मद्रास उच्च न्यायालय ने तमिलनाडु धर्मार्थ विभाग की लापरवाही पर कड़ी टिप्पणी की

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मद्रास उच्च न्यायालय ने तमिलनाडु धर्मार्थ विभाग की लापरवाही पर कड़ी टिप्पणी की

मंदिर प्रशासन में लापरवाही का चक्र2011 में शिकायतकिरायेदारों को निर्माणआयुक्त द्वारा विलंबकार्रवाई नहीं हुई2015 में बर्खास्तगीअनुशासनात्मक कार्रवाई2024 में बहाली आदेशएकल पीठ द्वाराखंडपीठ द्वारा निरस्तअनुपातहीन नहीं
मंदिर प्रशासन में लापरवाही का चक्र

✎ अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय सेवा-दंड की प्रक्रियागत वैधता की जाँच कर सकता है, परंतु अनुपातहीनता के अभाव में दंड को स्वयं बदलना साधारणतः उसके रिट क्षेत्राधिकार की सीमा से बाहर माना जाता है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — शासन (Polity): संविधान के प्रावधान, उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार, संघवाद और राज्य सूची के विषय  |  GS Paper II — शासन: धार्मिक एवं धर्मार्थ विन्यासों का प्रशासन, लोक सेवा में अनुशासनात्मक प्रक्रिया और प्रशासनिक जवाबदेही
  • Prelims: अनुच्छेद 226 (Article 226) और उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार, अनुच्छेद 26 (घ) — धार्मिक संप्रदाय की चल और अचल संपत्ति का प्रशासन, अनुच्छेद 25 (2) (ख) — हिंदू धार्मिक संस्थाओं को सार्वजनिक प्रकृति के लिए खोलने का राज्य का अधिकार, राज्य सूची की प्रविष्टि 28 — धर्मार्थ संस्थाएँ, धार्मिक एवं धर्मार्थ विन्यास, तमिलनाडु हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ विन्यास अधिनियम, 1959, रिट के प्रकार: बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण और अधिकार पृच्छा, सेवा-दंड की आनुपातिकता (Proportionality of punishment) का सिद्धांत
  • Essay: धार्मिक संस्थाओं की स्वायत्तता और राज्य का नियंत्रण: संवैधानिक संतुलन की चुनौती, प्रशासनिक जवाबदेही और नियंत्रण-संतुलन की व्यवस्था: सुशासन की कसौटी

त्वरित पुनरावृत्ति: अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय सेवा-दंड की प्रक्रियागत वैधता की जाँच कर सकता है, परंतु अनुपातहीनता के अभाव में दंड को स्वयं बदलना साधारणतः उसके रिट क्षेत्राधिकार की सीमा से बाहर माना जाता है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

23 अक्टूबर 2026 को मद्रास उच्च न्यायालय की द्वितीय खंडपीठ, जिसमें न्यायमूर्ति एस.एम. सुब्रमण्यम और न्यायमूर्ति कृष्णास्वामी गोविंदराजन शामिल थे, ने हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ विन्यास विभाग (HR&CE) की आलोचना की। विभाग ने 2011 में तिरुवारूर के थ्यागराज स्वामी मंदिर के तत्कालीन कार्यकारी अधिकारी (Executive Officer) के विरुद्ध समय पर कार्रवाई नहीं की थी। आरोप था कि कार्यकारी अधिकारी ने किरायेदारों को मंदिर भूमि पर स्थायी निर्माण की अनुमति दी और निजी व्यक्तियों को दिए गए पट्टे रद्द कराने के कदम नहीं उठाए। उन पर मंदिर निधि से 40 लाख रुपये एक ठेकेदार को अनधिकृत रूप से जारी करने का भी आरोप था। पीठ ने कहा कि आयुक्त ने शिकायतों पर लंबे समय तक कार्रवाई नहीं की और आरोपी अधिकारी से ही रिपोर्ट माँगी। 2015 में सेवा से बर्खास्तगी हुई थी। एकल पीठ ने 2024 में बहाली का आदेश दिया था, जिसे राज्य की अपील पर खंडपीठ ने निरस्त कर दिया। खंडपीठ ने माना कि रिट क्षेत्राधिकार में दंड को संशोधित करना विधिसम्मत नहीं था और बर्खास्तगी को अनुपातहीन नहीं कहा जा सकता।

पृष्ठभूमि

  • हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ विन्यास विभाग राज्य सरकार के अधीन कार्य करता है और उसका संचालन तमिलनाडु हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ विन्यास अधिनियम, 1959 के अंतर्गत होता है। आयुक्त (Commissioner) इसका प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी है।
  • कार्यकारी अधिकारी मंदिर का दैनिक प्रशासन, वित्तीय व्यवस्था और मंदिर संपत्ति की रक्षा देखता है। इसलिए उसकी लापरवाही या मिलीभगत सीधे संस्थागत हितों को प्रभावित करती है।
  • मंदिर भूमि पर अतिक्रमण, किरायेदारी के आधार पर स्थायी निर्माण और भू-राजस्व अभिलेखों में निजी नाम दर्ज होना, ऐसे विवाद अनेक राज्यों में सामने आते रहे हैं। इनमें भूमि अभिलेखों की जाँच और पट्टा रद्द करने की प्रक्रिया अहम होती है।
  • सरकारी सेवकों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन आवश्यक है। सर्वोच्च न्यायालय ने बी.सी. चतुर्वेदी बनाम भारत संघ (1995) में स्पष्ट किया कि न्यायालय दंड में तभी हस्तक्षेप करे जब वह अंतरात्मा को झकझोरने वाला हो, यानी अत्यधिक अनुपातहीन हो।
  • शिकायतों और मठ (अधीनम) के हस्तक्षेप से ही गड़बड़ियाँ सामने आईं, जिसके बाद विभागीय कार्रवाई शुरू हुई। यह प्रकरण बताता है कि शिकायत-तंत्र और समय पर निर्णय, दोनों प्रशासनिक जवाबदेही के लिए आवश्यक हैं।

अनुच्छेद 226 और धार्मिक संस्थाओं का प्रशासन क्या है?

  • अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन तथा अन्य किसी प्रयोजन के लिए अपने क्षेत्र में किसी व्यक्ति या प्राधिकारी को रिट जारी कर सकता है। इसका क्षेत्र अनुच्छेद 32 से अधिक व्यापक है, क्योंकि यह सर्वोच्च न्यायालय के मौलिक अधिकार-क्षेत्र तक सीमित नहीं है।
  • रिट के पाँच प्रकार हैं: बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus), परमादेश (Mandamus), प्रतिषेध (Prohibition), उत्प्रेषण (Certiorari) और अधिकार पृच्छा (Quo Warranto)।
  • सेवा मामलों में रिट क्षेत्राधिकार का प्रयोग सामान्यतः प्रक्रिया की वैधता, प्राकृतिक न्याय के पालन और निर्णय की तर्कसंगतता तक सीमित रहता है। न्यायालय साधारणतः साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन नहीं करता।
  • अनुच्छेद 26 (घ) प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय को अपनी चल और अचल संपत्ति का प्रशासन विधि के अनुसार करने का अधिकार देता है। इसीलिए इस अधिकार पर राज्य विधि द्वारा नियमन संभव है।
  • अनुच्छेद 25 (2) (ख) राज्य को सार्वजनिक प्रकृति की हिंदू धार्मिक संस्थाओं को सभी हिंदुओं के लिए खोलने और सामाजिक सुधार हेतु विधि बनाने का अधिकार देता है।
  • संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची की प्रविष्टि 28 धर्मार्थ संस्थाओं और धार्मिक एवं धर्मार्थ विन्यासों को राज्य का विषय बनाती है। इसी आधार पर राज्य स्तर पर ऐसे अधिनियम बनाए जाते हैं।
  • दंड की आनुपातिकता का सिद्धांत यह कहता है कि दंड अपराध की गंभीरता के अनुरूप होना चाहिए। फिर भी न्यायालय दंड की पुनर्रचना के बजाय साधारणतः प्रशासनिक प्राधिकारी को ही उचित दंड तय करने देता है।
  • सार्वजनिक संपत्ति और निधि के प्रबंधन में जवाबदेही के लिए विभागीय जाँच, समय-सीमा में निर्णय और नियमित निरीक्षण जैसी संस्थागत व्यवस्थाएँ आवश्यक होती हैं।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
मामले की प्रकृति मद्रास उच्च न्यायालय की द्विसदस्यीय पीठ ने हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ विन्यास विभाग (HR&CE) की 2011 की निष्क्रियता पर टिप्पणी की, जब कार्यकारी अधिकारी (Executive Officer) के विरुद्ध समय पर कार्रवाई नहीं हुई
आरोपित अनियमितताएँ मंदिर भूमि पर किरायेदारों द्वारा स्थायी निर्माण की अनुमति, पट्टा (Patta) रद्द न करना और लगभग ₹40 लाख की मंदिर निधि का अनधिकृत भुगतान
विभागीय जवाबदेही आयुक्त द्वारा शिकायतों पर लंबे समय तक कार्रवाई न करना और आरोपित अधिकारी से ही रिपोर्ट मँगवाना, जिससे निष्पक्ष जाँच की व्यवस्था पर प्रश्न उठा
अनुशासनात्मक परिणाम 2015 में कार्यकारी अधिकारी की सेवा से बर्खास्तगी; एकल पीठ (Single Judge) के 2024 के पुनर्बहाली के आदेश को खंडपीठ ने निरस्त किया
न्यायिक तर्क अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रिट क्षेत्राधिकार में दंड को संशोधित करना विधिक रूप से अस्वीकार्य माना गया; बर्खास्तगी को अनुपातहीन नहीं कहा गया
सामाजिक आधार भक्तों और एक मठ (Adheenam) की शिकायतों से ही अनियमितता सामने आई, जिससे नागरिक सतर्कता की भूमिका रेखांकित हुई

महत्व

प्रशासनिक (Administrative)

  • सार्वजनिक संस्थाओं में समय पर निर्णय और शिकायत निवारण की जिम्मेदारी स्पष्ट हुई; न्यायालय ने ‘निगरानी और नियंत्रण’ (checks and balances) के अभाव को कुप्रबंधन का मूल कारण माना।
  • विभागीय प्रमुख (आयुक्त) की भूमिका पर सीधी टिप्पणी से यह संदेश गया कि उच्च स्तर पर भी लापरवाही की जवाबदेही तय होती है।

कानूनी (Legal)

  • रिट क्षेत्राधिकार (Writ Jurisdiction) की सीमा स्पष्ट हुई: अनुशासनात्मक दंड का पुनर्मूल्यांकन सामान्यतः न्यायालय का कार्य नहीं है, और दंड केवल तभी बदला जा सकता है जब वह अनुपातहीन हो।
  • सेवा न्यायशास्त्र (Service Jurisprudence) में यह सिद्धांत पुष्ट हुआ कि सिद्ध कदाचार की स्थिति में विधिक प्रक्रिया का पालन होने पर बर्खास्तगी उचित दंड है।

धार्मिक संपत्ति प्रबंधन (Religious Endowment Management)

  • मंदिर भूमि और निधि का संरक्षण राज्य के धार्मिक संस्था-प्रशासन कानून के अंतर्गत विभाग का दायित्व है; अतिक्रमण और अवैध पट्टे सीधे इस दायित्व के उल्लंघन हैं।
  • मंदिर की संपत्ति को सार्वजनिक निधि की तरह देखना आवश्यक है, क्योंकि उसका उपयोग धार्मिक और धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए होता है।

चुनौतियाँ

1. मंदिर भूमि पर अतिक्रमण और अवैध पट्टे

  • किरायेदारों द्वारा स्थायी निर्माण और निजी व्यक्तियों के नाम पर पट्टा जारी होना मंदिर की भूमि का क्षरण करता है।
  • पट्टा रद्द करने में देरी से अतिक्रमण स्थायी स्वरूप ले लेता है और बाद में उसे हटाना कठिन हो जाता है।

2. प्रशासनिक विलंब और निष्क्रियता

  • शिकायतों पर लंबे समय तक निर्णय न लेना प्रशासनिक तंत्र की कार्यकुशलता पर प्रश्न उठाता है।
  • आरोपों की प्रारंभिक जाँच में समयबद्धता का अभाव अनियमितताओं को बढ़ावा देता है।

3. निगरानी तंत्र और आंतरिक नियंत्रण की कमी

  • न्यायालय द्वारा उल्लिखित ‘checks and balances’ का अभाव दर्शाता है कि वित्तीय और प्रशासनिक नियंत्रण की व्यवस्था कमज़ोर थी।
  • आरोपित अधिकारी से ही रिपोर्ट मँगवाना निष्पक्ष जाँच के सिद्धांत के विपरीत है।

4. सार्वजनिक निधि का अनधिकृत उपयोग

  • मंदिर निधि से बिना अधिकार के ठेकेदार को भुगतान वित्तीय अनुशासन और लेखा-परीक्षा तंत्र की कमी को दर्शाता है।
  • ऐसे मामलों में वसूली और उत्तरदायित्व तय करने की प्रक्रिया लंबी और जटिल होती है।

5. न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा

  • एकल पीठ द्वारा दंड में हस्तक्षेप को खंडपीठ ने अनुचित माना, जिससे रिट क्षेत्राधिकार की सीमाओं पर बहस उठी।
  • अनुपातहीनता की कसौटी पर न्यायिक समीक्षा और प्रशासनिक विवेक के बीच संतुलन बनाना कठिन है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

समस्या चिंता
मंदिर भूमि का अतिक्रमण धार्मिक संस्था की स्थायी संपत्ति का क्षरण और भविष्य में उसकी बहाली में कठिनाई
शिकायतों पर विलंब वर्षों तक निर्णय न होने से अनियमितताएँ जारी रहती हैं और नुकसान बढ़ता है
आरोपित से रिपोर्ट लेना जाँच की निष्पक्षता पर संदेह और हितों के टकराव की स्थिति
आंतरिक निगरानी की कमी वित्तीय और प्रशासनिक नियंत्रण का कमज़ोर होना, जिससे मनमाने निर्णय संभव
सार्वजनिक निधि का दुरुपयोग मंदिर निधि का अवैध भुगतान और वसूली में कठिनाई
दंड में न्यायिक हस्तक्षेप सेवा अनुशासन और रिट क्षेत्राधिकार की सीमाओं के बारे में अस्पष्टता

आगे की राह

  • शिकायतों के निपटान के लिए समयबद्ध प्रक्रिया (time-bound procedure) निर्धारित की जाए और उसकी नियमित निगरानी हो।
  • आरोपित अधिकारी से रिपोर्ट लेने के बजाय स्वतंत्र जाँच अधिकारी नियुक्त करने की व्यवस्था सुनिश्चित हो, ताकि निष्पक्षता बनी रहे।
  • मंदिर भूमि का डिजिटल अभिलेख तैयार कर उसका नियमित भू-सत्यापन (ground verification) किया जाए।
  • पट्टा जारी करने और रद्द करने की प्रक्रिया पर स्पष्ट दिशानिर्देश हों और अनधिकृत निर्माण पर तत्काल कार्रवाई का प्रावधान हो।
  • मंदिर निधि के व्यय पर आंतरिक लेखा-परीक्षा (internal audit) और वित्तीय स्वीकृति के बहुस्तरीय नियंत्रण लागू किए जाएँ।
  • आयुक्त स्तर पर शिकायतों की समीक्षा की नियमित बैठक और उसका सार्वजनिक प्रतिवेदन हो, ताकि उत्तरदायित्व तय हो सके।
  • भक्तों, मठों और स्थानीय समुदायों की शिकायत-दर्ज प्रणाली को सरल और पारदर्शी बनाया जाए।
  • अनुशासनात्मक कार्रवाई में विधिक प्रक्रिया और अनुपातिकता के सिद्धांतों का पालन सुनिश्चित कर विभागीय क्षमता का प्रशिक्षण दिया जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्त (Religious and Charitable Endowments) · मंदिर प्रशासन और राज्य नियंत्रण · कार्यकारी अधिकारी (Executive Officer) की जवाबदेही · अनुच्छेद 226 और रिट क्षेत्राधिकार (Writ Jurisdiction) · न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की सीमा · आनुपातिकता का सिद्धांत (Doctrine of Proportionality) · सेवा-न्यायशास्त्र और अनुशासनात्मक दंड · अनुच्छेद 26 और धार्मिक संस्थाओं का प्रबंधन · देवस्वम् संपत्ति और अतिक्रमण · आंतरिक नियंत्रण एवं संतुलन (Checks and Balances) · प्रशासनिक निष्क्रियता और सार्वजनिक जवाबदेही · सहकारी संघवाद के संदर्भ में राज्य के कानून

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 226 — रिट क्षेत्राधिकार में दंड के संशोधन की सीमा
  • अनुच्छेद 26 — धार्मिक संस्था की संपत्ति का विधि के अनुसार प्रशासन

अवधारणा प्रवाह

मंदिर भूमि पर किरायेदारों का स्थायी निर्माण और निजी व्यक्तियों के नाम पट्टा जारी होना  →  कार्यकारी अधिकारी की ओर से पट्टा रद्द न करना और मंदिर निधि का अनधिकृत भुगतान  →  भक्तों और मठ की शिकायतों पर विभागीय आयुक्त द्वारा लंबे समय तक कार्रवाई न करना  →  आरोपित अधिकारी से रिपोर्ट लेने जैसी कमज़ोर जाँच और निगरानी तंत्र की विफलता  →  2015 में कार्यकारी अधिकारी की बर्खास्तगी और एकल पीठ द्वारा 2024 में पुनर्बहाली का आदेश  →  राज्य की अपील पर खंडपीठ द्वारा एकल पीठ का आदेश निरस्त और बर्खास्तगी को अनुपातपूर्ण मानना

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के अतिरिक्त ‘किसी अन्य प्रयोजन’ के लिए भी रिट जारी कर सकता है।
2. अनुच्छेद 32 के अंतर्गत उपचार का अधिकार स्वयं एक मौलिक अधिकार है, और उच्चतम न्यायालय केवल मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की स्थिति में ही रिट जारी कर सकता है।
3. अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रिट याचिका केवल भारत का नागरिक ही दायर कर सकता है।

उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. उपर्युक्त में से कोई नहीं, क्योंकि सभी कथन गलत हैं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: अनुच्छेद 226(1) मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के साथ-साथ ‘किसी अन्य प्रयोजन’ के लिए भी रिट जारी करने की शक्ति देता है, जो उच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार को उच्चतम न्यायालय से व्यापक बनाता है। कथन 2 सही है: अनुच्छेद 32 स्वयं मौलिक अधिकार है, पर इसका प्रयोग केवल मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन हेतु है। कथन 3 गलत है: अनुच्छेद 226 के अंतर्गत कोई भी व्यक्ति, जो प्रभावित हो, याचिका दायर कर सकता है, नागरिकता की शर्त नहीं है। अतः सही उत्तर ‘केवल दो’ है।

Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?
कथन (A): तमिलनाडु में हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्त विभाग (HR&CE) राज्य कानून के अंतर्गत मंदिरों का प्रशासन करता है।
कारण (R): संविधान का अनुच्छेद 26(घ) धार्मिक संप्रदाय को अपनी संपत्ति का प्रशासन ‘विधि के अनुसार’ करने का अधिकार देता है।

  1. (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
  2. (A) और (R) दोनों सही हैं, परंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
  3. (A) सही है, परंतु (R) गलत है।
  4. (A) गलत है, परंतु (R) सही है।

उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — अनुच्छेद 26(घ) धार्मिक संप्रदायों को अपनी संपत्ति का प्रशासन ‘विधि के अनुसार’ करने का अधिकार देता है। इसी ‘विधि के अनुसार’ पद में राज्य विधि द्वारा धार्मिक न्यासों और बंदोबस्त संस्थाओं का नियमन कर सकता है। तमिलनाडु में यह नियमन तमिलनाडु हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्त अधिनियम, 1959 के अंतर्गत होता है, इसलिए (R) (A) की सही व्याख्या है।

Q3. निम्नलिखित सूचियों का सुमेलन कीजिए:
सूची-I (रिट)
1. परमादेश (Mandamus)
2. उत्प्रेषण (Certiorari)
3. अधिकार पृच्छा (Quo Warranto)
4. प्रतिषेध (Prohibition)

सूची-II (अर्थ)
a. अधीनस्थ न्यायालय या प्राधिकारी को अपने क्षेत्राधिकार से बाहर कार्यवाही करने से रोकना
b. लोक प्राधिकारी को उसके विधिक कर्तव्य का पालन करने का आदेश देना
c. क्षेत्राधिकार-विहीन रूप से पारित आदेश को रद्द करना
d. किसी व्यक्ति के सार्वजनिक पद पर वैधानिक दावे की जाँच करना

सही सुमेलन चुनिए:

  1. 1-a, 2-b, 3-c, 4-d
  2. 1-b, 2-c, 3-d, 4-a
  3. 1-c, 2-d, 3-a, 4-b
  4. 1-d, 2-a, 3-b, 4-c

उत्तर: 1-b, 2-c, 3-d, 4-a — परमादेश (1) लोक प्राधिकारी को कर्तव्य का पालन करने का आदेश देता है, इसलिए 1-b। उत्प्रेषण (2) पूर्व में पारित क्षेत्राधिकार-विहीन आदेश को रद्द करता है, इसलिए 2-c। अधिकार पृच्छा (3) किसी व्यक्ति के सार्वजनिक पद पर वैधता की जाँच करता है, इसलिए 3-d। प्रतिषेध (4) अधीनस्थ न्यायालय को आगे की कार्यवाही से रोकता है, इसलिए 4-a। अतः विकल्प 2 सही है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ मद्रास उच्च न्यायालय ने एक ऐसे मामले में, जिसमें वर्ष 2011 में मंदिर भूमि पर स्थायी निर्माण की अनुमति दी गई थी, विभाग की निष्क्रियता को ‘प्रशासनिक कुप्रबंधन’ माना और दंड को संशोधित करने के एकल पीठ के आदेश को निरस्त कर दिया। इस निर्णय के आधार पर, मंदिर प्रशासन में अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने हेतु राज्य विभागों की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही बताइए कि अनुच्छेद 226 के अंतर्गत दंड की आनुपातिकता की न्यायिक समीक्षा कहाँ तक वैध है और उसकी सीमाएँ क्या हैं। (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर-कंकाल (मॉडल स्केलेटन):
1. भूमिका: मद्रास उच्च न्यायालय की खंडपीठ (न्यायमूर्ति एस.एम. सुब्रमण्यम और के. गोविंदराजन) द्वारा 2024 के एकल पीठ आदेश को निरस्त करना; तिरुवारूर के त्यागराज स्वामी मंदिर से जुड़ा मामला; ₹40 लाख के अनधिकृत भुगतान और मंदिर भूमि पर पट्टे का प्रसंग।
2. प्रथम भाग (प्रशासनिक जवाबदेही): (क) कार्यकारी अधिकारी (Executive Officer) की विधिक ड्यूटी—मंदिर संपत्ति की रक्षा; (ख) आयुक्त द्वारा शिकायतों पर समय पर कार्यवाही न करना और आरोपित अधिकारी से ही रिपोर्ट मँगवाना; (ग) ‘आंतरिक नियंत्रण एवं संतुलन’ का अभाव; (घ) अधिकारी की बर्खास्तगी (2015) अंततः भक्तों और अधीनम की शिकायत से संभव हुई—इसका अर्थ है कि शिकायत-तंत्र पर निर्भरता; (ङ) सुधार उपाय: ऑडिट, समयबद्ध जाँच, सूचना का सार्वजनिक प्रकटीकरण, लोकपाल-सदृश तंत्र; सुझाव के रूप में प्रशासनिक सुधार आयोग (दूसरा) की सिफारिशों का संदर्भ।
3. द्वितीय भाग (दंड की न्यायिक समीक्षा): (क) अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रिट क्षेत्राधिकार का दायरा; अनुच्छेद 32 और 136 से तुलना; (ख) न्यायिक समीक्षा का सिद्धांत—निर्णय-प्रक्रिया की समीक्षा, न कि गुणों की; B.C. Chaturvedi v. Union of India (1995) का संदर्भ; (ग) आनुपातिकता का सिद्धांत—Ranjit Thakur v. Union of India (1987) में अनुचित दंड पर न्यायालय की शक्ति; (घ) निर्णय का तर्क: दुर्व्यवस्था के आरोपित व्यक्ति के लिए बर्खास्तगी ही एकमात्र विकल्प मानी गई, क्योंकि उच्च न्यायालय द्वारा दंड का संशोधन सेवा-न्यायशास्त्र के विपरीत था।
4. संतुलित दृष्टिकोण: (क) पक्ष में—जवाबदेही और सार्वजनिक निधि की रक्षा; (ख) विपक्ष में—विभाग के भीतर दंड तय करने की स्वायत्तता पर प्रश्न, और न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा; (ग) निष्कर्ष: प्रशासनिक सुधार, समयबद्ध अनुशासनात्मक प्रक्रिया और न्यायिक संयम के बीच संतुलन।
5. सम्बंधित संवैधानिक संदर्भ: अनुच्छेद 26 (धार्मिक संप्रदायों के अधिकार, ‘विधि के अनुसार’ सीमा) और राज्य का धार्मिक बंदोबस्त पर नियमन।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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