पीएम ने 12वें ब्रिक्स संसदीय मंच की भूमिका पर लोकसभा अध्यक्ष का लेख साझा किया

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ब्रिक्स संसदीय फोरम प्रक्रियासदस्य देशों की बैठकविधायी संस्थाएंसहयोग हेतु विचार-विमर्साझा विषयसहमति-बिंदुओं का निर्मविधायी ढांचाअनुवर्तन एवं कार्यान्वसंसदीय कूटनीति
ब्रिक्स संसदीय फोरम प्रक्रिया

✎ ब्रिक्स संसदीय फोरम विधायी स्तर पर बहुपक्षीय संवाद का मंच है, जो कार्यपालिका की ब्रिक्स कूटनीति को पूरक बनाता है; संधियों के घरेलू कार्यान्वयन का संवैधानिक आधार अनुच्छेद 253 है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — अंतरराष्ट्रीय संबंध (भारत और समूह आधारित बहुपक्षीय मंच, ब्रिक्स (BRICS) की संरचना और उद्देश्य)  |  GS Paper II — राजव्यवस्था (संसद की भूमिका, लोकसभा अध्यक्ष का पद, संसदीय प्रक्रिया और कार्यप्रणाली)  |  GS Paper II — संविधान (अनुच्छेद 51, अनुच्छेद 253 और अंतरराष्ट्रीय संधियों का घरेलू कार्यान्वयन)
  • Prelims: ब्रिक्स (BRICS) के सदस्य देश और इसकी स्थापना का वर्ष (2006 में BRIC के रूप में आरंभ; 2010 में दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने से BRICS), ब्रिक्स के बाद के विस्तार से जुड़े नए सदस्य और साझेदार देश, न्यू डेवलपमेंट बैंक (New Development Bank) का मुख्यालय शंघाई में है और इसकी स्थापना 2014 के फोर्टालेज़ा शिखर सम्मेलन में हुई, आकस्मिक आरक्षित व्यवस्था (Contingent Reserve Arrangement, CRA) — ब्रिक्स का वित्तीय सुरक्षा तंत्र, संविधान का अनुच्छेद 51 (अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा), संविधान का अनुच्छेद 253 (अंतरराष्ट्रीय संधियों और समझौतों के कार्यान्वयन हेतु संसद की विधायी शक्ति), अंतर-संसदीय संघ (Inter-Parliamentary Union, IPU) — वर्ष 1889 में स्थापित बहुपक्षीय संसदीय संस्था, लोकसभा अध्यक्ष की संवैधानिक स्थिति (अनुच्छेद 93 और अनुच्छेद 94 के अंतर्गत पद, और अनुच्छेद 118 के अंतर्गत प्रक्रिया नियम)
  • Essay: संसदीय कूटनीति: बहुपक्षीय सहयोग और लोकतांत्रिक संवाद में विधायी संस्थाओं की भूमिका, वैश्विक दक्षिण के उभरते मंच: ब्रिक्स की सार्थकता और उसकी आंतरिक चुनौतियाँ

त्वरित पुनरावृत्ति: ब्रिक्स संसदीय फोरम विधायी स्तर पर बहुपक्षीय संवाद का मंच है, जो कार्यपालिका की ब्रिक्स कूटनीति को पूरक बनाता है; संधियों के घरेलू कार्यान्वयन का संवैधानिक आधार अनुच्छेद 253 है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

प्रधानमंत्री ने लोकसभा अध्यक्ष श्री ओम बिरला द्वारा लिखा गया एक लेख साझा किया, जिसमें 12वें ब्रिक्स संसदीय फोरम की भूमिका को रेखांकित किया गया है। इस फोरम का उद्देश्य ब्रिक्स सदस्य देशों की विधायी संस्थाओं के बीच संवाद और सहयोग को सुदृढ़ करना है। इस संदर्भ में भारत की ओर से संसदीय स्तर पर अंतरराष्ट्रीय संवाद की प्रक्रिया, उसके महत्व और संसदों के बीच आपसी समझ बढ़ाने की भूमिका चर्चा में है। यह समाचार कार्यपालिका और विधायिका दोनों के स्तर पर बहुपक्षीय सहभागिता के संस्थागत पहलू को समझने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

पृष्ठभूमि

  • ब्रिक्स (BRICS) की शुरुआत 2006 में ब्रिक (BRIC) के रूप में हुई थी, जिसमें ब्राज़ील, रूस, भारत और चीन शामिल थे। दक्षिण अफ्रीका के 2010 में जुड़ने के बाद इसका नाम ब्रिक्स हुआ।
  • ब्रिक्स का मूल उद्देश्य विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच आर्थिक, राजनीतिक और वैज्ञानिक सहयोग को बढ़ावा देना है। इसके अंतर्गत न्यू डेवलपमेंट बैंक और आकस्मिक आरक्षित व्यवस्था जैसे संस्थागत उपाय विकसित किए गए हैं।
  • ब्रिक्स के भीतर कार्यकारी स्तर के शिखर सम्मेलनों के साथ-साथ मंत्रिस्तरीय बैठकें, विशेषज्ञ समूह और अन्य सहभागी मंच भी सक्रिय हैं। संसदीय फोरम इसी संरचना का एक विधायी आयाम है।
  • संसदीय स्तर पर सहयोग का उद्देश्य यह है कि विधायी प्रतिनिधि एक-दूसरे के अनुभव, नीतिगत चुनौतियों और सर्वोत्तम व्यवहारों से परिचित हों, जिससे द्विपक्षीय और बहुपक्षीय संबंधों में पारदर्शिता और विश्वास बढ़े।
  • भारत में अंतरराष्ट्रीय संधियों और समझौतों को घरेलू विधि में लागू करने के लिए संसद की शक्ति अनुच्छेद 253 में निहित है, जबकि अनुच्छेद 51 राज्य को अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देने का निर्देश देता है।

ब्रिक्स संसदीय फोरम क्या है?

  • ब्रिक्स संसदीय फोरम ब्रिक्स सदस्य देशों के विधायकों और संसदीय अधिकारियों का एक बहुपक्षीय मंच है, जो समय-समय पर बैठक कर सहयोग के विषयों पर विचार करता है।
  • इसका प्रमुख उद्देश्य संसदीय संवाद, अनुभवों के आदान-प्रदान और नीति-स्तर पर समन्वय को मजबूत करना है, ताकि ब्रिक्स के व्यापक एजेंडे को विधायी समर्थन मिल सके।
  • संसदीय कूटनीति (Parliamentary Diplomacy) के अंतर्गत विधायी संस्थाएँ सीधे राज्य के प्रतिनिधि के रूप में संवाद करती हैं। इससे कार्यपालिका की औपचारिक कूटनीति पूरक बनती है।
  • भारत में लोकसभा अध्यक्ष संसद के निचले सदन की कार्यवाही का संरक्षक होता है और अंतर-संसदीय संबंधों में भारतीय संसद का प्रमुख प्रतिनिधि भी माना जाता है।
  • अंतर-संसदीय संघ (IPU) जैसी वैश्विक संस्थाएँ इस प्रकार के क्षेत्रीय और समूह-आधारित संसदीय मंचों के लिए व्यापक ढाँचा प्रदान करती हैं।
  • संसदीय सहयोग का संवैधानिक आधार यह है कि संसद अनुच्छेद 253 के तहत अंतरराष्ट्रीय संधियों के क्रियान्वयन हेतु विधि बना सकती है, जबकि अनुच्छेद 51 अंतरराष्ट्रीय विधि और शांति के प्रति प्रतिबद्धता का मार्गदर्शन करता है।
  • ऐसे मंचों की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उनके निष्कर्ष सदस्य देशों की विधायी प्रक्रियाओं और नीतिगत निर्णयों में किस सीमा तक परिलक्षित होते हैं।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
मंच का स्वरूप ब्रिक्स सदस्य देशों की संसदों के बीच संवाद का बहुपक्षीय मंच (BRICS Parliamentary Forum), जो सरकारी स्तर की कूटनीति के समानांतर विधायी स्तर पर सहयोग का मार्ग खोलता है
सदस्य देशों की संसदीय भूमिका विधायिकाएँ कानून निर्माण, बजट पारण और कार्यपालिका की जवाबदेही का कार्य करती हैं, इसलिए उनके बीच संवाद नीतिगत समझ और विश्वास को संस्थागत आधार देता है
भारत की सक्रिय भागीदारी लोकसभा अध्यक्ष श्री ओम बिरला द्वारा लिखे लेख से स्पष्ट है कि इस आयोजन में भारतीय संसद की नेतृत्वकारी भूमिका रही और भारत ने संसदीय कूटनीति को प्राथमिकता दी
विषयगत सहयोग ब्रिक्स के सामान्य सहयोग क्षेत्रों, जैसे आर्थिक सहयोग, सतत विकास और बहुपक्षीय सुधार, पर सांसदों के स्तर पर नीति-विमर्श होता है
बाध्यता की प्रकृति मंच की घोषणाएँ और सिफारिशें सामान्यतः सलाहकारी होती हैं; ये किसी संधि की तरह सदस्य देशों पर कानूनी बाध्यता नहीं डालतीं

महत्व

कूटनीतिक

  • संसदीय कूटनीति (Parliamentary Diplomacy) सरकारों के औपचारिक संवाद को पूरक बनाती है और जनप्रतिनिधियों के बीच विश्वास का निर्माण करती है
  • द्विपक्षीय संबंधों में तनाव के समय भी विधायी स्तर पर संपर्क बना रहता है, जिससे संवाद के मार्ग खुले रहते हैं
  • भारत के लिए यह बहुपक्षीय मंचों पर अपनी नीतिगत प्राथमिकताएँ स्पष्ट करने का अवसर है

आर्थिक और विकासात्मक

  • ब्रिक्स सदस्य देशों के बीच व्यापार, निवेश और विकास सहयोग के लिए विधायी ढाँचे की समानता पर विचार-विमर्श संभव होता है
  • उभरती अर्थव्यवस्थाओं की विकास आवश्यकताओं को विधायी दृष्टिकोण से समझने में सहायता मिलती है

संस्थागत और शासन

  • विभिन्न देशों की संसदीय प्रक्रियाओं, समिति प्रणालियों और विधायी अनुभवों का आदान-प्रदान होता है
  • संसद के सदनों के पीठासीन अधिकारियों के बीच संवाद से सदन-संचालन की सर्वोत्तम पद्धतियों (Best Practices) को अपनाने का अवसर मिलता है

वैश्विक शासन सुधार

  • बहुपक्षीय संस्थाओं में प्रतिनिधित्व और निर्णय-प्रक्रिया में समावेशिता पर विधायी स्तर से विचार की आवाज़ बनती है
  • वैश्विक दक्षिण के देशों के बीच साझा चिंताओं को संसदीय मंच पर उठाया जा सकता है

चुनौतियाँ

1. बाध्यकारी निर्णयों का अभाव

  • संसदीय मंच की घोषणाएँ सलाहकारी होती हैं, इसलिए उनके क्रियान्वयन के लिए सरकारों की इच्छा और घरेलू विधायी प्रक्रिया पर निर्भरता रहती है
  • परिणामों को नीति में बदलने की कोई स्वचालित व्यवस्था नहीं है

2. सदस्य देशों के विविध राजनीतिक ढाँचे

  • ब्रिक्स सदस्य देशों में संसदीय, अध्यक्षात्मक और अन्य शासन-प्रणालियाँ हैं, इसलिए विधायी प्रक्रियाओं में समानता लाना कठिन है
  • सदन की कार्यप्रणाली, विपक्ष की भूमिका और जनप्रतिनिधित्व के नियम अलग-अलग होते हैं

3. परिणामों के अनुवर्तन (Follow-up) की कमी

  • बहुपक्षीय विधायी मंचों पर बनी सहमतियों का नियमित मूल्यांकन और अनुवर्तन तंत्र अक्सर सीमित होता है
  • सत्र-आधारित संवाद होने से निरंतरता बनाए रखना कठिन होता है

4. कार्यपालिका और विधायिका के बीच समन्वय

  • विदेश नीति का संचालन कार्यपालिका का क्षेत्र है, जबकि संसदीय मंच विधायी प्रतिनिधियों द्वारा संचालित होते हैं, इसलिए दोनों के बीच स्पष्ट समन्वय आवश्यक है
  • संसदीय कूटनीति के प्रभाव का आकलन करने के लिए कोई सुस्थापित मानक नहीं है

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
परिणामों की बाध्यता सलाहकारी घोषणाएँ नीति में तभी बदलती हैं जब सरकारें और विधायिका उन्हें अपनाएँ
राजनीतिक व्यवस्थाओं में अंतर अलग-अलग शासन-प्रणालियों के कारण साझा विधायी मानक तय करना कठिन है
निरंतरता का अभाव सम्मेलन-आधारित संवाद के बीच की अवधि में कार्य-योजना का अनुवर्तन सीमित रहता है
समन्वय की चुनौती संसदीय कूटनीति और सरकार की आधिकारिक विदेश नीति के बीच तालमेल बनाए रखना आवश्यक है
प्रभाव-मूल्यांकन संसदीय सहयोग से हुए ठोस परिणामों को मापने के स्पष्ट संकेतक उपलब्ध नहीं हैं

आगे की राह

  • संसदीय मंच की सिफारिशों के अनुवर्तन के लिए एक स्थायी समन्वय तंत्र बनाया जाए, जिसमें सदनों के सचिवालय और विदेश मंत्रालय की भागीदारी हो
  • सम्मेलनों की घोषणाओं को संबंधित संसदीय समितियों के समक्ष रखा जाए, ताकि उन पर विधायी और नीतिगत विचार सुनिश्चित हो
  • सदस्य देशों की संसदीय प्रक्रियाओं और सदन-संचालन की पद्धतियों पर तुलनात्मक अध्ययन को बढ़ाया जाए
  • अंतर-सत्र अवधि में सांसदों के बीच विषय-आधारित कार्यसमूह बनाए जाएँ, ताकि संवाद निरंतर रहे
  • संसदीय कूटनीति के प्रभाव के मूल्यांकन के लिए स्पष्ट संकेतक तय किए जाएँ
  • बहुपक्षीय संसदीय मंचों पर भारत की भूमिका को विदेश नीति के व्यापक लक्ष्यों से जोड़ा जाए
  • नागरिकों और शोध संस्थानों को संसदीय संवाद की जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराई जाए, ताकि पारदर्शिता बढ़े

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

संसदीय कूटनीति (Parliamentary Diplomacy) · ब्रिक्स (BRICS) · ब्रिक्स संसदीय मंच (BRICS Parliamentary Forum) · अंतर-संसदीय संघ (Inter-Parliamentary Union) · लोकसभा अध्यक्ष (Speaker of Lok Sabha) · कार्यपालिका की विदेश नीति (Executive Foreign Policy) · बहुपक्षीय सहयोग (Multilateral Cooperation) · अनुच्छेद 253 (Article 253) · नव विकास बैंक (New Development Bank) · सॉफ्ट पावर (Soft Power) · संसदीय समितियाँ (Parliamentary Committees) · दक्षिण-दक्षिण सहयोग (South-South Cooperation)

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 51: अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के प्रोत्साहन का निर्देश
  • अनुच्छेद 79: संसद की संरचना, जिसमें राज्यसभा और लोकसभा शामिल हैं

अवधारणा प्रवाह

ब्रिक्स सदस्य देशों की संसदों के बीच आपसी सहयोग की आवश्यकता उत्पन्न होती है  →  भारत की मेजबानी में 12वें ब्रिक्स संसदीय मंच का आयोजन होता है, जिसमें सदनों के प्रतिनिधि भाग लेते हैं  →  चर्चा से साझा विषयों पर विचार-विमर्श और सहमति-बिंदु सामने आते हैं  →  लोकसभा अध्यक्ष जैसे पीठासीन अधिकारियों के माध्यम से इन परिणामों को सार्वजनिक विमर्श में रखा जाता है  →  संसदीय कूटनीति से सरकारों के बीच विश्वास और संवाद के मार्ग मज़बूत होते हैं  →  इन सहमतियों के अनुवर्तन से सदस्य देशों के बीच दीर्घकालिक सहयोग का आधार तैयार होता है

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. ब्रिक्स (BRICS) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. नव विकास बैंक (New Development Bank) का मुख्यालय शंघाई में स्थित है।
2. ब्रिक्स का पहला शिखर सम्मेलन वर्ष 2006 में आयोजित हुआ था।
3. इंडोनेशिया वर्ष 2025 से ब्रिक्स का पूर्ण सदस्य है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. उपर्युक्त में से कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: नव विकास बैंक का मुख्यालय शंघाई में है। कथन 2 गलत है: ब्रिक्स का पहला औपचारिक शिखर सम्मेलन वर्ष 2009 में येकातेरिनबर्ग (रूस) में हुआ था, जबकि 2006 में समूह का आरंभ BRIC समूह के रूप में विदेश मंत्रियों की बैठक से हुआ था। कथन 3 सही है: इंडोनेशिया वर्ष 2025 में पूर्ण सदस्य बना। अतः केवल दो कथन सही हैं।

Q2. कथन (A): संसदीय कूटनीति कार्यपालिका की विदेश नीति की पूरक हो सकती है।
कारण (R): संसद के सदस्य अंतर-संसदीय मंचों पर साझा चिंताओं पर संवाद करके द्विपक्षीय और बहुपक्षीय विश्वास का निर्माण कर सकते हैं।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
(a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं, परंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) सही है, परंतु (R) गलत है।
(d) (A) गलत है, परंतु (R) सही है।

  1. (a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
  2. (b) (A) और (R) दोनों सही हैं, परंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
  3. (c) (A) सही है, परंतु (R) गलत है।
  4. (d) (A) गलत है, परंतु (R) सही है।

उत्तर: (a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — संविधान के अनुच्छेद 73 के अंतर्गत विदेश नीति का संचालन मुख्यतः संघ की कार्यपालिका के पास है, परंतु संसदीय कूटनीति द्विपक्षीय और बहुपक्षीय मंचों पर विश्वास और निरंतरता बढ़ाती है। अंतर-संसदीय संघ (IPU) और ब्रिक्स संसदीय मंच जैसे मंच इसी प्रक्रिया का उदाहरण हैं, इसलिए (R) (A) की सही व्याख्या है।

Q3. निम्नलिखित सुमेलों पर विचार कीजिए:

सूची I (संविधान का अनुच्छेद):
A. अनुच्छेद 93
B. अनुच्छेद 99
C. अनुच्छेद 108
D. अनुच्छेद 100

सूची II (प्रावधान):
i. सदन की कार्यवाही में मतदान का नियम
ii. दोनों सदनों की संयुक्त बैठक
iii. लोकसभा द्वारा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का निर्वाचन
iv. सदस्यों द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान

सही सुमेलन चुनिए:

  1. A-iii, B-iv, C-ii, D-i
  2. A-i, B-iii, C-ii, D-iv
  3. A-iii, B-ii, C-iv, D-i
  4. A-iii, B-iv, C-i, D-ii

उत्तर: A-iii, B-iv, C-ii, D-i — अनुच्छेद 93 के अंतर्गत लोकसभा अपने अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का निर्वाचन करती है (iii)। अनुच्छेद 99 सदस्यों द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान से संबंधित है (iv)। अनुच्छेद 108 दोनों सदनों की संयुक्त बैठक से संबंधित है (ii)। अनुच्छेद 100 सदन में मतदान और गणपूर्ति के नियम देता है (i)।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ ‘संसदीय कूटनीति कार्यपालिका की विदेश नीति की केवल सहायक भूमिका निभाती है।’ इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। ब्रिक्स संसदीय मंच और अंतर-संसदीय संघ जैसे मंचों के संदर्भ में बताइए कि इनकी प्रभावशीलता को कौन-से संवैधानिक और संस्थागत सीमाएँ प्रभावित करती हैं। (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर की रूपरेखा (मॉडल-उत्तर कंकाल):
1. भूमिका: विदेश नीति और संसदीय कूटनीति (Parliamentary Diplomacy) की परिभाषा। यह कार्यपालिका की कूटनीति से भिन्न है, जिसमें सांसद दल-निरपेक्ष संवाद, विधायी अनुभव और जन-प्रतिनिधित्व के आधार पर संवाद करते हैं। ब्रिक्स संसदीय मंच और अंतर-संसदीय संघ (IPU, 1889, जिनेवा) का उल्लेख करें।
2. संवैधानिक ढाँचा: अनुच्छेद 73 के अंतर्गत संघ की कार्यपालिका की विदेश नीति संबंधी कार्यकारी शक्ति; अनुच्छेद 51 के अंतर्गत अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देने का राज्य-नीति निदेशक तत्व; अनुच्छेद 253 के अंतर्गत संसद की वह शक्ति जिससे वह अंतरराष्ट्रीय संधियों और समझौतों को लागू करने के लिए विधि बना सकती है; संघ सूची की प्रविष्टि 14 (संधियों और करारों में प्रवेश)।
3. संस्थागत भूमिका: लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका (अनुच्छेद 93), संसदीय मैत्री समूह (Parliamentary Friendship Groups), संसदीय समितियों की विदेश और रक्षा मामलों पर भूमिका।
4. पक्ष में तर्क: संसदीय संवाद से विश्वास-निर्माण; कार्यपालिका परिवर्तन के बावजूद दीर्घकालिक निरंतरता; सॉफ्ट पावर (Soft Power) का विस्तार; दक्षिण-दक्षिण सहयोग में लोकतांत्रिक संवाद।
5. विपक्ष में तर्क और सीमाएँ: विदेश नीति पर कार्यपालिका का प्रधान नियंत्रण; संसदीय मंचों के प्रस्ताव बाध्यकारी नहीं होते; सदस्यों की सीमित विदेश-नीति विशेषज्ञता; घरेलू राजनीति के कारण बहुदलीय सहमति कठिन; समितियों की गोपनीयता की सीमाएँ; संधि-अनुमोदन की प्रक्रिया में संसद की भूमिका सीमित।
6. संतुलित निष्कर्ष: संसदीय कूटनीति कार्यपालिका की सहायक और पूरक है, प्रतिस्थापक नहीं। सुधार हेतु संसदीय मंचों पर नियमित समन्वय, विदेश मामलों की स्थायी समिति की सक्रिय भूमिका, और अंतरराष्ट्रीय संधियों पर संसदीय पारदर्शिता का सुझाव दीजिए।
7. समसामयिक संदर्भ: प्रधानमंत्री द्वारा इस मंच की भूमिका पर लेख साझा किए जाने के बाद यह बहस संसदीय संवाद को सुदृढ़ करने की ओर बढ़ी है; उत्तर में इसका संदर्भ सामान्य रूप से दें, किसी दल या व्यक्ति के वक्तव्य का उल्लेख न करें।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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