28 Oct संसदीय पैनल आरटीआई अधिनियम और सीआईसी की कार्यप्रणाली की समीक्षा करेगा
✎ सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 12 केंद्रीय सूचना आयोग का गठन करती है, धारा 19 के अंतर्गत द्वितीय अपील सुनी जाती है, और लंबित मामलों की समीक्षा संसद की विभाग-संबद्ध स्थायी समिति के माध्यम से होती है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — राजव्यवस्था एवं शासन (संसदीय समितियाँ, सूचना का अधिकार, न्याय वितरण, लोक शिकायत निवारण) | GS Paper II — संविधान (अनुच्छेद 19(1)(क), अनुच्छेद 348, आठवीं अनुसूची)
- Prelims: सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (Right to Information Act, 2005) और धारा 4, 8(1)(j), 12, 19, 20, केंद्रीय सूचना आयोग (Central Information Commission) की संरचना: मुख्य सूचना आयुक्त और अधिकतम 10 सूचना आयुक्त, सूचना आयुक्तों का कार्यकाल: 5 वर्ष या 65 वर्ष की आयु, जो भी पहले हो, विभाग-संबद्ध स्थायी समितियाँ (Department-related Parliamentary Standing Committees) और उनका एक वर्षीय पुनर्गठन, अनुच्छेद 323A (प्रशासनिक अधिकरण) और केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (Central Administrative Tribunal), ई-कोर्ट्स मिशन मोड परियोजना (e-Courts Mission Mode Project) और राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA), आठवीं अनुसूची की 22 भाषाएँ और अनुच्छेद 348 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय की भाषा, सीपीग्राम्स (CPGRAMS) और राष्ट्रीय मुकदमेबाजी नीति (National Litigation Policy), 2010
- Essay: सूचना का अधिकार: पारदर्शिता, जवाबदेही और संस्थागत क्षमता, न्याय में विलंब और लंबित मामले: सूचना आयोग से लेकर न्यायपालिका तक
त्वरित पुनरावृत्ति: सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 12 केंद्रीय सूचना आयोग का गठन करती है, धारा 19 के अंतर्गत द्वितीय अपील सुनी जाती है, और लंबित मामलों की समीक्षा संसद की विभाग-संबद्ध स्थायी समिति के माध्यम से होती है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
संसद की विभाग-संबद्ध स्थायी समिति (Standing Committee on Personnel, Public Grievances, Law and Justice) सूचना का अधिकार अधिनियम के क्रियान्वयन और केंद्रीय सूचना आयोग के कामकाज की समीक्षा करेगी। समाचार के अनुसार केंद्रीय सूचना आयोग में 10,000 से अधिक मामले लंबित हैं, जबकि आयोग अब अपनी स्वीकृत पूर्ण क्षमता के साथ कार्य कर रहा है और उसमें 11 सूचना आयुक्त हैं। लंबित मामलों को लेकर उठे सवालों के बीच यह समीक्षा हो रही है। लोक सभा बुलेटिन के अनुसार समिति के दायरे में कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के अंतर्गत केंद्र सरकार में रिक्तियाँ, केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण, सतर्कता प्रशासन और आरक्षण नीतियाँ भी हैं। विधि एवं न्याय विभाग के अंतर्गत त्वरित न्यायालयों, न्यायिक अवसंरचना की केंद्र-प्रायोजित योजनाओं, ई-कोर्ट्स परियोजना, न्याय वितरण में डिजिटाइज़ेशन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग, विधिक सहायता संस्थानों, लोक शिकायत निवारण और राष्ट्रीय मुकदमेबाजी नीति की भी जाँच होगी। विधायी विभाग से उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के निर्णयों की आठवीं अनुसूची की भाषाओं में उपलब्धता देखी जाएगी। यह समिति एक वर्ष के लिए पुनर्गठित हुई है और आगामी वर्ष के लिए विषयों का चयन कर रही है।
पृष्ठभूमि
- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 ने पूर्ववर्ती सूचना की स्वतंत्रता अधिनियम, 2002 (Freedom of Information Act, 2002) का स्थान लिया। यह अनुच्छेद 19(1)(क) में निहित वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े सूचना के अधिकार को विधिक रूप देता है।
- उच्चतम न्यायालय ने राज नारायण वाद (1975) सहित विभिन्न निर्णयों में सूचना के अधिकार को अनुच्छेद 19(1)(क) का अंग माना है, जिससे इस अधिनियम की संवैधानिक पृष्ठभूमि बनती है।
- केंद्रीय सूचना आयोग धारा 12 के अंतर्गत गठित एक वैधानिक निकाय है। अपील और शिकायतों के निपटारे की अंतिम वैधानिक व्यवस्था आयोग के पास है, इसलिए उसमें लंबित मामले सीधे नागरिकों के अधिकार से जुड़े हैं।
- सूचना आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं। 2019 के संशोधन द्वारा आयुक्तों के कार्यकाल और वेतन-भत्ते केंद्र सरकार द्वारा तय करने का प्रावधान किया गया, जिसे लेकर संस्थागत स्वायत्तता पर चर्चा हुई है।
- विभाग-संबद्ध स्थायी समितियाँ संसदीय निगरानी का एक प्रमुख साधन हैं। ये मंत्रालयों और विभागों के कामकाज की जाँच करती हैं, किंतु विधेयकों पर इनका कार्य संसदीय प्रक्रिया के अनुसार होता है, न कि कार्यपालिका के निर्णयों को पलटने के रूप में।
सूचना का अधिकार अधिनियम और केंद्रीय सूचना आयोग क्या है?
- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अंतर्गत नागरिक सार्वजनिक प्राधिकरणों से सूचना प्राप्त कर सकते हैं। धारा 4 के अंतर्गत प्राधिकरणों पर स्वतः प्रकटीकरण (Proactive Disclosure) की बाध्यता है।
- धारा 8 कुछ सूचनाओं को प्रकटीकरण से छूट देती है, जैसे धारा 8(1)(j) में वह व्यक्तिगत सूचना जिसका जनहित से संबंध न हो। इन छूटों की व्याख्या अक्सर विवाद का विषय बनती है।
- धारा 24 के अंतर्गत कुछ सुरक्षा और गुप्तचर संगठनों को अधिनियम के प्रावधानों से छूट प्राप्त है, यद्यपि भ्रष्टाचार और मानवाधिकार उल्लंघन से जुड़ी सूचना के संबंध में अपवाद रखे गए हैं।
- केंद्रीय सूचना आयोग धारा 18 के अंतर्गत शिकायत और धारा 19 के अंतर्गत द्वितीय अपील की सुनवाई करता है। धारा 20 के अंतर्गत जुर्माने और अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश का प्रावधान है।
- आयोग में एक मुख्य सूचना आयुक्त और अधिकतम 10 सूचना आयुक्त हो सकते हैं। ये पद पर पाँच वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो, बने रहते हैं।
- संसद की विभाग-संबद्ध स्थायी समितियों में सामान्यतः 31 सदस्य होते हैं, जिनमें लोक सभा और राज्य सभा दोनों के सदस्य शामिल होते हैं। ये समितियाँ विधेयकों, अनुदान माँगों और विभागीय कार्यों की जाँच करती हैं।
- सीपीग्राम्स (CPGRAMS) केंद्र सरकार की एकीकृत लोक शिकायत निवारण प्रणाली है, जिसके माध्यम से नागरिक ऑनलाइन शिकायत दर्ज कर सकते हैं। ई-कोर्ट्स परियोजना न्यायिक प्रक्रिया के डिजिटलीकरण से जुड़ी है।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| विभाग-संबंधित संसदीय स्थायी समिति (Parliamentary Standing Committee) द्वारा समीक्षा | सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (Right to Information Act, 2005) के क्रियान्वयन और केंद्रीय सूचना आयोग (Central Information Commission – CIC) के कामकाज का संसद-स्तरीय मूल्यांकन होगा, जिससे नीति-निर्माण में विधायी निगरानी सुनिश्चित होती है। |
| केंद्रीय सूचना आयोग में 10,000 से अधिक लंबित मामले | अपील और शिकायतों के निपटारे में विलंब नागरिकों के सूचना पाने के अधिकार को प्रभावित करता है। यही इस समीक्षा का केंद्रीय कारण है। |
| आयोग का पूर्ण स्वीकृत संख्या पर कार्यरत होना | समाचार के अनुसार आयोग में 11 सूचना आयुक्त कार्यरत हैं। इसके बावजूद लंबित मामलों की समस्या बनी है, जिससे प्रश्न संरचना और प्रक्रिया पर केंद्रित हो जाता है, केवल रिक्तियों पर नहीं। |
| समिति का व्यापक विषय-क्षेत्र | समिति केवल सूचना अधिकार तक सीमित नहीं है। इसमें सरकारी रिक्तियाँ, केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (Central Administrative Tribunal), सतर्कता प्रशासन (Vigilance Administration) और न्यायिक अवसंरचना शामिल हैं, जो शासन-व्यवस्था के कई पहलुओं को जोड़ता है। |
| न्याय वितरण में डिजिटलीकरण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की समीक्षा | ई-कोर्ट्स मिशन मोड प्रोजेक्ट (e-Courts Mission Mode Project) और न्याय वितरण में AI के उपयोग का मूल्यांकन होगा, जिससे प्रशासनिक और न्यायिक सुधारों की दिशा स्पष्ट होगी। |
| जन-शिकायत निवारण तंत्र की समीक्षा | CPGRAMS और CPENGRAMS पोर्टल को सुदृढ़ करने और उनके बारे में जागरूकता बढ़ाने पर विचार होगा, जिससे नागरिक-केंद्रित शासन को बल मिलता है। |
महत्व
प्रशासनिक और पारदर्शिता संबंधी महत्त्व
- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 पारदर्शिता और उत्तरदायी शासन का प्रमुख साधन है। इसके क्रियान्वयन की संसदीय समीक्षा से कानून की वास्तविक प्रभावशीलता का आकलन संभव होता है।
- केंद्रीय सूचना आयोग अपील और शिकायतों पर अंतिम प्रशासनिक निर्णय देने वाली संस्था है। इसकी कार्यक्षमता सीधे नागरिकों की पहुँच को निर्धारित करती है।
- लंबित मामलों की समस्या से संकेत मिलता है कि अधिनियम की सफलता केवल प्रावधानों पर नहीं, बल्कि संस्थागत क्षमता और प्रक्रियागत दक्षता पर निर्भर है।
न्यायिक और विधिक सुधार से संबंध
- फास्ट-ट्रैक विशेष न्यायालयों और न्यायिक अवसंरचना की समीक्षा से लंबित मामलों के निपटारे की व्यापक रणनीति का मूल्यांकन होगा।
- विधि आयोग की सिफारिशों और राष्ट्रीय मुकदमेबाजी नीति (National Litigation Policy) के क्रियान्वयन की जाँच से सरकारी मुकदमेबाजी के बोझ को कम करने पर ध्यान जाएगा।
- न्यायालयों के निर्णयों का आठवीं अनुसूची की भाषाओं में उपलब्ध होना न्याय तक पहुँच को भाषायी दृष्टि से व्यापक बनाने का प्रयास है।
सुशासन और सामाजिक न्याय संबंधी महत्त्व
- सरकारी सेवाओं में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़े वर्गों और दिव्यांगजनों के लिए आरक्षण नीतियों की समीक्षा समावेशी प्रशासन से जुड़ी है।
- विधिक सहायता संस्थाओं के प्रदर्शन की जाँच से कमजोर वर्गों के लिए न्याय की सुलभता का मूल्यांकन होगा।
- जन-शिकायत निवारण तंत्र की मजबूती नागरिक और राज्य के बीच विश्वास बढ़ाने का माध्यम है।
संसदीय निगरानी और विधायी प्रक्रिया
- विभाग-संबंधित संसदीय स्थायी समितियाँ कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित करने का संस्थागत तंत्र हैं। ये समितियाँ विशेषज्ञ अध्ययन के माध्यम से नीति-सुधार के सुझाव देती हैं।
- समितियों का पुनर्गठन एक वर्ष की अवधि के लिए होता है और वे अगले एक वर्ष के लिए विषय चुनती हैं। इससे समिति-प्रणाली की कार्यप्रणाली का एक चक्र स्पष्ट होता है।
चुनौतियाँ
1. लंबित मामलों का बोझ
- केंद्रीय सूचना आयोग में 10,000 से अधिक मामले लंबित हैं, जिससे अपीलकर्ताओं को न्याय और सूचना प्राप्ति में विलंब झेलना पड़ता है।
- लंबित मामलों का बढ़ना यह दर्शाता है कि आयोग की स्वीकृत संख्या के साथ-साथ प्रक्रियागत सुधार और मामलों के वर्गीकरण की आवश्यकता है।
- विलंब से सूचना का अधिकार अपने मूल उद्देश्य, यानी समय पर सूचना, से दूर होता जाता है।
यूपीएससी लिंक: शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही, प्रशासनिक सुधार
2. संस्थागत स्वायत्तता और दक्षता का संतुलन
- केंद्रीय सूचना आयोग की स्वतंत्रता उसकी नियुक्ति, कार्यकाल और सेवा-शर्तों पर निर्भर करती है। इन पहलुओं पर सतत विचार आवश्यक है।
- स्वतंत्र संस्थाओं की दक्षता को निगरानी के साथ संतुलित करना एक जटिल प्रशासनिक चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: संवैधानिक और सांविधिक निकाय, प्रशासनिक सुधार
3. न्याय वितरण में डिजिटल और तकनीकी परिवर्तन
- ई-कोर्ट्स मिशन मोड प्रोजेक्ट के बावजूद डिजिटल अवसंरचना, डेटा की गुणवत्ता और साइबर सुरक्षा संबंधी चिंताएँ बनी हुई हैं।
- न्याय वितरण में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग से निर्णय-प्रक्रिया की पारदर्शिता और जवाबदेही पर नए प्रश्न उठते हैं।
- डिजिटल पहुँच की असमानता ग्रामीण और कमजोर वर्गों के लिए नई बाधाएँ खड़ी कर सकती है।
यूपीएससी लिंक: ई-शासन, न्याय व्यवस्था में सुधार, प्रौद्योगिकी का शासन में उपयोग
4. सरकारी सेवाओं में रिक्तियाँ और आरक्षण
- केंद्र सरकार में रिक्तियों की संख्या सेवा-वितरण और प्रशासनिक क्षमता को प्रभावित करती है।
- अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़े वर्गों और दिव्यांगजनों के लिए आरक्षण नीति का प्रभावी क्रियान्वयन चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।
यूपीएससी लिंक: लोक सेवा में समावेशन, सामाजिक न्याय, मानव संसाधन प्रबंधन
5. जन-शिकायत निवारण की प्रभावशीलता
- CPGRAMS और CPENGRAMS जैसे पोर्टलों पर शिकायतों के समाधान की गति और गुणवत्ता पर प्रश्न उठते रहे हैं।
- नागरिकों में इन पोर्टलों के उपयोग के बारे में जागरूकता सीमित होने से इनकी पूरी क्षमता का उपयोग नहीं हो पाता।
यूपीएससी लिंक: नागरिक-केंद्रित शासन, ई-शासन, नागरिक चार्टर
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| लंबित मामले | 10,000 से अधिक मामलों का लंबित रहना सूचना और अपील के निपटारे में विलंब का संकेत है। |
| प्रक्रियागत विलंब | मामलों के निपटारे की प्रक्रिया में सुधार न होने पर स्वीकृत संख्या भी पर्याप्त सिद्ध नहीं होती। |
| न्यायिक अवसंरचना | फास्ट-ट्रैक विशेष न्यायालयों और केंद्र-प्रायोजित योजनाओं के बीच समन्वय और क्रियान्वयन की गति चिंता का विषय है। |
| डिजिटल असमानता | ई-कोर्ट्स और AI आधारित न्याय वितरण का लाभ सभी नागरिकों तक समान रूप से पहुँचना सुनिश्चित करना होगा। |
| आरक्षण और रिक्तियाँ | सरकारी सेवाओं में रिक्तियों और आरक्षण नीति के प्रभावी क्रियान्वयन पर निरंतर निगरानी आवश्यक है। |
| जन-शिकायत तंत्र | CPGRAMS और CPENGRAMS पर समाधान की गुणवत्ता और नागरिक जागरूकता में सुधार की आवश्यकता है। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- ई-कोर्ट्स मिशन मोड प्रोजेक्ट (e-Courts Mission Mode Project)
- CPGRAMS (Centralised Public Grievance Redress and Monitoring System)
- CPENGRAMS (Centralised Public Grievance Redress and Monitoring System for Pension)
आगे की राह
- केंद्रीय सूचना आयोग में लंबित मामलों के वर्गीकरण, समयबद्ध निपटारे और प्रक्रियागत मानकों को स्पष्ट करने की आवश्यकता है।
- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अंतर्गत आवेदन और अपील की प्रक्रिया को डिजिटल रूप से सरल बनाया जाना चाहिए, ताकि नागरिकों को सूचना समय पर मिल सके।
- आयोग के लिए नियुक्ति प्रक्रिया में समयबद्धता और पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए, जिससे रिक्तियों के कारण कार्य-बाधा न हो।
- फास्ट-ट्रैक विशेष न्यायालयों और न्यायिक अवसंरचना पर केंद्र-प्रायोजित योजनाओं के प्रभाव का नियमित मूल्यांकन होना चाहिए।
- ई-कोर्ट्स मिशन मोड प्रोजेक्ट के अंतर्गत डिजिटल पहुँच में ग्रामीण और कमजोर वर्गों की भागीदारी बढ़ाने के उपाय किए जाने चाहिए।
- न्याय वितरण में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग के लिए नैतिक दिशानिर्देश और जवाबदेही-तंत्र स्पष्ट किए जाने चाहिए।
- CPGRAMS और CPENGRAMS पोर्टलों पर शिकायत-समाधान की समय-सीमा की निगरानी और नागरिक-जागरूकता अभियान को सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
- विधिक सहायता संस्थाओं के प्रदर्शन का नियमित मूल्यांकन कर कमजोर वर्गों तक उनकी पहुँच बढ़ाई जानी चाहिए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
सूचना का अधिकार अधिनियम · केंद्रीय सूचना आयोग · संसदीय स्थायी समिति · पारदर्शिता · जवाबदेही · न्यायिक अवसंरचना · ई-न्यायालय · लोक शिकायत निवारण · विजिलेंस प्रशासन · विकसित भारत
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 19(1)(a): सूचना के अधिकार का वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से संबंध
- अनुच्छेद 21: त्वरित न्याय और न्याय तक पहुँच का आधार
- अनुच्छेद 39क: निर्धन और कमजोर वर्गों के लिए निःशुल्क विधिक सहायता
- आठवीं अनुसूची: न्यायालय निर्णयों की भाषायी उपलब्धता से संबंध
- अनुच्छेद 323क: प्रशासनिक अधिकरणों के गठन का संवैधानिक आधार
अवधारणा प्रवाह
सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अंतर्गत नागरिक सूचना माँगते हैं और अपील केंद्रीय सूचना आयोग तक पहुँचती है → अपीलों और शिकायतों की संख्या बढ़ने से केंद्रीय सूचना आयोग में 10,000 से अधिक मामले लंबित हो जाते हैं → आयोग के पूर्ण स्वीकृत संख्या पर कार्यरत होने के बावजूद लंबित मामलों की समस्या से प्रक्रियागत और संस्थागत प्रश्न उठते हैं → विभाग-संबंधित संसदीय स्थायी समिति इस समस्या सहित प्रशासन, न्याय और जन-शिकायत तंत्र की समीक्षा का निर्णय लेती है → समिति अध्ययन के आधार पर सुधार के सुझाव देती है, जिन पर कार्यपालिका द्वारा नीति-स्तर पर विचार किया जाता है
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत स्थापित एक संवैधानिक निकाय है।
2. CIC में एक मुख्य सूचना आयुक्त और अधिकतम दस सूचना आयुक्त होते हैं।
3. CIC के निर्णयों को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल एक — कथन 1 गलत है। केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) एक सांविधिक निकाय है, संवैधानिक नहीं, जिसकी स्थापना सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत की गई है। कथन 2 सही है। CIC में एक मुख्य सूचना आयुक्त और अधिकतम दस सूचना आयुक्त होते हैं। कथन 3 गलत है। CIC के निर्णयों को उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।
Q2. कथन (A): संसदीय स्थायी समितियाँ सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
कारण (R): ये समितियाँ मंत्रालयों और विभागों के विस्तृत परीक्षण और नीति निर्माण की प्रक्रिया में विशेषज्ञता प्रदान करती हैं।
- A और R दोनों सही हैं, और R, A का सही स्पष्टीकरण है।
- A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A का सही स्पष्टीकरण नहीं है।
- A सही है, लेकिन R गलत है।
- A गलत है, लेकिन R सही है।
उत्तर: A और R दोनों सही हैं, और R, A का सही स्पष्टीकरण है। — कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं। संसदीय स्थायी समितियाँ मंत्रालयों और विभागों के कार्यों की गहन समीक्षा करके सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करती हैं। वे नीति निर्माण और कानून बनाने की प्रक्रिया में विशेषज्ञता और विस्तृत विश्लेषण प्रदान करती हैं, जिससे संसद का कार्य अधिक प्रभावी होता है। इस प्रकार, R, A का सही स्पष्टीकरण है।
Q3. निम्नलिखित में से कौन सा विभाग-संबंधित संसदीय स्थायी समिति द्वारा समीक्षा किए जाने वाले विषयों में शामिल नहीं है?
- केंद्र सरकार में रिक्तियाँ
- न्यायिक अवसंरचना के लिए केंद्र प्रायोजित योजनाएँ
- राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन का कार्यान्वयन
- लोक शिकायत निवारण तंत्र
उत्तर: राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन का कार्यान्वयन — समाचार के अनुसार, संसदीय स्थायी समिति कार्मिक, लोक शिकायत, कानून और न्याय मंत्रालय से संबंधित विभिन्न विषयों की समीक्षा कर रही है, जिसमें केंद्र सरकार में रिक्तियाँ, न्यायिक अवसंरचना के लिए केंद्र प्रायोजित योजनाएँ और लोक शिकायत निवारण तंत्र शामिल हैं। राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन का कार्यान्वयन इस समिति के कार्यक्षेत्र में उल्लिखित नहीं है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के प्रभावी कार्यान्वयन में केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) की भूमिका का परीक्षण कीजिए। क्या आपको लगता है कि CIC के समक्ष लंबित मामलों की बढ़ती संख्या इसकी प्रभावशीलता को कम करती है? समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act, 2005) और केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) की स्थापना तथा उसके उद्देश्य का संक्षिप्त परिचय।
2. CIC की भूमिका: RTI अधिनियम के प्रभावी कार्यान्वयन में CIC की महत्वपूर्ण भूमिका का वर्णन करें, जिसमें अपील और शिकायतों का निपटान, पारदर्शिता को बढ़ावा देना, सूचना के अधिकार को सुनिश्चित करना और सार्वजनिक प्राधिकरणों को दिशा-निर्देश देना शामिल है।
3. लंबित मामलों का मुद्दा: CIC के समक्ष लंबित मामलों की बढ़ती संख्या की वर्तमान स्थिति का उल्लेख करें (जैसे 10,000 से अधिक मामले)।
4. प्रभावशीलता पर प्रभाव: लंबित मामलों के कारण CIC की प्रभावशीलता पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों का समालोचनात्मक विश्लेषण करें, जैसे कि:
क. सूचना तक पहुँच में देरी: नागरिकों के सूचना प्राप्त करने के अधिकार में विलंब।
ख. विश्वास में कमी: आयोग की कार्यप्रणाली पर जनता के विश्वास में कमी।
ग. जवाबदेही में कमी: सार्वजनिक प्राधिकरणों की जवाबदेही पर नकारात्मक प्रभाव।
घ. संसाधनों पर दबाव: आयोग के सीमित संसाधनों पर अतिरिक्त भार।
5. संभावित कारण: लंबित मामलों के संभावित कारणों पर प्रकाश डालें, जैसे कि अपर्याप्त कर्मचारी, सूचना आयुक्तों की नियुक्ति में देरी, जटिल मामले, अपर्याप्त बुनियादी ढाँचा और जन जागरूकता का अभाव।
6. समाधान/सुझाव: लंबित मामलों को कम करने और CIC की प्रभावशीलता बढ़ाने के लिए संभावित उपायों पर चर्चा करें, जैसे कि:
क. समय पर नियुक्तियाँ: सूचना आयुक्तों की समय पर और पूर्ण क्षमता में नियुक्तियाँ।
ख. डिजिटलीकरण: ई-फाइलिंग और मामलों के ऑनलाइन प्रबंधन को बढ़ावा देना।
ग. क्षमता निर्माण: कर्मचारियों और आयुक्तों के लिए प्रशिक्षण।
घ. वैकल्पिक विवाद समाधान: कुछ मामलों के लिए मध्यस्थता या अन्य तंत्रों का उपयोग।
ङ. जन जागरूकता: RTI के सही उपयोग के बारे में जागरूकता बढ़ाना।
7. निष्कर्ष: CIC की भूमिका के महत्व को दोहराते हुए एक संतुलित निष्कर्ष प्रस्तुत करें और इसकी चुनौतियों का समाधान करके इसे और अधिक प्रभावी बनाने की आवश्यकता पर बल दें।
स्रोत: orissapost.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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