेद 25 के अंतर्गत बाध्यकारी हैं। कथन 2 सही है, क्योंकि महासभा में ‘एक राज्य, एक मत’ का सिद्धांत लागू होता है। कथन 3 सही है, जो अनुच्छेद 10 की व्यवस्था है।
Q2. निम्नलिखित दो कथनों पर विचार कीजिए:
कथन (A): संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा क्यूबा पर अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंध समाप्त करने का प्रस्ताव अमेरिका पर कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है।
कारण (R): संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अंतर्गत महासभा के अधिकांश प्रस्ताव सिफारिशी स्वरूप के होते हैं और उनमें प्रवर्तन की शक्ति नहीं होती।
दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
- (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) का सही स्पष्टीकरण है।
- (A) और (R) दोनों सही हैं, परंतु (R), (A) का सही स्पष्टीकरण नहीं है।
- (A) सही है, परंतु (R) गलत है।
- (A) गलत है, परंतु (R) सही है।
उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) का सही स्पष्टीकरण है। — महासभा के प्रस्ताव सामान्यतः सिफारिशी होते हैं (अनुच्छेद 10 और 11), इसलिए किसी सदस्य पर उनका कानूनी बंधन नहीं होता। इसी कारण कारण (R) कथन (A) की सही व्याख्या करता है। प्रवर्तनीय निर्णय केवल सुरक्षा परिषद के अनुच्छेद 25 और अध्याय VII के अंतर्गत ही संभव हैं।
Q3. निम्नलिखित सूचियों का मिलान कीजिए:
सूची-I (विधि/प्रावधान)
1. ट्रेडिंग विद द एनिमी अधिनियम, 1917 (अमेरिका)
2. क्यूबन लिबर्टी एंड डेमोक्रेटिक सॉलिडैरिटी (लिबर्टाड) अधिनियम, 1996
3. संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 10
4. संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2(7)
सूची-II (विशेषता)
a. महासभा को चर्चा करने और सिफारिश करने की शक्ति
b. अमेरिकी क्यूबा प्रतिबंध का आधारभूत विधिक स्रोत
c. तीसरे देशों की कंपनियों पर भी लागू होने वाले बाह्य-क्षेत्रीय प्रतिबंध
d. संयुक्त राष्ट्र को सदस्य राज्यों के घरेलू मामलों में हस्तक्षेप से रोकना
सही मिलान चुनिए:
- 1-b, 2-c, 3-a, 4-d
- 1-c, 2-b, 3-d, 4-a
- 1-b, 2-d, 3-a, 4-c
- 1-a, 2-c, 3-b, 4-d
उत्तर: 1-b, 2-c, 3-a, 4-d — 1917 का अधिनियम अमेरिकी क्यूबा प्रतिबंध का मूल विधिक आधार है। 1996 का लिबर्टाड अधिनियम तीसरे देशों की कंपनियों पर भी प्रतिबंध लगाने की व्यवस्था रखता है। अनुच्छेद 10 महासभा को चर्चा और सिफारिश की शक्ति देता है, जबकि अनुच्छेद 2(7) संयुक्त राष्ट्र को घरेलू अधिकार क्षेत्र के मामलों में हस्तक्षेप से रोकता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ अमेरिका द्वारा क्यूबा पर लगाए गए आर्थिक, वाणिज्यिक एवं वित्तीय प्रतिबंध के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होते, फिर भी वे अंतरराष्ट्रीय विधि और राजनयिक नैतिकता के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस कथन के आलोक में महासभा के गैर-बाध्यकारी प्रस्तावों की वैधानिक सीमाओं और उनके राजनीतिक प्रभाव का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि एकपक्षीय प्रतिबंधों के बाह्य-क्षेत्रीय प्रभाव को अंतरराष्ट्रीय विधि के अंतर्गत किस सीमा तक वैध ठहराया जा सकता है। (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर की रूपरेखा:
(1) भूमिका: 193 सदस्यीय महासभा में 130 मत पक्ष में, 17 विपक्ष में और 25 तटस्थ रहे। प्रस्ताव का शीर्षक ‘आवश्यकता कि संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा क्यूबा पर लगाए गए आर्थिक, वाणिज्यिक एवं वित्तीय प्रतिबंध को समाप्त किया जाए’ है।
(2) महासभा के प्रस्तावों की विधिक स्थिति: अनुच्छेद 10 और 11 के अंतर्गत सिफारिशी शक्ति; अनुच्छेद 25 और अध्याय VII के अंतर्गत सुरक्षा परिषद के बाध्यकारी निर्णयों से अंतर; 1950 का ‘उनाइटिंग फॉर पीस’ प्रस्ताव (संकल्प 377) महासभा की भूमिका के विस्तार का उदाहरण।
(3) गैर-बाध्यकारी प्रस्तावों का प्रभाव: अंतरराष्ट्रीय प्रथागत विधि के निर्माण में योगदान; नैतिक और राजनयिक दबाव; लगातार मतदान का संचयी प्रभाव। सीमाएँ: प्रवर्तन का अभाव, अमेरिका जैसे राज्य का मतदान से असहमत रहना।
(4) बाह्य-क्षेत्रीय प्रभाव की वैधता: 1996 का लिबर्टाड अधिनियम (Title III और IV) तथा 1992 का क्यूबन डेमोक्रेसी अधिनियम (टोरिसेली अधिनियम); संप्रभु समानता (अनुच्छेद 2(1)) और घरेलू अधिकार क्षेत्र (अनुच्छेद 2(7)) के सिद्धांत। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का 1986 का निकारागुआ मामला (Military and Paramilitary Activities) जिसमें अमेरिकी व्यापार प्रतिबंधों को गैर-हस्तक्षेप के प्रथागत सिद्धांत के विरुद्ध माना गया था।
(5) संतुलित दृष्टिकोण: अमेरिकी पक्ष (संप्रभु नीतिगत विकल्प, राष्ट्रीय सुरक्षा और लोकतंत्र का तर्क) बनाम प्रस्ताव समर्थक पक्ष (मानवीय प्रभाव, विकास का अधिकार, समान संप्रभुता)। महासभा रिपोर्ट के अनुसार क्यूबा में आवश्यक दवाओं की लगभग 60 प्रतिशत से अधिक कमी और पाँच वर्षों में खाद्य उत्पादन में 50 प्रतिशत से अधिक गिरावट का उल्लेख।
(6) भारत का दृष्टिकोण: बहुपक्षवाद, संवाद और कूटनीति में आस्था, पंचशील और गुटनिरपेक्ष परंपरा के संदर्भ में संप्रभुता-आधारित विदेश नीति।
(7) निष्कर्ष: गैर-बाध्यकारी होते हुए भी महासभा प्रस्ताव नैतिक वैधता और अंतरराष्ट्रीय विधि-निर्माण के माध्यम के रूप में प्रासंगिक हैं; बाह्य-क्षेत्रीय प्रतिबंधों की वैधता पर विधिक बहस अभी भी खुली है।
स्रोत: orissapost.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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