01 Sep क्या न्यायविदों को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश नियुक्त किया जा सकता है? | जानें संवैधानिक प्रावधान
✎ भारतीय संविधान का अनुच्छेद 124(3) सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में एक 'प्रतिष्ठित न्यायविद' की नियुक्ति का प्रावधान करता है, जिसका उद्देश्य न्यायपालिका में बौद्धिक और अकादमिक विविधता लाना है, हालांकि यह प्रावधान अब तक…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान, कार्यपालिका और न्यायपालिका की संरचना, संगठन और कार्यप्रणाली; सरकार के मंत्रालय और विभाग; दबाव समूह और औपचारिक/अनौपचारिक संघ तथा शासन प्रणाली में उनकी भूमिका। | GS Paper II — जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की मुख्य विशेषताएँ। | GS Paper II — विभिन्न संवैधानिक पदों पर नियुक्तियाँ और विभिन्न संवैधानिक निकायों की शक्तियाँ, कार्य और उत्तरदायित्व।
- Prelims: अनुच्छेद 124(3), सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति, प्रतिष्ठित न्यायविद, संविधान सभा बहस, न्यायिक नियुक्तियाँ, न्यायिक संयम
- Essay: भारतीय न्यायपालिका में विविधता और विशेषज्ञता का महत्व, संविधान निर्माताओं की दूरदर्शिता और वर्तमान प्रासंगिकता
त्वरित पुनरावृत्ति: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 124(3) सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में एक ‘प्रतिष्ठित न्यायविद’ की नियुक्ति का प्रावधान करता है, जिसका उद्देश्य न्यायपालिका में बौद्धिक और अकादमिक विविधता लाना है, हालांकि यह प्रावधान अब तक अप्रयुक्त रहा है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां ने इस बात पर प्रश्न उठाया है कि संविधान का वह प्रावधान, जो एक ‘प्रतिष्ठित न्यायविद’ (distinguished jurist) को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करने की अनुमति देता है, 76 वर्षों से अधिक समय से अप्रयुक्त क्यों रहा है। उन्होंने राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, दिल्ली के 13वें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए अनुच्छेद 124(3) का उल्लेख किया, जो राष्ट्रपति की राय में एक ‘प्रतिष्ठित न्यायविद’ को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करने की अनुमति देता है। इस प्रावधान के तहत अब तक किसी भी कानूनी शिक्षाविद् को सर्वोच्च न्यायालय में पदोन्नत नहीं किया गया है।
पृष्ठभूमि
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 124(3) सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए तीन मार्ग निर्धारित करता है।
- इन मार्गों में कम से कम पाँच वर्षों के लिए उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में कार्य करना, कम से कम 10 वर्षों के लिए उच्च न्यायालय के अधिवक्ता के रूप में अभ्यास करना, या राष्ट्रपति की राय में एक ‘प्रतिष्ठित न्यायविद’ होना शामिल है।
- संविधान में ‘प्रतिष्ठित न्यायविद’ की परिभाषा या ऐसे व्यक्ति के लिए पेशेवर अनुभव की कोई न्यूनतम अवधि निर्धारित नहीं की गई है।
- इस श्रेणी को शामिल करने का उद्देश्य न्यायपालिका में विविधता लाना और न्यायिक सेवा तथा कानूनी अभ्यास के पारंपरिक मार्गों से परे विशेषज्ञों को सर्वोच्च न्यायालय में लाना था।
- संविधान सभा की बहसों से पता चलता है कि इस प्रावधान का उद्देश्य सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले में राष्ट्रपति के लिए ‘विकल्पों का व्यापक क्षेत्र’ खोलना था।
- संविधान सभा के सदस्य एच.वी. कामथ ने 24 मई, 1949 को इस संशोधन को प्रस्तुत करते हुए कहा था कि ‘उत्कृष्ट कानूनी और न्यायशास्त्रीय ज्ञान’ वाले व्यक्ति ‘आवश्यक रूप से न्यायाधीशों या अधिवक्ताओं तक ही सीमित नहीं’ होते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति और ‘प्रतिष्ठित न्यायविद’ का प्रावधान क्या है?
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 124(3) सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए योग्यताएँ निर्धारित करता है।
- इसके अनुसार, एक व्यक्ति सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के योग्य होगा यदि वह: (क) कम से कम पाँच वर्षों तक किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश रहा हो; या (ख) कम से कम दस वर्षों तक किसी उच्च न्यायालय का अधिवक्ता रहा हो; या (ग) राष्ट्रपति की राय में एक ‘प्रतिष्ठित न्यायविद’ हो।
- ‘प्रतिष्ठित न्यायविद’ का प्रावधान संविधान निर्माताओं की दूरदर्शिता को दर्शाता है, जिसका उद्देश्य न्यायपालिका में अकादमिक और सैद्धांतिक विशेषज्ञता को शामिल करना था।
- यह प्रावधान न्यायपालिका को केवल न्यायिक सेवा या वकालत के अनुभव तक सीमित न रखकर, कानूनी सिद्धांतों, संवैधानिक कानून और न्यायशास्त्र के गहन ज्ञान वाले व्यक्तियों को भी शामिल करने का अवसर देता है।
- संविधान सभा की बहसों में संयुक्त राज्य अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय में फेलिक्स फ्रैंकफर्टर की नियुक्ति का उदाहरण दिया गया था।
- इस प्रावधान का उपयोग न होने के पीछे के कारणों में ‘प्रतिष्ठित न्यायविद’ की परिभाषा का अभाव और न्यायिक नियुक्तियों की कॉलेजियम प्रणाली (Collegium system) का विकास शामिल हो सकता है, जिसने न्यायाधीशों के चयन के मानदंड को संकुचित कर दिया है।
- इस प्रावधान का सक्रिय उपयोग न्यायपालिका में बौद्धिक विविधता ला सकता है और कानूनी शिक्षा तथा अनुसंधान को बढ़ावा दे सकता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| संविधान का अनुच्छेद 124(3) | सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए योग्यताएँ निर्धारित करता है। |
| न्यायाधीशों की नियुक्ति के तीन मार्ग | उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, उच्च न्यायालय के अधिवक्ता, या ‘प्रख्यात विधिवेत्ता’। |
| प्रख्यात विधिवेत्ता का प्रावधान | न्यायिक सेवा और कानूनी अभ्यास से परे, कानूनी विद्वानों के लिए सर्वोच्च न्यायालय में प्रवेश का मार्ग खोलता है। |
| संविधान सभा की बहसें | न्यायिक पीठ में व्यावसायिक पृष्ठभूमि में विविधता लाने के उद्देश्य को दर्शाती हैं। |
| फेनिक्स फ्रैंकफर्टर का उदाहरण | अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय में एक प्रोफेसर की नियुक्ति, जो न्यायिक संयम के सिद्धांत के समर्थक थे। |
महत्व
न्यायिक स्वतंत्रता और विशेषज्ञता
- प्रख्यात विधिवेत्ताओं की नियुक्ति से सर्वोच्च न्यायालय में विभिन्न कानूनी क्षेत्रों के विशेषज्ञ शामिल हो सकते हैं, जिससे न्यायिक निर्णयों की गुणवत्ता और गहराई बढ़ सकती है।
- यह न्यायिक स्वतंत्रता को मजबूत कर सकता है, क्योंकि ऐसे व्यक्ति अक्सर अकादमिक पृष्ठभूमि से आते हैं और उनका न्यायिक या वकालत के पारंपरिक करियर से अलग दृष्टिकोण हो सकता है।
न्यायिक विविधता और प्रतिनिधित्व
- यह प्रावधान सर्वोच्च न्यायालय में विविधता लाने में मदद कर सकता है, जिसमें न केवल न्यायाधीश और अधिवक्ता बल्कि कानूनी विद्वान भी शामिल हो सकते हैं, जिससे न्यायिक संस्था का प्रतिनिधित्व व्यापक होगा।
- यह न्यायिक प्रक्रिया में नए दृष्टिकोण और विचारों को ला सकता है, जिससे कानून के विकास में अधिक नवाचार हो सकता है।
कानूनी शिक्षा और अनुसंधान को प्रोत्साहन
- प्रख्यात विधिवेत्ताओं की नियुक्ति कानूनी शिक्षा और अनुसंधान के महत्व को बढ़ाएगी, जिससे अकादमिक क्षेत्र में उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा।
- यह कानूनी विद्वानों को सार्वजनिक सेवा में योगदान करने का अवसर प्रदान करेगा, जिससे कानून के सैद्धांतिक और व्यावहारिक पहलुओं के बीच की खाई को पाटने में मदद मिलेगी।
चुनौतियाँ
1. परिभाषा का अभाव
- संविधान में ‘प्रख्यात विधिवेत्ता’ की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है, जिससे इस श्रेणी में किसे नियुक्त किया जा सकता है, इस पर अस्पष्टता बनी हुई है।
- इस अस्पष्टता के कारण नियुक्ति प्रक्रिया में व्यक्तिपरकता की संभावना बढ़ जाती है और संभावित विवाद उत्पन्न हो सकते हैं।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान: न्यायपालिका
2. न्यायिक नियुक्तियों में कॉलेजियम प्रणाली का प्रभुत्व
- सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति में कॉलेजियम प्रणाली (Collegium System) का प्रभुत्व रहा है, जिसने ‘प्रख्यात विधिवेत्ता’ के मार्ग को अप्रयुक्त छोड़ दिया है।
- कॉलेजियम प्रणाली मुख्य रूप से मौजूदा न्यायाधीशों और वरिष्ठ अधिवक्ताओं पर ध्यान केंद्रित करती है, जिससे अकादमिक पृष्ठभूमि के व्यक्तियों के लिए अवसर सीमित हो जाते हैं।
यूपीएससी लिंक: भारतीय राजव्यवस्था: न्यायिक नियुक्तियाँ
3. अनुभव और योग्यता का निर्धारण
- प्रख्यात विधिवेत्ता के लिए आवश्यक पेशेवर अनुभव की न्यूनतम अवधि निर्धारित नहीं है, जिससे उनकी योग्यता का मूल्यांकन करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
- यह तय करना कठिन हो सकता है कि एक अकादमिक विद्वान के पास न्यायिक कार्य के लिए आवश्यक व्यावहारिक अनुभव और दृष्टिकोण है या नहीं।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान: न्यायपालिका की संरचना
4. कार्यपालिका की भूमिका
- यद्यपि संविधान राष्ट्रपति की राय पर जोर देता है, व्यवहार में कार्यपालिका की भूमिका कॉलेजियम प्रणाली के कारण सीमित हो गई है।
- कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच संभावित गतिरोध की स्थिति उत्पन्न हो सकती है यदि ‘प्रख्यात विधिवेत्ता’ की नियुक्ति पर सहमति न बन पाए।
यूपीएससी लिंक: भारतीय राजव्यवस्था: कार्यपालिका और न्यायपालिका
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| ‘प्रख्यात विधिवेत्ता’ की अस्पष्ट परिभाषा | नियुक्ति प्रक्रिया में व्यक्तिपरकता और संभावित विवादों का कारण बन सकती है। |
| कॉलेजियम प्रणाली का प्रभुत्व | अकादमिक पृष्ठभूमि के व्यक्तियों के लिए सर्वोच्च न्यायालय में प्रवेश के अवसर सीमित करता है। |
| अनुभव और योग्यता का मूल्यांकन | न्यायिक कार्य के लिए आवश्यक व्यावहारिक अनुभव और दृष्टिकोण का आकलन करने में कठिनाई। |
| कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच समन्वय | नियुक्ति पर सहमति न बन पाने की स्थिति में गतिरोध की संभावना। |
| पारंपरिक न्यायिक मार्गों पर निर्भरता | सर्वोच्च न्यायालय में न्यायिक विविधता और नए दृष्टिकोणों की कमी। |
आगे की राह
- सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए ‘प्रख्यात विधिवेत्ता’ की श्रेणी को स्पष्ट रूप से परिभाषित करने के लिए संवैधानिक संशोधन या विस्तृत दिशानिर्देश तैयार किए जाने चाहिए।
- कॉलेजियम प्रणाली में सुधार किए जाने चाहिए ताकि ‘प्रख्यात विधिवेत्ता’ श्रेणी के तहत नियुक्तियों पर विचार करने के लिए एक पारदर्शी और वस्तुनिष्ठ तंत्र शामिल किया जा सके।
- कानूनी अकादमिक समुदाय के भीतर से संभावित उम्मीदवारों की पहचान करने के लिए एक व्यापक प्रक्रिया विकसित की जानी चाहिए, जिसमें उनकी विद्वत्ता, प्रकाशनों और कानूनी क्षेत्र में योगदान का मूल्यांकन किया जाए।
- न्यायिक नियुक्तियों में विविधता को बढ़ावा देने के लिए एक व्यापक नीति अपनाई जानी चाहिए, जिसमें न केवल लिंग और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व बल्कि व्यावसायिक पृष्ठभूमि भी शामिल हो।
- संविधान सभा के मूल इरादे को ध्यान में रखते हुए, न्यायिक पीठ में विभिन्न दृष्टिकोणों और विशेषज्ञता को शामिल करने के महत्व पर जोर दिया जाना चाहिए।
- न्यायिक शिक्षा और अनुसंधान को मजबूत करने के लिए कदम उठाए जाने चाहिए ताकि भविष्य में ‘प्रख्यात विधिवेत्ता’ के रूप में नियुक्त किए जा सकने वाले योग्य उम्मीदवारों का एक पूल तैयार हो सके।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
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संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 124(3)’, ‘note’: ‘सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की योग्यताएँ’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 124(2)’, ‘note’: ‘सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 217(2)’, ‘note’: ‘उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की योग्यताएँ’}
अवधारणा प्रवाह
अनुच्छेद 124(3) ‘प्रख्यात विधिवेत्ता’ का प्रावधान करता है। → यह प्रावधान अभी तक अप्रयुक्त रहा है। → संविधान सभा का उद्देश्य विविधता लाना था। → कॉलेजियम प्रणाली का प्रभुत्व एक बाधा है। → परिभाषा की अस्पष्टता भी एक चुनौती है। → न्यायिक विविधता और विशेषज्ञता प्रभावित होती है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के संविधान का अनुच्छेद 124(3) सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए तीन मार्गों का प्रावधान करता है।
2. ‘प्रख्यात विधिवेत्ता’ की श्रेणी को संविधान सभा की बहसों के दौरान जोड़ा गया था ताकि सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्तियों में व्यावसायिक पृष्ठभूमि की विविधता लाई जा सके।
3. भारत में अब तक किसी भी ‘प्रख्यात विधिवेत्ता’ को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त नहीं किया गया है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। अनुच्छेद 124(3) उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में पाँच वर्ष, उच्च न्यायालय के अधिवक्ता के रूप में दस वर्ष, या राष्ट्रपति की राय में एक ‘प्रख्यात विधिवेत्ता’ होने का प्रावधान करता है।
कथन 2 सही है। संविधान सभा की बहसों में ‘प्रख्यात विधिवेत्ता’ श्रेणी को शामिल करने का उद्देश्य न्यायाधीशों की नियुक्ति में विविधता लाना था।
कथन 3 सही है। वर्तमान तक, इस प्रावधान के तहत किसी भी ‘प्रख्यात विधिवेत्ता’ को सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्त नहीं किया गया है।
Q2. अभिकथन (A): भारत के संविधान के अनुच्छेद 124(3) में ‘प्रख्यात विधिवेत्ता’ के रूप में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति का प्रावधान है।
कारण (R): संविधान निर्माताओं का उद्देश्य न्यायिक सेवा और कानूनी अभ्यास के पारंपरिक मार्गों से परे सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचने का मार्ग खोलना था।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A का सही स्पष्टीकरण है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A का सही स्पष्टीकरण नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A का सही स्पष्टीकरण है। — अभिकथन (A) सही है, क्योंकि अनुच्छेद 124(3) में ‘प्रख्यात विधिवेत्ता’ के प्रावधान का स्पष्ट उल्लेख है। कारण (R) भी सही है और अभिकथन का सही स्पष्टीकरण है, क्योंकि संविधान सभा की बहसों से यह स्पष्ट होता है कि इस प्रावधान का उद्देश्य न्यायिक पीठ में विविधता लाना और पारंपरिक मार्गों से परे योग्य व्यक्तियों को शामिल करना था।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत के सर्वोच्च न्यायालय में ‘प्रख्यात विधिवेत्ता’ की नियुक्ति के संवैधानिक प्रावधान की व्याख्या कीजिए। क्या आपको लगता है कि इस प्रावधान का अप्रयुक्त रहना न्यायिक प्रणाली के लिए एक अवसर की हानि है? समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए अनुच्छेद 124(3) और ‘प्रख्यात विधिवेत्ता’ श्रेणी का संक्षिप्त परिचय।
2. संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 124(3) के तहत ‘प्रख्यात विधिवेत्ता’ की नियुक्ति की शर्तों और इसके पीछे के संविधान निर्माताओं के उद्देश्य (संविधान सभा की बहस, एच.वी. कामथ, एम. अनंतशयनम आयंगर के विचार) का विस्तार से वर्णन।
3. अप्रयुक्त प्रावधान के कारण: कॉलेजियम प्रणाली के विकास, ‘प्रख्यात विधिवेत्ता’ की परिभाषा की अस्पष्टता, और न्यायिक नियुक्तियों में पारंपरिक मार्गों पर अत्यधिक निर्भरता जैसे कारकों पर चर्चा।
4. अवसर की हानि के रूप में: न्यायिक प्रणाली में विविधता की कमी, कानूनी अकादमिक ज्ञान का लाभ न मिल पाना (जैसे फेलिक्स फ्रैंकफर्टर का उदाहरण), न्यायिक बहस में नए दृष्टिकोणों का अभाव, और कानून के विकास में संभावित योगदान की कमी पर तर्क।
5. समालोचनात्मक परीक्षण: इस बात पर भी विचार करें कि क्या ‘प्रख्यात विधिवेत्ता’ की नियुक्ति से न्यायिक स्वतंत्रता पर कोई प्रभाव पड़ सकता है, या क्या यह नियुक्ति प्रक्रिया को और अधिक जटिल बना सकता है। कॉलेजियम प्रणाली की भूमिका और उसकी सीमाओं पर भी चर्चा करें।
6. निष्कर्ष: न्यायिक नियुक्तियों में विविधता और विशेषज्ञता के महत्व को रेखांकित करते हुए, इस प्रावधान के संभावित भविष्य और न्यायिक सुधारों की आवश्यकता पर संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करें।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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