30 Oct कर्नाटक उच्च न्यायालय ने विकलांग व्यक्ति को आवंटित करने के आदेश को किया निरस्त
✎ दिव्यांगता की श्रेणी में होना भूखंड आवंटन का स्वतः अधिकार नहीं है; आरक्षण का लाभ केवल निर्धारित प्रक्रिया में वैध आवेदन करने वाले पात्र व्यक्ति को मिलता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — राज्यव्यवस्था: न्यायपालिका (अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रिट अधिकारिता और न्यायिक समीक्षा) | GS Paper II — सामाजिक न्याय: दिव्यांगजनों के अधिकार और उनके लिए आरक्षण व्यवस्था | GS Paper II — शासन: वैधानिक निकाय, प्रशासनिक प्राधिकरण और सार्वजनिक भूमि आवंटन की प्रक्रिया
- Prelims: दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (Rights of Persons with Disabilities Act, 2016), बेंचमार्क दिव्यांगता (Benchmark Disability) और 21 दिव्यांगता श्रेणियाँ, अनुच्छेद 226 (Article 226): उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता, न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) और रिट के प्रकार, नगर विकास प्राधिकरण (Urban Development Authority) और उसके द्वारा भूखंड आवंटन, कर्नाटक नगर विकास प्राधिकरण नियम, 1991 (Karnataka Urban Development Authorities Rules, 1991), राज्य दिव्यांगजन आयुक्त (State Commissioner for Persons with Disabilities), दिव्यांगजन सशक्तीकरण विभाग और दिव्यांगजनों के लिए आरक्षण (क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर)
- Essay: अधिकार और प्रक्रिया: पात्रता का अधिकार बनाम विधिक प्रक्रिया का पालन, सामाजिक न्याय की संवैधानिक दृष्टि में दिव्यांगजनों के लिए समान अवसर और सकारात्मक विभेद की सीमाएँ
त्वरित पुनरावृत्ति: दिव्यांगता की श्रेणी में होना भूखंड आवंटन का स्वतः अधिकार नहीं है; आरक्षण का लाभ केवल निर्धारित प्रक्रिया में वैध आवेदन करने वाले पात्र व्यक्ति को मिलता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने राज्य दिव्यांगजन आयुक्त के उस आदेश को निरस्त कर दिया है, जिसमें मैसूरु नगर विकास प्राधिकरण (Mandya Urban Development Authority — MUDA) को एक दिव्यांगजन को भूखंड आवंटित करने का निर्देश दिया गया था। संबंधित व्यक्ति ने 2007 में आवंटन के लिए पंजीकरण कराया था, परंतु उसने किसी सार्वजनिक अधिसूचना के अंतर्गत निर्धारित प्रपत्र में आवेदन नहीं किया था। न्यायमूर्ति सूरज गोविंदराज ने स्पष्ट किया कि केवल दिव्यांगता की श्रेणी में आना स्वतः भूखंड पाने का अधिकार नहीं देता। कर्नाटक नगर विकास प्राधिकरण नियम, 1991 के अनुसार, नामात्र शुल्क पर किया गया पंजीकरण वैध आवेदन नहीं माना जाएगा। न्यायालय ने व्यक्ति को भविष्य में आमंत्रित आवेदनों में प्रक्रिया के अनुसार आवेदन करने की छूट दी तथा वरिष्ठता (seniority) का लाभ देने का निर्देश दिया।
पृष्ठभूमि
- दिव्यांगजनों के लिए आरक्षण की व्यवस्था सामाजिक न्याय और समान अवसर की संवैधानिक भावना से जुड़ी है। अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) इसके प्रमुख आधार हैं।
- भारत ने संयुक्त राष्ट्र दिव्यांगजन अधिकार अभिसमय (UN Convention on the Rights of Persons with Disabilities — UNCRPD) की पुष्टि की है, जिसके बाद देश में दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 लागू हुआ। इसने पूर्ववर्ती अधिनियम, 1995 का स्थान लिया।
- राज्यों में नगर विकास प्राधिकरण भूमि अधिग्रहण, योजना निर्माण और भूखंड आवंटन का कार्य करते हैं। इनके आवंटन प्रायः सार्वजनिक अधिसूचना, आवेदन, जमा राशि और लॉटरी जैसी प्रक्रियाओं से होते हैं।
- प्रस्तुत मामले में प्राधिकरण ने 2002 में लगभग 2,100 भूखंडों के आवंटन हेतु आवेदन आमंत्रित किए थे, जिनमें 2 प्रतिशत (42 भूखंड) दिव्यांगजनों के लिए आरक्षित थे। इनमें से केवल 11 दिव्यांगजनों ने आवेदन किया और उन्हें भूखंड आवंटित हुए।
- 2002 के बाद से प्राधिकरण ने भूखंड आवंटन के लिए आवेदन नहीं मंगाए हैं, क्योंकि लॉटरी आधारित आवंटन की कथित अनियमितताओं की जाँच लंबित है। इसी संदर्भ में न्यायालय ने भविष्य के आवंटन में आवेदन की प्रक्रिया पर बल दिया।
भूखंड आवंटन में दिव्यांगजनों का आरक्षण और विधिक प्रक्रिया क्या है?
- आरक्षण केवल पात्र आवेदकों के बीच लागू होता है: आरक्षित कोटा तभी प्रभावी होता है जब आवेदन प्रक्रिया के अंतर्गत आवेदन आमंत्रित किए गए हों और आवेदक ने निर्धारित प्रपत्र व जमा राशि के साथ आवेदन किया हो।
- पंजीकरण और आवेदन में अंतर: नामात्र शुल्क पर किया गया पंजीकरण सामान्यतः भविष्य की सूचना के लिए होता है, जबकि भूखंड का अधिकार आवेदन की वैध प्रक्रिया पूरी होने पर बनता है।
- दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के अंतर्गत दिव्यांगता की परिभाषा में 21 श्रेणियाँ शामिल हैं, जिनमें चलन-संबंधी दिव्यांगता (Locomotor Disability) भी है। किसी व्यक्ति का दिव्यांगजन होना सरकारी लाभ की पात्रता का आधार है, परंतु उसकी प्रक्रियागत बाध्यताएँ समाप्त नहीं करता।
- रिट अधिकारिता (Writ Jurisdiction): संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय मौलिक तथा अन्य विधिक अधिकारों के प्रवर्तन हेतु रिट जारी कर सकता है और अधीनस्थ प्राधिकारियों या अर्ध-न्यायिक निकायों के आदेशों की वैधता की समीक्षा कर सकता है।
- न्यायिक समीक्षा का दायरा: न्यायालय यह देखता है कि आदेश विधि के अनुरूप है या नहीं, क्षेत्राधिकार का अतिक्रमण तो नहीं हुआ, और क्या संबंधित नियमों का पालन किया गया। वह नीतिगत विवेक के स्थान पर स्वयं निर्णय नहीं देता।
- सकारात्मक विभेद और प्रक्रियात्मक न्याय में संतुलन आवश्यक है: दिव्यांगजनों के लिए विशेष प्रावधान अनुच्छेद 15 और 16 में निहित सकारात्मक विभेद की भावना से जुड़े हैं, किंतु सभी लाभार्थियों के लिए समान और पारदर्शी प्रक्रिया भी उतनी ही आवश्यक है।
- राज्य दिव्यांगजन आयुक्त दिव्यांगजनों के अधिकारों की निगरानी और शिकायत निवारण के लिए उत्तरदायी है। उसके आदेश का कानूनी दायरा उसी सीमा तक है, जो अधिनियम और लागू नियमों द्वारा निर्धारित है।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| न्यायालय का निर्णय | राज्य दिव्यांगजन आयुक्त का 8 अगस्त 2013 का आदेश उच्च न्यायालय ने निरस्त किया। दिव्यांगता होने मात्र से स्थल आवंटन का स्वतः अधिकार नहीं मिलता। |
| नियामक आधार | कर्नाटक नगर विकास प्राधिकरण नियम, 1991 के अंतर्गत प्राधिकरण की सार्वजनिक अधिसूचना के उत्तर में निर्धारित प्रपत्र में आवेदन और न्यूनतम जमा राशि अनिवार्य है। |
| पंजीकरण बनाम आवेदन | नाममात्र शुल्क पर किया गया पंजीकरण वैध आवेदन नहीं माना गया। दिव्यांगजन सहित हर पंजीकृत व्यक्ति को आवंटन के लिए अलग से आवेदन करना होगा। |
| आरक्षित कोटा की स्थिति | वर्ष 2002 की योजना में लगभग 2,100 स्थलों में से 2% (42 स्थल) दिव्यांगजन वर्ग के लिए आरक्षित थे, जबकि केवल 11 स्थलों का आवंटन हुआ। |
| भविष्य के लिए राहत | याचिकाकर्ता को भविष्य में आवेदन आमंत्रित होने पर निर्धारित प्रपत्र में आवेदन करने की छूट मिली तथा वरिष्ठता का लाभ देने का निर्देश दिया गया। |
महत्व
कानूनी और न्यायिक
- प्रक्रिया-सम्मत आवंटन पर बल: न्यायालय ने यह स्थापित किया कि पात्रता और आवेदन, दोनों अलग शर्तें हैं और दोनों का पालन आवश्यक है।
- न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) का प्रयोग: उच्च न्यायालय ने अर्ध-न्यायिक निकाय के आदेश की वैधता की जाँच करके उसे निरस्त किया, जो संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रिट क्षेत्राधिकार की व्याख्या का उदाहरण है।
- पंजीकरण और आवेदन में अंतर स्पष्ट होने से भविष्य के ऐसे विवादों में नियमों की व्याख्या का मार्गदर्शन मिलता है।
दिव्यांगजन अधिकार और कल्याण
- दिव्यांगजन के लिए आरक्षित कोटा का अस्तित्व बना रहा; न्यायालय ने आरक्षण को समाप्त नहीं किया, बल्कि उसे नियमों के अनुरूप लागू करने की बात कही।
- वरिष्ठता का लाभ और भविष्य में आवेदन की छूट से यह संतुलन दिखता है कि अधिकार की रक्षा और प्रक्रिया की पालना, दोनों साथ चल सकते हैं।
- दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (Rights of Persons with Disabilities Act, 2016) के अंतर्गत राज्य स्तर पर बने आयुक्त की भूमिका शिकायत-निवारण की है, जबकि आवंटन की प्रक्रिया नगर विकास प्राधिकरणों के नियमों से तय होती है।
शासन और पारदर्शिता
- लॉटरी के माध्यम से हुए स्थल आवंटन में अनियमितता की लंबित जाँच ने प्रशासनिक निर्णयों में पारदर्शिता के महत्व को रेखांकित किया।
- सार्वजनिक अधिसूचना और निर्धारित प्रपत्र प्रणाली से आवंटन में समान अवसर सुनिश्चित होता है।
- नगरीय भूमि प्रबंधन में जवाबदेही तब तक कठिन रहती है जब तक प्रक्रिया, समय-सीमा और रिकॉर्ड सार्वजनिक रूप से उपलब्ध न हों।
संस्थागत संबंध
- वैधानिक आयोग की शक्तियों की सीमा: शिकायत-निवारण की भूमिका और कार्यकारी प्रक्रिया के बीच की रेखा इस निर्णय में स्पष्ट हुई।
- न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच संतुलन: न्यायालय ने प्राधिकरण को निर्देश तो दिए, पर बिना आवेदन के सीधा आवंटन नहीं कराया।
चुनौतियाँ
1. पंजीकरण और आवेदन के बीच भ्रम
- नाममात्र शुल्क पर पंजीकरण को लोग आवंटन की स्वचालित पात्रता मान लेते हैं, जिससे विवाद बढ़ते हैं।
- निर्धारित प्रपत्र, न्यूनतम जमा राशि और समय-सीमा की जानकारी आम नागरिकों तक सीमित पहुँच में रहती है।
- दिव्यांगजन के लिए सुलभ सूचना-प्रणाली (जैसे सुलभ प्रपत्र और सहायता केंद्र) का अभाव प्रक्रियागत बाधा बनता है।
यूपीएससी लिंक: सुशासन में सेवा-वितरण की पारदर्शिता और नागरिक-केंद्रित प्रशासन (शासन एवं प्रशासन)
2. आरक्षित कोटे के उपयोग में कमी
- 2002 में 42 आरक्षित स्थलों में से केवल 11 का आवंटन हुआ, जिससे आरक्षण की वास्तविक उपयोगिता पर प्रश्न उठता है।
- आरक्षित स्थलों की संख्या और माँग के बीच तालमेल न होने से लाभार्थियों तक पहुँच सीमित रहती है।
- आवेदन-प्रक्रिया की जटिलता और जागरूकता की कमी आरक्षण के प्रभावी क्रियान्वयन में बाधक है।
यूपीएससी लिंक: दिव्यांगजन कल्याण और सामाजिक न्याय हेतु नीतियों का क्रियान्वयन (सामाजिक न्याय)
3. लंबित जाँच से प्रशासनिक ठहराव
- लॉटरी से आवंटन में अनियमितता की जाँच लंबित होने के कारण 2002 से नए आवेदन आमंत्रित नहीं किए गए।
- इससे सभी वर्गों के आवेदकों, विशेषकर दिव्यांगजन, के लिए दीर्घ प्रतीक्षा और अनिश्चितता बनी रहती है।
- जाँच और प्रशासनिक सुधार को समानांतर चलाने की व्यवस्था न होने से शासन की गति प्रभावित होती है।
यूपीएससी लिंक: प्रशासनिक सुधार, भ्रष्टाचार-निरोध तंत्र और जवाबदेही (शासन एवं प्रशासन)
4. अर्ध-न्यायिक आदेशों की वैधता का प्रश्न
- राज्य आयुक्त का आदेश 2013 में आया और उसकी वैधता पर उच्च न्यायालय में वर्षों बाद निर्णय हुआ, जिससे विलंब की समस्या उजागर होती है।
- आयोग का आदेश यदि नियमों और प्रक्रिया से परे हो, तो उसे न्यायिक समीक्षा में निरस्त किया जा सकता है।
- शिकायत-निवारण और प्रशासनिक निर्णय की सीमाओं को स्पष्ट रखना आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: संवैधानिक और सांविधिक निकाय, न्यायिक समीक्षा और न्यायपालिका-कार्यपालिका संबंध (राजव्यवस्था)
5. नगरीय भूमि आवंटन में पारदर्शिता
- लॉटरी आधारित आवंटन में पारदर्शिता, निष्पक्षता और रिकॉर्ड-प्रबंधन की चुनौतियाँ बनी रहती हैं।
- आवंटन के नियम, समय-सारिणी और परिणाम सार्वजनिक न होने पर विवाद और मुकदमेबाजी बढ़ती है।
- नगर नियोजन में भूमि की उपलब्धता और माँग का सही आकलन आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: नगरीय शासन, भूमि प्रबंधन और शहरी विकास प्राधिकरणों की भूमिका (शासन एवं प्रशासन)
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| पंजीकरण बनाम आवेदन | पंजीकरण को स्वतः पात्रता मानने से प्रक्रिया-उल्लंघन और विवाद बढ़ते हैं। |
| आरक्षित कोटे का कम उपयोग | 42 आरक्षित स्थलों में से केवल 11 आवंटित होने से नीति का वास्तविक लाभ सीमित रहा। |
| प्रशासनिक ठहराव | 2002 से आवेदन आमंत्रित न होने से नए आवंटन की प्रक्रिया रुकी हुई है। |
| लॉटरी में अनियमितता का आरोप | लंबित जाँच के कारण पारदर्शी और समयबद्ध आवंटन की संभावना कम रही। |
| निर्णय में विलंब | 2013 के आदेश पर उच्च न्यायालय का निर्णय वर्षों बाद आने से पक्षकारों को अनिश्चितता झेलनी पड़ी। |
आगे की राह
- सार्वजनिक अधिसूचना में प्रति स्थल श्रेणी, आरक्षित संख्या, आवेदन की अंतिम तिथि और न्यूनतम जमा राशि स्पष्ट रूप से दी जाए।
- पंजीकरण और आवेदन की प्रक्रिया को अलग-अलग चरणों में बाँटकर उपयोगकर्ता को प्रत्येक चरण की स्थिति ऑनलाइन दिखाई जाए।
- दिव्यांगजन वर्ग के लिए आवेदन-प्रपत्र, सहायता केंद्र और सुलभ सूचना उपलब्ध कराई जाए, ताकि आरक्षित कोटे का वास्तविक उपयोग बढ़े।
- लॉटरी से आवंटन की जाँच को समयबद्ध किया जाए और उसके समानांतर पारदर्शी नियम बनाकर नए आवंटन की प्रक्रिया फिर से शुरू की जाए।
- वरिष्ठता सूची और आवंटन-रिकॉर्ड को डिजिटल रूप में सुरक्षित रखा जाए, ताकि भविष्य के विवादों में स्पष्ट साक्ष्य उपलब्ध हों।
- राज्य आयुक्त के आदेशों के क्रियान्वयन से पहले प्रक्रियागत पात्रता की जाँच की व्यवस्था हो, ताकि अनावश्यक मुकदमेबाजी से बचा जा सके।
- प्राधिकरणों में शिकायत-निवारण और अपील की स्पष्ट व्यवस्था हो, जिससे विवाद न्यायालय तक पहुँचने से पहले सुलझ सकें।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
दिव्यांगजन अधिकार (Rights of Persons with Disabilities) · राज्य दिव्यांगजन आयोग (State Commission for Persons with Disabilities) · नगर विकास प्राधिकरण (Urban Development Authority) · न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) · रिट क्षेत्राधिकार (Writ Jurisdiction) · अनुच्छेद 226 (Article 226) · प्रक्रियात्मक न्याय (Procedural Justice) · वैधानिक नियम (Statutory Rules) · विधिक अपेक्षा (Legitimate Expectation) · सकारात्मक कार्रवाई (Affirmative Action) · आरक्षण (Reservation) · सारभूत समानता (Substantive Equality) · राज्य सेवा में समान अवसर (Equality of Opportunity) · दिव्यांगता अधिकार अधिनियम, 2016 (Rights of Persons with Disabilities Act, 2016)
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 14 — प्रक्रिया-सम्मत आवंटन और मनमानेपन का निषेध
- अनुच्छेद 226 — उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार, आदेश निरस्त
अवधारणा प्रवाह
2002 में मांड्या नगर विकास प्राधिकरण (MUDA) ने लगभग 2,100 स्थलों के आवंटन हेतु सार्वजनिक अधिसूचना जारी की। → दिव्यांगजन वर्ग के लिए 2% (42 स्थल) आरक्षित किए गए, किंतु केवल 11 स्थलों का आवंटन हुआ। → शिकायतकर्ता ने 2007 में केवल पंजीकरण कराया, निर्धारित अवधि में आवेदन नहीं किया। → राज्य दिव्यांगजन आयुक्त ने 8 अगस्त 2013 को आवंटन का आदेश दिया। → MUDA ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर आदेश को चुनौती दी; नियमों के आधार पर सुनवाई हुई। → उच्च न्यायालय ने आदेश निरस्त किया, किंतु भविष्य में आवेदन की छूट और वरिष्ठता का लाभ देने का निर्देश दिया।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के अंतर्गत ‘मानक दिव्यांगता’ (Benchmark Disability) को न्यूनतम 40 प्रतिशत दिव्यांगता के रूप में परिभाषित किया गया है।
2. उच्च न्यायालय, अनुच्छेद 226 के अंतर्गत अपने क्षेत्राधिकार में आने वाले किसी प्राधिकारी के विधिविरुद्ध आदेश को रिट द्वारा रद्द कर सकता है।
3. राज्य दिव्यांगजन आयुक्त की नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा की जाती है और वह केंद्र के प्रति ही उत्तरदायी होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: मानक दिव्यांगता की परिभाषा में न्यूनतम 40 प्रतिशत दिव्यांगता का प्रावधान है। कथन 2 सही है: उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 के अंतर्गत अपने क्षेत्राधिकार में विधिविरुद्ध आदेशों के विरुद्ध रिट जारी कर सकता है। कथन 3 गलत है: राज्य आयुक्त की नियुक्ति संबंधित राज्य सरकार करती है और वह राज्य सरकार के प्रति उत्तरदायी होता है। अतः सही उत्तर ‘केवल दो’ है।
Q2. निम्नलिखित दो कथनों को ध्यान से पढ़िए:
कथन (A): किसी राज्य दिव्यांगजन आयोग का वह आदेश, जो किसी व्यक्ति को ऐसे भूखंड के आवंटन का निर्देश देता है जिसके लिए उसने विहित प्रक्रिया के अंतर्गत आवेदन नहीं किया है, न्यायालय द्वारा रद्द किया जा सकता है।
कारण (R): दिव्यांगता का प्रमाण होना अपने-आप में विहित प्रक्रिया का पालन किए बिना किसी आवंटन का वैधानिक अधिकार नहीं देता।
सही विकल्प चुनिए:
- (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
- (A) और (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
- (A) सही है, किंतु (R) गलत है।
- (A) गलत है, किंतु (R) सही है।
उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — दिव्यांगता होना आवेदन की प्रक्रिया के स्थान पर स्वतः अधिकार नहीं देता, इसलिए विहित प्रक्रिया के बिना दिया गया आवंटन आदेश वैधानिक रूप से टिकाऊ नहीं होता। कारण इसी तर्क को पूरी तरह स्पष्ट करता है, अतः (R) ही (A) की सही व्याख्या है।
Q3. दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के अंतर्गत सरकारी प्रतिष्ठानों में मानक दिव्यांगता वाले व्यक्तियों के लिए न्यूनतम आरक्षण कितने प्रतिशत है?
- 1 प्रतिशत
- 2 प्रतिशत
- 4 प्रतिशत
- 5 प्रतिशत
उत्तर: 4 प्रतिशत — दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की धारा 34 के अंतर्गत सरकारी प्रतिष्ठानों में नियुक्तियों में मानक दिव्यांगता वाले व्यक्तियों के लिए न्यूनतम 4 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है। यह आरक्षण नियुक्तियों से संबंधित है, भूखंड आवंटन से नहीं, जबकि भूखंड आवंटन राज्य के नगर विकास नियमों से शासित होता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ दिव्यांगजनों के लिए आरक्षित भूखंड के आवंटन के संदर्भ में यह प्रश्न विचारणीय है कि केवल दिव्यांगता का प्रमाण होना किसी व्यक्ति को भूखंड का स्वतः अधिकारी नहीं बनाता। इस दृष्टिकोण का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए कि विहित आवेदन प्रक्रिया का पालन किए बिना आवंटन का निर्देश देना सामाजिक न्याय के संवैधानिक लक्ष्य के विरुद्ध है या उसके अनुरूप। साथ ही उत्तर दीजिए कि प्रशासनिक प्रक्रिया की अनदेखी से दिव्यांगजनों के वास्तविक हितों पर क्या प्रभाव पड़ता है और इस अंतर को दूर करने के लिए कौन-से सुधार अपेक्षित हैं। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल उत्तर संरचना:
1. भूमिका: दिव्यांगजनों के लिए आरक्षण और समान अवसर का संवैधानिक आधार। कर्नाटक उच्च न्यायालय का निर्णय (न्यायमूर्ति सूरज गोविंदराज) : राज्य दिव्यांगजन आयोग द्वारा 8 अगस्त 2013 को मैसूरु के आवेदक के पक्ष में मांड्या नगर विकास प्राधिकरण (MUDA) को भूखंड आवंटन का आदेश; उच्च न्यायालय ने इसे रद्द किया।
2. तथ्यात्मक आधार: कर्नाटक नगर विकास प्राधिकरण नियम, 1991 के अंतर्गत विज्ञापित सार्वजनिक सूचना पर विहित प्रपत्र में आवेदन और न्यूनतम जमा राशि अनिवार्य; केवल पंजीकरण (नाममात्र शुल्क के साथ) वैध आवेदन नहीं। 2002 में लगभग 2,100 भूखंडों के लिए आवेदन आमंत्रित, 2 प्रतिशत (42 भूखंड) दिव्यांगजनों हेतु आरक्षित, केवल 11 आवेदन प्राप्त और आवंटित। शिकायतकर्ता ने न पंजीकरण के बाद आवेदन किया, न उस अवधि में। लॉटरी आवंटन से जुड़ी जाँच लंबित होने के कारण 2002 से नए आवंटन आमंत्रित नहीं। न्यायालय ने भविष्य में आवेदन का विकल्प और वरिष्ठता का लाभ दिया।
3. संवैधानिक एवं विधिक ढाँचा:
– अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समानता) और अनुच्छेद 21 (गरिमामय जीवन) की व्याख्या में दिव्यांगजन की समान भागीदारी।
– अनुच्छेद 41 (राज्य नीति का निदेशक तत्व) : दिव्यांगता की स्थिति में लोक सहायता।
– दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 : सरकारी प्रतिष्ठानों में 4 प्रतिशत आरक्षण (धारा 34) तथा राज्य आयुक्त का वैधानिक ढाँचा; भारत द्वारा अनुमोदित संयुक्त राष्ट्र दिव्यांगजन अधिकार अभिसमय (UNCRPD, 2006)।
– प्रक्रियात्मक न्याय: मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) में ‘प्रक्रिया उचित, न्यायपूर्ण और युक्तियुक्त होनी चाहिए’ का सिद्धांत।
– सारभूत समानता बनाम औपचारिक समानता; अमर्त्य सेन के क्षमता दृष्टिकोण (Capability Approach) और मार्था नुसबाम का क्षमता सिद्धांत, जो अवसर की वास्तविक उपलब्धता पर बल देते हैं।
4. विभिन्न दृष्टिकोणों का संतुलन:
– पक्ष: आयोग का उद्देश्य दिव्यांगजनों के प्रति प्रशासनिक उदासीनता को दूर करना है; तकनीकी प्रक्रिया उनके अधिकार को निष्फल न कर दे।
– विपक्ष: यदि विहित प्रक्रिया शिथिल हो जाए तो समान अवसर का सिद्धांत, पारदर्शिता और लॉटरी/आवंटन में निष्पक्षता प्रभावित होती है; अन्य आवेदकों के विधिक अधिकार भी जुड़े हैं।
– विधिक अपेक्षा (Legitimate Expectation) का सिद्धांत: सार्वजनिक सूचना के बाद सभी के लिए समान नियम।
5. परिणाम (Also answer बिंदु): प्रक्रिया की अनदेखी से प्रशासनिक अराजकता, मुकदमेबाजी में वृद्धि, वास्तविक आवेदकों की प्रतीक्षा में देरी और 2002 के बाद आवंटन रुकने जैसी स्थिति; अतः वैधानिक उपाय (जैसे वरिष्ठता, भविष्य में आवेदन का अधिकार) अधिक व्यावहारिक हैं।
6. सुधार सुझाव: आवेदन और आवंटन की समयबद्ध, नियमित सार्वजनिक सूचना; ऑनलाइन पंजीकरण और पारदर्शी लॉटरी प्रणाली; आरक्षित भूखंडों का नियमित लेखा-जोखा; लंबित जाँचों का समयबद्ध निपटारा; आयोग के आदेशों में विधिक सीमाओं का स्पष्ट उल्लेख।
7. निष्कर्ष: सकारात्मक कार्रवाई और विधिक प्रक्रिया परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं; सामाजिक न्याय तभी सार्थक है जब वह विधि के शासन के भीतर लागू हो।
स्रोत: The Hindu
Karnataka PCS (KPSC) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: कर्नाटक उच्च न्यायालय द्वारा हाल ही में किस मामले में आयोग के आदेश को निरस्त किया गया, जिसमें विकलांग व्यक्ति को आवंटित स्थल दिया गया था?
- A. विकलांग व्यक्ति द्वारा आवेदन न करने के बावजूद स्थल आवंटन
- B. विकलांग व्यक्ति द्वारा आवेदन करने के बाद स्थल आवंटन
- C. विकलांग व्यक्ति द्वारा आवेदन वापस लेने के बाद स्थल आवंटन
- D. विकलांग व्यक्ति द्वारा स्थल आवंटन के विरुद्ध अपील करने के बाद स्थल आवंटन
उत्तर: A. विकलांग व्यक्ति द्वारा आवेदन न करने के बावजूद स्थल आवंटन — कर्नाटक उच्च न्यायालय ने विकलांग व्यक्ति द्वारा आवेदन न करने के बावजूद आयोग द्वारा स्थल आवंटन के आदेश को निरस्त किया।
Mains: कर्नाटक राज्य विकलांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016 के तहत विकलांग व्यक्तियों को आवासीय स्थलों के आवंटन में पारदर्शिता एवं कानूनी प्रक्रिया का पालन क्यों आवश्यक है? अपने उत्तर में संबंधित कानूनी प्रावधानों एवं न्यायिक दृष्टिकोण का उल्लेख करें।
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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