03 Nov डीजीपी नियुक्ति नियम: सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों से मांगा ब्योरा
✎ प्रकाश सिंह मामला (2006) के अनुसार पुलिस महानिदेशक की नियुक्ति योग्यता और पारदर्शिता पर आधारित होनी चाहिए तथा राज्यों के नियम इन निर्देशों के अनुरूप होने चाहिए, जिनकी न्यायिक समीक्षा उच्चतम न्यायालय कर सकता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र – II (शासन एवं संविधान): संघवाद, राज्य विषय, पुलिस सुधार, संवैधानिक निकाय और न्यायिक हस्तक्षेप
- Prelims: प्रकाश सिंह मामला (2006) और उसके दिशा-निर्देश, राज्य सूची की प्रविष्टि 2 (पुलिस: राज्य का विषय), अनुच्छेद 142 (उच्चतम न्यायालय की पूर्ण न्याय की शक्ति), अनुच्छेद 355 (संघ का राज्यों की रक्षा का कर्तव्य), राज्य सुरक्षा आयोग (State Security Commission), राष्ट्रीय पुलिस आयोग (National Police Commission, 1977–81), मॉडल पुलिस अधिनियम, 2006, न्याय-मित्र (Amicus Curiae), न्यायिक समीक्षा और विधि का प्रभाव (Statute, नियम, कार्यकारी आदेश)
- Essay: पुलिस सुधार: राज्य पुलिस की स्वायत्तता, राजनीतिक हस्तक्षेप और जवाबदेही, संघवाद में राज्य विषयों पर संघ और न्यायपालिका की भूमिका
त्वरित पुनरावृत्ति: प्रकाश सिंह मामला (2006) के अनुसार पुलिस महानिदेशक की नियुक्ति योग्यता और पारदर्शिता पर आधारित होनी चाहिए तथा राज्यों के नियम इन निर्देशों के अनुरूप होने चाहिए, जिनकी न्यायिक समीक्षा उच्चतम न्यायालय कर सकता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
उच्चतम न्यायालय ने पुलिस महानिदेशक (DGP) की नियुक्ति से जुड़े मामले की सुनवाई को व्यापक करते हुए संघ सरकार से यह जानकारी माँगी है कि प्रत्येक राज्य में पुलिस प्रमुख के चयन और नियुक्ति के लिए कौन-सा विधायी या कार्यकारी ढाँचा अपनाया गया है। न्याय-मित्र वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन के सुझाव पर पीठ ने माना कि राज्यों के नियमों का अलग-अलग मूल्यांकन करने के बजाय समग्र आकलन आवश्यक है। पीठ ने झारखंड के वर्तमान पुलिस महानिदेशक को 16 नवंबर 2026 तक जवाबी शपथ-पत्र दाखिल करने का अवसर भी दिया है। यह मामला इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि न्याय-मित्र के अनुसार कुछ राज्यों ने ऐसे नियम बनाए हैं जो झारखंड के नियमों से मिलते-जुलते हैं, फिर भी वे प्रकाश सिंह मामले के निर्देशों के पालन का दावा करते हैं। उत्तर प्रदेश और पंजाब का उल्लेख भी इसी संदर्भ में हुआ है। पहले, 8 अक्टूबर के आदेश में पीठ ने झारखंड के नियमों की वैधता पर प्रथम दृष्टया सवाल उठाया था और कहा था कि यदि नियम निरस्त होते हैं तो वर्तमान नियुक्ति भी प्रभावित हो सकती है।
पृष्ठभूमि
- पुलिस संविधान के अंतर्गत राज्य सूची का विषय है, इसलिए पुलिस बल का गठन, संचालन और उच्च पदों पर नियुक्ति मुख्यतः राज्यों के दायरे में आती है।
- राष्ट्रीय पुलिस आयोग (1977–81) ने पुलिस प्रमुख के चयन में पारदर्शिता, निश्चित कार्यकाल और राजनीतिक हस्तक्षेप से बचाव की सिफारिशें की थीं, जिन्हें व्यापक रूप से लागू नहीं किया गया।
- प्रकाश सिंह मामले (2006) में उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 142 के अंतर्गत राज्यों के लिए पुलिस सुधार के निर्देश जारी किए, जिनमें डीजीपी के चयन और न्यूनतम कार्यकाल से जुड़े प्रावधान प्रमुख थे।
- केंद्र सरकार ने मॉडल पुलिस अधिनियम, 2006 तैयार किया ताकि राज्य अपने पुलिस कानून इसी आधार पर बना सकें; अनेक राज्यों ने अपने कानून और नियम अलग-अलग रूप में बनाए।
- वर्तमान मामले में मुख्य प्रश्न यह है कि राज्यों के नियम (क़ानून, विनियम या कार्यकारी आदेश) प्रकाश सिंह निर्देशों के अनुरूप हैं या नहीं, और सेवानिवृत्ति से ठीक पहले की गई नियुक्ति उस उद्देश्य को कैसे प्रभावित करती है।
पुलिस महानिदेशक की नियुक्ति का ढाँचा क्या है?
- पुलिस महानिदेशक (DGP) किसी राज्य का सर्वोच्च पुलिस अधिकारी होता है, जो राज्य पुलिस बल के प्रशासन, अनुशासन और अभियान का नेतृत्व करता है।
- पुलिस राज्य का विषय होने के कारण इस पद पर नियुक्ति के नियम राज्य विधानमंडल द्वारा बनाए गए कानूनों, नियमों या राज्य सरकार के कार्यकारी आदेशों से तय होते हैं।
- प्रकाश सिंह मामले के निर्देशों के अनुसार डीजीपी का चयन योग्यता के आधार पर होना चाहिए, और इसके लिए वरिष्ठतम अधिकारियों के पैनल में से चयन का प्रावधान किया गया, जिसमें संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की भूमिका भी उल्लिखित है।
- निर्देशों में डीजीपी के लिए न्यूनतम कार्यकाल का प्रावधान है, ताकि पद पर स्थिरता रहे और मनमाने तबादले या हटाने से बचाव हो।
- राज्य सुरक्षा आयोग (State Security Commission) पुलिस के कार्यों की दिशा और नीति पर निगरानी रखने वाला निकाय है, जिसे पुलिस नीति और अधिकारियों के मूल्यांकन में भूमिका देने की बात निर्देशों में की गई थी।
- अनुच्छेद 355 के अंतर्गत संघ का कर्तव्य है कि वह बाह्य आक्रमण और आंतरिक अशांति से राज्यों की रक्षा करे, और कानून-व्यवस्था की स्थिति में संघ का हस्तक्षेप इसी संदर्भ में होता है।
- न्याय-मित्र (Amicus Curiae) वह विधिवेत्ता है जिसे न्यायालय किसी जटिल सार्वजनिक प्रश्न पर स्वतंत्र सहायता के लिए नियुक्त करता है; वह पक्षकार नहीं होता।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| सर्वोच्च न्यायालय का विस्तृत परीक्षण | राज्यों में पुलिस महानिदेशक की नियुक्ति के नियमों और विधिक-प्रशासनिक ढाँचे का समग्र आकलन, केवल किसी एक राज्य के नियम तक सीमित नहीं |
| न्याय मित्र की भूमिका | वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन (न्याय मित्र / Amicus Curiae) के सुझाव पर केंद्र और सभी राज्यों से नियुक्ति-व्यवस्था का सार माँगा गया |
| प्रकाश सिंह निर्णय का संदर्भ | वर्ष 2006 के प्रकाश सिंह निर्णय (Prakash Singh Judgment) में दिए निर्देशों के अनुपालन की जाँच का मुख्य आधार |
| झारखंड का मामला | झारखंड के नियमों को प्रथम दृष्टया प्रकाश सिंह निर्णय के विरुद्ध मानकर वर्तमान पुलिस महानिदेशक की नियुक्ति की वैधता पर प्रश्न |
| समय-सीमा | केंद्र सरकार और झारखंड सरकार के जवाब तथा पुलिस महानिदेशक का प्रति-शपथ-पत्र 16 नवंबर 2026 तक दाखिल करने के निर्देश |
| विधिक रूप की विविधता | नियम कानून, विनियम या कार्यकारी आदेश, किसी भी रूप में हो सकते हैं, पर उनका विधिक प्रभाव न्यायिक समीक्षा के अधीन रहेगा |
महत्व
संवैधानिक और विधिक
- प्रकाश सिंह निर्णय सर्वोच्च न्यायालय का विधि-घोषणा है, इसलिए अनुच्छेद 141 के अंतर्गत सभी न्यायालयों और प्रशासन पर बाध्यकारी है
- अनुच्छेद 142 के अंतर्गत जारी निर्देशों के अनुपालन की जाँच से यह तय होगा कि राज्यों के नियम उनके अनुरूप हैं या नहीं
- न्यायिक समीक्षा के माध्यम से राज्य के नियमों की वैधता तय होगी, और अवैध पाए जाने पर उसके परिणामस्वरूप हुई नियुक्ति भी प्रभावित हो सकती है
प्रशासनिक
- पुलिस महानिदेशक का निश्चित कार्यकाल और योग्यता-आधारित चयन पुलिस बल में नेतृत्व की स्थिरता सुनिश्चित करने का उद्देश्य रखता है
- सेवानिवृत्ति से ठीक पहले नियुक्ति जैसी स्थिति से यह प्रश्न उठता है कि चयन प्रक्रिया वरिष्ठता और योग्यता के सिद्धांत का पालन करती है या नहीं
- राज्यों में समान प्रक्रिया होने से पुलिस नेतृत्व के चयन में पारदर्शिता और पूर्वानुमेयता बढ़ती है
संघीय ढाँचा
- पुलिस राज्य सूची का विषय है, इसलिए राज्यों को इस पर विधि और नियम बनाने की संवैधानिक शक्ति प्राप्त है
- सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश इस विधायी शक्ति पर सीमा के रूप में कार्य करते हैं, जिससे राज्य-स्वायत्तता और केंद्रीय दिशानिर्देशों के बीच संतुलन का प्रश्न उठता है
- केंद्र सरकार की भूमिका सभी राज्यों की जानकारी एकत्र करने में सहायक होती है, जिससे राष्ट्रीय स्तर पर तुलनात्मक तस्वीर बनती है
न्यायिक प्रक्रिया
- व्यक्तिगत राज्य के नियमों को अलग-अलग देखने के बजाय समग्र आकलन से न्यायालय एक सुसंगत सिद्धांत विकसित कर सकता है
- न्याय मित्र द्वारा व्यापक टिप्पणी दाखिल कर पक्षकारों के बीच प्रसारित करने की व्यवस्था प्रक्रिया को पारदर्शी बनाती है
चुनौतियाँ
1. औपचारिक अनुपालन बनाम वास्तविक क्रियान्वयन
- कुछ राज्य नियम बनाकर भी प्रकाश सिंह निर्णय के अनुपालन का दावा करते हैं, जबकि व्यवहार में चयन प्रक्रिया भिन्न हो सकती है
- नियम कागज़ पर होना और उनका वास्तव में लागू होना अलग विषय है, और न्यायालय ने इसी अंतर की जाँच पर बल दिया है
यूपीएससी लिंक: शासन, पुलिस सुधार (GS-2)
2. पुलिस नेतृत्व में राजनीतिक हस्तक्षेप का जोखिम
- यदि चयन प्रक्रिया में कार्यकाल की सुरक्षा और पैनल-आधारित चयन का अभाव हो, तो पुलिस महानिदेशक पद पर नियुक्ति में मनमानी की आशंका बढ़ती है
- प्रकाश सिंह निर्णय ने राज्य सुरक्षा आयोग जैसे निकायों के माध्यम से इस जोखिम को कम करने का प्रयास किया था
यूपीएससी लिंक: शासन, नागरिक सेवा, संस्थागत स्वायत्तता (GS-2)
3. सेवानिवृत्ति के निकट नियुक्ति का प्रश्न
- सेवानिवृत्ति से ठीक पहले नियुक्ति से कार्यकाल की निरंतरता और नेतृत्व की स्थिरता पर प्रश्न उठते हैं
- यदि नियम का आधार ही संदिग्ध हो, तो बाद की सभी नियुक्तियाँ भी विवादित हो सकती हैं
यूपीएससी लिंक: लोक प्रशासन, नैतिकता और शासन (GS-4)
4. राज्य विधायी क्षमता और न्यायिक निर्देशों के बीच संबंध
- पुलिस राज्य सूची का विषय है, किंतु सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश राज्यों के नियम-निर्माण को सीमित करते हैं
- राज्यों को नियम बनाने की स्वतंत्रता और न्यायिक निर्देशों का पालन, दोनों के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण है
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान, संघवाद (GS-2)
5. पूर्वव्यापी प्रभाव और नियुक्तियों की वैधता
- यदि किसी राज्य का नियम प्रथम दृष्टया विरोधी पाया जाता है, तो वर्तमान नियुक्ति को रद्द करने जैसे परिणाम संभव हैं
- इससे प्रशासनिक निरंतरता और विधि के शासन के बीच तनाव उत्पन्न हो सकता है
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान, न्यायपालिका की भूमिका (GS-2)
6. राज्यों के बीच एकरूपता का अभाव
- विभिन्न राज्यों में चयन पैनल, कार्यकाल और सेवानिवृत्ति-पूर्व नियुक्ति के नियम अलग-अलग हो सकते हैं
- एकरूप ढाँचे के अभाव में पुलिस नेतृत्व के चयन में असमानता बनी रह सकती है
यूपीएससी लिंक: शासन, संघवाद (GS-2)
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| अनुपालन की वास्तविकता | नियम होने के बावजूद उनका व्यवहार में पालन सुनिश्चित करना कठिन |
| राज्य-स्वायत्तता | पुलिस राज्य सूची का विषय होने से राज्यों की विधायी शक्ति और न्यायिक निर्देशों में संतुलन |
| कार्यकाल की सुरक्षा | न्यूनतम कार्यकाल और सेवानिवृत्ति-निकट नियुक्ति के बीच विरोधाभास |
| नियुक्ति की वैधता | नियम अवैध पाए जाने पर वर्तमान नियुक्ति का प्रभावित होना |
| प्रक्रिया की गति | एक राज्य के मामले को पहले सुनने और शेष राज्यों के आकलन के बीच समन्वय |
| नेतृत्व की स्थिरता | बार-बार नियुक्ति और अस्थिर कार्यकाल से पुलिस बल की कार्यक्षमता पर प्रभाव |
आगे की राह
- सभी राज्यों से नियुक्ति संबंधी विधि, नियम और कार्यकारी आदेशों की एक समान सूची और उनके क्रियान्वयन का विवरण एकत्र किया जाए
- प्रकाश सिंह निर्णय के प्रत्येक निर्देश, जैसे पैनल-आधारित चयन और न्यूनतम कार्यकाल, के अनुपालन का स्वतंत्र मूल्यांकन हो
- राज्य सुरक्षा आयोग जैसे निकायों को सक्रिय और प्रभावी बनाया जाए, ताकि चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे
- सेवानिवृत्ति के निकट नियुक्ति पर स्पष्ट दिशानिर्देश बनाए जाएँ, जिससे पद की अवधि और योग्यता के मानदंड तय हों
- संघ और राज्य सरकारों के बीच नियमित समन्वय के लिए एक सामान्य मंच या प्रक्रिया विकसित हो
- पुलिस नेतृत्व चयन से जुड़े विवादों के त्वरित समाधान के लिए प्रक्रियात्मक समय-सीमा तय की जाए
- न्यायिक निर्णयों के बाद उनके अनुपालन की नियमित समीक्षा और सार्वजनिक प्रतिवेदन की व्यवस्था हो
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
पुलिस महानिदेशक नियुक्ति (DGP Appointment) · प्रकाश सिंह निर्णय (Prakash Singh Judgment), 2006 · राज्य सूची (State List) और पुलिस · पुलिस सुधार (Police Reforms) · राज्य सुरक्षा आयोग (State Security Commission) · संघवाद (Federalism) · न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) · अनुच्छेद 141 (Article 141) · अनुच्छेद 355 (Article 355) · राष्ट्रीय पुलिस आयोग (National Police Commission) · मॉडल पुलिस अधिनियम, 2006 (Model Police Act, 2006) · न्याय-मित्र (Amicus Curiae)
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 142: पूर्ण न्याय हेतु निर्देश जारी करने की शक्ति
- अनुच्छेद 141: सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की बाध्यकारी प्रकृति
- अनुच्छेद 309: सेवा शर्तों हेतु राज्य द्वारा नियम बनाने की शक्ति
- सातवीं अनुसूची, राज्य सूची की प्रविष्टि 2: राज्य का पुलिस विषय
अवधारणा प्रवाह
पुलिस महानिदेशक (Director General of Police) की नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा अपने नियमों के आधार पर की जाती है → प्रकाश सिंह निर्णय (2006) ने चयन, न्यूनतम कार्यकाल और पुलिस सुधार के निर्देश दिए, जो सभी राज्यों पर बाध्यकारी हैं → कुछ राज्यों द्वारा बनाए गए नियम प्रथम दृष्टया इन निर्देशों के विरुद्ध प्रतीत होने पर मामला सर्वोच्च न्यायालय में पहुँचता है → सर्वोच्च न्यायालय नियमों की वैधता की जाँच करता है और न्याय मित्र के सुझाव पर सभी राज्यों का समग्र आकलन माँगता है → केंद्र सरकार और राज्यों से नियमों का सार और उनके क्रियान्वयन का विवरण प्राप्त होता है → नियमों की वैधता तय होने पर उनके आधार पर हुई नियुक्तियों की वैधता पर अंतिम निर्णय संभव होता है
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. पुलिस सुधारों और पुलिस महानिदेशक (Director General of Police, DGP) की नियुक्ति के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. पुलिस भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची (State List) का विषय है।
2. प्रकाश सिंह निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि पुलिस महानिदेशक का चयन संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) द्वारा तैयार किए गए, सेवा में वरिष्ठतम तीन अधिकारियों के पैनल में से किया जाए।
3. प्रकाश सिंह निर्णय सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2016 में दिया था।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: पुलिस राज्य सूची की प्रविष्टि 1 के अंतर्गत आती है, इसलिए यह मुख्यतः राज्यों का विषय है। कथन 2 सही है: प्रकाश सिंह निर्णय (2006) में वरिष्ठतम तीन अधिकारियों का पैनल संघ लोक सेवा आयोग द्वारा तैयार करने और उसमें से राज्य द्वारा डीजीपी चुनने का निर्देश दिया गया था। कथन 3 गलत है: यह निर्णय वर्ष 2006 में दिया गया था, 2016 में नहीं।
Q2. निम्नलिखित दो कथनों पर विचार कीजिए:
अभिकथन (A): राज्यों द्वारा पुलिस महानिदेशक की नियुक्ति के लिए बनाए गए नियम न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के अधीन हैं।
कारण (R): संविधान के अनुच्छेद 141 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित विधि भारत के सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी होती है।
उपर्युक्त के संदर्भ में, निम्नलिखित विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
- (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है
- (A) और (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है
- (A) सही है, किंतु (R) गलत है
- (A) गलत है, किंतु (R) सही है
उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है — अभिकथन सही है: राज्यों के नियम संविधान के अनुच्छेद 226 और 32 के अंतर्गत न्यायिक समीक्षा के अधीन हैं। कारण भी सही है: अनुच्छेद 141 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित विधि सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी होती है, और प्रकाश सिंह निर्णय के निर्देश इसी शक्ति से लागू होते हैं, अतः कारण अभिकथन की सही व्याख्या है।
Q3. निम्नलिखित सुमेलन (Match) पर विचार कीजिए:
स्तंभ I (संवैधानिक प्रावधान):
(a) अनुच्छेद 141
(b) अनुच्छेद 246
(c) अनुच्छेद 355
(d) अनुच्छेद 316
स्तंभ II (विषय):
1. संघ लोक सेवा आयोग और राज्य लोक सेवा आयोगों के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति
2. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित विधि का सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी होना
3. संघ और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों का वितरण
4. राज्यों को बाह्य आक्रमण और आंतरिक अशांति से बचाना संघ का कर्तव्य
सही सुमेलन चुनिए:
- (a)-2, (b)-3, (c)-4, (d)-1
- (a)-3, (b)-2, (c)-1, (d)-4
- (a)-2, (b)-1, (c)-4, (d)-3
- (a)-4, (b)-3, (c)-2, (d)-1
उत्तर: (a)-2, (b)-3, (c)-4, (d)-1 — अनुच्छेद 141 सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों की बाध्यकारिता से संबंधित है (2)। अनुच्छेद 246 संघ और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों के वितरण से संबंधित है, जो सातवीं अनुसूची पर आधारित है (3)। अनुच्छेद 355 संघ का राज्यों की रक्षा का कर्तव्य बताता है (4)। अनुच्छेद 316 लोक सेवा आयोगों के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति और कार्यकाल से संबंधित है (1)।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ पुलिस राज्य सूची का विषय है, फिर भी सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यों के पुलिस महानिदेशक की नियुक्ति में प्रकाश सिंह निर्णय के माध्यम से निर्देश जारी किए हैं। इस न्यायिक हस्तक्षेप के संवैधानिक आधार का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि यदि राज्य इन निर्देशों के विपरीत नियम बनाते हैं, तो संघवाद और नियुक्ति की वैधता पर क्या परिणाम होंगे। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल उत्तर के मुख्य बिंदु:
1. भूमिका: पुलिस का संवैधानिक स्वरूप। सातवीं अनुसूची की राज्य सूची की प्रविष्टि 1 (पुलिस, जिसमें सशस्त्र बलों से भिन्न राज्य पुलिस बल शामिल हैं) के अंतर्गत पुलिस राज्य का विषय है। संघ की भूमिका अनुच्छेद 355 के अंतर्गत बाह्य आक्रमण और आंतरिक अशांति से राज्यों की रक्षा तक सीमित है। अनुच्छेद 246 विधायी शक्तियों के वितरण का आधार है।
2. न्यायिक हस्तक्षेप का आधार: प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ (2006) में सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सुरक्षा आयोग का गठन, डीजीपी का चयन संघ लोक सेवा आयोग द्वारा तैयार वरिष्ठतम तीन अधिकारियों के पैनल से करना, न्यूनतम दो वर्ष का कार्यकाल, और पुलिस के दैनिक कार्यों में अनुचित राजनीतिक हस्तक्षेप से बचाव जैसे निर्देश दिए। यह अनुच्छेद 32 के अंतर्गत रिट क्षेत्राधिकार और अनुच्छेद 141 की बाध्यकारिता पर आधारित है। इसे सुधारात्मक न्यायिक सक्रियता के रूप में देखा जाता है।
3. पृष्ठभूमि और सहायक दस्तावेज़: राष्ट्रीय पुलिस आयोग (1977-81) की सिफारिशें; रिबेरो समिति (1998), पद्मनाभैया समिति (2000); सोली सोराबजी समिति द्वारा तैयार मॉडल पुलिस अधिनियम, 2006।
4. वर्तमान घटनाक्रम: झारखंड के नियमों पर प्रश्न, जिनकी प्रथम दृष्टया वैधता पर सर्वोच्च न्यायालय ने संदेह जताया है; न्याय-मित्र (amicus curiae) वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन द्वारा उत्तर प्रदेश और पंजाब सहित अन्य राज्यों के नियमों का समग्र आकलन करने का सुझाव; केंद्र द्वारा सभी राज्यों के नियमों का सार प्रस्तुत करने का निर्देश।
5. संतुलित दृष्टिकोण: पक्ष में तर्क: कार्यकाल की सुरक्षा, नियुक्ति में योग्यता और निष्पक्षता, पुलिस को राजनीतिक दबाव से बचाना, कानून के शासन की रक्षा। विपक्ष/सावधानी: संघवाद और राज्य की विधायी स्वायत्तता, कार्यपालिका-न्यायपालिका के शक्ति-पृथक्करण की चिंता, एकसमान नियम बनाम राज्यों की विविध परिस्थितियाँ, और न्यायालय के निर्देशों का विधायी रूप में अनुपालन।
6. परिणाम: यदि राज्य का नियम प्रकाश सिंह निर्णय के विपरीत पाया जाता है, तो उसके आधार पर हुई नियुक्ति को अवैध घोषित किया जा सकता है, जैसा कि झारखंड मामले में संभावित माना गया है। इससे प्रशासनिक अस्थिरता, अधिकारियों के कार्यकाल पर अनिश्चितता और केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव की संभावना है। सुझाव: राष्ट्रीय स्तर पर पुलिस अधिनियम का आधुनिकीकरण, राज्य सुरक्षा आयोगों का प्रभावी कार्यान्वयन, तथा विधायी और कार्यकारी प्रावधानों की पारदर्शी प्रकाशन व्यवस्था।
7. निष्कर्ष: न्यायिक हस्तक्षेप को संघवाद के भीतर कानून के शासन और पुलिस की स्वायत्तता सुनिश्चित करने के साधन के रूप में संतुलित ढंग से रखना।
स्रोत: orissapost.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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