सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग के अधिकार पर उठाया सवाल, जानिए पूरा मामला

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सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग के अधिकार पर उठाया सवाल, जानिए पूरा मामला

सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग के अधिकार पर उठाया सवाल, जानिए पूरा मामला — सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग की शक्तियों पर चुनौती
आरेख: सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग की शक्तियों पर चुनौती

✎ भारत निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक निकाय है जिसे अनुच्छेद 324 के तहत चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति प्राप्त है, और इसकी कार्यप्रणाली में सामूहिक निर्णय प्रक्रिया का पालन संवैधानिक सिद्धांतों के लिए महत्वपूर्ण है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान, कार्यप्रणाली, सरकार के मंत्रालय एवं विभाग  |  GS Paper II — सांविधिक, विनियामक और विभिन्न अर्ध-न्यायिक निकाय
  • Prelims: भारत निर्वाचन आयोग (ECI), मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC), अनुच्छेद 324, सामूहिक निर्णय, निर्वाचक नामावली, फॉर्म 6, टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ मामला, 1995, मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023
  • Essay: भारत में लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता और जवाबदेही, निर्वाचन सुधार और भारतीय लोकतंत्र का भविष्य

त्वरित पुनरावृत्ति: भारत निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक निकाय है जिसे अनुच्छेद 324 के तहत चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति प्राप्त है, और इसकी कार्यप्रणाली में सामूहिक निर्णय प्रक्रिया का पालन संवैधानिक सिद्धांतों के लिए महत्वपूर्ण है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

सर्वोच्च न्यायालय ने भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की कार्यप्रणाली को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई करने का निर्णय लिया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि एक बहु-सदस्यीय संवैधानिक निकाय के रूप में आयोग में निहित शक्तियों का प्रयोग सामूहिक निर्णय प्रक्रिया का पालन किए बिना किया जा रहा है, जैसा कि कानून द्वारा अनिवार्य है। यह याचिका मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) द्वारा कथित रूप से व्यक्तिगत रूप से शक्तियों के प्रयोग और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की आपत्तियों को नजरअंदाज करने से संबंधित है।

पृष्ठभूमि

  • याचिकाकर्ता ने अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की है, जिसमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ निर्देश की मांग की गई है।
  • याचिका में तर्क दिया गया है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त, आयोग के अध्यक्ष के रूप में, अनुच्छेद 324 द्वारा ‘निर्वाचन आयोग’ नामक निकाय में निहित शक्तियों का व्यक्तिगत रूप से प्रयोग नहीं कर सकते।
  • याचिका में अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच निर्वाचन आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी द्वारा दर्ज की गई कम से कम 14 समकालीन आपत्तियों का हवाला दिया गया है।
  • इन आपत्तियों में आयोग की मंजूरी के बिना ECI के नाम पर संचार जारी करना, बैठकों के एजेंडा और कार्यवृत्त को एक वर्ष से अधिक समय तक प्रसारित न करना, और दोनों आयुक्तों की भागीदारी या अनुमोदन के बिना निर्वाचक नामावली प्रणालियों में बदलाव करना शामिल है।
  • एक प्रमुख शिकायत निर्वाचक नामावली के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision) के दौरान फॉर्म 6 में बदलाव से संबंधित है, जिस पर आयुक्त जोशी ने आपत्ति जताई थी कि निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 में संशोधन के बिना इसे नहीं बदला जा सकता।
  • याचिका में निर्वाचक नामावली डेटाबेस के कथित केंद्रीकरण और वैधानिक क्षेत्रीय-स्तरीय अधिकारियों द्वारा ERONet/ECINet तक पहुंच पर भी चिंता व्यक्त की गई है।
  • याचिका में सर्वोच्च न्यायालय के 1995 के टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ मामले के निर्णय पर भी जोर दिया गया है, जिसने एक बहु-सदस्यीय आयोग में निर्वाचन आयुक्तों की महत्वपूर्ण निर्णय लेने की भूमिका को मान्यता दी थी।

भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India – ECI)

  • भारत निर्वाचन आयोग एक स्वायत्त संवैधानिक निकाय है जो भारत में संघ और राज्य चुनाव प्रक्रियाओं के प्रशासन के लिए जिम्मेदार है।
  • इसका गठन भारत के संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत किया गया था, जो संसद, राज्य विधानसभाओं, भारत के राष्ट्रपति और भारत के उपराष्ट्रपति के कार्यालयों के चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति आयोग में निहित करता है।
  • मूल रूप से, आयोग में केवल एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त होता था, लेकिन निर्वाचन आयुक्तों की संख्या को समय-समय पर बढ़ाया गया है। वर्तमान में, इसमें एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और दो निर्वाचन आयुक्त (ECs) होते हैं।
  • मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। उनका कार्यकाल छह वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो, होता है।
  • मुख्य निर्वाचन आयुक्त को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान ही हटाया जा सकता है, जबकि अन्य निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है।
  • आयोग के प्रमुख कार्यों में निर्वाचक नामावली तैयार करना और अद्यतन करना, चुनाव कार्यक्रम निर्धारित करना, राजनीतिक दलों को मान्यता देना, चुनाव चिन्ह आवंटित करना और चुनाव आचार संहिता लागू करना शामिल है।
  • अनुच्छेद 324 आयोग को व्यापक शक्तियाँ प्रदान करता है ताकि वह स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित कर सके।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
बहु-सदस्यीय निकाय यह सुनिश्चित करता है कि निर्णय सामूहिक रूप से लिए जाएं, जिससे पारदर्शिता और निष्पक्षता बढ़ती है।
सामूहिक निर्णय प्रक्रिया आयोग के सदस्यों के बीच सर्वसम्मति या बहुमत से निर्णय लिए जाते हैं, जो संवैधानिक जनादेश है।
मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) की भूमिका CEC आयोग का अध्यक्ष होता है, लेकिन उसके पास व्यक्तिगत रूप से आयोग की शक्तियों का प्रयोग करने का अधिकार नहीं होता है।
निर्वाचक नामावली का संशोधन मतदाता सूची में बदलाव या संशोधन एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है, जिसके लिए सभी सदस्यों की सहमति या बहुमत की आवश्यकता होती है।
आंतरिक कामकाज का विनियमन आयोग के आंतरिक कामकाज, जैसे बैठकों का एजेंडा और कार्यवृत्त, का उचित संचलन और रिकॉर्ड रखना महत्वपूर्ण है।

महत्व

लोकतांत्रिक महत्व

  • चुनाव आयोग (Election Commission of India – ECI) भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने वाली एक संवैधानिक संस्था है।
  • इसकी निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता और सामूहिक भागीदारी लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों को मजबूत करती है।

संवैधानिक शासन

  • अनुच्छेद 324 (Article 324) के तहत चुनाव आयोग को दी गई शक्तियों का उचित प्रयोग संवैधानिक शासन के लिए महत्वपूर्ण है।
  • यह मामला आयोग के भीतर शक्ति के संतुलन और संवैधानिक प्रावधानों के पालन को सुनिश्चित करने से संबंधित है।

न्यायिक समीक्षा का महत्व

  • उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) द्वारा इस मामले की सुनवाई न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के महत्व को दर्शाती है, जो संवैधानिक निकायों के कामकाज की निगरानी करती है।
  • यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी संवैधानिक निकाय अपनी शक्तियों का मनमाने ढंग से प्रयोग न करे।

चुनौतियाँ

1. सामूहिक निर्णय प्रक्रिया का उल्लंघन

  • याचिका में आरोप लगाया गया है कि आयोग की शक्तियों का प्रयोग सामूहिक निर्णय प्रक्रिया का पालन किए बिना किया जा रहा है।
  • यह चुनाव आयोग के बहु-सदस्यीय स्वरूप के मूल उद्देश्य को कमजोर करता है।

2. निर्वाचक नामावली में बदलाव

  • फॉर्म 6 में बदलाव और विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision) के दौरान नए प्रकटीकरण की आवश्यकता पर आपत्ति उठाई गई है।
  • यह आरोप लगाया गया है कि ये बदलाव पंजीकरण निर्वाचक नियमावली, 1960 (Registration of Electors Rules, 1960) में संशोधन के बिना किए गए।

3. डेटाबेस तक पहुंच का केंद्रीकरण

  • निर्वाचक नामावली डेटाबेस के कथित केंद्रीकरण और ERONet/ECINet तक पहुंच पर चिंता व्यक्त की गई है।
  • यह डेटा सुरक्षा और चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता पर सवाल उठाता है।

4. आंतरिक प्रक्रियात्मक अनियमितताएँ

  • आरोप है कि बैठकों के एजेंडा और कार्यवृत्त प्रसारित नहीं किए गए, और आयोग की मंजूरी के बिना संचार जारी किए गए।
  • यह आयोग के आंतरिक कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी को दर्शाता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
सामूहिक निर्णय का अभाव CEC द्वारा व्यक्तिगत रूप से शक्तियों का प्रयोग, जबकि संविधान आयोग को शक्तियाँ देता है।
फॉर्म 6 में बदलाव पंजीकरण निर्वाचक नियमावली, 1960 में संशोधन के बिना मतदाता पंजीकरण फॉर्म में बदलाव।
निर्वाचक नामावली डेटाबेस का केंद्रीकरण ERONet/ECINet तक पहुंच पर नियंत्रण और डेटा सुरक्षा संबंधी चिंताएँ।
आंतरिक संचार और कार्यवृत्त का अभाव आयोग की बैठकों के एजेंडा और कार्यवृत्त का गैर-संचलन, पारदर्शिता की कमी।
अपीलों का अनधिकृत दाखिल पश्चिम बंगाल अपीलीय न्यायाधिकरणों में मतदाताओं के खिलाफ आयोग के नाम पर अपीलें दाखिल करना, बिना स्पष्ट प्राधिकरण के।

आगे की राह

  • उच्चतम न्यायालय के निर्णय का पालन सुनिश्चित किया जाए, जो चुनाव आयोग के कामकाज के लिए एक स्पष्ट दिशानिर्देश प्रदान करेगा।
  • चुनाव आयोग को अपनी आंतरिक निर्णय प्रक्रियाओं में अधिक पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए।
  • मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 (Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act, 2023) के प्रावधानों का कड़ाई से पालन किया जाए, विशेषकर सामूहिक निर्णय प्रक्रिया के संबंध में।
  • निर्वाचक नामावली में किसी भी बदलाव या संशोधन के लिए सभी सदस्यों की सहमति या बहुमत और संबंधित नियमों का पालन अनिवार्य किया जाए।
  • निर्वाचक नामावली डेटाबेस तक पहुंच और उसके प्रबंधन के लिए स्पष्ट प्रोटोकॉल और ऑडिट तंत्र स्थापित किए जाएं।
  • आयोग के सभी सदस्यों के बीच प्रभावी संचार और सूचना साझाकरण सुनिश्चित किया जाए ताकि सामूहिक निर्णय प्रक्रिया सुचारू रूप से चल सके।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

भारत निर्वाचन आयोग · मुख्य निर्वाचन आयुक्त · बहु-सदस्यीय निकाय · सामूहिक निर्णय प्रक्रिया · अनुच्छेद 324 · टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ मामला · निर्वाचक नामावली · पंजीकरण निर्वाचक नियम, 1960 · मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 · न्यायिक समीक्षा · लोकतंत्र · संवैधानिक निकाय

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 324’, ‘note’: ‘चुनाव आयोग की शक्तियाँ और कार्य’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 32’, ‘note’: ‘मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन का अधिकार’}

अवधारणा प्रवाह

याचिका में चुनाव आयोग के कामकाज पर सवाल  →  आरोप: सामूहिक निर्णय प्रक्रिया का उल्लंघन  →  CEC द्वारा व्यक्तिगत शक्तियों का प्रयोग  →  निर्वाचक नामावली में बदलाव और डेटाबेस तक पहुंच पर चिंता  →  उच्चतम न्यायालय द्वारा मामले की सुनवाई  →  संवैधानिक प्रावधानों और लोकतांत्रिक सिद्धांतों की रक्षा

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत निर्वाचन आयोग एक बहु-सदस्यीय निकाय है जिसका उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 324 में किया गया है।
2. मुख्य निर्वाचन आयुक्त (Chief Election Commissioner) तथा अन्य निर्वाचन आयुक्तों (Election Commissioners) की शक्तियाँ और वेतन समान होते हैं।
3. मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया के समान है, जबकि अन्य निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। अनुच्छेद 324 भारत निर्वाचन आयोग के गठन और शक्तियों से संबंधित है, और यह एक बहु-सदस्यीय निकाय है।
कथन 2 सही है। टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया था कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की शक्तियाँ समान हैं।
कथन 3 गलत है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया के समान है, लेकिन अन्य निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश पर नहीं, बल्कि राष्ट्रपति द्वारा सीधे हटाया जा सकता है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश आवश्यक नहीं है।

Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा प्रावधान भारत निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है?

  1. निर्वाचन आयुक्तों का कार्यकाल निश्चित होता है।
  2. निर्वाचन आयुक्तों को पद से हटाने की प्रक्रिया कठिन है।
  3. निर्वाचन आयोग का व्यय भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) पर भारित होता है।
  4. उपर्युक्त सभी

उत्तर: उपर्युक्त सभी — निर्वाचन आयुक्तों का निश्चित कार्यकाल उन्हें राजनीतिक दबाव से मुक्त रखता है। उन्हें पद से हटाने की कठिन प्रक्रिया (जो सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के समान है) उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करती है। निर्वाचन आयोग का व्यय संचित निधि पर भारित होने से सरकार के वित्तीय नियंत्रण से मुक्ति मिलती है। ये सभी प्रावधान आयोग की स्वतंत्रता सुनिश्चित करते हैं।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत निर्वाचन आयोग एक बहु-सदस्यीय संवैधानिक निकाय के रूप में किस प्रकार कार्य करता है? हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष दायर याचिका के आलोक में मुख्य निर्वाचन आयुक्त की शक्तियों और आयोग की सामूहिक निर्णय प्रक्रिया के महत्व का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) का संक्षिप्त परिचय, अनुच्छेद 324 के तहत इसकी संवैधानिक स्थिति और एक बहु-सदस्यीय निकाय के रूप में इसकी भूमिका।
2. **बहु-सदस्यीय निकाय के रूप में कार्यप्रणाली:**
* आयोग में मुख्य निर्वाचन आयुक्त (Chief Election Commissioner) और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की संरचना।
* ‘मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023’ की धारा 18 का उल्लेख, जो सर्वसम्मति या बहुमत से निर्णय लेने का प्रावधान करती है।
* टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ (1995) मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का संदर्भ, जिसने निर्वाचन आयुक्तों की समान निर्णय-निर्माण भूमिका को मान्यता दी।
3. **याचिका में उठाए गए मुद्दे:**
* मुख्य निर्वाचन आयुक्त द्वारा कथित तौर पर व्यक्तिगत रूप से शक्तियों का प्रयोग।
* आयोग की मंजूरी के बिना संचार जारी करना।
* बैठकों के एजेंडा और कार्यवृत्त का प्रसार न करना।
* निर्वाचक नामावली (Electoral Roll) प्रणाली में अन्य आयुक्तों की भागीदारी या अनुमोदन के बिना परिवर्तन (जैसे फॉर्म 6 में बदलाव)।
* निर्वाचक नामावली डेटाबेस के केंद्रीकरण और ERONet/ECINet तक पहुंच पर चिंताएँ।
4. **सामूहिक निर्णय प्रक्रिया का महत्व:**
* लोकतांत्रिक सिद्धांतों को बनाए रखने में इसकी भूमिका।
* निर्णयों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना।
* किसी एक व्यक्ति के अत्यधिक शक्ति संकेंद्रण को रोकना।
* आयोग की विश्वसनीयता और निष्पक्षता को बनाए रखना।
5. **समालोचनात्मक परीक्षण:**
* क्या वर्तमान कार्यप्रणाली संवैधानिक जनादेश और न्यायिक मिसालों के अनुरूप है।
* मुख्य निर्वाचन आयुक्त की भूमिका ‘प्रथम अमंग इक्वल्स’ (primus inter pares) के रूप में।
* इन मुद्दों का भारतीय लोकतंत्र और चुनावी प्रक्रिया की अखंडता पर संभावित प्रभाव।
6. **निष्कर्ष:** आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता बनाए रखने के लिए सामूहिक निर्णय प्रक्रिया के महत्व पर बल देते हुए एक संतुलित निष्कर्ष।

स्रोत: Mint


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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