09 Oct ओडिशा में SEBC आयोग: ओबीसी आरक्षण से आगे की राजनीतिक पहल

✎ स्थानीय निकायों में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण हेतु सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित 'ट्रिपल टेस्ट' में एक समर्पित आयोग का गठन, पिछड़ेपन के अनुपात का निर्धारण और 50% आरक्षण सीमा का पालन शामिल है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान – ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और आधारभूत संरचना। | GS Paper II — संघ एवं राज्यों के कार्य और उत्तरदायित्व, संघीय ढाँचे से संबंधित विषय एवं चुनौतियाँ, स्थानीय स्तर पर शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण और उसकी चुनौतियाँ।
- Prelims: सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग (SEBC), स्थानीय स्वशासन संस्थाएँ, अनुच्छेद 243-D(6), अनुच्छेद 243-T(6), के. कृष्णमूर्ति वाद, ट्रिपल टेस्ट (त्रिपक्षीय जाँच), ओडिशा पंचायत समिति (संशोधन) अधिनियम, 1995, ओडिशा ग्राम पंचायत अधिनियम, 1964, ओडिशा पंचायत समिति अधिनियम, 1959, ओडिशा जिला परिषद अधिनियम, 1991
- Essay: स्थानीय स्वशासन में समावेशी प्रतिनिधित्व: चुनौतियाँ और समाधान, संवैधानिक प्रावधानों के तहत सामाजिक न्याय की अवधारणा
त्वरित पुनरावृत्ति: स्थानीय निकायों में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण हेतु सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित ‘ट्रिपल टेस्ट’ में एक समर्पित आयोग का गठन, पिछड़ेपन के अनुपात का निर्धारण और 50% आरक्षण सीमा का पालन शामिल है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
ओडिशा सरकार ने स्थानीय स्वशासन संस्थाओं में सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों (SEBCs) के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का आकलन करने और उनकी राजनीतिक पिछड़ेपन का निर्धारण करने के लिए एक आयोग का गठन किया है। यह कदम 2027 के पंचायत और शहरी स्थानीय निकाय चुनावों से पहले उठाया गया है, जिसका उद्देश्य स्थानीय निकायों में SEBCs के लिए आरक्षण बहाल करना है, जो 2022 के चुनावों में अनुपस्थित था। यह आयोग सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनिवार्य ‘ट्रिपल टेस्ट’ की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अनुभवजन्य डेटा (empirical data) एकत्र करेगा।
पृष्ठभूमि
- ओडिशा में 1995 से 2017 तक स्थानीय निकाय चुनावों में पिछड़े वर्गों के लिए 27% कोटा लागू था।
- ओडिशा पंचायत समिति (संशोधन) अधिनियम, 1995 के तहत, प्रत्येक समिति में प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा भरी जाने वाली सीटों में से कम से कम 27% सीटें संविधान के अनुच्छेद 243-D(6) में संदर्भित पिछड़े वर्ग के नागरिकों के लिए आरक्षित थीं।
- 2022 के पंचायती राज संस्था चुनावों में राज्य सरकार 27% कोटा प्रदान नहीं कर सकी, क्योंकि ओडिशा उच्च न्यायालय में इस आधार पर आरक्षण को चुनौती दी गई थी कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनिवार्य ‘ट्रिपल टेस्ट’ पूरा नहीं किया गया था।
- इसके परिणामस्वरूप, राज्य को 27% कोटा वापस लेना पड़ा था।
- सर्वोच्च न्यायालय के के. कृष्णमूर्ति वाद में ‘ट्रिपल टेस्ट’ के जनादेश और ओडिशा उच्च न्यायालय के आदेशों के बाद, राज्य सरकार ने 2021 में ओडिशा ग्राम पंचायत अधिनियम, 1964, ओडिशा पंचायत समिति अधिनियम, 1959 और ओडिशा जिला परिषद अधिनियम, 1991 में संशोधन किया।
- इन संशोधनों ने अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़े वर्गों (OBCs) के लिए संयुक्त आरक्षण को 50% तक सीमित कर दिया, जिससे OBCs और SEBCs के लिए पहले के 27% कोटे पर प्रभाव पड़ा।
स्थानीय निकायों में SEBC आरक्षण और ‘ट्रिपल टेस्ट’
- सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग (SEBCs) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15(4) और 16(4) के तहत परिभाषित वर्गों में से हैं, जिन्हें शिक्षा और रोजगार में विशेष प्रावधानों की आवश्यकता होती है।
- स्थानीय स्वशासन संस्थाओं में आरक्षण का प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 243-D(6) (पंचायतों के लिए) और अनुच्छेद 243-T(6) (नगरपालिकाओं के लिए) में किया गया है, जो राज्यों को पिछड़े वर्गों के लिए सीटों के आरक्षण हेतु कानून बनाने की शक्ति देता है।
- के. कृष्णमूर्ति बनाम भारत संघ वाद (2010) में सर्वोच्च न्यायालय ने स्थानीय निकायों में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण को अनुमति देते हुए कुछ शर्तें निर्धारित कीं, जिन्हें ‘ट्रिपल टेस्ट’ के रूप में जाना जाता है।
- पहला टेस्ट: राज्य के भीतर स्थानीय निकायों में पिछड़ेपन की प्रकृति और निहितार्थों की जाँच करने के लिए एक समर्पित आयोग का गठन करना।
- दूसरा टेस्ट: आयोग की सिफारिशों के आधार पर स्थानीय निकाय-वार पिछड़े वर्गों के अनुपात को निर्धारित करना।
- तीसरा टेस्ट: अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए कुल आरक्षण 50% की सीमा से अधिक नहीं होना चाहिए।
- ओडिशा सरकार द्वारा गठित यह आयोग आधिकारिक अभिलेखों, रिपोर्टों, सर्वेक्षणों और अन्य उपलब्ध डेटा के आधार पर SEBC नागरिकों के कुल जनसंख्या में ग्रामीण और स्थानीय निकाय-वार अनुपात का निर्धारण करेगा।
- यह आयोग SEBCs के राजनीतिक पिछड़ेपन की प्रकृति और निहितार्थों, विशेष रूप से स्थानीय निकायों में उनके प्रतिनिधित्व की समकालीन अनुभवजन्य जाँच भी करेगा।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| SEBC आयोग का गठन | स्थानीय स्वशासन संस्थाओं में SEBCs के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और पिछड़ेपन का आकलन |
| न्यायमूर्ति प्रमाथ पटनायक की अध्यक्षता | आयोग की निष्पक्षता और कानूनी विशेषज्ञता सुनिश्चित करना |
| 2027 के पंचायत और शहरी स्थानीय निकाय चुनावों से पहले | आगामी चुनावों में SEBCs के लिए आरक्षण बहाल करने का लक्ष्य |
| ‘ट्रिपल टेस्ट’ की आवश्यकताओं को पूरा करना | सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप आरक्षण नीति को वैध बनाना |
| जनसंख्या अनुपात का निर्धारण | SEBC नागरिकों के सटीक अनुपात के आधार पर आरक्षण का प्रावधान |
| राजनीतिक पिछड़ेपन का समकालीन अनुभवजन्य अध्ययन | स्थानीय निकायों में SEBCs के प्रतिनिधित्व की वास्तविक स्थिति का आकलन |
महत्व
सामाजिक न्याय
- यह कदम सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (SEBCs) को स्थानीय स्वशासन संस्थाओं में उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने में मदद करेगा, जिससे सामाजिक न्याय के सिद्धांत को बढ़ावा मिलेगा।
- आरक्षण नीति में विसंगतियों को दूर करके, यह आयोग SEBC समुदायों के सशक्तिकरण और समावेशी विकास में योगदान देगा।
शासन और नीति निर्माण
- आयोग द्वारा एकत्र किए गए अनुभवजन्य डेटा (empirical data) के आधार पर, राज्य सरकार स्थानीय निकायों में SEBCs के लिए एक वैध और तर्कसंगत आरक्षण नीति तैयार कर सकेगी।
- यह पहल सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनिवार्य ‘ट्रिपल टेस्ट’ (triple test) को पूरा करने में राज्य की मदद करेगी, जिससे आरक्षण संबंधी कानूनी चुनौतियों का समाधान होगा।
लोकतांत्रिक भागीदारी
- स्थानीय स्वशासन संस्थाओं में SEBCs के प्रतिनिधित्व को बहाल करने से इन समुदायों की लोकतांत्रिक भागीदारी बढ़ेगी, जिससे जमीनी स्तर पर शासन अधिक प्रतिनिधि और समावेशी बनेगा।
- यह निर्णय 2022 के चुनावों में SEBCs के लिए आरक्षण की अनुपस्थिति के बाद उनकी राजनीतिक भागीदारी को पुनः स्थापित करेगा।
चुनौतियाँ
1. डेटा संग्रह और विश्लेषण
- SEBC नागरिकों के सटीक अनुपात और उनके राजनीतिक पिछड़ेपन का निर्धारण करने के लिए विश्वसनीय और अद्यतन डेटा एकत्र करना एक बड़ी चुनौती हो सकती है।
- डेटा की सटीकता और उसकी व्याख्या पर विवाद उत्पन्न हो सकते हैं, जिससे आयोग के निष्कर्षों की वैधता पर सवाल उठ सकते हैं।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक सशक्तिकरण, शासन
2. कानूनी चुनौतियाँ
- आयोग की सिफारिशों और उसके आधार पर लागू की गई आरक्षण नीति को फिर से कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, खासकर यदि ‘ट्रिपल टेस्ट’ के सभी मानदंडों को पूरी तरह से पूरा नहीं किया जाता है।
- आरक्षण की 50% सीमा का पालन करना और SEBCs के लिए उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना एक नाजुक संतुलन है, जिस पर कानूनी विवाद हो सकते हैं।
यूपीएससी लिंक: न्यायिक समीक्षा, संवैधानिक कानून
3. राजनीतिक सहमति और कार्यान्वयन
- आयोग की सिफारिशों पर राजनीतिक सहमति बनाना और उन्हें प्रभावी ढंग से लागू करना एक चुनौती हो सकती है, खासकर विभिन्न राजनीतिक दलों के हितों को देखते हुए।
- स्थानीय निकायों में आरक्षण के कार्यान्वयन में प्रशासनिक और तार्किक बाधाएं आ सकती हैं।
यूपीएससी लिंक: शासन, नीति निर्माण
4. प्रतिनिधित्व की गुणवत्ता
- केवल संख्यात्मक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना ही पर्याप्त नहीं है; यह भी सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि SEBCs के प्रतिनिधि प्रभावी ढंग से अपने समुदायों के हितों का प्रतिनिधित्व करें।
- राजनीतिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए केवल आरक्षण से परे अन्य उपायों की भी आवश्यकता हो सकती है।
यूपीएससी लिंक: समावेशी विकास, लोकतंत्र
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| ‘ट्रिपल टेस्ट’ का अनुपालन | सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित तीन शर्तों (अनुभवजन्य डेटा, आरक्षण का अनुपात, 50% सीमा) को पूरा करने में संभावित कठिनाई। |
| डेटा की विश्वसनीयता | SEBCs की जनसंख्या और राजनीतिक पिछड़ेपन पर सटीक और अद्यतन डेटा एकत्र करने की चुनौती। |
| आरक्षण की 50% सीमा | अनुसूचित जाति (SCs), अनुसूचित जनजाति (STs) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBCs) के लिए कुल आरक्षण को 50% से अधिक न होने देने का दबाव। |
| कानूनी चुनौतियाँ | आयोग की सिफारिशों और आरक्षण नीति के खिलाफ भविष्य में संभावित कानूनी मुकदमे। |
| राजनीतिक इच्छाशक्ति | आयोग की सिफारिशों को लागू करने और आवश्यक विधायी संशोधन करने के लिए निरंतर राजनीतिक प्रतिबद्धता की आवश्यकता। |
आगे की राह
- आयोग को अनुभवजन्य डेटा (empirical data) एकत्र करने के लिए एक मजबूत और वैज्ञानिक पद्धति अपनानी चाहिए, जिसमें विभिन्न स्रोतों से जानकारी शामिल हो।
- आरक्षण नीति को अंतिम रूप देते समय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित ‘ट्रिपल टेस्ट’ के सभी तीन मानदंडों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
- राज्य सरकार को SEBCs के लिए आरक्षण के साथ-साथ अन्य सामाजिक-आर्थिक विकास कार्यक्रमों पर भी ध्यान देना चाहिए ताकि उनके समग्र सशक्तिकरण को बढ़ावा मिल सके।
- आरक्षण नीति के कार्यान्वयन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए ताकि किसी भी संभावित अनियमितता या पक्षपात से बचा जा सके।
- विभिन्न हितधारकों, विशेषकर SEBC समुदायों के प्रतिनिधियों के साथ व्यापक विचार-विमर्श किया जाना चाहिए ताकि नीति को अधिक समावेशी और स्वीकार्य बनाया जा सके।
- आरक्षण के प्रभाव का नियमित मूल्यांकन किया जाना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि यह अपने वांछित लक्ष्यों को प्राप्त कर रहा है और यदि आवश्यक हो तो समायोजन किया जा सके।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग (SEBC) · स्थानीय स्वशासन संस्थाएँ · आरक्षण नीति · त्रिपक्षीय परीक्षण (Triple Test) · अनुच्छेद 243-D(6) · ओडिशा पंचायत समिति (संशोधन) अधिनियम, 1995 · के. कृष्णमूर्ति मामला · राजनीतिक पिछड़ापन · अनुभवजन्य डेटा · संवैधानिक प्रावधान
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 243-D(6)’, ‘note’: ‘पंचायतों में सीटों का आरक्षण’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 15(4)’, ‘note’: ‘सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 16(4)’, ‘note’: ‘सेवाओं में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 243-T(6)’, ‘note’: ‘नगरपालिकाओं में सीटों का आरक्षण’}
अवधारणा प्रवाह
ओडिशा में स्थानीय निकायों में SEBC आरक्षण रद्द → सर्वोच्च न्यायालय के ‘ट्रिपल टेस्ट’ का अनुपालन न होना → राज्य सरकार द्वारा SEBC आयोग का गठन → आयोग द्वारा अनुभवजन्य डेटा और राजनीतिक पिछड़ेपन का आकलन → ‘ट्रिपल टेस्ट’ की आवश्यकताओं को पूरा करना → स्थानीय निकायों में SEBCs के लिए आरक्षण की बहाली
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के संविधान का अनुच्छेद 243-D(6) पंचायतों में पिछड़े वर्गों के लिए सीटों के आरक्षण से संबंधित है।
2. सर्वोच्च न्यायालय का ‘त्रिपक्षीय परीक्षण’ स्थानीय निकायों में आरक्षण लागू करने के लिए आवश्यक शर्तों को निर्धारित करता है।
3. के. कृष्णमूर्ति मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्थानीय निकायों में कुल आरक्षण पर 50% की सीमा को अनिवार्य किया था।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। अनुच्छेद 243-D(6) पंचायतों में सीटों के आरक्षण का प्रावधान करता है। कथन 2 सही है। ‘त्रिपक्षीय परीक्षण’ (Triple Test) सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थानीय निकायों में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण लागू करने हेतु निर्धारित किया गया है, जिसमें अनुभवजन्य डेटा संग्रह, आरक्षण का अनुपात और कुल आरक्षण पर 50% की सीमा शामिल है। कथन 3 सही है। के. कृष्णमूर्ति मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्थानीय निकायों में SC, ST और OBC के लिए कुल आरक्षण पर 50% की सीमा को अनिवार्य किया था।
Q2. स्थानीय स्वशासन संस्थाओं में सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों (SEBC) के लिए आरक्षण के संबंध में, ‘त्रिपक्षीय परीक्षण’ (Triple Test) में निम्नलिखित में से कौन-सा तत्व शामिल नहीं है?
- राज्य के भीतर पिछड़ेपन की प्रकृति और निहितार्थों की जांच के लिए एक आयोग का गठन।
- स्थानीय निकायों में आरक्षण का अनुपात निर्धारित करने के लिए अनुभवजन्य डेटा (Empirical Data) का संग्रह।
- अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए कुल आरक्षित सीटों की संख्या 50% से अधिक नहीं होनी चाहिए।
- पिछड़े वर्गों के लिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने हेतु विशेष विधायी प्रावधानों का निर्माण।
उत्तर: पिछड़े वर्गों के लिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने हेतु विशेष विधायी प्रावधानों का निर्माण। — त्रिपक्षीय परीक्षण में राज्य के भीतर पिछड़ेपन की प्रकृति और निहितार्थों की जांच के लिए एक आयोग का गठन, स्थानीय निकायों में आरक्षण का अनुपात निर्धारित करने के लिए अनुभवजन्य डेटा का संग्रह, और अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए कुल आरक्षित सीटों की संख्या 50% से अधिक नहीं होनी चाहिए, ये तीनों तत्व शामिल हैं। विशेष विधायी प्रावधानों का निर्माण परीक्षण का हिस्सा नहीं है, बल्कि परीक्षण के परिणामों के आधार पर एक नीतिगत निर्णय है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ स्थानीय स्वशासन संस्थाओं में सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों (SEBC) के लिए आरक्षण सुनिश्चित करने में सर्वोच्च न्यायालय के ‘त्रिपक्षीय परीक्षण’ (Triple Test) के महत्व का परीक्षण कीजिए। इस संदर्भ में, ओडिशा सरकार द्वारा SEBC आयोग के गठन के निहितार्थों पर चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** स्थानीय स्वशासन में SEBC आरक्षण की पृष्ठभूमि और ‘त्रिपक्षीय परीक्षण’ की आवश्यकता का संक्षिप्त उल्लेख।
2. **त्रिपक्षीय परीक्षण का महत्व:**
* **संवैधानिक जनादेश:** अनुच्छेद 243-D(6) के तहत आरक्षण के प्रावधान को व्यवहार में लाने में भूमिका।
* **न्यायिक समीक्षा:** के. कृष्णमूर्ति मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित सिद्धांतों का उल्लेख।
* **अनुभवजन्य डेटा:** आरक्षण के लिए वैज्ञानिक और तथ्यात्मक आधार प्रदान करने में भूमिका।
* **समानता का सिद्धांत:** आरक्षण को मनमाना होने से रोकने और ‘क्रीमी लेयर’ जैसे मुद्दों को संबोधित करने में सहायक।
* **50% सीमा:** आरक्षण की कुल सीमा को बनाए रखने में इसकी भूमिका।
3. **ओडिशा सरकार द्वारा SEBC आयोग के गठन के निहितार्थ:**
* **न्यायिक आवश्यकताओं की पूर्ति:** सर्वोच्च न्यायालय के ‘त्रिपक्षीय परीक्षण’ की शर्तों को पूरा करने का प्रयास।
* **अनुभवजन्य डेटा संग्रह:** SEBC की जनसंख्या के अनुपात और राजनीतिक पिछड़ेपन का आकलन।
* **आरक्षण की बहाली:** 2022 के चुनावों में अनुपस्थित आरक्षण को बहाल करने का मार्ग प्रशस्त करना।
* **समावेशी शासन:** स्थानीय निकायों में SEBC के उचित प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करना।
* **कानूनी स्थिरता:** भविष्य में आरक्षण संबंधी कानूनी चुनौतियों से बचने का प्रयास।
4. **निष्कर्ष:** स्थानीय स्वशासन में समावेशिता और संवैधानिक मूल्यों को बनाए रखने में ऐसे आयोगों की भूमिका का महत्व।
स्रोत: The Hindu
Odisha PCS (OPSC (OAS)) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: ओडिशा सरकार द्वारा हाल ही में गठित ‘सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग (एसईबीसी) आयोग’ का मुख्य उद्देश्य क्या है?
- A. ओबीसी आरक्षण के तकनीकी पहलुओं का पुनर्मूल्यांकन करना
- B. ओडिशा में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान और उनके उत्थान के लिए व्यापक नीति तैयार करना
- C. केवल अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण नीति लागू करना
- D. राज्य में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (ईडब्ल्यूएस) के लिए आरक्षण लागू करना
उत्तर: B. ओडिशा में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान और उनके उत्थान के लिए व्यापक नीति तैयार करना — एसईबीसी आयोग का गठन ओडिशा में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान कर उनके उत्थान के लिए व्यापक नीति तैयार करने हेतु किया गया है, जो तकनीकी आरक्षण से आगे बढ़कर समावेशी विकास पर केंद्रित है।
Mains: ओडिशा सरकार द्वारा गठित ‘एसईबीसी आयोग’ की भूमिका और महत्व की चर्चा करते हुए, बताइए कि यह आयोग राज्य में सामाजिक न्याय और समावेशन को किस प्रकार सुदृढ़ करेगा? अपने उत्तर में आयोग के गठन के उद्देश्यों, इसकी संरचना और अपेक्षित परिणामों पर प्रकाश डालिए।
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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