22 Oct मुद्रास्फीति व्यापक हो रही है? आरबीआई के निर्णयकर्ताओं में मतभेद, चिंता का कारण
✎ मुद्रास्फीति का सामान्यीकरण तब माना जाता है जब मूल्य-वृद्धि खाद्य और ईंधन से आगे बढ़कर उपभोक्ता वस्तुओं और सेवाओं तक लगातार फैल जाए, और यही प्रवृत्ति मौद्रिक नीति के रुख को तय करने में निर्णायक होती है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था (मौद्रिक नीति, मुद्रास्फीति, वित्तीय संस्थाएँ)
- Prelims: मुद्रास्फीति का सामान्यीकरण (Generalisation of Inflation), रेपो दर (Repo Rate) और बेसिस पॉइंट (Basis Point), मौद्रिक नीति समिति (Monetary Policy Committee – MPC) की संरचना, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (Consumer Price Index – CPI), मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण: 4% लक्ष्य और ±2% सहनशीलता सीमा, मौद्रिक नीति का रुख: तटस्थ (Neutral) बनाम कैलिब्रेटेड सख्ती (Calibrated Tightening), RBI अधिनियम, 1934 की धारा 45ZA–45ZN (मौद्रिक नीति ढाँचा), कोर मुद्रास्फीति (Core Inflation)
- Essay: मुद्रास्फीति का फैलाव और मौद्रिक नीति की विश्वसनीयता, आपूर्ति-पक्षीय झटके और मूल्य-निर्धारण में मौद्रिक नीति की सीमाएँ
त्वरित पुनरावृत्ति: मुद्रास्फीति का सामान्यीकरण तब माना जाता है जब मूल्य-वृद्धि खाद्य और ईंधन से आगे बढ़कर उपभोक्ता वस्तुओं और सेवाओं तक लगातार फैल जाए, और यही प्रवृत्ति मौद्रिक नीति के रुख को तय करने में निर्णायक होती है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
भारतीय रिज़र्व बैंक (Reserve Bank of India – RBI) की छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति ने 7 अक्टूबर को सर्वसम्मति से रेपो दर में 25 बेसिस पॉइंट की वृद्धि कर उसे 5.5% किया। इसके साथ समिति के चार सदस्य नीतिगत रुख को ‘तटस्थ’ से ‘कैलिब्रेटेड सख्ती’ में बदलने के पक्ष में थे। समिति की 5-7 अक्टूबर की बैठक के कार्यवृत्त (Minutes) से स्पष्ट हुआ कि चार सदस्यों को लगता है कि मूल्य-दबाव उपभोक्ता टोकरी की अधिक से अधिक वस्तुओं और सेवाओं तक फैल रहा है, जबकि दो सदस्य इस निष्कर्ष से पूरी तरह सहमत नहीं थे। CPI मुद्रास्फीति अगस्त में 4.83% से बढ़कर सितंबर में 5.54% हो गई और जून से यह 4% के लक्ष्य से ऊपर बनी हुई है। इसलिए मुद्रास्फीति के सामान्यीकरण पर समिति की असहमति नीतिगत दृष्टि से महत्त्वपूर्ण मानी जा रही है।
पृष्ठभूमि
- RBI अधिनियम, 1934 में वर्ष 2016 के संशोधन के द्वारा मौद्रिक नीति समिति की स्थापना की गई, ताकि रेपो दर जैसे मौद्रिक निर्णय बहु-सदस्यीय प्रक्रिया से लिए जा सकें।
- सरकार और RBI के बीच हुए समझौते के अंतर्गत मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (Inflation Targeting) को अपनाया गया है, जिसमें CPI मुद्रास्फीति का लक्ष्य 4% तय है और उसकी सहनशीलता सीमा ±2% (अर्थात् 2% से 6%) है।
- मौद्रिक नीति के प्रभाव को अर्थव्यवस्था तक पहुँचाने के लिए रेपो दर में परिवर्तन बैंकों की ब्याज दरों और ऋण-मांग के माध्यम से काम करता है। इसे मौद्रिक संचरण (Monetary Transmission) कहा जाता है।
- पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के बाद ईंधन और ऊर्जा की कीमतों में आए उतार-चढ़ाव ने वैश्विक स्तर पर आपूर्ति-पक्षीय दबाव बढ़ाए हैं, जिससे मुद्रास्फीति की प्रकृति पर बहस तेज़ हुई है।
- समिति के निर्णय पारदर्शी होते हैं, इसलिए कार्यवृत्त के प्रकाशन से यह समझने में मदद मिलती है कि सदस्यों के बीच आकलन में कहाँ सहमति है और कहाँ मतभेद।
मुद्रास्फीति का सामान्यीकरण क्या है?
- सामान्यीकरण (Generalisation) का अर्थ है कि मूल्य-वृद्धि कुछ वस्तुओं तक सीमित न रहकर उपभोक्ता टोकरी की अनेक श्रेणियों में लगातार फैल जाए।
- प्रारंभिक चरण में मूल्य-वृद्धि आमतौर पर खाद्य और ईंधन जैसी अस्थिर श्रेणियों में दिखती है, जिन्हें आपूर्ति-झटके सबसे अधिक प्रभावित करते हैं।
- जब यह दबाव उपभोक्ता वस्तुओं (Consumer Goods) और सेवाओं जैसी अपेक्षाकृत स्थिर श्रेणियों तक पहुँचता है, तब मुद्रास्फीति के सामान्यीकरण का संकेत माना जाता है।
- सामान्यीकरण को मापने के लिए कोर मुद्रास्फीति (खाद्य और ईंधन को छोड़कर) तथा मूल्य-वृद्धि के विस्तार (Breadth) जैसे संकेतकों का उपयोग किया जाता है।
- सामान्यीकृत मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना अधिक कठिन होता है, क्योंकि मूल्य-अपेक्षाएँ (Inflation Expectations) स्वयं मजदूरी और कीमत-निर्धारण को प्रभावित करने लगती हैं।
- यदि मुद्रास्फीति स्थायी रूप से (Entrenched) बनी रहती है, तो मौद्रिक नीति को अधिक आक्रामक कदम उठाने पड़ सकते हैं, जिससे आर्थिक संवृद्धि पर दबाव बढ़ सकता है।
- RBI के लिए मुख्य चुनौती यह है कि वह मुद्रास्फीति को 4% लक्ष्य की ओर लाने के साथ-साथ आर्थिक संवृद्धि की गति को भी बनाए रखे।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| रेपो दर (Repo Rate) में वृद्धि | 7 अक्टूबर 2026 को मौद्रिक नीति समिति (Monetary Policy Committee – MPC) ने रेपो दर 25 आधार अंक (Basis Points) बढ़ाकर 5.5% की, जो सर्वसम्मति से लिया गया निर्णय था। |
| नीति रुख में बदलाव | रुख ‘तटस्थ’ (Neutral) से बदलकर ‘संयमित कसाव’ (Calibrated Tightening) किया गया। इसका अर्थ है कि मुद्रास्फीति पर नियंत्रण के लिए आगे और सख़्त मौद्रिक कदम संभव हैं। |
| मूल्य दबाव का सामान्यीकरण | मूल्य वृद्धि अब खाद्य और ईंधन तक सीमित न रहकर उपभोक्ता वस्तुओं और सेवाओं तक फैल रही है या नहीं, यह मुद्दा बैठक में केंद्रीय रहा। छह में से चार सदस्यों ने इस पर चिंता जताई। |
| उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (Consumer Price Index – CPI) आधारित मुद्रास्फीति | सितंबर 2026 में CPI मुद्रास्फीति बढ़कर 5.54% हुई, जो अगस्त के 4.83% से अधिक है। जून से यह मध्यम-अवधि लक्ष्य 4% से ऊपर बनी हुई है। |
| सदस्यों के बीच मतभेद | दो सदस्यों ने सामान्यीकरण के सीमित संकेत देखे, जिससे समिति का समग्र स्वर कुछ नरम पड़ा। इसका प्रभाव ब्याज दर वृद्धि की मात्रा पर भी पड़ता है। |
| मौद्रिक नीति की प्रभावशीलता | यदि मूल्य दबाव व्यापक हो जाए, तो मुद्रास्फीति को लक्ष्य तक लाने के लिए अधिक समय और कठोर नीति की आवश्यकता पड़ सकती है। |
महत्व
आर्थिक
- मुद्रास्फीति का सामान्यीकरण उपभोग-आधारित मांग और मज़दूरी-मूल्य चक्र को सक्रिय कर सकता है, जिससे मूल्य वृद्धि स्थायी रूप ले सकती है।
- यदि मूल्य वृद्धि केवल अस्थायी आपूर्ति-झटकों तक सीमित हो, तो नीति को अनावश्यक रूप से कसना आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) पर दबाव डाल सकता है। इसलिए निर्णय का संतुलन महत्वपूर्ण है।
- ब्याज दर में वृद्धि का असर ऋण की लागत, निवेश और उपभोग पर धीरे-धीरे पहुँचता है, जिसे मौद्रिक संचरण (Monetary Transmission) कहा जाता है।
मौद्रिक एवं संस्थागत
- मौद्रिक नीति समिति के भीतर मतभेद यह दर्शाते हैं कि बहु-सदस्यीय निर्णय-प्रक्रिया में पारदर्शिता और कार्यवृत्त (Minutes) का प्रकाशन जनता को नीति की तर्क-शृंखला समझने में सहायता करता है।
- रुख में परिवर्तन भविष्य की नीति-दिशा का संकेत देता है, इसलिए बाज़ार और आर्थिक एजेंट इसे गंभीरता से लेते हैं।
सामाजिक
- व्यापक मूल्य वृद्धि निम्न और मध्य आय वर्ग के वास्तविक क्रय-शक्ति पर सबसे अधिक असर डालती है।
- खाद्येतर वस्तुओं और सेवाओं में मूल्य वृद्धि परिवार के मासिक बजट की संरचना को भी प्रभावित करती है।
चुनौतियाँ
1. मूल्य दबाव का सामान्यीकरण पहचानना
- खाद्य और ईंधन के अलावा अन्य श्रेणियों में मूल्य वृद्धि का सटीक मापन कठिन है, क्योंकि प्रभाव धीरे-धीरे फैलता है।
- मूल प्रभाव (Base Effect), मौसमी कारक और आपूर्ति-झटके एक साथ काम करते हैं, इसलिए स्थायी रुझान अलग करना चुनौतीपूर्ण है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: मुद्रास्फीति और मौद्रिक नीति
2. पश्चिम एशिया संघर्ष से ऊर्जा और कमोडिटी कीमतों का प्रभाव
- ईंधन और कच्चे माल की कीमतों में वैश्विक उतार-चढ़ाव आयातित मुद्रास्फीति (Imported Inflation) को बढ़ाता है।
- लागत-दबाव धीरे-धीरे परिवहन, उत्पादन और सेवाओं की कीमतों तक पहुँचते हैं, जिससे नीति के लिए समय-सीमा अनिश्चित हो जाती है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: वैश्विक कारकों का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
3. मध्यम-अवधि लक्ष्य की ओर वापसी में कठिनाई
- CPI मुद्रास्फीति जून से 4% के मध्यम-अवधि लक्ष्य से ऊपर है और अक्टूबर में 6% पार करने का अनुमान है।
- लक्ष्य पर वापसी के लिए नीति को कसे रखना पड़ सकता है, जिससे ऋण की लागत बढ़ने का जोखिम रहता है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: मौद्रिक नीति ढाँचा और मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण
4. सदस्यों के बीच आकलन में मतभेद
- दो सदस्यों के कम चिंतित होने से समिति का समग्र संदेश कुछ कमज़ोर दिखता है, जिससे बाज़ार में अनिश्चितता बढ़ सकती है।
- ब्याज दर वृद्धि की मात्रा पर सहमति न होने से नीति-संकेत की स्पष्टता प्रभावित होती है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: संवैधानिक एवं वैधानिक निकाय तथा उनकी निर्णय-प्रक्रिया
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| मूल्य वृद्धि का फैलाव | खाद्य और ईंधन से आगे बढ़कर उपभोक्ता वस्तुओं और सेवाओं में मूल्य वृद्धि स्थायी होने का खतरा। |
| बाह्य आपूर्ति-झटके | पश्चिम एशिया संघर्ष से ऊर्जा और कमोडिटी कीमतों में अस्थिरता। |
| मौद्रिक नीति की समय-सीमा | मुद्रास्फीति को 4% लक्ष्य तक लाने में समय लग सकता है और ब्याज दरें लंबे समय तक ऊँची रह सकती हैं। |
| विकास बनाम स्थिरता | अधिक कसाव से आर्थिक संवृद्धि धीमी हो सकती है, जबकि ढील देने से मुद्रास्फीति बढ़ सकती है। |
| समिति में मतभेद | सदस्यों के आकलन में विभाजन से नीति-संदेश की स्पष्टता और विश्वसनीयता पर प्रभाव। |
आगे की राह
- मूल्य वृद्धि के सामान्यीकरण को मापने के लिए कोर मुद्रास्फीति (Core Inflation) और सेवा-मूल्य सूचकांक जैसे संकेतकों की नियमित निगरानी की जाए।
- आपूर्ति-पक्ष उपायों, जैसे खाद्य भंडारण, परिवहन और आयात-प्रबंधन, के माध्यम से अस्थायी झटकों का प्रभाव सीमित किया जाए।
- मौद्रिक नीति और राजकोषीय नीति के बीच समन्वय बनाए रखा जाए, ताकि मांग-पक्ष का दबाव नियंत्रित रहे।
- मौद्रिक संचरण को सुदृढ़ करने के लिए ऋण बाज़ार में प्रतिस्पर्धा और बैंकों की ब्याज दर-निर्धारण प्रक्रिया पर ध्यान दिया जाए।
- मुद्रास्फीति-अपेक्षाओं (Inflation Expectations) को स्थिर रखने के लिए नीति-संचार को स्पष्ट और नियमित रखा जाए।
- मौद्रिक नीति समिति के कार्यवृत्त का समय पर प्रकाशन जारी रहे, ताकि नीति के तर्क और सदस्यों के मतभेद सार्वजनिक रूप से समझे जा सकें।
- वैश्विक ऊर्जा और कमोडिटी बाज़ारों की निगरानी कर आयातित मुद्रास्फीति के संभावित प्रभाव का पूर्वानुमान लगाया जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
मुद्रास्फीति सामान्यीकरण · मौद्रिक नीति समिति · रेपो दर · उपभोक्ता मूल्य सूचकांक · भारतीय रिजर्व बैंक · मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण · राजकोषीय नीति · मुद्रास्फीति के कारण · आपूर्ति-पक्ष के झटके · मांग-पक्ष के कारक · आर्थिक स्थिरता · ब्याज दरें
अवधारणा प्रवाह
पश्चिम एशिया संघर्ष से ईंधन और कमोडिटी कीमतों में वृद्धि (आपूर्ति-पक्ष झटका) → खाद्य और ईंधन से आगे बढ़कर उपभोक्ता वस्तुओं और सेवाओं में मूल्य वृद्धि का फैलाव (मुद्रास्फीति का सामान्यीकरण) → CPI मुद्रास्फीति का 4% मध्यम-अवधि लक्ष्य से ऊपर पहुँचना (सितंबर 2026 में 5.54%) → मौद्रिक नीति समिति में सदस्यों का आकलन बँटना: चार सदस्य चिंतित, दो कम चिंतित → 7 अक्टूबर 2026 को रेपो दर 25 आधार अंक बढ़ाकर 5.5% और रुख ‘संयमित कसाव’ में बदला गया → मौद्रिक संचरण के माध्यम से ऋण और ब्याज दरों पर असर, जिससे मांग और मुद्रास्फीति पर नियंत्रण का प्रयास
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) में छह सदस्य होते हैं, जिनमें से तीन RBI के अधिकारी होते हैं और तीन केंद्र सरकार द्वारा नामित बाहरी सदस्य होते हैं।
2. MPC का प्राथमिक उद्देश्य आर्थिक संवृद्धि को बढ़ावा देना है, जबकि मूल्य स्थिरता एक द्वितीयक लक्ष्य है।
3. रेपो दर में वृद्धि से अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति कम हो सकती है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। MPC में छह सदस्य होते हैं: RBI गवर्नर (पदेन अध्यक्ष), एक डिप्टी गवर्नर, एक RBI अधिकारी, और तीन बाहरी सदस्य। कथन 2 गलत है। MPC का प्राथमिक उद्देश्य मूल्य स्थिरता बनाए रखना है, जबकि संवृद्धि को ध्यान में रखना एक द्वितीयक लक्ष्य है। कथन 3 सही है। रेपो दर में वृद्धि से बैंकों के लिए RBI से उधार लेना महंगा हो जाता है, जिससे वे आगे ऋण महंगा करते हैं, जिससे मुद्रा आपूर्ति कम होती है।
Q2. मुद्रास्फीति के सामान्यीकरण (Generalisation of Inflation) के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा कथन सबसे सटीक रूप से इसकी व्याख्या करता है?
- यह केवल खाद्य और ईंधन जैसी वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि को संदर्भित करता है।
- यह तब होता है जब मुद्रास्फीति की दर एक निश्चित सीमा से ऊपर बनी रहती है।
- यह उच्च कीमतों का विभिन्न प्रकार की वस्तुओं और सेवाओं में स्थायी रूप से फैलना है, जो आमतौर पर खाद्य और ईंधन से उपभोक्ता वस्तुओं और सेवाओं तक जाता है।
- यह सरकार द्वारा निर्धारित मुद्रास्फीति लक्ष्य को प्राप्त करने में विफलता है।
- यह तब होता है जब मुद्रास्फीति की दर एक निश्चित सीमा से ऊपर बनी रहती है।
उत्तर: यह उच्च कीमतों का विभिन्न प्रकार की वस्तुओं और सेवाओं में स्थायी रूप से फैलना है, जो आमतौर पर खाद्य और ईंधन से उपभोक्ता वस्तुओं और सेवाओं तक जाता है। — मुद्रास्फीति का सामान्यीकरण उच्च कीमतों का एक स्थायी तरीके से विभिन्न प्रकार की वस्तुओं और सेवाओं में फैलना है। यह आमतौर पर उन वस्तुओं से शुरू होता है जो मूल्य वृद्धि के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील होती हैं, जैसे कि खाद्य और ईंधन, और फिर उपभोक्ता वस्तुओं और सेवाओं जैसी अन्य श्रेणियों में फैल जाता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ हाल ही में मौद्रिक नीति समिति (MPC) के सदस्यों के बीच मुद्रास्फीति के सामान्यीकरण पर मतभेद देखे गए हैं। मुद्रास्फीति के सामान्यीकरण से आप क्या समझते हैं? भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसके संभावित प्रभावों का विश्लेषण करें और इसे नियंत्रित करने के लिए मौद्रिक नीति के समक्ष चुनौतियों की चर्चा करें। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** मुद्रास्फीति के सामान्यीकरण की संक्षिप्त परिभाषा दें और हाल ही में मौद्रिक नीति समिति (MPC) में इस पर मतभेद का उल्लेख करें।
2. **मुद्रास्फीति का सामान्यीकरण:** इसकी विस्तृत व्याख्या करें – यह कैसे खाद्य और ईंधन जैसी अस्थिर वस्तुओं से उपभोक्ता वस्तुओं और सेवाओं जैसी व्यापक श्रेणियों में फैलता है, और यह कैसे एक स्थायी मूल्य वृद्धि का संकेत देता है।
3. **भारतीय अर्थव्यवस्था पर संभावित प्रभाव:**
* **क्रय शक्ति में कमी:** उपभोक्ताओं की वास्तविक आय पर प्रभाव।
* **निवेश और संवृद्धि पर प्रभाव:** अनिश्चितता के कारण निवेश में कमी।
* **निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता:** उच्च उत्पादन लागत के कारण निर्यात पर नकारात्मक प्रभाव।
* **आय असमानता:** निश्चित आय वर्ग और गरीब तबके पर अधिक बोझ।
* **वित्तीय स्थिरता:** ब्याज दरों में वृद्धि से ऋण लागत में वृद्धि और NPA की संभावना।
4. **मौद्रिक नीति के समक्ष चुनौतियाँ:**
* **नीतिगत प्रतिक्रिया की जटिलता:** सामान्यीकृत मुद्रास्फीति से निपटने के लिए अधिक कठोर उपायों की आवश्यकता।
* **संवृद्धि-मुद्रास्फीति दुविधा:** संवृद्धि को प्रभावित किए बिना मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने की चुनौती।
* **आपूर्ति-पक्ष के झटके:** मौद्रिक नीति के दायरे से बाहर के कारकों (जैसे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला व्यवधान, भू-राजनीतिक तनाव) से उत्पन्न मुद्रास्फीति।
* **अपेक्षाओं का प्रबंधन:** जनता और बाजार की मुद्रास्फीति संबंधी अपेक्षाओं को स्थिर रखना।
* **MPC के भीतर मतभेद:** नीतिगत निर्णयों में एकरूपता की कमी का जोखिम।
5. **निष्कर्ष:** संक्षेप में बताएं कि सामान्यीकृत मुद्रास्फीति एक गंभीर चुनौती है जिसके लिए संतुलित और समय पर मौद्रिक नीति प्रतिक्रिया की आवश्यकता है, साथ ही राजकोषीय नीति के साथ समन्वय भी महत्वपूर्ण है।
स्रोत: The Indian Express
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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