ग्राम पंचायत ने शुरू किया बाघ-हाथी जैसे वन्य जीवों से फसलों की सुरक्षा का अभियान, जानिए कैसे मिलेगा लाभ

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ग्राम पंचायत ने शुरू किया बाघ-हाथी जैसे वन्य जीवों से फसलों की सुरक्षा का अभियान, जानिए कैसे मिलेगा लाभ

पंचायत की बाड़ परियोजनायोजना शुरू₹10 लाख आवंटनलाभार्थी चयनग्राम सभाबाड़ निर्माण₹400/मीटर अनुदानफसल सुरक्षामानव-वन्यजीव संघर्ष कम
पंचायत की बाड़ परियोजना

✎ मानव-वन्यजीव संघर्ष में बाड़ जैसे गैर-प्राणघातक उपाय स्थानीय स्तर पर प्रभावी हैं, पर दीर्घकालिक समाधान के लिए आवास-संरक्षण और वन्यजीव गलियारों की आवश्यकता है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II — शासन (स्थानीय शासन, पंचायती राज, ग्राम सभा की भूमिका)  |  सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र III — पर्यावरण एवं जैव विविधता (मानव-वन्यजीव संघर्ष, वन्यजीव संरक्षण)  |  सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र III — कृषि (फसल सुरक्षा, कृषि-आधारित आजीविका)
  • Prelims: मानव-वन्यजीव संघर्ष (Human-Wildlife Conflict), ग्राम पंचायत (Gram Panchayat) और ग्राम सभा (Gram Sabha) की भूमिका, अनुच्छेद 243G (पंचायतों की शक्तियाँ और उत्तरदायित्व), अनुच्छेद 243 (ख) — ग्राम सभा की परिभाषा से संबंधित संवैधानिक प्रावधान, वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 (Wildlife (Protection) Act, 1972), प्रोजेक्ट एलीफैंट (Project Elephant), 1992, GI पाइप (Galvanised Iron Pipe) और चेन-लिंक बाड़ का तकनीकी स्वरूप, ग्यारहवीं अनुसूची (Eleventh Schedule) — कृषि और पशुपालन से जुड़े विषय
  • Essay: मानव-वन्यजीव संघर्ष: विकास, संरक्षण और आजीविका के बीच संतुलन की चुनौती, विकेंद्रीकृत शासन में ग्राम सभा की भूमिका: स्थानीय संसाधनों से स्थानीय समस्याओं का समाधान

त्वरित पुनरावृत्ति: मानव-वन्यजीव संघर्ष में बाड़ जैसे गैर-प्राणघातक उपाय स्थानीय स्तर पर प्रभावी हैं, पर दीर्घकालिक समाधान के लिए आवास-संरक्षण और वन्यजीव गलियारों की आवश्यकता है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

केरल के कोल्लम ज़िले की वेट्टिकवला ग्राम पंचायत ने वन्यजीवों द्वारा फसल क्षति और मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए चेन-लिंक बाड़ लगाने की नई परियोजना शुरू की है। इस योजना के अंतर्गत केला, नारियल, सब्ज़ियाँ और फलदार वृक्ष उगाने वाले किसान सहायता के पात्र होंगे। ग्राम पंचायत प्रति मीटर बाड़ पर ₹400 का अनुदान देगी, जिसकी अधिकतम सीमा प्रति किसान ₹50,000 रखी गई है। लाभार्थियों का चयन ग्राम सभाओं के माध्यम से होगा। चालू वित्तीय वर्ष के लिए ग्राम पंचायत ने अपनी निधि से ₹10 लाख आवंटित किए हैं, जिससे कुल 2,500 मीटर चेन-लिंक बाड़ का निर्माण किया जाएगा। यह पहल स्थानीय स्तर पर संघर्ष-शमन के लिए एक अनारक्षित, गैर-प्राणघातक उपाय के रूप में देखी जा रही है।

पृष्ठभूमि

  • भारत में मानव-वन्यजीव संघर्ष वन-क्षेत्रों के सिकुड़ने, आवास-विखंडन और कृषि भूमि के वन-सीमाओं तक विस्तार के कारण बढ़ा है। केरल में वन-सीमावर्ती बागानों और घरेलू बाड़ियों में इसकी गंभीरता विशेष रूप से दिखाई देती है।
  • 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 के द्वारा संविधान में भाग IX जोड़ा गया और पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा मिला। अनुच्छेद 243G के अंतर्गत राज्य विधानमंडल पंचायतों को आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय की योजनाएँ तैयार करने और लागू करने की शक्ति दे सकते हैं।
  • अनुच्छेद 243A ग्राम सभा के गठन का प्रावधान करता है। ग्राम सभा ग्राम स्तर पर उन व्यक्तियों से बनी संस्था है जो पंचायत क्षेत्र के मतदाता-सूची में पंजीकृत हों, और इसके माध्यम से लाभार्थियों का चयन पारदर्शी रूप से किया जाता है।
  • वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के अंतर्गत वन्यजीवों को अनुसूचियों में रखकर उनके शिकार पर रोक लगाई गई है। इसलिए वन्यजीव-जनित क्षति से निपटने के लिए बाड़ जैसे गैर-हिंसक उपाय विशेष महत्व रखते हैं।
  • केंद्र सरकार ने 1992 में प्रोजेक्ट एलीफैंट (Project Elephant) आरंभ किया, जिसमें हाथियों के संरक्षण के साथ आवास-संरक्षण और संघर्ष-शमन के उपायों को भी प्राथमिकता दी गई। राज्य स्तर पर स्थानीय निकाय और राज्य सरकारें अपनी योजनाओं के माध्यम से इसी उद्देश्य की पूर्ति करती हैं।

चेन-लिंक बाड़ सहायता योजना क्या है?

  • यह ग्राम पंचायत स्तर की एक अनुदान आधारित योजना है, जिसमें किसान अपने खेत के चारों ओर चेन-लिंक बाड़ लगाने पर प्रति मीटर निश्चित राशि प्राप्त करते हैं।
  • पात्रता फसल-आधारित है। केला, नारियल, सब्ज़ियाँ और फलदार वृक्ष उगाने वाले किसान ही इसके लिए पात्र माने गए हैं।
  • तकनीकी मानक तय हैं: 1.5 इंच के GI पाइपों में चेन-लिंक लगाई जाती है, पाइप कंक्रीट में स्थापित होते हैं, और बाड़ की न्यूनतम ऊँचाई 1.2 मीटर होनी चाहिए।
  • प्रक्रिया पहले किसान के व्यय पर निर्माण और बाद में अनुदान की प्रतिपूर्ति की है। किसान को इंजीनियर द्वारा जारी मूल्यांकन प्रमाण-पत्र कृषि भवन में जमा करना होता है।
  • लगभग पाँच वर्ष तक खेती जारी रखने के वचन-पत्र पर ₹200 के स्टाम्प पेपर पर अनुबंध किया जाता है। इसका उद्देश्य निवेशित संरचना के दुरुपयोग या भूमि-उपयोग परिवर्तन को रोकना है।
  • लाभार्थियों का चयन ग्राम सभा के माध्यम से होता है, जिससे चयन में सामुदायिक सहभागिता और पारदर्शिता बनी रहती है।
  • वित्तीय स्रोत ग्राम पंचायत की अपनी निधि है, इसलिए योजना का विस्तार स्थानीय संसाधनों की उपलब्धता पर निर्भर करता है।
  • सीमाएँ भी हैं: बाड़ से संघर्ष पूरी तरह समाप्त नहीं होता, बल्कि प्रायः प्रभाव अन्य क्षेत्रों की ओर स्थानांतरित हो सकता है। इसलिए इसे वन्यजीव गलियारों और आवास-प्रबंधन जैसे दीर्घकालिक उपायों के साथ जोड़ना आवश्यक है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
योजना का स्वरूप केरल के कोल्लम जिले की वेट्टिकवला ग्राम पंचायत द्वारा अपने निजी कोष से शुरू की गई स्थानीय पहल, जिसका उद्देश्य मानव-वन्यजीव संघर्ष (Human-Wildlife Conflict) घटाकर खेतों की रक्षा करना है।
लाभार्थी चयन लाभार्थियों का चयन सीधे ग्राम सभा के माध्यम से होता है, जिससे चयन प्रक्रिया में स्थानीय सहभागिता और पारदर्शिता सुनिश्चित होती है।
पात्र फसलें केला, नारियल, सब्ज़ी और फलदार वृक्ष उगाने वाले किसान पात्र हैं, यानी बाड़ का लाभ उन फसलों को दिया गया है जो वन्यजीवों के लिए अधिक आकर्षक मानी जाती हैं।
अनुदान की संरचना प्रति मीटर ₹400 का अनुदान और प्रति किसान अधिकतम ₹50,000 की सीमा तय है। इस सीमा के अनुसार एक किसान को अधिकतम लगभग 125 मीटर बाड़ पर अनुदान मिल सकता है।
निर्माण के मानक चेन-लिंक बाड़ को 1.5 इंच के GI पाइप पर लगाना, पाइप को कंक्रीट में स्थापित करना और न्यूनतम 1.2 मीटर ऊँचाई रखना अनिवार्य है। इससे बाड़ की टिकाऊपन और प्रभावशीलता सुनिश्चित होती है।
सत्यापन और प्रतिबद्धता किसान को पहले अपने खर्च पर निर्माण करना होता है, इंजीनियर का मूल्यांकन प्रमाणपत्र कृषि भवन में जमा करना होता है और ₹200 के स्टाम्प पेपर पर पाँच वर्ष तक खेती जारी रखने का करार करना होता है।

महत्व

सामाजिक-आर्थिक

  • फसल क्षति कम होने से छोटे और सीमांत किसानों की आय सुरक्षित रहती है और कृषि जोखिम घटता है।
  • बाड़ के कारण किसान खेती छोड़ने के बजाय उसी भूमि पर टिके रहते हैं, जिससे ग्रामीण रोज़गार और भूमि-उपयोग की निरंतरता बनी रहती है।
  • मानव-वन्यजीव संघर्ष से होने वाली असुरक्षा की भावना घटने से ग्रामीण जीवन की गुणवत्ता पर सकारात्मक असर पड़ता है।

प्रशासनिक और शासन-संबंधी

  • ग्राम पंचायत द्वारा अपने संसाधनों से स्थानीय समस्या का समाधान करना स्थानीय स्वशासन की वास्तविक क्षमता को दर्शाता है।
  • ग्राम सभा के माध्यम से चयन, इंजीनियर का प्रमाणपत्र और स्टाम्प पेपर पर करार जैसी व्यवस्थाएँ लाभ के दुरुपयोग को रोकने का प्रयास हैं।
  • निर्माण-पूर्व अनुदान के बजाय निर्माण-पश्चात भुगतान की व्यवस्था वास्तविक कार्य के आधार पर भुगतान सुनिश्चित करती है।

पर्यावरणीय

  • बाड़ के माध्यम से वन्यजीवों को खेतों से दूर रखा जा सकता है, जिससे वन्यजीव और मानव दोनों के बीच टकराव कम हो सकता है।
  • यह उपाय जीव-हत्या या वन्यजीवों को नुकसान पहुँचाने वाले कठोर उपायों की तुलना में अधिक व्यावहारिक और अहिंसक माना जा सकता है।

चुनौतियाँ

1. बाड़ की लागत और छोटे किसानों की पहुँच

  • निर्माण-पूर्व खर्च किसान को स्वयं वहन करना पड़ता है, जिससे कम पूँजी वाले छोटे किसान योजना से वंचित रह सकते हैं।
  • प्रति किसान ₹50,000 की सीमा बड़े खेतों के लिए पर्याप्त नहीं हो सकती, जिससे अनुदान की वास्तविक पहुँच सीमित रहती है।
  • वार्षिक आवंटन ₹10 लाख और 2,500 मीटर बाड़ का लक्ष्य सीमित है, इसलिए सभी प्रभावित किसानों को एक साथ लाभ देना कठिन है।

2. मानव-वन्यजीव संघर्ष की प्रकृति

  • बाड़ केवल एक तात्कालिक उपाय है; वन्यजीवों का आवास और भोजन-स्रोत बदलने से उत्पन्न दबाव का समाधान इससे पूरी तरह नहीं होता।
  • हाथी जैसे बड़े जीवों के लिए बाड़ की संरचना और ऊँचाई की प्रभावशीलता पर प्रश्न उठ सकते हैं, इसलिए तकनीकी मानकों का निरंतर मूल्यांकन आवश्यक है।
  • वन सीमा से लगे गाँवों में संघर्ष का स्वरूप अलग होता है, इसलिए एक समान मानक हर क्षेत्र में पर्याप्त नहीं हो सकता।

3. वन्यजीव संरक्षण कानून और स्थानीय उपायों का तालमेल

  • वन्यजीव संरक्षण से जुड़े कानूनी प्रावधान मुख्यतः राज्य और केंद्र के स्तर पर तय होते हैं, जबकि बाड़ जैसे उपाय स्थानीय निकाय चलाता है।
  • बाड़ लगाने के दौरान वन्यजीवों के आवागमन मार्ग बाधित होने का जोखिम रहता है, जिससे पारिस्थितिक असंतुलन की आशंका हो सकती है।
  • अनुमति, मानक और निगरानी के बीच स्पष्ट समन्वय न होने पर स्थानीय पहलें असंगत हो सकती हैं।

4. पंचायती राज संस्थाओं की वित्तीय क्षमता

  • ग्राम पंचायत का अपना कोष सीमित होता है, इसलिए ऐसी योजनाएँ निरंतर चलाने के लिए अतिरिक्त वित्तीय स्रोत आवश्यक हैं।
  • पंचायतों के पास सभी कार्य संपादित करने की तकनीकी और प्रशासनिक क्षमता नहीं होती, विशेषकर इंजीनियर द्वारा मूल्यांकन जैसे चरणों में।
  • वित्त आयोग के अनुदान पर निर्भरता बढ़ने से स्थानीय योजनाओं की स्वायत्तता सीमित हो सकती है।

5. भूमि-उपयोग और दीर्घकालिक प्रतिबद्धता

  • पाँच वर्ष तक खेती जारी रखने का करार किसान की स्वतंत्रता पर सीमा लगाता है, जिससे आर्थिक परिस्थितियाँ बदलने पर उसके विकल्प घट सकते हैं।
  • भूमि-स्वामित्व और पट्टेदारी की स्थिति स्पष्ट न होने पर पात्रता तय करना कठिन हो सकता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

समस्या चिंता
प्रारंभिक लागत किसान को निर्माण-पूर्व खर्च स्वयं उठाना पड़ता है, जिससे कम साधन वाले किसान पीछे रह सकते हैं।
अनुदान सीमा ₹50,000 की अधिकतम सीमा बड़े खेतों के लिए अपर्याप्त हो सकती है।
सीमित आवंटन ₹10 लाख का वार्षिक आवंटन और 2,500 मीटर का लक्ष्य व्यापक माँग को पूरा नहीं कर सकता।
तकनीकी प्रभावशीलता बाड़ की ऊँचाई और संरचना सभी वन्यजीवों के लिए समान रूप से प्रभावी नहीं हो सकती।
पारिस्थितिक प्रभाव वन्यजीवों के आवागमन मार्ग बाधित होने से दीर्घकालिक पारिस्थितिक असंतुलन का जोखिम है।
वित्तीय स्थिरता पंचायत का अपना कोष सीमित होने से योजना की निरंतरता पर अनिश्चितता बनी रहती है।

आगे की राह

  • वन्यजीव आवागमन मार्गों की पहचान कर बाड़ का स्थान तय किया जाए, ताकि पारिस्थितिक संतुलन बना रहे।
  • छोटे और सीमांत किसानों के लिए निर्माण-पूर्व भुगतान या सामूहिक बाड़ परियोजना का विकल्प अपनाया जाए।
  • बाड़ के साथ फसल-विविधीकरण, रात्रि-निगरानी और चेतावनी प्रणाली जैसे पूरक उपाय जोड़े जाएँ।
  • अनुदान की सीमा और दर को क्षेत्र की भूमि-माप और फसल-प्रकार के अनुसार समय-समय पर संशोधित किया जाए।
  • पंचायत के स्तर पर तकनीकी सहायता के लिए कृषि और वन विभाग के बीच स्पष्ट समन्वय तंत्र बनाया जाए।
  • ग्राम सभा की निगरानी में लाभार्थी-सूची और निर्माण-स्थिति का सार्वजनिक प्रकाशन किया जाए, ताकि पारदर्शिता बढ़े।
  • पंचायत के स्वयं के कोष के साथ राज्य और वित्त आयोग के अनुदान के संयोजन पर विचार किया जाए, ताकि योजना टिकाऊ बने।
  • अनुभव और परिणामों के आँकड़े एकत्र कर अन्य ग्राम पंचायतों के लिए मानक मॉडल तैयार किया जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

मानव-वन्यजीव संघर्ष · स्थानीय स्वशासन · ग्राम पंचायत · कृषि सुरक्षा · ग्रामीण विकास · वन्यजीव संरक्षण · सामुदायिक भागीदारी · सतत कृषि · पंचायती राज संस्थाएँ · वित्तीय सहायता · फसल क्षति · पर्यावरण प्रबंधन

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 243G: पंचायतों को कृषि और भूमि सुधार से जुड़े कार्य सौंपने की शक्ति।
  • ग्यारहवीं अनुसूची: कृषि, भूमि सुधार और मृदा संरक्षण जैसे पंचायत के विषय।
  • अनुच्छेद 243A: ग्राम सभा द्वारा लाभार्थी चयन की संवैधानिक आधारशिला।
  • अनुच्छेद 48A: पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण का राज्य का दायित्व।
  • अनुच्छेद 51A(छ): प्राकृतिक पर्यावरण और वन्यजीवों की रक्षा का मौलिक कर्तव्य।

अवधारणा प्रवाह

मानव-वन्यजीव संघर्ष से फसल-क्षति बढ़ती है और किसानों की आय व खेती की निरंतरता खतरे में पड़ती है।  →  ग्राम पंचायत अपने कोष से बाड़ परियोजना शुरू करती है और ग्राम सभा के माध्यम से लाभार्थियों का चयन करती है।  →  किसान मानकों के अनुसार बाड़ का निर्माण करता है, इंजीनियर का मूल्यांकन प्रमाणपत्र प्रस्तुत करता है और पाँच वर्ष की खेती का करार करता है।  →  प्रति मीटर ₹400 के अनुदान और ₹50,000 की सीमा के अंतर्गत भुगतान होता है, जिससे फसल-सुरक्षा और भूमि पर टिके रहने को प्रोत्साहन मिलता है।  →  फसल-क्षति घटने और खेती जारी रहने से मानव-वन्यजीव संघर्ष का दबाव कम होता है और स्थानीय कृषि अर्थव्यवस्था स्थिर रहती है।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243G के तहत पंचायतों को आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए योजनाएँ तैयार करने का अधिकार है।
2. 73वें संविधान संशोधन अधिनियम ने पंचायतों को राज्य सरकारों से स्वतंत्र रूप से धन जुटाने की शक्ति प्रदान की है।
3. ग्राम सभाएँ स्थानीय स्तर पर योजनाओं के लाभार्थियों के चयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। अनुच्छेद 243G पंचायतों को आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए योजनाएँ तैयार करने और उन्हें लागू करने का अधिकार देता है। कथन 2 गलत है। 73वें संविधान संशोधन ने पंचायतों को राज्य सरकारों पर वित्तीय निर्भरता से पूरी तरह मुक्त नहीं किया, बल्कि उन्हें राज्य वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर धन प्राप्त होता है। कथन 3 सही है। ग्राम सभाएँ स्थानीय स्तर पर पारदर्शिता और भागीदारी सुनिश्चित करते हुए योजनाओं के लाभार्थियों के चयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

Q2. मानव-वन्यजीव संघर्ष के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन संघर्ष को कम करने के लिए एक प्रभावी रणनीति हो सकता/सकते है/हैं?
1. वन्यजीव गलियारों का निर्माण और संरक्षण।
2. फसल पैटर्न में बदलाव करके वन्यजीवों के लिए कम आकर्षक फसलें उगाना।
3. स्थानीय समुदायों को वन्यजीव संरक्षण में शामिल करना और उन्हें वैकल्पिक आजीविका के अवसर प्रदान करना।
4. वन्यजीवों को उनके प्राकृतिक आवास से दूर स्थानांतरित करना।

  1. केवल 1 और 2
  2. केवल 2, 3 और 4
  3. केवल 1, 2 और 3
  4. केवल 1, 3 और 4

उत्तर: केवल 1, 2 और 3 — कथन 1, 2 और 3 मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए प्रभावी रणनीतियाँ हैं। वन्यजीव गलियारे उनके सुरक्षित आवागमन को सुनिश्चित करते हैं, फसल पैटर्न में बदलाव से क्षति कम होती है, और सामुदायिक भागीदारी संरक्षण प्रयासों को मजबूत करती है। कथन 4 हमेशा प्रभावी या वांछनीय नहीं होता, क्योंकि यह वन्यजीवों के लिए तनावपूर्ण हो सकता है और उनके नए आवास में भी समस्याएँ पैदा कर सकता है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने में स्थानीय स्वशासन संस्थाओं, विशेषकर ग्राम पंचायतों की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। इस संदर्भ में, ऐसी पहलों के प्रभावी कार्यान्वयन में आने वाली चुनौतियों और उनके संभावित समाधानों पर भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर की शुरुआत मानव-वन्यजीव संघर्ष की परिभाषा और भारत में इसकी बढ़ती प्रासंगिकता से करें। इसके बाद, स्थानीय स्वशासन संस्थाओं, विशेष रूप से ग्राम पंचायतों की भूमिका पर प्रकाश डालें, जिसमें उनकी योजना बनाने, कार्यान्वयन करने, सामुदायिक भागीदारी सुनिश्चित करने और स्थानीय संसाधनों का उपयोग करने की क्षमता शामिल हो। उदाहरण के तौर पर, केरल की वेट्टिकावला ग्राम पंचायत की बाड़ लगाने की परियोजना का उल्लेख करें।

चुनौतियों के खंड में, वित्तीय संसाधनों की कमी, तकनीकी ज्ञान का अभाव, अंतर-विभागीय समन्वय की कमी, सामुदायिक प्रतिरोध, और वन्यजीव कानूनों की जटिलता जैसे मुद्दों पर चर्चा करें।

समाधानों के लिए, क्षमता निर्माण, वित्तीय सशक्तिकरण (राज्य और केंद्र से सहायता), प्रौद्योगिकी का उपयोग (जैसे जीपीएस ट्रैकिंग, सेंसर), जागरूकता कार्यक्रम, और सहयोगात्मक मॉडल (वन विभाग, गैर-सरकारी संगठन, स्थानीय समुदाय) पर जोर दें।

निष्कर्ष में, स्थानीय स्वशासन के महत्व को दोहराते हुए एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करें जो संघर्ष को कम करने और सतत विकास को बढ़ावा देने में सहायक हो।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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