24 Sep कर्नाटक में अनुसूचित जनजातियों के अधिकार एवं विकास: एनसीएसटी की व्यापक समीक्षा बैठक
✎ राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) एक संवैधानिक निकाय है जो अनुच्छेद 338A के तहत अनुसूचित जनजातियों के संवैधानिक सुरक्षा उपायों और कल्याणकारी योजनाओं के कार्यान्वयन की निगरानी करता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान: ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना | GS Paper II — संघ एवं राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व; संघीय ढाँचे से संबंधित विषय एवं चुनौतियाँ; स्थानीय स्तर पर शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण तथा उसकी चुनौतियाँ | GS Paper II — केंद्र एवं राज्यों द्वारा जनसंख्या के अति संवेदनशील वर्गों के लिए कल्याणकारी योजनाएँ तथा इन वर्गों की सुरक्षा एवं बेहतरी के लिए गठित तंत्र, विधि, संस्थान एवं निकाय
- Prelims: राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST), अनुच्छेद 338A, अनुसूचित जनजातियाँ (STs), वन अधिकार अधिनियम, 2006, कमजोर जनजातीय समूह (PVTGs), संवैधानिक सुरक्षा उपाय, जनजातीय भूमि अधिकार, आरक्षण
- Essay: भारत में जनजातीय समुदायों का सशक्तिकरण: चुनौतियाँ और समाधान, समावेशी विकास के लिए संवैधानिक निकायों की भूमिका
त्वरित पुनरावृत्ति: राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) एक संवैधानिक निकाय है जो अनुच्छेद 338A के तहत अनुसूचित जनजातियों के संवैधानिक सुरक्षा उपायों और कल्याणकारी योजनाओं के कार्यान्वयन की निगरानी करता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) ने हाल ही में बेंगलुरु में एक समीक्षा बैठक आयोजित की, जिसमें कर्नाटक राज्य में अनुसूचित जनजातियों (STs) के लिए संवैधानिक सुरक्षा उपायों, कल्याणकारी योजनाओं और विकास कार्यक्रमों के कार्यान्वयन की व्यापक समीक्षा की गई। इस बैठक की अध्यक्षता NCST के अध्यक्ष ने की, जिसमें राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया, और इसका उद्देश्य जनजातीय समुदायों के हितों की रक्षा और उनके सामाजिक-आर्थिक विकास को सुनिश्चित करना था।
पृष्ठभूमि
- भारतीय संविधान अनुसूचित जनजातियों के हितों की रक्षा और उनके विकास को बढ़ावा देने के लिए कई विशेष प्रावधान करता है।
- राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) एक संवैधानिक निकाय है जिसे अनुच्छेद 338A के तहत स्थापित किया गया है, जिसका मुख्य कार्य अनुसूचित जनजातियों के संवैधानिक सुरक्षा उपायों के कार्यान्वयन की निगरानी करना है।
- वन अधिकार अधिनियम, 2006 (Forest Rights Act, 2006) जनजातीय समुदायों और अन्य पारंपरिक वन निवासियों को उनके वन भूमि पर अधिकारों को मान्यता देता है।
- राज्य सरकारें अनुसूचित जनजातियों के लिए विभिन्न कल्याणकारी योजनाएँ और विकास कार्यक्रम लागू करती हैं, जिनमें शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका और बुनियादी ढाँचे का विकास शामिल है।
- कमजोर जनजातीय समूह (PVTGs) विशेष रूप से संवेदनशील जनजातीय समुदाय हैं जिनके लिए अतिरिक्त सुरक्षा और विकास प्रयासों की आवश्यकता होती है।
- आरक्षण नीति शिक्षा और सार्वजनिक रोजगार में अनुसूचित जनजातियों के प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने का एक महत्वपूर्ण साधन है।
राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) और इसके कार्य
- NCST एक संवैधानिक निकाय है जिसे 89वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 द्वारा संविधान के अनुच्छेद 338A के तहत स्थापित किया गया था।
- इसका मुख्य उद्देश्य अनुसूचित जनजातियों के लिए प्रदान किए गए संवैधानिक और अन्य कानूनी सुरक्षा उपायों से संबंधित सभी मामलों की जाँच और निगरानी करना है।
- आयोग अनुसूचित जनजातियों के अधिकारों और सुरक्षा उपायों से वंचित करने से संबंधित विशिष्ट शिकायतों की जाँच करता है।
- यह अनुसूचित जनजातियों के सामाजिक-आर्थिक विकास की योजना प्रक्रिया में भाग लेता है और सलाह देता है, तथा संघ और किसी राज्य के अधीन उनके विकास की प्रगति का मूल्यांकन करता है।
- आयोग राष्ट्रपति को वार्षिक रूप से और ऐसे अन्य समय पर रिपोर्ट प्रस्तुत करता है, जैसा वह उचित समझे, उन सुरक्षा उपायों के कामकाज पर।
- राष्ट्रपति ऐसी सभी रिपोर्टों को संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाते हैं।
- आयोग को अनुसूचित जनजातियों के कल्याण, संरक्षण, विकास और उन्नति से संबंधित ऐसे अन्य कार्यों का निर्वहन करना होता है, जो राष्ट्रपति नियम द्वारा निर्दिष्ट करें।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| संवैधानिक सुरक्षा उपाय | अनुसूचित जनजातियों (Scheduled Tribes) के अधिकारों और हितों की रक्षा सुनिश्चित करना। |
| कल्याणकारी उपाय | जनजातीय समुदायों के सामाजिक-आर्थिक उत्थान और जीवन स्तर में सुधार। |
| विकास कार्यक्रम | जनजातीय क्षेत्रों में बुनियादी ढाँचे और सेवाओं का विस्तार कर समावेशी विकास को बढ़ावा देना। |
| वन अधिकार अधिनियम, 2006 (Forest Rights Act, 2006) का कार्यान्वयन | वन-निवासी अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वन निवासियों के वन अधिकारों को मान्यता देना। |
| विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) | सबसे कमजोर और हाशिए पर पड़े जनजातीय समूहों के लिए लक्षित विकास सुनिश्चित करना। |
महत्व
सामाजिक महत्व
- यह समीक्षा अनुसूचित जनजातियों के संवैधानिक अधिकारों और कल्याणकारी उपायों के प्रभावी कार्यान्वयन को सुनिश्चित करती है, जिससे सामाजिक न्याय और समानता को बढ़ावा मिलता है।
- वन अधिकार अधिनियम के कार्यान्वयन की समीक्षा से जनजातीय समुदायों के भूमि और वन संसाधनों पर पारंपरिक अधिकारों की सुरक्षा होती है, जो उनकी आजीविका और सांस्कृतिक पहचान के लिए महत्वपूर्ण है।
- शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका के अवसरों में सुधार से जनजातीय समुदायों का समावेशी विकास होता है, जिससे वे मुख्यधारा में शामिल हो पाते हैं।
प्रशासनिक महत्व
- राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) द्वारा की गई यह समीक्षा राज्य सरकार के विभिन्न विभागों को जनजातीय कल्याण के प्रति उनकी जवाबदेही तय करने में मदद करती है।
- बैठक में राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों की भागीदारी नीति निर्माण और कार्यान्वयन में केंद्र-राज्य समन्वय को मजबूत करती है।
- एक विशेष राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग की स्थापना का प्रस्ताव जनजातीय हितों की निरंतर निगरानी और सुरक्षा के लिए एक मजबूत संस्थागत तंत्र प्रदान करेगा।
आर्थिक महत्व
- अनुसूचित जनजाति घटक (Scheduled Tribe Component) के तहत निधियों के उचित उपयोग की निगरानी से यह सुनिश्चित होता है कि विकास योजनाओं का लाभ लक्षित लाभार्थियों तक पहुँचे, जिससे जनजातीय क्षेत्रों में आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) हो।
- कमजोर जनजातीय समूहों (PVTG) के सामाजिक-आर्थिक विकास पर जोर देने से उनके स्वास्थ्य, पोषण, आवास और आजीविका में सुधार होता है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत होती है।
- वन अधिकारों की मान्यता जनजातीय समुदायों को वन उत्पादों से आय अर्जित करने और अपनी पारंपरिक आजीविका को बनाए रखने में सक्षम बनाती है।
चुनौतियाँ
1. वन अधिकार अधिनियम का कार्यान्वयन
- वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत बड़ी संख्या में दावों का अस्वीकृत होना जनजातीय समुदायों के भूमि अधिकारों की सुरक्षा में एक बड़ी चुनौती है।
- अस्वीकृत और लंबित दावों की व्यापक जाँच की आवश्यकता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि पात्र व्यक्तियों को उनके अधिकार मिलें।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय, जनजातीय कल्याण
2. आरक्षण और बैकलॉग रिक्तियाँ
- शिक्षा और सार्वजनिक रोजगार में अनुसूचित जनजातियों के प्रभावी प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए बैकलॉग रिक्तियों को भरना एक महत्वपूर्ण चुनौती है।
- आरक्षण नीतियों के उचित कार्यान्वयन की निगरानी आवश्यक है ताकि जनजातीय समुदायों को समान अवसर मिल सकें।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय, संवैधानिक प्रावधान
3. निधियों का उपयोग
- अनुसूचित जनजाति घटक के तहत आवंटित निधियों का प्रभावी और समयबद्ध उपयोग सुनिश्चित करना एक चुनौती है।
- निधियों के दुरुपयोग या अपर्याप्त उपयोग से विकास योजनाओं के वांछित परिणाम प्राप्त नहीं हो पाते हैं।
यूपीएससी लिंक: शासन, विकास योजनाएँ
4. कमजोर जनजातीय समूहों का विकास
- कोरगा और जेनू कुरुबा जैसे विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTG) के सामाजिक-आर्थिक और बुनियादी ढाँचे के विकास में विशेष ध्यान और लक्षित हस्तक्षेप की आवश्यकता है।
- इन समूहों के स्वास्थ्य, पोषण, आवास, शिक्षा और आजीविका संबंधी चुनौतियों का समाधान करना जटिल है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय, कमजोर वर्ग
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| वन अधिकार अधिनियम के दावों की अस्वीकृति | बड़ी संख्या में दावों का अस्वीकृत होना जनजातीय भूमि अधिकारों के लिए चिंता का विषय है। |
| बैकलॉग रिक्तियाँ | सार्वजनिक रोजगार में अनुसूचित जनजातियों के प्रतिनिधित्व में कमी। |
| अनुसूचित जनजाति घटक निधियों का उपयोग | विकास योजनाओं के लिए आवंटित निधियों का अपर्याप्त या अप्रभावी उपयोग। |
| कमजोर जनजातीय समूहों का विकास | स्वास्थ्य, शिक्षा और आजीविका जैसे क्षेत्रों में विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों की विशिष्ट आवश्यकताएँ। |
| संवैधानिक सुरक्षा उपायों की निगरानी | राज्य स्तर पर जनजातीय हितों की निरंतर निगरानी के लिए संस्थागत तंत्र की कमी। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- वन अधिकार अधिनियम, 2006 (Forest Rights Act, 2006)
आगे की राह
- वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत अस्वीकृत और लंबित दावों की व्यापक और पारदर्शी जाँच की जाए, ताकि पात्र व्यक्तियों को उनके अधिकार मिल सकें।
- शिक्षा और सार्वजनिक रोजगार में अनुसूचित जनजातियों के प्रभावी प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए बैकलॉग रिक्तियों को भरने हेतु विशेष अभियान चलाए जाएँ।
- अनुसूचित जनजाति घटक के तहत आवंटित निधियों के प्रभावी उपयोग की निगरानी के लिए एक मजबूत तंत्र स्थापित किया जाए, जिसमें नियमित ऑडिट और जवाबदेही शामिल हो।
- विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTG) के लिए लक्षित विकास योजनाएँ तैयार की जाएँ, जो उनके स्वास्थ्य, पोषण, आवास, शिक्षा और आजीविका की विशिष्ट आवश्यकताओं को पूरा करें।
- कर्नाटक राज्य में अनुसूचित जनजातियों के संवैधानिक सुरक्षा उपायों की निरंतर निगरानी के लिए एक विशेष राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग की स्थापना पर विचार किया जाए।
- जनजातीय समुदायों के साथ नियमित संवाद और परामर्श स्थापित किया जाए ताकि उनकी समस्याओं और आवश्यकताओं को बेहतर ढंग से समझा जा सके और नीतियों में शामिल किया जा सके।
- जनजातीय क्षेत्रों में बुनियादी ढाँचे (सड़क, बिजली, पानी) और आवश्यक सेवाओं (स्वास्थ्य, शिक्षा) तक पहुँच में सुधार के लिए ठोस कदम उठाए जाएँ।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग · संवैधानिक सुरक्षा उपाय · जनजातीय विकास योजनाएँ · वन अधिकार अधिनियम 2006 · कमजोर जनजातीय समूह (PVTGs) · आरक्षण नीति · भूमि अधिकार · सामाजिक-आर्थिक विकास · संघवाद · न्यायिक समीक्षा
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 338A’, ‘note’: ‘राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग का गठन’}
अवधारणा प्रवाह
राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) द्वारा समीक्षा बैठक का आयोजन → कर्नाटक में अनुसूचित जनजातियों के संवैधानिक सुरक्षा उपायों का मूल्यांकन → वन अधिकार अधिनियम के कार्यान्वयन और दावों की अस्वीकृति पर चिंता → बैकलॉग रिक्तियों और कमजोर जनजातीय समूहों के विकास पर चर्चा → राज्य सरकार के विभागों को समयबद्ध कार्रवाई का आग्रह → जनजातीय कल्याण हेतु संवैधानिक सुरक्षा उपायों के प्रभावी कार्यान्वयन की प्रतिबद्धता
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) एक संवैधानिक निकाय है जिसका उल्लेख भारतीय संविधान के अनुच्छेद 338A में किया गया है।
2. यह आयोग अनुसूचित जनजातियों के अधिकारों और सुरक्षा उपायों से संबंधित मामलों की जांच और निगरानी करता है।
3. आयोग के पास सिविल न्यायालय की शक्तियाँ होती हैं।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) एक संवैधानिक निकाय है जिसे संविधान के अनुच्छेद 338A के तहत स्थापित किया गया है। कथन 2 सही है। यह आयोग अनुसूचित जनजातियों के संवैधानिक सुरक्षा उपायों के कार्यान्वयन की निगरानी करता है। कथन 3 सही है। आयोग के पास सिविल न्यायालय की शक्तियाँ होती हैं, जिससे वह साक्ष्य एकत्र कर सकता है और गवाहों को समन कर सकता है।
Q2. वन अधिकार अधिनियम, 2006 (Forest Rights Act, 2006) के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
1. यह अधिनियम वन में रहने वाले अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वन निवासियों के वन भूमि पर अधिकारों को मान्यता देता है।
2. यह अधिनियम केवल उन जनजातियों पर लागू होता है जो 13 दिसंबर 2005 से पहले कम से कम 75 वर्षों से वन भूमि पर रह रहे हैं।
3. यह अधिनियम ग्राम सभा को व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकारों के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान करता है।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
- केवल 1
- केवल 1 और 2
- केवल 1 और 3
- 1, 2 और 3
उत्तर: केवल 1 और 3 — कथन 1 सही है। वन अधिकार अधिनियम, 2006 वन में रहने वाले अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वन निवासियों के वन भूमि पर अधिकारों को मान्यता देता है। कथन 2 गलत है। यह अधिनियम उन जनजातियों पर लागू होता है जो 13 दिसंबर 2005 से पहले कम से कम 75 वर्षों से वन भूमि पर रह रहे हैं, लेकिन ‘अन्य पारंपरिक वन निवासी’ के लिए यह अवधि 3 पीढ़ियों (75 वर्ष) की है। कथन 3 सही है। यह अधिनियम ग्राम सभा को व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकारों के निर्धारण की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान करता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) के संवैधानिक अधिदेश और शक्तियों का विस्तार से वर्णन कीजिए। जनजातीय समुदायों के अधिकारों और कल्याण को सुनिश्चित करने में यह आयोग कितना प्रभावी रहा है, हालिया समीक्षा बैठक के आलोक में मूल्यांकन कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) का संक्षिप्त परिचय, इसकी स्थापना और संवैधानिक स्थिति (अनुच्छेद 338A)।
2. **संवैधानिक अधिदेश और शक्तियाँ:**
* अनुसूचित जनजातियों के लिए संवैधानिक और अन्य कानूनी सुरक्षा उपायों की निगरानी।
* इन सुरक्षा उपायों के कार्यान्वयन पर सरकार को रिपोर्ट प्रस्तुत करना।
* अनुसूचित जनजातियों के सामाजिक-आर्थिक विकास की योजना प्रक्रिया में भाग लेना और सलाह देना।
* इनके अधिकारों और सुरक्षा उपायों के उल्लंघन से संबंधित विशिष्ट शिकायतों की जांच करना।
* सिविल न्यायालय की शक्तियाँ (गवाहों को समन करना, दस्तावेजों की मांग करना आदि)।
3. **प्रभावशीलता का मूल्यांकन (हालिया समीक्षा बैठक के आलोक में):**
* **सकारात्मक पक्ष:**
* राज्य सरकारों के साथ संवाद और समन्वय के लिए मंच प्रदान करना।
* योजनाओं और सुरक्षा उपायों के कार्यान्वयन की निगरानी में भूमिका।
* वन अधिकार अधिनियम, 2006 जैसे महत्वपूर्ण कानूनों के कार्यान्वयन पर ध्यान केंद्रित करना।
* कमजोर जनजातीय समूहों (PVTGs) पर विशेष जोर।
* बैकलॉग रिक्तियों और आरक्षण के मुद्दों पर चर्चा।
* **चुनौतियाँ/सीमाएँ:**
* सिफारिशों की बाध्यकारी प्रकृति का अभाव।
* वन अधिकार दावों की अस्वीकृति दर जैसे मुद्दों पर धीमी प्रगति।
* संसाधनों और जनशक्ति की कमी।
* राज्य स्तरीय आयोगों की स्थापना की आवश्यकता पर बल (कर्नाटक के संदर्भ में)।
* जमीनी स्तर पर ठोस परिणामों की सुनिश्चितता में अंतराल।
4. **निष्कर्ष:** आयोग की भूमिका का महत्व और इसकी प्रभावशीलता को बढ़ाने के लिए आवश्यक उपाय (जैसे सिफारिशों को अधिक बाध्यकारी बनाना, राज्य आयोगों को मजबूत करना, जागरूकता बढ़ाना)।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
Karnataka PCS (KPSC) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: कर्नाटक राज्य में अनुसूचित जनजातियों के लिए संवैधानिक सुरक्षा उपायों के संदर्भ में, ‘अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन और अनुसूचित जनजातियों के कल्याण से संबंधित संविधान के किस अनुच्छेद के अंतर्गत राज्यपाल को विशेष अधिकार प्राप्त हैं?
- अनुच्छेद 244(1)
- अनुच्छेद 164(1)
- अनुच्छेद 339(2)
- अनुच्छेद 342(1)
उत्तर: अनुच्छेद 244(1) — अनुच्छेद 244(1) के अंतर्गत राज्यपाल को अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन और अनुसूचित जनजातियों के कल्याण हेतु विशेष अधिकार प्रदान किए गए हैं।
Mains: कर्नाटक राज्य में अनुसूचित जनजातियों के विकास के लिए लागू की गई विभिन्न केंद्र एवं राज्य सरकार की योजनाओं के प्रभावी कार्यान्वयन में आने वाली प्रमुख चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए। साथ ही, इन चुनौतियों के समाधान हेतु सुझाव प्रस्तुत कीजिए।
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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