01 Nov कर्नाटक में आधिकारिक मान्यता मिल सकती है कन्नड़ ध्वज, सीएम शिवाकुमार का बड़ा ऐलान
✎ राष्ट्रीय ध्वज संबंधी नियम राष्ट्रीय ध्वज संहिता, 2002 से तय होते हैं, जबकि राज्य ध्वज की मान्यता राज्य की विधायी और प्रशासनिक शक्ति के भीतर आती है, पर उसे राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान और संघीय सीमाओं के अनुरूप ही होना चाहिए।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II — शासन एवं राजव्यवस्था (संघवाद, राज्य–केंद्र संबंध, संवैधानिक प्रावधान) | सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र I — भारतीय विरासत एवं संस्कृति (राज्य प्रतीक, भाषायी एवं सांस्कृतिक पहचान)
- Prelims: राष्ट्रीय ध्वज संहिता, 2002 (Flag Code of India, 2002), राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 (Prevention of Insults to National Honour Act, 1971), प्रतीक और नाम (अनुचित प्रयोग निवारण) अधिनियम, 1950 (Emblems and Names (Prevention of Improper Use) Act, 1950), अनुच्छेद 51क (मूल कर्तव्य) — राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान के प्रति आदर, अनुच्छेद 1 — भारत: राज्यों का संघ, अनुच्छेद 162 — राज्य की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार, राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 (States Reorganisation Act, 1956), गंडभेरुंड (कर्नाटक का राज्य प्रतीक), राज्य सूची और समवर्ती सूची का उपयोग: प्रतीक एवं ध्वज संबंधी विधि-निर्माण का प्रश्न
- Essay: राष्ट्रीय एकता और क्षेत्रीय अस्मिता: क्या प्रतीकों की विविधता संघवाद को सुदृढ़ करती है?, प्रतीकात्मक संघवाद: राज्य पहचान की अभिव्यक्ति और संवैधानिक सीमाएँ
त्वरित पुनरावृत्ति: राष्ट्रीय ध्वज संबंधी नियम राष्ट्रीय ध्वज संहिता, 2002 से तय होते हैं, जबकि राज्य ध्वज की मान्यता राज्य की विधायी और प्रशासनिक शक्ति के भीतर आती है, पर उसे राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान और संघीय सीमाओं के अनुरूप ही होना चाहिए।
यह खबर चर्चा में क्यों?
कर्नाटक सरकार ने राज्य ध्वज को आधिकारिक मान्यता देने पर विचार करने की घोषणा की है और कहा है कि इस विषय पर आगामी शीतकालीन विधानमंडल सत्र (बेलगावी, 30 नवंबर से आरंभ) में चर्चा होगी। राज्य सरकार निजी संस्थानों को राज्य ध्वज फहराने की अनुमति देने वाला आदेश जारी करने तथा सरकारी सहायता प्राप्त संस्थानों में इसे अनिवार्य करने पर भी विचार कर रही है। मुख्यमंत्री के अनुसार, पूर्व में मंत्रिमंडल ने यह प्रस्ताव पारित कर केंद्र को भेजा था, जिस पर अनुमोदन लंबित है। साथ ही विधिक विशेषज्ञों से परामर्श के बाद ऐसे विकल्पों की खोज की जा रही है जिनसे राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान बना रहे और राष्ट्रीय ध्वज संबंधी नियमों का उल्लंघन न हो। यह मामला राज्य की प्रतीकात्मक पहचान और राष्ट्रीय ध्वज संहिता के बीच संतुलन से जुड़ा है।
पृष्ठभूमि
- राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के बाद कर्नाटक राज्य का गठन हुआ; इसी उपलक्ष्य में प्रति वर्ष 1 नवंबर को राज्योत्सव (Rajyotsava) मनाया जाता है।
- 2018 में राज्य सरकार ने कन्नड़ एवं संस्कृति विभाग की विशेषज्ञ समिति की अनुशंसा पर एक क्षैतिज त्रिवर्णी ध्वज (पीला, सफ़ेद और लाल) डिज़ाइन को मंज़ूरी दी थी, जिसके केंद्र में गंडभेरुंड का चिह्न है।
- इस प्रस्ताव को केंद्र को भेजा गया, क्योंकि इसके लिए राष्ट्रीय ध्वज संहिता में संशोधन आवश्यक माना गया; गृह मंत्रालय ने इस प्रस्ताव को स्वीकृति नहीं दी।
- भारत में राष्ट्रीय ध्वज के प्रयोग, प्रदर्शन और सम्मान का विनियमन मुख्यतः राष्ट्रीय ध्वज संहिता, 2002 तथा राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 से होता है; राज्य ध्वज के लिए कोई समान संवैधानिक प्रावधान नहीं है।
राज्य ध्वज क्या है?
- राज्य ध्वज किसी राज्य की भाषायी, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान को दर्शाने वाला प्रतीक है; यह राष्ट्रीय ध्वज से भिन्न और उसके अधीन नहीं होता, बल्कि उसके साथ सह-अस्तित्व में रह सकता है।
- भारतीय संविधान में राष्ट्रीय ध्वज का उल्लेख है, किंतु राज्य ध्वज या राज्य प्रतीक के लिए कोई विशिष्ट संवैधानिक उपबंध नहीं है।
- राष्ट्रीय ध्वज की अभिकल्पना, उसका आकार-अनुपात (3:2) और प्रदर्शन-नियम राष्ट्रीय ध्वज संहिता द्वारा निर्धारित हैं; इसमें परिवर्तन के लिए केंद्र स्तर पर संशोधन आवश्यक होता है।
- अनुच्छेद 51क(क) के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक का मूल कर्तव्य है कि वह राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान का आदर करे; इसलिए किसी भी प्रतीक की मान्यता इस सम्मान की भावना के अनुरूप होनी चाहिए।
- प्रतीक और नाम (अनुचित प्रयोग निवारण) अधिनियम, 1950 के अंतर्गत कुछ राष्ट्रीय प्रतीकों और नामों के अनुचित प्रयोग पर नियंत्रण है; राज्य प्रतीकों की विधिक स्थिति इस संदर्भ में परखी जाती है।
- भारत के संघीय ढांचे में राज्य अपनी सांस्कृतिक पहचान को प्रतीकों के माध्यम से अभिव्यक्त कर सकते हैं, परंतु यह शक्ति संविधान की सीमाओं और केंद्र-राज्य विधायी विभाजन (सातवीं अनुसूची) के भीतर प्रयोग होती है।
- राज्य ध्वज को आधिकारिक दर्जा देने के लिए सामान्यतः राज्य विधानमंडल में विधेयक या संकल्प, मंत्रिमंडलीय अनुमोदन, और जहाँ आवश्यक हो, केंद्रीय परामर्श व अनुमोदन की प्रक्रिया अपनाई जाती है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्त्व |
|---|---|
| प्रस्तावित राज्य ध्वज का स्वरूप | 2018 में राज्य सरकार ने क्षैतिज त्रिवर्णी ध्वज (पीला, सफेद और लाल) को मंज़ूरी दी थी, जिसके केंद्र में राज्य का प्रतीक गंडभेरुंड (Gandaberunda) अंकित है। यह डिज़ाइन कन्नड़ एवं संस्कृति विभाग की विशेषज्ञ समिति की अनुशंसा पर तय हुआ था। |
| मंत्रिमंडल की भूमिका | मंत्रिमंडल ने इस प्रस्ताव को पारित कर केंद्र को भेजा था। राज्य की कार्यपालिका के स्तर पर निर्णय हो चुका है, किंतु उसे औपचारिक मान्यता देने की शक्ति केंद्र के पास मानी गई है। |
| केंद्र की स्थिति | केंद्र का अनुमोदन लंबित बताया गया है। 2018 के प्रस्ताव पर गृह मंत्रालय ने सहमति नहीं दी, क्योंकि इसके लिए राष्ट्र ध्वज संहिता (Flag Code of India) में संशोधन आवश्यक है। |
| निजी संस्थानों के लिए आदेश | राज्य सरकार निजी संस्थानों को राज्य ध्वज फहराने की अनुमति देने वाला आदेश जारी करने पर विचार कर रही है। यह कदम राज्य के प्रशासनिक अधिकार-क्षेत्र में आता है। |
| सरकारी संस्थानों में अनिवार्यता | सरकारी सहायता प्राप्त संस्थानों में राज्य ध्वज फहराना अनिवार्य करने पर विचार हो रहा है। इससे प्रतीक का प्रयोग सार्वजनिक शिक्षा और प्रशासन के माध्यम से बढ़ सकता है। |
| विधायी प्रक्रिया | शीतकालीन सत्र (बेलगावी, 30 नवंबर से) में मुद्दे पर चर्चा प्रस्तावित है। राज्य सरकार ने राज्य ध्वज के साथ राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए विधान लाने की प्रतिबद्धता जताई है। |
महत्व
सांस्कृतिक और भाषायी महत्त्व
- राज्य ध्वज कन्नड़ भाषा, साहित्य और विरासत की सामूहिक पहचान का प्रतीक बनने की दिशा में है।
- भारत की विविधता में क्षेत्रीय पहचानों को संस्थागत मान्यता देने का उदाहरण बनता है।
- गंडभेरुंड जैसे पारंपरिक प्रतीक को आधुनिक शासन के औपचारिक ढाँचे में जगह मिलती है।
संघीय और संवैधानिक महत्त्व
- संविधान के अनुच्छेद 1 में भारत को राज्यों का संघ कहा गया है। राज्य द्वारा अपने प्रतीक को औपचारिक मान्यता देने का प्रश्न संघीय ढाँचे की व्याख्या से जुड़ता है।
- राज्यों की प्रतीकात्मक स्वायत्तता और केंद्र के राष्ट्रीय प्रतीकों के बीच संतुलन की आवश्यकता स्पष्ट होती है।
प्रशासनिक और विधिक महत्त्व
- प्रस्ताव से यह स्पष्ट होता है कि राज्य ध्वज के लिए किस स्तर की विधिक व्यवस्था चाहिए, यह तय करने की प्रक्रिया शुरू हुई है।
- निजी संस्थानों के लिए आदेश राज्य के प्रशासनिक अधिकार का प्रयोग है, जिसकी सीमाएँ विधिक परीक्षण से तय होंगी।
सामाजिक और भावनात्मक महत्त्व
- मुख्यमंत्री के अनुसार यह ध्वज जनभावना का प्रतीक है, इसलिए सार्वजनिक चर्चा और विधायकों की राय इस प्रक्रिया का हिस्सा है।
- सभी धर्मों के बीच समानता और शांति के मूल्यों को प्रतीक के साथ जोड़ा गया है, जिसे नीति-निर्माण में संतुलित रूप से देखना होगा।
चुनौतियाँ
1. राष्ट्रीय ध्वज की गरिमा और राष्ट्र ध्वज संहिता
- राष्ट्र ध्वज संहिता, 2002 राष्ट्रीय ध्वज के प्रयोग को नियंत्रित करती है। राज्य ध्वज को उसके साथ फहराने के लिए संहिता में संशोधन की आवश्यकता बताई गई है।
- राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान और उसके नियमों का उल्लंघन न हो, यह सुनिश्चित करना सबसे बड़ी विधिक चुनौती है।
- सरकार ने कहा है कि विकल्प ऐसे खोजे जाएँगे जिनसे राष्ट्रीय ध्वज की गरिमा प्रभावित न हो।
यूपीएससी लिंक: GS-2: संघवाद; प्रतीक और विधिक ढाँचा
2. केंद्र का अनुमोदन और संघीय समन्वय
- राज्य मंत्रिमंडल के प्रस्ताव को केंद्र की स्वीकृति अब तक नहीं मिली है।
- 2018 के प्रस्ताव पर गृह मंत्रालय की असहमति से यह स्पष्ट है कि प्रतीकात्मक विषयों पर केंद्र-राज्य संवाद आवश्यक है।
- राज्य और केंद्र के बीच प्रशासनिक अधिकार-क्षेत्र का स्पष्ट निर्धारण आगे की प्रक्रिया को प्रभावित करेगा।
यूपीएससी लिंक: GS-2: केंद्र-राज्य संबंध; संघीय ढाँचे की चुनौतियाँ
3. राज्य ध्वज की विधिक मान्यता और संरक्षण
- राज्य ध्वज को औपचारिक मान्यता देने के लिए विधान या संकल्प का स्वरूप क्या होगा, यह अभी तय नहीं है।
- विधिक राय के अनुसार विकल्प खोजे जा रहे हैं, किंतु अंतिम रूप देने के लिए स्पष्ट कानूनी आधार चाहिए।
- राज्य ध्वज के अपमान या दुरुपयोग से संरक्षण के उपाय भी विधि में स्पष्ट करने होंगे।
यूपीएससी लिंक: GS-2: विधायी प्रक्रिया; राज्य विधानमंडल की शक्तियाँ
4. निजी संस्थानों पर अनिवार्यता की सीमा
- निजी संस्थानों को ध्वज फहराने की अनुमति देना और उन पर बाध्यता डालना, दोनों में अंतर है।
- अनिवार्यता का दायरा सरकारी सहायता प्राप्त संस्थानों तक सीमित रखने का प्रस्ताव है, जिससे निजी क्षेत्र की स्वायत्तता का प्रश्न उठता है।
- आदेश की वैधता न्यायिक समीक्षा में परखी जा सकती है, इसलिए प्रशासनिक निर्णय को विधिक आधार देना आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: शासन में विधिक सीमाएँ; न्यायिक समीक्षा
5. प्रतीकों के माध्यम से सामाजिक एकता का संतुलन
- राज्य प्रतीक को सांस्कृतिक गौरव के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, किंतु इसके प्रयोग में सभी वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी।
- राष्ट्रीय और राज्य प्रतीकों के बीच सम्मान का संतुलन बनाए रखना सामाजिक सौहार्द के लिए आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: GS-1: भारतीय विरासत और संस्कृति; सामाजिक एकता
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| राष्ट्र ध्वज संहिता में संशोधन | राष्ट्रीय ध्वज के नियमों का उल्लंघन न हो, यह सुनिश्चित करना आवश्यक है। |
| केंद्र का अनुमोदन | 2018 का प्रस्ताव अस्वीकृत हुआ था और वर्तमान अनुमोदन लंबित है। |
| विधिक आधार | राज्य ध्वज को संरक्षण देने वाले विधान का स्वरूप अभी स्पष्ट नहीं है। |
| निजी संस्थानों पर बाध्यता | अनुमति और अनिवार्यता के बीच का अंतर विधिक रूप से स्पष्ट करना होगा। |
| न्यायिक समीक्षा का जोखिम | प्रशासनिक आदेश को न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है। |
| प्रतीकों का सामूहिक स्वीकार | प्रतीक को सभी वर्गों की सहमति से अपनाना दीर्घकालिक स्थिरता के लिए आवश्यक है। |
आगे की राह
- राष्ट्र ध्वज संहिता के साथ तालमेल बनाकर राज्य ध्वज के प्रयोग के नियम स्पष्ट किए जाएँ।
- केंद्र और राज्य के बीच औपचारिक परामर्श द्वारा अनुमोदन की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जाए।
- राज्य ध्वज को मान्यता देने वाले विधान या संकल्प का मसौदा विधिक विशेषज्ञों की राय से तैयार किया जाए।
- निजी संस्थानों के लिए अनुमति और सरकारी संस्थानों के लिए अनिवार्यता, दोनों के दायरे को अलग-अलग परिभाषित किया जाए।
- राज्य ध्वज के सम्मान और दुरुपयोग से संरक्षण के लिए दंडात्मक प्रावधानों पर स्पष्टता लाई जाए।
- विधानमंडल में सार्वजनिक परामर्श और विधायकों की राय को नीति-निर्माण का नियमित हिस्सा बनाया जाए।
- न्यायिक समीक्षा की संभावना को ध्यान में रखते हुए प्रशासनिक आदेशों को पहले से विधिक आधार दिया जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
राष्ट्रीय ध्वज और राज्य प्रतीक · ध्वज संहिता, 2002 (Flag Code of India, 2002) · राष्ट्रीय सम्मान का अपमान निवारण अधिनियम, 1971 · अनुच्छेद 51क(क) (मौलिक कर्तव्य) · अनुच्छेद 19(1)(क) और अनुच्छेद 19(2) · संघीय ढांचा और सहकारी संघवाद · भाषायी आधार पर राज्य पुनर्गठन (राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956) · अनुच्छेद 345 (राज्य की राजभाषा) · गंडभेरुंड (कर्नाटक का राज्य चिह्न) · राज्य प्रतीकों की सांस्कृतिक पहचान बनाम राष्ट्रीय एकता · न्यायिक समीक्षा और संघ-राज्य संबंध · कर्नाटक राज्योत्सव
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 1: भारत राज्यों का संघ, संघीय ढाँचा
- अनुच्छेद 51क(क): राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान का कर्तव्य
अवधारणा प्रवाह
राज्य की सांस्कृतिक और भावनात्मक पहचान के लिए राज्य ध्वज की मांग उठती है। → राज्य मंत्रिमंडल विशेषज्ञ समिति की अनुशंसा पर ध्वज के डिज़ाइन को मंज़ूरी देता है। → प्रस्ताव केंद्र को भेजा जाता है, क्योंकि इसके लिए राष्ट्र ध्वज संहिता में संशोधन आवश्यक माना जाता है। → केंद्र की ओर से अनुमोदन लंबित रहने पर राज्य विधिक राय लेकर वैकल्पिक मार्ग खोजता है। → विधानमंडल के शीतकालीन सत्र में चर्चा के बाद विधान या संकल्प का स्वरूप तय होता है। → विधिक मान्यता मिलने पर राज्य ध्वज के प्रयोग, निजी संस्थानों की अनुमति और सरकारी संस्थानों में अनिवार्यता के नियम लागू होते हैं।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. ध्वज संहिता, 2002 राष्ट्रीय ध्वज के प्रदर्शन और प्रयोग से संबंधित अनुदेशों को समेकित करती है।
2. राष्ट्रीय सम्मान का अपमान निवारण अधिनियम, 1971 राष्ट्रीय ध्वज के जानबूझकर अपमान को दंडनीय अपराध बनाता है।
3. संविधान की संरचना में राज्यों के अपने ध्वज का स्पष्ट उल्लेख है और उनके लिए अलग ध्वज संहिता का प्रावधान है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: ध्वज संहिता, 2002 राष्ट्रीय ध्वज से जुड़े अनुदेशों को एक स्थान पर समेकित करती है। कथन 2 सही है: राष्ट्रीय सम्मान का अपमान निवारण अधिनियम, 1971 के अंतर्गत राष्ट्रीय ध्वज का जानबूझकर अपमान दंडनीय है। कथन 3 गलत है: संविधान में राज्यों के ध्वज का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है; कर्नाटक का प्रस्ताव इसी कारण ध्वज संहिता में संशोधन की मांग से जुड़ा है।
Q2. निम्नलिखित में से प्रत्येक में एक अभिकथन (A) और एक कारण (R) दिया गया है।
अभिकथन (A): किसी राज्य के ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज के साथ आधिकारिक रूप से फहराने की अनुमति देने के लिए ध्वज संहिता में संशोधन की आवश्यकता हो सकती है।
कारण (R): ध्वज संहिता केंद्र सरकार द्वारा जारी वे अनुदेश हैं जो राष्ट्रीय ध्वज के प्रदर्शन और प्रयोग को नियंत्रित करते हैं।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
- (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
- (A) और (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
- (A) सही है, किंतु (R) गलत है।
- (A) गलत है, किंतु (R) सही है।
उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — ध्वज संहिता राष्ट्रीय ध्वज के लिए बनी है, इसलिए किसी दूसरे ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज के साथ फहराने का प्रस्ताव उसमें संशोधन की मांग करता है। कारण (R) यही स्पष्ट करता है कि ध्वज संबंधी नियम संघ सरकार के अनुदेशों से शासित होते हैं, इसलिए (R) (A) की सही व्याख्या है।
Q3. निम्नलिखित सूचियों को सुमेलित कीजिए:
सूची I (विधि/संहिता)
1. ध्वज संहिता, 2002
2. राष्ट्रीय सम्मान का अपमान निवारण अधिनियम, 1971
3. राष्ट्रीय चिह्न एवं नाम (अनुचित प्रयोग निवारण) अधिनियम, 1950
सूची II (विषय)
A. राष्ट्रीय ध्वज के प्रदर्शन और प्रयोग का विनियमन
B. राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रगान और संविधान के अपमान को दंडनीय बनाना
C. राष्ट्रीय चिह्न और राष्ट्रीय नामों के अनुचित प्रयोग पर रोक
सही सुमेलन चुनिए:
- 1-A, 2-B, 3-C
- 1-B, 2-A, 3-C
- 1-C, 2-A, 3-B
- 1-A, 2-C, 3-B
उत्तर: 1-A, 2-B, 3-C — ध्वज संहिता, 2002 राष्ट्रीय ध्वज के प्रदर्शन और प्रयोग का विनियमन करती है (1-A)। राष्ट्रीय सम्मान का अपमान निवारण अधिनियम, 1971 राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रगान और संविधान के अपमान को दंडनीय बनाता है (2-B)। राष्ट्रीय चिह्न एवं नाम (अनुचित प्रयोग निवारण) अधिनियम, 1950 राष्ट्रीय चिह्न और नामों के दुरुपयोग को रोकता है (3-C)।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ राज्य के प्रतीक सांस्कृतिक पहचान की अभिव्यक्ति होते हैं, किंतु एक संघीय ढांचे में इनकी मान्यता राष्ट्रीय प्रतीकों की गरिमा और संवैधानिक सीमाओं से संतुलित होनी चाहिए। भारतीय संवैधानिक और वैधानिक ढांचे के संदर्भ में राज्य ध्वज को आधिकारिक मान्यता देने की संभावनाओं और सीमाओं का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि यदि संघ सरकार ऐसे प्रस्ताव पर अनुमोदन न दे, तो राज्य के पास कौन-से वैधानिक और संवैधानिक विकल्प शेष रहते हैं। (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर की रूपरेखा (मॉडल उत्तर के बिंदु):
1. भूमिका: कर्नाटक सरकार द्वारा कन्नड़ ध्वज को आधिकारिक मान्यता देने का प्रस्ताव, जिसे शीतकालीन विधानमंडल सत्र (बेलगावी) में चर्चा हेतु रखा जाना है। 2018 में मंत्रिमंडल द्वारा स्वीकृत पीला, सफेद और लाल रंग का क्षैतिज ध्वज, जिसमें गंडभेरुंड चिह्न है, केंद्र को भेजा गया था; गृह मंत्रालय ने इसे अस्वीकार किया। कारण: ध्वज संहिता में संशोधन की आवश्यकता।
2. संवैधानिक ढांचा:
– अनुच्छेद 1: भारत राज्यों का संघ है; संघीय ढांचे में राज्यों की सांस्कृतिक पहचान और संघ की एकता दोनों का संतुलन।
– अनुच्छेद 51क(क): प्रत्येक नागरिक का मौलिक कर्तव्य है कि वह राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान का आदर करे।
– अनुच्छेद 19(1)(क) और 19(2): राष्ट्रीय ध्वज फहराना वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अंतर्गत आता है, परंतु उस पर युक्तियुक्त निर्बंधन लगाए जा सकते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने भारत संघ बनाम नवीन जिंदल (2004) में इसे मान्यता दी।
– अनुच्छेद 345: राज्य विधानमंडल अपनी राजभाषा (यहाँ कन्नड़) विधि द्वारा निर्धारित कर सकता है; भाषायी पहचान का संवैधानिक आधार।
3. वैधानिक ढांचा:
– ध्वज संहिता, 2002 (2021 में संशोधित, जिससे मशीन-निर्मित और पॉलिएस्टर ध्वज की अनुमति मिली)।
– राष्ट्रीय सम्मान का अपमान निवारण अधिनियम, 1971।
– राष्ट्रीय चिह्न एवं नाम (अनुचित प्रयोग निवारण) अधिनियम, 1950।
4. ऐतिहासिक संदर्भ:
– राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के आधार पर भाषायी राज्यों का गठन; 1 नवंबर 1973 को मैसूर का नाम कर्नाटक हुआ।
– जम्मू-कश्मीर का अपना राज्य ध्वज था, जो अनुच्छेद 370 के निरसन (2019) के साथ समाप्त हुआ; यह दर्शाता है कि राज्य ध्वज की वैधता संवैधानिक व्यवस्था पर निर्भर करती है।
5. आलोचनात्मक विश्लेषण:
– पक्ष: सांस्कृतिक पहचान, सहकारी संघवाद की भावना, राज्य गौरव और भाषायी विविधता का सम्मान।
– विपक्ष: राष्ट्रीय ध्वज की एकरूपता, संभावित भ्रम और सार्वजनिक सम्मान से जुड़े प्रश्न, तथा राष्ट्रीय प्रतीकों के समान व्यवहार का सिद्धांत।
– सुझाव: राष्ट्रीय ध्वज के साथ किसी अन्य ध्वज को समान या ऊपर स्थान न देने की शर्त; संस्थागत प्रयोग (सरकारी संस्थान, निजी संस्थान) के नियमन हेतु स्पष्ट मानक।
6. वैकल्पिक मार्ग (संघ की अस्वीकृति की स्थिति में):
– राज्य विधानमंडल द्वारा राज्य में सार्वजनिक स्थानों और राज्य संस्थानों पर राज्य ध्वज फहराने के लिए विधि बनाना, जिसकी वैधता को न्यायिक समीक्षा में परखा जाएगा।
– केंद्र-राज्य संवाद: अंतर-राज्य परिषद और सरकारिया आयोग (1988) तथा पुंछी आयोग (2010) की सिफारिशें, जो संघ-राज्य सहयोग पर बल देती हैं।
– एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994): संघवाद संविधान की मूल संरचना का अंग है।
7. निष्कर्ष: राष्ट्रीय प्रतीकों की गरिमा और राज्य की सांस्कृतिक पहचान के बीच संतुलन; विधिक मार्ग का चुनाव, सार्वजनिक चर्चा और संवैधानिक सीमाओं का पालन।
स्रोत: The Hindu
Karnataka PCS (KPSC) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार द्वारा प्रस्तावित ‘कन्नड़ ध्वज’ के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?
- A. कन्नड़ ध्वज को आधिकारिक मान्यता देने का प्रस्ताव केवल सांस्कृतिक संगठनों द्वारा किया गया है
- B. कर्नाटक सरकार द्वारा प्रस्तावित कन्नड़ ध्वज में ‘गंडभेरुंड’ (राज्य पक्षी) का चित्र शामिल है
- C. कर्नाटक सरकार ने कन्नड़ ध्वज को राज्य ध्वज के रूप में मान्यता देने के लिए विधानसभा में प्रस्ताव पारित किया है
- D. कन्नड़ ध्वज को मान्यता देने का प्रस्ताव केंद्र सरकार द्वारा अस्वीकार कर दिया गया है
उत्तर: C. कर्नाटक सरकार ने कन्नड़ ध्वज को राज्य ध्वज के रूप में मान्यता देने के लिए विधानसभा में प्रस्ताव पारित किया है — कर्नाटक सरकार द्वारा प्रस्तावित कन्नड़ ध्वज में ‘गंडभेरुंड’ (राज्य पक्षी) का चित्र शामिल किया गया है, जो राज्य की सांस्कृतिक पहचान को दर्शाता है।
Mains: कर्नाटक सरकार द्वारा प्रस्तावित ‘कन्नड़ ध्वज’ के राज्य ध्वज के रूप में मान्यता देने के पीछे के राजनीतिक, सांस्कृतिक एवं प्रशासनिक कारणों की विवेचना कीजिए। साथ ही, इस प्रस्ताव के संभावित लाभ एवं चुनौतियों पर प्रकाश डालिए।
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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