14 Oct NSAP का नाम बदला, अब ‘प्रधानमंत्री सामाजिक सहायता योजना’ से जाने जाएगी
✎ NSAP (1995, अनुच्छेद 41, ग्रामीण विकास मंत्रालय) → 'प्रधानमंत्री सामाजिक सहायता योजना': 2026-27 से 2030-31 तक ₹53,428 करोड़; दिव्यांगता पेंशन की सीमा 80% से 40% (RPwD Act, 2016 के अनुरूप), आयु-सीमा समाप्त; दरें ₹375 (79 वर्ष तक)…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — कल्याणकारी योजनाएँ, सामाजिक न्याय तथा समाज के निर्बल वर्गों (वृद्ध, विधवा, दिव्यांगजन) के लिए तंत्र, विधि और संस्थाएँ | GS Paper II — राज्य के नीति निदेशक तत्त्व तथा केंद्र-राज्य संबंध (केंद्र प्रायोजित योजनाएँ) | GS Paper III — समावेशी संवृद्धि और सामाजिक सुरक्षा
- Prelims: राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (NSAP), अनुच्छेद 41 (राज्य के नीति निदेशक तत्त्व), केंद्र प्रायोजित योजना, बेंचमार्क दिव्यांगता (40% या अधिक), दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (RPwD Act), राष्ट्रीय परिवार लाभ योजना (NFBS), प्रधानमंत्री वृद्धावस्था पेंशन योजना, प्रधानमंत्री विधवा पेंशन योजना, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT), ग्रामीण विकास मंत्रालय
- Essay: सामाजिक सुरक्षा के सार्वभौमीकरण की ओर: कल्याणकारी राज्य में समावेशन और गरिमा, दिव्यांगजन: दया से अधिकार तक — सहायता नहीं, सशक्तीकरण
त्वरित पुनरावृत्ति: NSAP (1995, अनुच्छेद 41, ग्रामीण विकास मंत्रालय) → ‘प्रधानमंत्री सामाजिक सहायता योजना’: 2026-27 से 2030-31 तक ₹53,428 करोड़; दिव्यांगता पेंशन की सीमा 80% से 40% (RPwD Act, 2016 के अनुरूप), आयु-सीमा समाप्त; दरें ₹375 (79 वर्ष तक) और ₹625 (80+); लगभग 3.20 करोड़ लाभार्थी।
यह खबर चर्चा में क्यों?
14 अक्टूबर 2026 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (National Social Assistance Programme – NSAP) को 2026-27 से 2030-31 तक पाँच वर्षों के लिए जारी रखने की स्वीकृति दी और इसके लिए ₹53,428 करोड़ का परिव्यय निर्धारित किया। कार्यक्रम का नाम अब ‘प्रधानमंत्री सामाजिक सहायता योजना’ होगा तथा इसके पेंशन और पारिवारिक लाभ घटकों का भी पुनर्नामकरण किया जाएगा। सबसे महत्त्वपूर्ण नीतिगत परिवर्तन दिव्यांगता पेंशन में है: पात्रता के लिए दिव्यांगता की न्यूनतम सीमा 80% से घटाकर 40% कर दी गई है और न्यूनतम आयु की शर्त हटा दी गई है, अर्थात जन्म से ही दिव्यांगजन पात्र होंगे। संशोधित मासिक सहायता 79 वर्ष तक के लाभार्थियों के लिए ₹375 और 80 वर्ष तथा उससे अधिक आयु के लाभार्थियों के लिए ₹625 होगी। सरकारी वक्तव्य के अनुसार यह निर्णय सभी 36 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में लगभग 3.20 करोड़ लाभार्थियों को लाभ पहुँचाएगा।
पृष्ठभूमि
- NSAP का शुभारंभ 15 अगस्त 1995 को हुआ। इसका संवैधानिक आधार संविधान का अनुच्छेद 41 है, जो राज्य को वृद्धावस्था, बीमारी, दिव्यांगता और अनर्जित अभाव की दशा में लोक सहायता उपलब्ध कराने के लिए प्रयास करने का निदेश देता है। यह राज्य के नीति निदेशक तत्त्वों (भाग IV) में आता है, जो न्यायालय में प्रवर्तनीय नहीं हैं।
- आरंभ में इसके तीन घटक थे: राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना, राष्ट्रीय परिवार लाभ योजना और राष्ट्रीय मातृत्व लाभ योजना। बाद में मातृत्व लाभ घटक को अन्य मंत्रालय के कार्यक्षेत्र में स्थानांतरित कर दिया गया, और NSAP मुख्यतः पेंशन तथा पारिवारिक लाभ पर केंद्रित हो गया।
- 2007 में वृद्धावस्था पेंशन का नाम बदलकर इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना (IGNOAPS) किया गया। इसके बाद इंदिरा गांधी राष्ट्रीय विधवा पेंशन योजना (IGNWPS) और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय दिव्यांगता पेंशन योजना (IGNDPS) जुड़ीं। इस प्रकार NSAP के अंतर्गत पाँच उप-योजनाएँ बनीं।
- NSAP ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा क्रियान्वित केंद्र प्रायोजित योजना है। इसमें केंद्र एक न्यूनतम पेंशन राशि देता है और राज्य अपने संसाधनों से उसमें अतिरिक्त राशि जोड़ सकते हैं, इसलिए पेंशन की राशि राज्यों में अलग-अलग है। संविधान की सातवीं अनुसूची में ‘अपंगों और नियोज्य न रहे व्यक्तियों को सहायता’ राज्य सूची का विषय है, जबकि सामाजिक सुरक्षा और सामाजिक बीमा समवर्ती सूची में है।
- दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (Rights of Persons with Disabilities Act, 2016) ‘बेंचमार्क दिव्यांगता’ को कम से कम 40% दिव्यांगता वाले व्यक्ति के रूप में परिभाषित करता है और 21 प्रकार की दिव्यांगताओं को मान्यता देता है। पेंशन की 80% की सीमा इस वैधानिक परिभाषा से कहीं अधिक कठोर थी, इसलिए नया निर्णय योजना को अधिनियम की भावना के अनुरूप बनाता है।
- भारत ने 2007 में दिव्यांगजन अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UN CRPD) का अनुसमर्थन किया। यह अभिसमय सामाजिक संरक्षण और पर्याप्त जीवन स्तर के अधिकार पर बल देता है। पात्रता का विस्तार इसी अधिकार-आधारित दृष्टिकोण से जुड़ता है।
राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (NSAP) / प्रधानमंत्री सामाजिक सहायता योजना क्या है?
- स्वरूप: यह गरीबी रेखा से नीचे (BPL) के परिवारों के वृद्ध, विधवा और दिव्यांग व्यक्तियों को गैर-अंशदायी सामाजिक पेंशन तथा परिवार के मुख्य कमाने वाले की मृत्यु पर एकमुश्त सहायता देने वाला केंद्र प्रायोजित कार्यक्रम है। लाभार्थी को कोई अंशदान नहीं करना पड़ता।
- घटक: वृद्धावस्था पेंशन, विधवा पेंशन, दिव्यांगता पेंशन और राष्ट्रीय परिवार लाभ योजना (NFBS)। NFBS में BPL परिवार के मुख्य कमाने वाले की मृत्यु पर एकमुश्त ₹20,000 की सहायता दी जाती है।
- नए नाम: इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना अब ‘प्रधानमंत्री वृद्धावस्था पेंशन योजना’ और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय विधवा पेंशन योजना अब ‘प्रधानमंत्री विधवा पेंशन योजना’ कहलाएगी। समाचार में दिव्यांगता पेंशन और पारिवारिक लाभ घटकों के नए नामों का उल्लेख नहीं है।
- निरंतरता: पाँच वर्ष (2026-27 से 2030-31) के लिए कुल परिव्यय ₹53,428 करोड़ है। वृद्धावस्था और विधवा पेंशन तथा राष्ट्रीय परिवार लाभ योजना यथावत वर्तमान स्वरूप में जारी रहेंगी।
- दिव्यांगता पेंशन में परिवर्तन: बेंचमार्क दिव्यांगता की सीमा 80% से घटकर 40% हुई और न्यूनतम आयु की शर्त समाप्त हुई, यानी जन्म से ही पात्रता मिलेगी। इससे मध्यम श्रेणी की दिव्यांगता वाले बड़ी संख्या में लोग तथा दिव्यांग बच्चे योजना के दायरे में आएँगे।
- सहायता दर: दिव्यांगता पेंशन 79 वर्ष तक के लिए ₹375 प्रतिमाह और 80 वर्ष या उससे अधिक के लिए ₹625 प्रतिमाह होगी। संशोधित पात्रता, लाभार्थी कवरेज और दरें दिशानिर्देश जारी होने के तीन महीने के भीतर लागू की जाएँगी।
- क्रियान्वयन: योजना का संचालन ग्रामीण विकास मंत्रालय करता है, जबकि राज्य और केंद्रशासित प्रदेश लाभार्थी की पहचान तथा भुगतान करते हैं। भुगतान में प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) पर बल दिया जाता है, ताकि रिसाव कम हो।
- चुनौतियाँ: राज्यों के बीच पेंशन राशि में भारी अंतर; केंद्रीय अंश का लंबे समय तक स्थिर रहना और मुद्रास्फीति (Inflation) के अनुरूप अनुकूलित न होना; दिव्यांगता प्रमाणपत्र प्राप्त करने में कठिनाई; तथा पात्र लाभार्थियों की पहचान में त्रुटियाँ। ₹375 और ₹625 की दरें जीवन-निर्वाह लागत की तुलना में सीमित सहायता ही हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्त्व |
|---|---|
| 5 वर्ष की निरंतरता (2026-27 से 2030-31) और कुल परिव्यय ₹53,428 करोड़ | योजना को पाँच वर्ष की वित्तीय निश्चितता मिलती है। राज्य लाभार्थियों की पहचान और भुगतान की दीर्घकालिक योजना बना सकते हैं। |
| बेंचमार्क दिव्यांगता की सीमा 80% से घटाकर 40% की गई | यह दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की ‘बेंचमार्क दिव्यांगता’ की परिभाषा (40% या अधिक) के अनुरूप है। मध्यम स्तर की दिव्यांगता वाले लोग भी अब पात्र होंगे। |
| न्यूनतम आयु की शर्त समाप्त, जन्म से पात्रता | बाल्यावस्था से ही दिव्यांग बच्चों के परिवारों को सहायता मिलेगी, जिससे शिक्षा, चिकित्सा और पुनर्वास पर होने वाला खर्च कुछ हल्का होगा। |
| दिव्यांगता पेंशन की नई दरें: 79 वर्ष तक ₹375 और 80 वर्ष या अधिक पर ₹625 प्रति माह | आयु के साथ बढ़ती निर्भरता और चिकित्सा आवश्यकताओं को देखते हुए वरिष्ठ दिव्यांगजनों के लिए अधिक राशि रखी गई है। |
| वृद्धावस्था और विधवा पेंशन तथा राष्ट्रीय परिवार लाभ योजना यथावत; घटकों के नाम बदले गए | पेंशन के ढाँचे में बदलाव दिव्यांगता घटक तक सीमित है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना अब ‘प्रधानमंत्री वृद्धावस्था पेंशन योजना’ और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय विधवा पेंशन योजना ‘प्रधानमंत्री विधवा पेंशन योजना’ कहलाएगी। |
| लगभग 3.20 करोड़ लाभार्थी, सभी 36 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश; दिशानिर्देश जारी होने के 3 माह के भीतर क्रियान्वयन | योजना का राष्ट्रव्यापी विस्तार है। दिशानिर्देशों की समय-सीमा तय होने से नई पात्रता शीघ्र लागू करने की बाध्यता बनती है। |
महत्व
सामाजिक एवं समावेशी न्याय
- पात्रता की सीमा 80% से 40% करने पर वे दिव्यांगजन भी सामाजिक सुरक्षा के दायरे में आएँगे जो अब तक ‘अत्यंत गंभीर दिव्यांगता’ की शर्त के कारण बाहर थे।
- जन्म से पात्रता मिलने पर दिव्यांग शिशुओं और बच्चों के परिवारों पर आरंभिक वर्षों में पड़ने वाला आर्थिक दबाव घटेगा।
- नीति में कल्याण-आधारित दृष्टि से अधिकार-आधारित दृष्टि की ओर बढ़ने का संकेत मिलता है, जो दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की भावना के अनुरूप है।
संवैधानिक एवं नीतिगत
- अनुच्छेद 41 में निर्देशित है कि राज्य बेरोज़गारी, वृद्धावस्था, बीमारी और निःशक्तता की दशा में लोक सहायता का प्रभावी प्रावधान करे। यह योजना उसी निदेशक तत्त्व को मूर्त रूप देती है।
- अनुच्छेद 21 के अंतर्गत गरिमामय जीवन के अधिकार को सामाजिक सुरक्षा का न्यूनतम आधार मिलता है।
- दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 और संयुक्त राष्ट्र दिव्यांगजन अधिकार अभिसमय (UNCRPD) के प्रति भारत की प्रतिबद्धता के अनुरूप योजना की परिभाषाएँ एक समान हुई हैं।
आर्थिक एवं राजकोषीय
- ₹53,428 करोड़ का पाँच वर्षीय परिव्यय सामाजिक क्षेत्र पर सार्वजनिक व्यय का हिस्सा है। यह निर्धन परिवारों की क्रय-शक्ति को आधार देता है।
- छोटी किंतु नियमित नकद सहायता से परिवार स्वास्थ्य और पोषण पर अपेक्षाकृत अधिक व्यय कर पाते हैं, जिससे अनौपचारिक क्षेत्र के परिवारों में जोखिम घटता है।
- प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) के माध्यम से भुगतान होने पर रिसाव कम होता है और राजकोषीय संसाधनों का लक्षित उपयोग संभव होता है।
संघीय एवं प्रशासनिक
- यह केंद्र प्रायोजित योजना है, जिसमें केंद्र से मिलने वाली सहायता पर राज्य अपनी ओर से अतिरिक्त राशि जोड़ सकते हैं। सहकारी संघवाद का यह एक व्यावहारिक उदाहरण है।
- सभी 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एक समान पात्रता मानक लागू होने से राज्यों के बीच असमानता कुछ घटने की संभावना है।
चुनौतियाँ
1. पेंशन राशि की अपर्याप्तता
- ₹375 और ₹625 की मासिक सहायता वर्तमान जीवन-व्यय और दिव्यांगता से जुड़े अतिरिक्त खर्चों (उपकरण, चिकित्सा, देखभाल) की तुलना में बहुत कम है।
- वृद्धावस्था और विधवा पेंशन यथावत रहने से इन वर्गों के लिए मुद्रास्फीति (Inflation) के अनुरूप राशि बढ़ाने का प्रश्न अनसुलझा रहता है।
- केंद्र की सहायता की राशि स्थिर रहे तो राज्यों का अंशदान ही वास्तविक राशि तय करता है, जिससे राज्यों में बड़ा अंतर बना रहता है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: सामाजिक सुरक्षा, कल्याणकारी योजनाओं का प्रदर्शन
2. दिव्यांगता की पहचान और प्रमाणन
- 40% की सीमा लागू करने के लिए दिव्यांगता का मानकीकृत चिकित्सा मूल्यांकन और प्रमाणपत्र आवश्यक है।
- ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में चिकित्सा बोर्ड और प्रमाणन शिविर कम हैं, जिससे पात्र लोग प्रमाणपत्र के अभाव में लाभ से वंचित रह सकते हैं।
- विशिष्ट दिव्यांगता पहचान पत्र (UDID) की पहुँच और डेटा का मिलान अब भी चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: दिव्यांगजनों से जुड़े मुद्दे; शासन में पारदर्शिता
3. राज्यों पर राजकोषीय दबाव और अंशदान में असमानता
- पात्र लाभार्थियों की संख्या बढ़ने से राज्य अपने संसाधनों से अतिरिक्त राशि जोड़ने के लिए बाध्य हो सकते हैं।
- कमज़ोर राजकोषीय क्षमता वाले राज्य उच्च अंशदान नहीं कर पाएँगे, इसलिए क्षेत्रीय विषमता बढ़ सकती है।
- दिव्यांगजनों की राहत संविधान की सातवीं अनुसूची में राज्य सूची का विषय है, इसलिए राज्य की भूमिका केंद्रीय है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: संघ-राज्य संबंध, केंद्र प्रायोजित योजनाएँ
4. लक्ष्यीकरण और बहिष्करण त्रुटि
- योजना में गरीबी रेखा से नीचे (BPL) परिवारों को वरीयता मिलती रही है। पुरानी BPL सूचियों के आधार पर वास्तविक पात्र बाहर रह सकते हैं और अपात्र शामिल हो सकते हैं।
- अशिक्षा, जागरूकता की कमी और दस्तावेज़ों की जटिलता के कारण सबसे कमज़ोर लोग आवेदन ही नहीं कर पाते।
यूपीएससी लिंक: GS-2: कल्याणकारी योजनाओं का क्रियान्वयन; GS-3: समावेशी संवृद्धि
5. भुगतान प्रणाली और क्रियान्वयन में विलंब
- दिशानिर्देश जारी होने के बाद 3 माह में लागू करने की समय-सीमा चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि राज्यों को लाभार्थी-सूची नए सिरे से तैयार करनी होगी।
- आधार-आधारित DBT में बैंक खाते और सत्यापन की समस्याओं से भुगतान में देरी और बहिष्करण की शिकायतें रही हैं।
- नियमित सामाजिक अंकेक्षण और शिकायत-निवारण तंत्र सीमित होने से जवाबदेही कमज़ोर रहती है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: शासन, ई-गवर्नेंस और जवाबदेही
6. खंडित सामाजिक सुरक्षा ढाँचा
- दिव्यांगता, वृद्धावस्था और विधवा पेंशन अलग-अलग घटकों में चलती हैं। एक व्यक्ति पर एक से अधिक श्रेणियाँ लागू हों तो समन्वय की कठिनाई आती है।
- नाम बदलने जैसे प्रशासनिक परिवर्तन से वास्तविक लाभ में वृद्धि नहीं होती, इसलिए ध्यान क्रियान्वयन की गुणवत्ता पर रहना चाहिए।
यूपीएससी लिंक: GS-2: सरकारी नीतियाँ और हस्तक्षेप
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| राशि का स्तर | ₹375/₹625 की सहायता दिव्यांगता से जुड़े वास्तविक खर्चों की तुलना में अपर्याप्त है। |
| पात्रता का सत्यापन | 40% की सीमा के लिए चिकित्सा प्रमाणन और UDID की व्यापक उपलब्धता आवश्यक है। |
| राज्यों का वित्तीय बोझ | लाभार्थी बढ़ने से अंशदान का दबाव; राज्यों के बीच पेंशन राशि में असमानता। |
| बहिष्करण त्रुटि | पुराने BPL आँकड़ों और दस्तावेज़ी बाधाओं के कारण पात्र लोगों का छूट जाना। |
| समय-सीमा | दिशानिर्देशों के बाद 3 माह में क्रियान्वयन का प्रशासनिक दबाव। |
| वृद्ध और विधवा घटक | राशि और पात्रता में कोई बदलाव नहीं, जबकि जीवन-व्यय बढ़ रहा है। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (NSAP): 15 अगस्त 1995 को आरंभ; ग्रामीण विकास मंत्रालय के अधीन केंद्र प्रायोजित योजना, जिसे अब ‘प्रधानमंत्री सामाजिक सहायता योजना’ नाम दिया गया है
- इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना (अब प्रधानमंत्री वृद्धावस्था पेंशन योजना)
- इंदिरा गांधी राष्ट्रीय विधवा पेंशन योजना (अब प्रधानमंत्री विधवा पेंशन योजना)
- इंदिरा गांधी राष्ट्रीय दिव्यांगता पेंशन योजना: इसी घटक में पात्रता और दरों में संशोधन किया गया है
- राष्ट्रीय परिवार लाभ योजना (NFBS): मुख्य कमाने वाले की मृत्यु पर शोकग्रस्त निर्धन परिवार को एकमुश्त सहायता
- विशिष्ट दिव्यांगता पहचान पत्र (UDID) परियोजना: दिव्यांगता प्रमाणन और लाभ-वितरण के लिए एकल राष्ट्रीय पहचान
आगे की राह
- दिव्यांगता पेंशन की राशि को मुद्रास्फीति-सूचकांक से जोड़कर नियमित अंतराल पर संशोधित किया जाए, ताकि इसका वास्तविक मूल्य बना रहे।
- UDID और चिकित्सा प्रमाणन को सुलभ बनाया जाए। इसके लिए ज़िला स्तर पर नियमित शिविर लगें और प्रमाणपत्र ऑनलाइन उपलब्ध हों, ताकि 40% की सीमा का लाभ वास्तव में मिल सके।
- दिशानिर्देश स्पष्ट, सरल और राज्यों से परामर्श के बाद जारी हों। राज्यों को लाभार्थी-सूची के अद्यतन के लिए तकनीकी और वित्तीय सहायता दी जाए।
- पुरानी BPL सूची पर निर्भरता घटाकर सामाजिक-आर्थिक आँकड़ों और स्वतः समावेशन (Auto-inclusion) की व्यवस्था अपनाई जाए।
- भुगतान के लिए DBT को सुदृढ़ किया जाए और बैंक खाते तथा सत्यापन की समस्याओं के निवारण हेतु डाकघर और बैंक सखी जैसे माध्यमों का उपयोग हो।
- ग्राम सभाओं द्वारा सामाजिक अंकेक्षण और शिकायत-निवारण तंत्र को सशक्त किया जाए।
- पेंशन को पुनर्वास, सहायक उपकरण, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ा जाए, ताकि नकद सहायता के साथ व्यापक दिव्यांगता-सेवाएँ मिलें।
- वृद्धावस्था और विधवा पेंशन की राशि की भी समीक्षा हो तथा राज्यों से अंशदान बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन-आधारित व्यवस्था बनाई जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (NSAP) · अनुच्छेद 41 (राज्य की नीति के निदेशक तत्त्व) · सामाजिक सुरक्षा (Social Security) · बेंचमार्क दिव्यांगता (Benchmark Disability) – 40% · दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 · केंद्र प्रायोजित योजना (Centrally Sponsored Scheme) · प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (Direct Benefit Transfer) · समावेशन और बहिष्करण त्रुटि (Inclusion and Exclusion Error) · अनुच्छेद 21 – गरिमापूर्ण जीवन · सार्वभौमिक दिव्यांगता पहचान पत्र (UDID) · पेंशन राशि की पर्याप्तता · सहकारी संघवाद और राज्यों का अंशदान
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 41 — वृद्धावस्था, निःशक्तता में लोक सहायता
- अनुच्छेद 38 — लोक कल्याण हेतु सामाजिक व्यवस्था
- अनुच्छेद 21 — गरिमामय जीवन का मौलिक अधिकार
- अनुच्छेद 282 — लोक प्रयोजन हेतु केंद्र का अनुदान
- सातवीं अनुसूची, राज्य सूची प्रविष्टि 9 — दिव्यांगों और अक्षमों की राहत
- सातवीं अनुसूची, समवर्ती सूची प्रविष्टि 23 — सामाजिक सुरक्षा और सामाजिक बीमा
अवधारणा प्रवाह
अनुच्छेद 41 के निदेशक तत्त्व के अंतर्गत 1995 में NSAP का आरंभ → दिव्यांगता पेंशन की 80% की ऊँची सीमा से अनेक पात्र दिव्यांगजन बाहर → दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 में बेंचमार्क दिव्यांगता की सीमा 40% निर्धारित → केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा 2026-27 से 2030-31 के लिए ₹53,428 करोड़ की मंज़ूरी; सीमा 40% और आयु की शर्त समाप्त → योजना का नाम ‘प्रधानमंत्री सामाजिक सहायता योजना’ और दिशानिर्देश जारी होने के 3 माह में नई पात्रता लागू → UDID, चिकित्सा प्रमाणन और DBT के माध्यम से लगभग 3.20 करोड़ लाभार्थियों तक पहुँच → क्रियान्वयन की गुणवत्ता से तय होगा कि समावेशन, गरिमा और सामाजिक सुरक्षा का लक्ष्य सिद्ध होता है या नहीं
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (NSAP) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इसकी शुरुआत 1995 में हुई थी और यह संविधान के अनुच्छेद 41 में निहित निदेशक तत्त्व को साकार करने का एक साधन है।
2. केंद्रीय मंत्रिमंडल के हालिया निर्णय के अनुसार दिव्यांगता पेंशन के लिए न्यूनतम दिव्यांगता की सीमा 80% से घटाकर 40% कर दी गई है, जो दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की ‘बेंचमार्क दिव्यांगता’ की परिभाषा के अनुरूप है।
3. यह पूर्णतः केंद्रीय क्षेत्र की योजना है, जिसमें राज्यों की कोई भूमिका नहीं होती।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: NSAP 15 अगस्त 1995 को शुरू हुआ और यह अनुच्छेद 41 (वृद्धावस्था, नि:शक्तता आदि में लोक सहायता) से जुड़ा है। कथन 2 सही है: 2016 के अधिनियम में बेंचमार्क दिव्यांगता कम से कम 40% है। कथन 3 गलत है: NSAP केंद्र प्रायोजित योजना है, जिसमें राज्य अपनी ओर से अतिरिक्त राशि भी जोड़ते हैं और इसका कार्यान्वयन भी करते हैं।
Q2. अभिकथन (A): दिव्यांगता पेंशन से न्यूनतम आयु की शर्त हटाए जाने के बाद दिव्यांग बच्चे जन्म से ही सहायता के पात्र हो गए हैं।
कारण (R): पहले यह पेंशन केवल वयस्क दिव्यांगजन, यानी 18 वर्ष या उससे अधिक आयु के लाभार्थियों को मिलती थी।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
- A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है
- A और R दोनों सही हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है
- A सही है, किंतु R गलत है
- A गलत है, किंतु R सही है
उत्तर: A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है — समाचार के अनुसार न्यूनतम आयु की शर्त हटाने से जन्म से पात्रता मिली है, इसलिए A सही है। पूर्व की इंदिरा गांधी राष्ट्रीय दिव्यांगता पेंशन योजना में पात्रता आयु 18 वर्ष से शुरू होती थी, इसलिए R भी सही है और वही A की पृष्ठभूमि स्पष्ट करता है।
Q3. स्तंभ-I (संवैधानिक प्रावधान) को स्तंभ-II (विषय) से सुमेलित कीजिए:
स्तंभ-I
A. अनुच्छेद 41
B. सातवीं अनुसूची, राज्य सूची की प्रविष्टि 9
C. सातवीं अनुसूची, समवर्ती सूची की प्रविष्टि 23
स्तंभ-II
1. सामाजिक सुरक्षा और सामाजिक बीमा
2. विकलांगों और काम करने में असमर्थ व्यक्तियों की सहायता
3. बेरोज़गारी, वृद्धावस्था, बीमारी और नि:शक्तता की दशा में लोक सहायता
- A-1, B-2, C-3
- A-2, B-3, C-1
- A-3, B-2, C-1
- A-3, B-1, C-2
उत्तर: A-3, B-2, C-1 — अनुच्छेद 41 बेरोज़गारी, वृद्धावस्था, बीमारी और नि:शक्तता में लोक सहायता से संबंधित निदेशक तत्त्व है (A-3)। राज्य सूची की प्रविष्टि 9 ‘विकलांगों और काम न कर सकने योग्य व्यक्तियों की सहायता’ से संबंधित है (B-2)। समवर्ती सूची की प्रविष्टि 23 सामाजिक सुरक्षा और सामाजिक बीमा से संबंधित है (C-1)।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (NSAP) के अंतर्गत दिव्यांगता पेंशन की पात्रता-सीमा को 80% से घटाकर 40% करना संवैधानिक दायित्वों और दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की भावना के अनुरूप है। परीक्षण कीजिए। साथ ही यह भी बताइए कि पेंशन की राशि और क्रियान्वयन से जुड़ी कौन-सी चुनौतियाँ इस सुधार के पूरे लाभ को सीमित कर सकती हैं। (15 Marks)
रूपरेखा: भूमिका (2-3 पंक्तियाँ): NSAP की शुरुआत 15 अगस्त 1995 को हुई। इसके घटक हैं इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था, विधवा और दिव्यांगता पेंशन योजनाएँ तथा राष्ट्रीय पारिवारिक लाभ योजना। अक्टूबर 2026 में मंत्रिमंडल ने 2026-27 से 2030-31 के लिए ₹53,428 करोड़ के परिव्यय से इसे जारी रखने की मंज़ूरी दी, जिसका अनुमानित लाभ 3.20 करोड़ लाभार्थियों को मिलेगा। योजना का नाम बदलकर प्रधानमंत्री सामाजिक सहायता योजना किया गया है।
भाग 1 – सुधार का औचित्य: (क) संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 41 (विकलांगता में लोक सहायता), अनुच्छेद 21 (गरिमापूर्ण जीवन) और अनुच्छेद 14। (ख) दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 में बेंचमार्क दिव्यांगता कम से कम 40% है और धारा 24 में सामाजिक सुरक्षा का प्रावधान है। 40% की सीमा से योजना इस परिभाषा के अनुरूप होती है। (ग) संयुक्त राष्ट्र दिव्यांगजन अधिकार अभिसमय (UNCRPD, 2006) की पुष्टि भारत ने 2007 में की थी। (घ) 80% की पुरानी सीमा से बहिष्करण होता था, क्योंकि बहुत से मध्यम दिव्यांगजन (40-79%) पेंशन से बाहर थे। जनगणना 2011 के अनुसार दिव्यांग जनसंख्या लगभग 2.68 करोड़ (2.21%) थी। (ङ) जन्म से पात्रता: न्यूनतम आयु हटने से बाल्यावस्था में चिकित्सा, चिकित्सीय पुनर्वास और शिक्षा पर होने वाले परिवार के खर्च को सहारा मिलता है। यह अवस्था-आधारित भेद भी समाप्त करता है।
भाग 2 – सीमाएँ और चुनौतियाँ: (क) राशि की पर्याप्तता: ₹375 (79 वर्ष तक) और ₹625 (80 वर्ष या अधिक) की मासिक राशि जीवन-निर्वाह लागत और न्यूनतम मज़दूरी की तुलना में बहुत कम है। इसलिए पेंशन सहायक भर रह जाती है, पूर्ण सामाजिक सुरक्षा नहीं बन पाती। (ख) राज्यों के अंशदान में भारी असमानता से सहकारी संघवाद पर प्रश्न उठता है और दिव्यांगजन के बीच क्षेत्रीय विषमता बढ़ती है। (ग) पात्रता सत्यापन: UDID और चिकित्सा प्रमाणन में विलंब, ग्रामीण क्षेत्रों में प्रमाणन केंद्रों की कमी, BPL आधारित लक्ष्यीकरण की पुरानी सूचियाँ और समावेशन व बहिष्करण त्रुटियाँ। (घ) आधार-आधारित DBT की बाधाएँ: बैंकिंग पहुँच, बायोमेट्रिक विफलता और भुगतान में देरी। (ङ) राजकोषीय भार: पात्र लाभार्थी बढ़ने से केंद्र और राज्यों पर व्यय बढ़ेगा, जबकि दिशानिर्देश जारी होने के तीन माह के भीतर लागू करने की समय-सीमा है। (च) पेंशन मूलतः आय-सहायता है, जबकि दिव्यांगजन को सुगम्यता, शिक्षा, रोज़गार और सहायक उपकरण भी चाहिए।
आगे की राह: पेंशन राशि का आवधिक सूचकांकन (मुद्रास्फीति से जोड़ना), UDID के आधार पर स्वतः पात्रता निर्धारण, घर-द्वार प्रमाणन शिविर, राज्यों के लिए न्यूनतम अंशदान का मानदंड, सामाजिक अंकेक्षण और शिकायत निवारण तंत्र, तथा पेंशन को सुगम्य भारत अभियान जैसी पहलों और समावेशी शिक्षा व कौशल योजनाओं से जोड़ना।
निष्कर्ष: यह सुधार कल्याणकारी राज्य की ओर ‘दान’ से ‘अधिकार-आधारित’ दृष्टिकोण का महत्त्वपूर्ण कदम है, परंतु उसकी सफलता राशि की पर्याप्तता और सुचारु क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी।
स्रोत: orissapost.com
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