04 Nov कर्नाटक उच्च न्यायालय ने अधिवक्ताओं के विरुद्ध हिंसा पर स्वतः संज्ञान लिया
✎ स्वतः संज्ञान जनहित याचिका न्यायालय की पहल से आरंभ होती है और अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय इसके माध्यम से अधिवक्ताओं की सुरक्षा और पुलिस जवाबदेही जैसे सार्वजनिक हित के प्रश्नों की निगरानी कर सकता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — Polity and Governance (न्यायपालिका, उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता, जनहित याचिका, पुलिस सुधार) | GS Paper II — Polity and Governance (विधिक पेशे का नियमन, राज्य बार काउंसिल, अधिवक्ता संरक्षण)
- Prelims: स्वतः संज्ञान (Suo Motu) और जनहित याचिका (PIL) में अंतर, अनुच्छेद 226 — उच्च न्यायालयों की रिट अधिकारिता, अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 226 में अंतर, अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (Advocates Act, 1961), राज्य बार काउंसिल और भारतीय विधिज्ञ परिषद (Bar Council of India), पुलिस द्वारा सिविल विवादों का निपटारा और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय, लळितकुमारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2013) — प्राथमिकी दर्ज करने से संबंधित दिशा-निर्देश, डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1997) — गिरफ्तारी और हिरासत संबंधी दिशा-निर्देश
- Essay: विधि-व्यवस्था बनाम न्यायिक निगरानी: अधिवक्ताओं की सुरक्षा और न्याय तक पहुँच, जनहित याचिका और न्यायपालिका का बढ़ता सक्रियतावादी दृष्टिकोण: शक्ति-पृथक्करण की सीमाएँ
त्वरित पुनरावृत्ति: स्वतः संज्ञान जनहित याचिका न्यायालय की पहल से आरंभ होती है और अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय इसके माध्यम से अधिवक्ताओं की सुरक्षा और पुलिस जवाबदेही जैसे सार्वजनिक हित के प्रश्नों की निगरानी कर सकता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
कर्नाटक उच्च न्यायालय की खंडपीठ (न्यायमूर्ति डी.के. सिंह और न्यायमूर्ति एच. शांति भूषण) ने 3 नवंबर 2026 को राज्य में अधिवक्ताओं पर बढ़ती हिंसा के मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका दर्ज की। इस कार्रवाई का आधार अधिवक्ता संघ, बेंगलुरु और कर्नाटक राज्य बार काउंसिल के प्रतिवेदन थे, जिनमें अधिवक्ताओं की हत्या, हमले, धमकी और उत्पीड़न की घटनाओं का उल्लेख किया गया था। अक्टूबर 2026 में वकील श्रीराम वी. और मंजुनाथ की हत्या तथा गौरीबिदनूर के अधिवक्ता वेंकटरमणप्पा सन्नकी पर हत्या के प्रयास का विशेष संदर्भ दिया गया। न्यायालय ने राज्य सरकार को नोटिस जारी कर अधिवक्ताओं को उपलब्ध वैधानिक संरक्षण को सुदृढ़ करने के प्रस्तावित उपायों और पुलिसकर्मियों के विरुद्ध अधिवक्ताओं की शिकायतों के निपटारे की व्यवस्था के बारे में जानकारी माँगी है। साथ ही, राज्य में मारे गए हर अधिवक्ता के मामले का प्रकरणवार विवरण, जिसमें प्राथमिकी, गिरफ्तारी, एकत्र सामग्री, आरोप-पत्र की स्थिति और विलंब के कारण शामिल हों, मांगा गया है।
पृष्ठभूमि
- अधिवक्ता न्याय-प्रशासन के अभिन्न अंग हैं; उनकी सुरक्षा सीधे तौर पर न्याय तक नागरिकों की पहुँच से जुड़ी है। इसी कारण विधिक पेशे की सुरक्षा का प्रश्न न्यायिक संस्थाओं की चिंता का विषय बनता है।
- अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के अंतर्गत राज्य बार काउंसिल और भारतीय विधिज्ञ परिषद विधिक पेशे के नियमन, अनुशासन और अधिवक्ताओं के हितों से जुड़े कार्य करती हैं।
- सर्वोच्च न्यायालय ने कई निर्णयों में स्पष्ट किया है कि पुलिस का कार्य अपराध की जाँच और विधिक प्रक्रिया का पालन है; सिविल विवादों का निपटारा करना पुलिस के वैधानिक अधिकार-क्षेत्र में नहीं आता।
- जनहित याचिका का विकास 1980 के दशक में हुआ, जिसमें न्यायालयों ने कमजोर वर्गों और सार्वजनिक हित के मुद्दों पर न्यायिक हस्तक्षेप की व्यवस्था को विस्तार दिया।
- भारत में अधिवक्ताओं की सुरक्षा के लिए कोई एकीकृत केंद्रीय कानून नहीं है; कुछ राज्यों ने अपने स्तर पर अधिवक्ता संरक्षण से संबंधित विधान बनाए हैं, जिससे राज्यों के बीच संरक्षण व्यवस्था में भिन्नता है।
स्वतः संज्ञान जनहित याचिका क्या है?
- स्वतः संज्ञान (Suo Motu) का अर्थ है कि न्यायालय किसी पीड़ित पक्ष के आवेदन के बिना, समाचार या सार्वजनिक महत्व के किसी मामले को स्वयं संज्ञान में लेकर कार्यवाही आरंभ करे।
- जनहित याचिका (PIL — Public Interest Litigation) वह याचिका है जिसे कोई भी व्यक्ति या संस्था सार्वजनिक हित के मामले में न्यायालय के समक्ष ला सकती है; इसमें याचिकाकर्ता का प्रत्यक्ष व्यक्तिगत हित आवश्यक नहीं होता।
- उच्च न्यायालय को अनुच्छेद 226 के अंतर्गत मौलिक अधिकारों और अन्य विधिक अधिकारों के प्रवर्तन हेतु रिट जारी करने की अधिकारिता प्राप्त है; सर्वोच्च न्यायालय यह अधिकारिता अनुच्छेद 32 के अंतर्गत प्रयोग करता है।
- स्वतः संज्ञान की कार्यवाही में न्यायालय सामान्यतः नोटिस जारी करता है, संबंधित विभाग से शपथ-पत्र या सूचना माँगता है और आवश्यकता होने पर निगरानी-समिति या विशेष जाँच की व्यवस्था कर सकता है।
- इस प्रक्रिया का उद्देश्य राज्य-तंत्र की जवाबदेही सुनिश्चित करना और विधि-व्यवस्था से जुड़ी संस्थागत विफलताओं को उजागर करना है।
- न्यायिक सक्रियता के साथ शक्ति-पृथक्करण का सिद्धांत भी जुड़ा है; न्यायालय से अपेक्षा की जाती है कि वह नीति-निर्माण के क्षेत्र में अतिक्रमण किए बिना विधिक सिद्धांतों के पालन को सुनिश्चित करे।
- पुलिस कार्यप्रणाली से जुड़े मामलों में लळितकुमारी (2013) और डी.के. बसु (1997) जैसे निर्णय प्राथमिकी दर्ज करने और गिरफ्तारी व हिरासत में मानवाधिकार संरक्षण के मानक तय करते हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| स्वप्रेरणा से जनहित याचिका (Suo Motu PIL) | उच्च न्यायालय ने किसी पक्ष की याचिका की प्रतीक्षा किए बिना स्वयं संज्ञान लिया, जिससे न्यायालय की सक्रिय भूमिका स्पष्ट होती है। |
| खंडपीठ द्वारा कार्यवाही | न्यायमूर्ति डी.के. सिंह और न्यायमूर्ति एच. शांति भूषण की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की, जिससे एक से अधिक न्यायाधीशों के विचार से निर्णय सुनिश्चित होता है। |
| अधिवक्ता संघ और राज्य बार परिषद के प्रतिवेदन | बेंगलुरु के अधिवक्ता संघ और कर्नाटक राज्य बार परिषद के प्रतिवेदनों के आधार पर कार्यवाही हुई, यानी पेशेवर संस्थाओं की भूमिका न्यायिक संज्ञान का आधार बनी। |
| अधिवक्ताओं पर हिंसा के मामले | अक्टूबर 2026 में दो हत्याओं और एक हत्या के प्रयास की घटनाएँ उल्लिखित हैं, जिससे अधिवक्ताओं की सुरक्षा का प्रश्न व्यापक रूप में सामने आया। |
| पुलिस थानों पर आरोप | याचिका में आरोप लगाया गया कि पुलिस थाने सिविल विवादों का निपटारा कर रहे हैं, जो वैधानिक प्राधिकार के बिना और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के विपरीत है। |
| राज्य सरकार को नोटिस और निर्देश | राज्य सरकार से सुरक्षा के वैधानिक उपायों और पुलिस कर्मियों के विरुद्ध शिकायत तंत्र का विवरण माँगा गया, तथा प्रत्येक हत्या का मामलेवार ब्योरा भी माँगा गया। |
महत्व
विधिक एवं संवैधानिक
- अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन और अन्य उद्देश्यों के लिए रिट जारी करने की शक्ति प्राप्त है। स्वप्रेरणा से कार्यवाही इसी शक्ति के प्रयोग का एक रूप है।
- अधिवक्ताओं की सुरक्षा को न्याय व्यवस्था की स्वतंत्रता और निष्पक्ष सुनवाई से जोड़कर देखा जा सकता है, क्योंकि अधिवक्ता न्याय प्रक्रिया के अनिवार्य अंग हैं।
- पुलिस द्वारा सिविल विवादों में हस्तक्षेप का प्रश्न शक्ति पृथक्करण और विधि के शासन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
प्रशासनिक एवं पुलिस सुधार
- पुलिस की जाँच, गिरफ्तारी और आरोप-पत्र की स्थिति के ब्योरे से जाँच प्रक्रिया की पारदर्शिता और देरी के कारणों की जवाबदेही तय करने में सहायता मिलती है।
- पुलिस कर्मियों के विरुद्ध अधिवक्ताओं की शिकायतों के लिए अलग तंत्र का प्रश्न पुलिस की आंतरिक जवाबदेही और शिकायत निवारण व्यवस्था से जुड़ता है।
पेशेवर स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय
- अनुच्छेद 19(1)(छ) के अंतर्गत वृत्ति, उपजीविका और व्यापार की स्वतंत्रता का प्रश्न अधिवक्ताओं के भयमुक्त कार्य से जुड़ता है, क्योंकि धमकी और हिंसा से पेशेवर कार्य बाधित होता है।
- अधिवक्ता यदि असुरक्षित हों तो कमज़ोर वर्गों को समय पर विधिक सहायता मिलने में बाधा आ सकती है, जिससे पहुँच और न्याय का व्यापक प्रश्न जुड़ता है।
चुनौतियाँ
1. अधिवक्ताओं की सुरक्षा का अभाव
- अधिवक्ताओं पर हत्या, हमले और धमकी की घटनाओं की शिकायत बढ़ने की बात सामने आई है।
- सुरक्षा के लिए उपलब्ध वैधानिक संरक्षण कितना प्रभावी है, यह प्रश्न राज्य सरकार से माँगे गए विवरण से जुड़ा है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: विधि के शासन, नागरिक अधिकार और राज्य की जिम्मेदारी
2. पुलिस द्वारा सिविल विवादों में हस्तक्षेप का आरोप
- याचिका में आरोप है कि पुलिस थाने संपत्ति, कब्ज़े और संविदा जैसे सिविल विवादों का निपटारा कर रहे हैं।
- ऐसे निपटारे को सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के विपरीत बताया गया है, जिससे पुलिस के वैधानिक दायरे का प्रश्न उठता है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: पुलिस सुधार, शक्ति पृथक्करण और विधिक प्रक्रिया
3. पुलिस थानों में अधिवक्ताओं के साथ व्यवहार
- अधिवक्ताओं के साथ अशिष्ट व्यवहार और बैठने तक की सुविधा न दिए जाने के आरोप सामने आए हैं।
- यह प्रश्न नागरिकों और पेशेवरों के प्रति पुलिस की संवेदनशीलता और सेवा-आचरण से जुड़ता है।
यूपीएससी लिंक: GS-4: सार्वजनिक सेवा में नैतिकता और आचरण
4. पुलिस के विरुद्ध शिकायत तंत्र की स्पष्टता
- अधिवक्ताओं की शिकायतों के निवारण के लिए अलग और प्रभावी तंत्र की आवश्यकता पर न्यायालय ने ध्यान दिया है।
- शिकायत तंत्र यदि स्वतंत्र और समयबद्ध न हो तो आंतरिक जाँच पर भरोसा कम होता है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: शासन में जवाबदेही और शिकायत निवारण
5. गंभीर अपराधों में जाँच और अभियोजन में देरी
- न्यायालय ने प्रत्येक हत्या के मामले में एफ.आई.आर. विवरण, गिरफ्तारी, एकत्र सामग्री और आरोप-पत्र की स्थिति माँगी है।
- जाँच में देरी के कारणों का स्पष्टीकरण आपराधिक न्याय व्यवस्था की दक्षता का मूल्यांकन करने का आधार बनता है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: आपराधिक न्याय प्रणाली और जाँच की दक्षता
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| समस्या | चिंता |
|---|---|
| अधिवक्ताओं पर हिंसा | हत्या और हमलों से पेशेवर सुरक्षा और न्याय तक पहुँच प्रभावित होती है। |
| सिविल विवादों में पुलिस की भूमिका | वैधानिक प्राधिकार के बिना निपटारे से विधि के शासन और अदालती प्रक्रिया की अवहेलना का खतरा रहता है। |
| थानों में अधिवक्ताओं का सम्मान | गरिमापूर्ण व्यवहार का अभाव पेशे की प्रतिष्ठा और संस्थागत विश्वास को कम करता है। |
| शिकायत निवारण का अपर्याप्त तंत्र | पुलिस कर्मियों के विरुद्ध शिकायतों पर निष्पक्ष और समयबद्ध कार्रवाई की आवश्यकता है। |
| जाँच और आरोप-पत्र में विलंब | देरी से दोषसिद्धि की संभावना घटती है और पीड़ित पक्ष का भरोसा कमज़ोर होता है। |
आगे की राह
- अधिवक्ताओं की सुरक्षा के लिए वैधानिक संरक्षण के प्रावधानों की समीक्षा कर उन्हें व्यावहारिक रूप से लागू करना चाहिए।
- पुलिस थानों में सिविल विवादों के निपटारे पर स्पष्ट निर्देश और उनका कठोर अनुपालन सुनिश्चित करना चाहिए, ताकि वे सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के अनुरूप रहें।
- पुलिस कर्मियों के विरुद्ध अधिवक्ताओं की शिकायतों के लिए स्वतंत्र, समयबद्ध और पारदर्शी शिकायत निवारण तंत्र बनाया जाना चाहिए।
- थानों में अधिवक्ताओं और आम नागरिकों के साथ गरिमापूर्ण व्यवहार हेतु पुलिस प्रशिक्षण और सेवा-आचरण के मानक सुदृढ़ किए जाने चाहिए।
- हिंसा के प्रत्येक मामले में एफ.आई.आर., गिरफ्तारी, साक्ष्य संग्रह और आरोप-पत्र की समयबद्ध प्रगति की निगरानी के लिए तंत्र बनाना चाहिए।
- जाँच में विलंब के कारणों की संस्थागत समीक्षा कर फॉरेंसिक और अन्वेषण क्षमता बढ़ाई जानी चाहिए।
- बार परिषद और अधिवक्ता संघों तथा पुलिस के बीच नियमित संवाद की व्यवस्था से शिकायतों का समाधान पूर्व में ही हो सकता है।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
जनहित याचिका (PIL) · स्वतः संज्ञान (Suo Motu) · अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 226 · अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (Advocates Act, 1961) · राज्य बार काउंसिल (State Bar Council) · समानांतर न्यायालय की प्रवृत्ति · प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ (2006) और पुलिस सुधार · ललिता कुमारी मामला (2013) और प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) · शक्ति पृथक्करण (Separation of Powers) · विधि का शासन (Rule of Law) · अनुच्छेद 19(1)(छ) और अनुच्छेद 21 · साक्षी संरक्षण योजना (Witness Protection Scheme)
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 21: जीवन और व्यक्तिगत सुरक्षा का अधिकार
- अनुच्छेद 19(1)(छ): वृत्ति और पेशे की स्वतंत्रता
- अनुच्छेद 226: उच्च न्यायालय की रिट और स्वप्रेरणा कार्यवाही
- अनुच्छेद 141: सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों की बाध्यकारी प्रकृति
- सातवीं अनुसूची, राज्य सूची: पुलिस और कानून-व्यवस्था राज्य का विषय
अवधारणा प्रवाह
अधिवक्ताओं पर हत्या, हमले और धमकी की घटनाएँ सामने आईं। → अधिवक्ता संघ और कर्नाटक राज्य बार परिषद ने उच्च न्यायालय को प्रतिवेदन दिए। → उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने स्वप्रेरणा से जनहित याचिका के रूप में संज्ञान लिया। → राज्य सरकार को नोटिस जारी कर सुरक्षा उपायों और शिकायत तंत्र का विवरण माँगा गया। → प्रत्येक हत्या के मामले में जाँच, गिरफ्तारी और आरोप-पत्र की स्थिति का ब्योरा माँगा गया। → जाँच और सुरक्षा व्यवस्था में सुधार से विधि के शासन और अधिवक्ताओं के पेशेवर संरक्षण को सुदृढ़ करने की दिशा बनती है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. जनहित याचिका केवल वही व्यक्ति दायर कर सकता है जिसके स्वयं के मौलिक अधिकार का उल्लंघन हुआ हो।
2. अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 226, दोनों मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए रिट जारी करने की शक्ति प्रदान करते हैं, किंतु अनुच्छेद 226 का क्षेत्र अधिक व्यापक है।
3. न्यायालय समाचार-पत्र की रिपोर्ट या पत्र के आधार पर जनहित से जुड़े मामले में स्वतः संज्ञान ले सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 गलत है, क्योंकि जनहित याचिका में कोई भी सद्भावी व्यक्ति या संस्था लोकहित में याचिका दायर कर सकती है; S.P. Gupta (1981) के बाद स्थान-बोध (locus standi) का विस्तार हुआ। कथन 2 सही है: अनुच्छेद 32 केवल मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन हेतु है, जबकि अनुच्छेद 226 मौलिक और अन्य विधिक अधिकारों के लिए रिट जारी करने की शक्ति देता है। कथन 3 सही है, क्योंकि न्यायालय पत्र, समाचार या सूचना के आधार पर स्वतः संज्ञान लेने की प्रक्रिया अपनाते रहे हैं (जैसे Bandhua Mukti Morcha, 1984 में पत्र-याचिका का सिद्धांत)।
Q2. निम्नलिखित दो कथनों पर विचार कीजिए:
अभिकथन (A): पुलिस थाने संपत्ति या कब्ज़े जैसे सिविल विवादों को वैधानिक प्राधिकार के बिना निपटाते हैं, तो यह विधि के शासन के विरुद्ध है।
कारण (R): सिविल विवादों का अधिनिर्णय सक्षम न्यायालयों द्वारा सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के अंतर्गत होता है, कार्यपालिका की पुलिस शाखा द्वारा नहीं।
नीचे दिए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
- (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
- (A) और (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
- (A) सही है, किंतु (R) गलत है।
- (A) गलत है, किंतु (R) सही है।
उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — पुलिस को सिविल विवादों का अधिनिर्णय करने का अधिकार नहीं है, इसलिए ऐसा आचरण विधि के शासन और शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत के विरुद्ध है। सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के अंतर्गत सिविल न्यायालय ही संपत्ति और संविदा विवादों का निपटारा करते हैं, अतः कारण (R) अभिकथन (A) की सही व्याख्या करता है।
Q3. निम्नलिखित सुमेलों पर विचार कीजिए:
सूची I (निर्णय)
A. हुसैनारा खातून मामला (1979)
B. ललिता कुमारी मामला (2013)
C. अर्नेश कुमार मामला (2014)
D. डी.के. बसु मामला (1997)
सूची II (मुख्य प्रावधान)
1. संज्ञेय अपराध में प्रथम सूचना रिपोर्ट का पंजीकरण अनिवार्य
2. सात वर्ष तक दंडनीय अपराधों में अनावश्यक गिरफ़्तारी पर रोक और गिरफ़्तारी के औचित्य की जाँच
3. हिरासत में यातना रोकने हेतु गिरफ़्तारी और निरोध संबंधी दिशा-निर्देश
4. विचाराधीन कैदियों के लिए शीघ्र विचारण का अधिकार (अनुच्छेद 21 के अंतर्गत)
सही सुमेलन चुनिए:
- A-1, B-3, C-2, D-4
- A-4, B-3, C-1, D-2
- A-4, B-1, C-2, D-3
- A-2, B-4, C-3, D-1
उत्तर: A-4, B-1, C-2, D-3 — हुसैनारा खातून (1979) ने विचाराधीन कैदियों के शीघ्र विचारण को अनुच्छेद 21 का भाग माना, अतः A-4। ललिता कुमारी (2013) ने संज्ञेय अपराध में FIR पंजीकरण को अनिवार्य किया, अतः B-1। अर्नेश कुमार (2014) ने अनावश्यक गिरफ़्तारी पर रोक लगाई, अतः C-2। डी.के. बसु (1997) ने हिरासत में यातना रोकने के दिशा-निर्देश दिए, अतः D-3।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ पुलिस थानों द्वारा सिविल विवादों का निपटारा करना और अधिवक्ताओं के प्रति असम्मानजनक व्यवहार विधि के शासन के समक्ष गंभीर चुनौती प्रस्तुत करते हैं। इस प्रवृत्ति का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही बताइए कि अधिवक्ताओं की सुरक्षा और उनकी शिकायतों के निवारण हेतु विद्यमान विधिक ढाँचा कहाँ तक पर्याप्त है और उसमें किन सुधारों की आवश्यकता है। (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर की रूपरेखा (Model-Answer Skeleton):
1. भूमिका: कर्नाटक उच्च न्यायालय द्वारा अधिवक्ताओं पर हिंसा के प्रसंग में स्वतः संज्ञान (Suo Motu) से जनहित याचिका का आरंभ, जिसमें राज्य सरकार से सुरक्षा उपायों और शिकायत-तंत्र पर रिपोर्ट माँगी गई।
2. पुलिस की सीमाएँ: (क) प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) संबंधी ललिता कुमारी (2013) का निर्णय, जिसमें संज्ञेय अपराध में पंजीकरण अनिवार्य है; (ख) पुलिस द्वारा सिविल विवादों (संपत्ति, कब्ज़ा, संविदा) का निपटारा सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के सक्षम न्यायालय के क्षेत्राधिकार का अतिक्रमण है; (ग) शक्ति पृथक्करण और विधि के शासन की अवधारणा; (घ) पुलिस व्यवस्था में सुधार हेतु प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ (2006) के निर्देश और मॉडल पुलिस अधिनियम, 2006 (सोली सोराबजी समिति का प्रारूप)।
3. अधिवक्ताओं का संवैधानिक और विधिक आधार: अनुच्छेद 19(1)(छ) के अंतर्गत वृत्ति का अधिकार, अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन और गरिमा का अधिकार; अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के अंतर्गत राज्य बार काउंसिल की भूमिका (धारा 9) और अनुशासनात्मक शक्ति (धारा 35)।
4. संरक्षण ढाँचे की कमी: केंद्रीय स्तर पर अधिवक्ता-विशिष्ट संरक्षण विधि का अभाव; कुछ राज्यों द्वारा स्वयं के अधिवक्ता संरक्षण विधान; शिकायत-निवारण के लिए स्वतंत्र तंत्र की आवश्यकता।
5. न्यायिक हस्तक्षेप का संतुलन: अनुच्छेद 32 और 226 के अंतर्गत न्यायिक समीक्षा; स्वतः संज्ञान का औचित्य बनाम न्यायिक संयम (judicial restraint); हुसैनारा खातून (1979) और S.P. Gupta (1981) से जनहित याचिका के विकास का संक्षिप्त उल्लेख; कार्यपालिका की स्वायत्तता बनाम जवाबदेही का संतुलन।
6. सुधार के उपाय: पुलिस शिकायत प्राधिकरण (Police Complaints Authority) को सुदृढ़ करना; डी.के. बसु (1997) के दिशा-निर्देशों का कठोर पालन; गंभीर अपराधों में साक्षी संरक्षण योजना (Mahender Chawla, 2018 के निर्देशों के अनुरूप); हत्या के मामलों में समयबद्ध अन्वेषण और आरोप-पत्र की स्थिति की निगरानी।
7. निष्कर्ष: विधि के शासन की रक्षा के लिए पुलिस की भूमिका को विधिक सीमाओं में रखना, अधिवक्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना और न्यायिक निगरानी व कार्यपालिका की जवाबदेही में संतुलन बनाना।
स्रोत: The Hindu
Karnataka PCS (KPSC) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: हाल ही में, कर्नाटक उच्च न्यायालय ने अधिवक्ताओं के खिलाफ हिंसा पर स्वतः संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका (PIL) शुरू की। इस संदर्भ में, ‘स्वतः संज्ञान’ का सही अर्थ क्या है?
- A. न्यायालय द्वारा किसी बाहरी याचिका के बिना स्वयं किसी मामले का संज्ञान लेना।
- B. किसी पीड़ित पक्ष द्वारा सीधे उच्च न्यायालय में दायर की गई याचिका।
- C. सरकार द्वारा न्यायालय को किसी मामले की जांच करने का निर्देश देना।
- D. जनता के किसी सदस्य द्वारा दायर की गई जनहित याचिका।
उत्तर: A. न्यायालय द्वारा किसी बाहरी याचिका के बिना स्वयं किसी मामले का संज्ञान लेना। — स्वतः संज्ञान का अर्थ है कि न्यायालय किसी बाहरी आवेदन या याचिका के बिना, अपनी पहल पर किसी मामले की सुनवाई शुरू करता है।
Mains: कर्नाटक उच्च न्यायालय द्वारा अधिवक्ताओं के खिलाफ हिंसा पर स्वतः संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका (PIL) शुरू करने के महत्व का विश्लेषण करें। कर्नाटक में कानून के शासन और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बनाए रखने में इस तरह की न्यायिक सक्रियता की भूमिका पर चर्चा करें।
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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