05 Nov नई पंचायती राज योजना: आधार की जगह वोटर ID, आरजेडी ने उठाए सवाल
✎ पंचायती राज योजनाओं में पहचान का प्रमुख आधार बदलने का प्रश्न आधार अधिनियम, 2016 की धारा 7, लाभार्थी सत्यापन की प्रशासनिक नीति और पंचायतों के संवैधानिक दायित्वों से जुड़ा शासन का विषय है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — राजव्यवस्था (Polity): पंचायती राज संस्थाएँ, संविधान के अनुच्छेद 243 से 243O तथा ग्यारहवीं अनुसूची | GS Paper II — शासन (Governance): प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (Direct Benefit Transfer), लाभार्थी पहचान और सेवा वितरण में पारदर्शिता
- Prelims: आधार अधिनियम, 2016 (Aadhaar Act, 2016) की धारा 7 और उसका प्रावधान, EPIC (Elector’s Photo Identity Card) — निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूची के आधार पर जारी, भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) और आधार के प्रमाणीकरण के तरीके, बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण बनाम OTP आधारित और जनसांख्यिकीय प्रमाणीकरण, पुट्टस्वामी मामला (2018) — आधार की संवैधानिक वैधता और धारा 57 का निरस्त होना, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और निर्वाचन विधि (संशोधन) अधिनियम, 2021, अनुच्छेद 243G और ग्यारहवीं अनुसूची — पंचायतों के कार्य और दायित्व, अनुच्छेद 243K — पंचायत चुनावों का संचालन राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा
- Essay: लोकतांत्रिक शासन में पहचान की व्यवस्था: समावेशन बनाम बहिष्करण का प्रश्न, तकनीक-आधारित कल्याण प्रशासन: लाभ-वितरण में पारदर्शिता और लाभार्थी की पहुँच के बीच संतुलन
त्वरित पुनरावृत्ति: पंचायती राज योजनाओं में पहचान का प्रमुख आधार बदलने का प्रश्न आधार अधिनियम, 2016 की धारा 7, लाभार्थी सत्यापन की प्रशासनिक नीति और पंचायतों के संवैधानिक दायित्वों से जुड़ा शासन का विषय है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केंद्रीय पंचायती राज मंत्री ललन सिंह ने 30 अक्तूबर को नई पंचायती राज योजना के संदर्भ में घोषणा की कि लाभार्थियों के भुगतान और योजनाओं के लाभ के लिए आधार को पहचान का प्रमुख आधार नहीं रखा जाएगा। इसके स्थान पर बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण के साथ मतदाता पहचान पत्र का EPIC नंबर उपयोग में लाया जाएगा। इस घोषणा पर विभिन्न राजनीतिक दलों ने अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ दी हैं। परीक्षा की दृष्टि से मुख्य प्रश्न यह है कि किसी योजना में लाभार्थी की पहचान तय करने का अधिकार किस विधिक आधार पर है, आधार अधिनियम की धारा 7 इस पर क्या प्रावधान करती है, और फर्जी लाभार्थियों तथा सेवा से वंचन, दोनों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। रिपोर्ट में अभी औपचारिक अधिसूचना, नियमों और कार्यान्वयन की समय-सीमा का पूरा विवरण स्पष्ट नहीं है, इसलिए घोषणा और लागू प्रक्रिया में अंतर बनाए रखना आवश्यक है।
पृष्ठभूमि
- 73वें संविधान संशोधन (1992) द्वारा पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा मिला; इसके तहत अनुच्छेद 243 से 243O जोड़े गए और ग्यारहवीं अनुसूची में 29 विषय पंचायतों को सौंपे गए।
- प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) के तहत सब्सिडी और सामाजिक सुरक्षा के भुगतान सीधे लाभार्थी के बैंक खाते में किए जाते हैं। इसमें जन धन, आधार और मोबाइल (JAM) की त्रयी को मुख्य आधार माना गया है।
- आधार अधिनियम, 2016 की धारा 7 के अनुसार केंद्र या राज्य सरकार किसी कल्याणकारी योजना के लाभ के लिए आधार को पहचान के प्रमाण के रूप में माँग सकती है; किंतु जिन व्यक्तियों के पास आधार नहीं है, उनके लिए वैकल्पिक पहचान व्यवस्था का प्रावधान भी रखा गया है।
- पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2018) में सर्वोच्च न्यायालय ने आधार अधिनियम को संवैधानिक रूप से वैध माना, पर निजी संस्थाओं के लिए आधार की अनिवार्यता से जुड़ी धारा 57 को निरस्त किया।
- निर्वाचन विधि (संशोधन) अधिनियम, 2021 के माध्यम से लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 में मतदाता सूची को आधार से स्वैच्छिक रूप से जोड़ने का प्रावधान जोड़ा गया। EPIC मूल रूप से मतदाता सूची में पंजीकरण का दस्तावेज़ है।
बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण और EPIC आधारित लाभार्थी पहचान क्या है?
- लाभार्थी पहचान सत्यापन वह प्रक्रिया है जिसमें भुगतान या सेवा देने से पहले यह पुष्टि की जाती है कि लाभ पाने वाला व्यक्ति वास्तव में वही है जिसके लिए योजना बनी है।
- आधार UIDAI द्वारा जारी 12 अंकों की विशिष्ट संख्या है। इसके प्रमाणीकरण के तीन तरीके हैं: जनसांख्यिकीय, बायोमेट्रिक (फिंगरप्रिंट या आइरिस) और OTP आधारित।
- बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण व्यक्ति की जैविक विशेषताओं से पहचान की पुष्टि करता है। यह किसी भी पहचान संख्या के साथ उपयोग हो सकता है, इसलिए इसे आधार का विकल्प मानना सही नहीं है।
- EPIC (मतदाता पहचान पत्र) निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूची में पंजीकृत मतदाता को दिया जाने वाला फोटो पहचान पत्र है, जिसमें एक विशिष्ट संख्या होती है।
- पहचान का प्रमुख आधार बदलने का अर्थ है कि लाभ-वितरण प्रणाली में बैंक खाते, आधार सीडिंग और अन्य रिकॉर्ड के बीच संबंध की भूमिका बदलेगी। इससे सत्यापन की व्यवस्था और लाभार्थी डेटाबेस दोनों पर प्रभाव पड़ता है।
- किसी योजना के लिए पहचान का दस्तावेज़ तय करना प्रशासनिक नियम का विषय है, पर इसके लिए संबंधित योजना के दिशानिर्देश और, जहाँ आधार का उपयोग हो, आधार अधिनियम के प्रावधानों का अनुपालन आवश्यक है।
- परीक्षा के दृष्टिकोण से मुख्य बिंदु यह है कि सरकार लाभ-वितरण में रिसाव और फर्जी लाभार्थियों को कम करना चाहती है, जबकि सेवा से वंचन और पहुँच की समस्या से बचाव भी उतना ही आवश्यक है।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| बदलाव का स्वरूप | आधार के स्थान पर बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण (Biometric Authentication) और मतदाता पहचान पत्र (Electors Photo Identity Card – EPIC) के नंबर को लाभार्थी पहचान का प्राथमिक आधार बनाना |
| लागू क्षेत्र | पंचायती राज योजनाओं के अंतर्गत भुगतान और सरकारी लाभों का वितरण |
| घोषित उद्देश्य | फर्जी लाभार्थियों की पहचान, लाभ के रिसाव (Leakage) को रोकना और योग्य व्यक्तियों तक लाभ पहुँचाना |
| दो-स्तरीय सत्यापन | EPIC नंबर के साथ बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण से पहचान की पुष्टि, जिससे केवल एक पहचान-दस्तावेज़ पर निर्भरता घटती है |
| नीतिगत स्वरूप | स्रोत में किसी नए कानून या संशोधन का उल्लेख नहीं है; यह कार्यकारी निर्देश के रूप में लागू होता प्रतीत होता है, जिसके दिशानिर्देशों की जाँच आवश्यक है |
महत्व
प्रशासनिक और शासन-संबंधी
- लाभार्थी सत्यापन की प्रक्रिया को एक निर्धारित पहचान-आधार से जोड़ने का प्रयास, जिससे प्रशासनिक एकरूपता बढ़ सकती है
- डुप्लिकेट और फर्जी प्रविष्टियों की जाँच के लिए मौजूदा मतदाता पहचान के आँकड़ों का उपयोग संभव होगा
- पारदर्शिता और जवाबदेही के सिद्धांत के अनुरूप, लाभ-वितरण में मानवीय हस्तक्षेप घटाने की दिशा
सामाजिक-आर्थिक और कल्याण-संबंधी
- प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (Direct Benefit Transfer – DBT) के तहत लाभ सही व्यक्ति तक पहुँचना कल्याण-नीति का मूल लक्ष्य है
- यदि सत्यापन सटीक हो, तो सार्वजनिक संसाधनों का रिसाव घटने से योजनाओं की प्रभावशीलता बढ़ सकती है
- पर इसका सीधा प्रभाव उन्हीं लाभार्थियों पर पड़ेगा जिनके पास EPIC या बायोमेट्रिक रिकॉर्ड सही नहीं है, इसलिए समावेशन (Inclusion) की दृष्टि से इसका मूल्यांकन आवश्यक है
संघीय और संवैधानिक परिप्रेक्ष्य
- पंचायती राज संस्थाएँ संविधान के अनुच्छेद 243G के अंतर्गत विकास योजनाओं का दायित्व संभालती हैं, और स्थानीय शासन राज्य सूची का विषय है
- इसलिए केंद्र के निर्देश को राज्य सरकारों और राज्य पंचायती राज विभागों के सहयोग से लागू करना आवश्यक होगा
- आधार और EPIC दोनों के उपयोग पर राज्य-स्तरीय प्रशासनिक निर्णयों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी
डेटा-शासन और निजता
- बायोमेट्रिक आँकड़ों का संग्रह और उपयोग निजता के अधिकार (Right to Privacy) से जुड़ा है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने के.एस. पुट्टस्वामी मामले (2017) में मौलिक अधिकार माना
- डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 (Digital Personal Data Protection Act, 2023) के सिद्धांत इस प्रणाली के डेटा-प्रबंधन पर लागू होते हैं
चुनौतियाँ
1. बहिष्करण का जोखिम (Exclusion Risk)
- जिन लाभार्थियों के पास वैध EPIC नहीं है या जिनका मतदाता नामांकन अधूरा है, उन्हें लाभ से वंचित होने का खतरा रहेगा
- श्रमिक वर्ग और प्रवासी मजदूरों के बायोमेट्रिक निशान घिसे होने पर प्रमाणीकरण विफल हो सकता है
- इससे कल्याण-योजनाओं का मूल उद्देश्य, यानी सबसे ज़रूरतमंद तक पहुँच, कमज़ोर हो सकता है
यूपीएससी लिंक: GS-2: सामाजिक न्याय; कल्याण योजनाओं का क्रियान्वयन और समावेशी विकास
2. मतदाता सूची की सटीकता और कवरेज
- EPIC मूल रूप से निर्वाचन के लिए बनाई गई पहचान-प्रणाली है, कल्याण-लाभ के सत्यापन के लिए इसकी सटीकता पर प्रश्न उठ सकते हैं
- मतदाता सूची में मृत, स्थानांतरित या दोहरे नाम हो सकते हैं, जिससे सत्यापन की विश्वसनीयता पर असर पड़ेगा
- निर्वाचन आयोग द्वारा सूची के अद्यतन और उसके प्रयोजन-सीमा (Purpose Limitation) का प्रश्न भी सामने आता है
यूपीएससी लिंक: GS-2: संवैधानिक निकाय (निर्वाचन आयोग); शासन में पारदर्शिता
3. निजता और डेटा-सुरक्षा
- बायोमेट्रिक और मतदाता डेटा को एक साथ जोड़ने से डेटा-संग्रह का दायरा बढ़ता है
- डेटा के दुरुपयोग या रिसाव की स्थिति में व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा के लिए स्पष्ट सुरक्षा-उपाय आवश्यक हैं
- आनुपातिकता (Proportionality) की कसौटी पर यह जाँचना होगा कि क्या इतना व्यापक संग्रह उद्देश्य के अनुरूप है
यूपीएससी लिंक: GS-2: अधिकार और शासन; GS-3: डेटा-सुरक्षा और साइबर सुरक्षा
4. संघीय समन्वय और प्रशासनिक क्षमता
- पंचायती राज और स्थानीय शासन राज्य सूची के विषय हैं, इसलिए राज्यों की सहमति और सहयोग से ही व्यवहार में लागू होगा
- ग्रामीण स्तर पर बायोमेट्रिक उपकरणों, इंटरनेट संपर्क और प्रशिक्षित कर्मियों की उपलब्धता असमान है
- मौजूदा आधार-आधारित प्रणाली से नई प्रणाली में संक्रमण की लागत और समय-सीमा स्पष्ट नहीं है
यूपीएससी लिंक: GS-2: संघवाद; पंचायती राज और स्थानीय शासन
5. संक्रमण-काल में लाभ में व्यवधान
- पुरानी प्रणाली से नई प्रणाली में बदलाव के दौरान भुगतानों में देरी या अस्थायी रुकावट की आशंका रहती है
- लाभार्थियों को नए सत्यापन की प्रक्रिया की जानकारी न होने पर भ्रम और शिकायतें बढ़ सकती हैं
यूपीएससी लिंक: GS-2: सार्वजनिक नीति का कार्यान्वयन; प्रशासनिक सुधार
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| बहिष्करण | वैध EPIC या बायोमेट्रिक रिकॉर्ड के अभाव में पात्र लाभार्थी भुगतान से वंचित हो सकते हैं |
| बायोमेट्रिक विफलता | श्रमिकों और वृद्धजनों के उँगलियों के निशान प्रमाणीकरण में बाधा बन सकते हैं |
| मतदाता सूची की शुद्धता | सूची में त्रुटियाँ, दोहराव या अनुपस्थिति सत्यापन की विश्वसनीयता घटाती हैं |
| निजता और डेटा-सुरक्षा | बायोमेट्रिक और मतदाता आँकड़ों का एकीकृत उपयोग सुरक्षा-उपायों की माँग करता है |
| संघीय समन्वय | स्थानीय शासन राज्य का विषय होने से राज्यों की भागीदारी अनिवार्य है |
| संक्रमण-लागत | पुरानी DBT प्रणाली से नई प्रणाली में बदलाव के दौरान भुगतान में व्यवधान की आशंका |
आगे की राह
- पहचान-प्रणाली में बदलाव से पहले बहिष्करण का आकलन कर यह सुनिश्चित करना कि कोई पात्र लाभार्थी छूटे नहीं, और वैकल्पिक सत्यापन-मार्ग उपलब्ध हों
- मतदाता सूची की नियमित और पारदर्शी शुद्धिकरण प्रक्रिया, जिसमें निर्वाचन आयोग और राज्य प्रशासन का समन्वय हो
- बायोमेट्रिक विफलता की स्थिति में मैनुअल सत्यापन और शिकायत-निवारण की स्पष्ट व्यवस्था
- बायोमेट्रिक और EPIC आँकड़ों के उपयोग के लिए स्पष्ट उद्देश्य-सीमा, भंडारण-अवधि और सुरक्षा-मानक तय करना
- डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 के सिद्धांतों के अनुरूप डेटा-संरक्षण बोर्ड और शिकायत-तंत्र को सक्रिय रखना
- राज्य सरकारों और पंचायतों के साथ प्रशिक्षण और जागरूकता अभियान चलाकर ग्रामीण स्तर पर प्रशासनिक क्षमता बढ़ाना
- पुरानी और नई प्रणाली के बीच संक्रमण-काल की योजना बनाकर भुगतान में अंतराल से बचना
- नीति के प्रभाव का स्वतंत्र मूल्यांकन और लाभार्थियों के आँकड़ों का सार्वजनिक प्रकाशन, ताकि लक्ष्य और परिणाम की तुलना हो सके
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (Direct Benefit Transfer – DBT) · आधार अधिनियम, 2016 (Aadhaar Act, 2016) · के.एस. पुट्टस्वामी मामला, 2018 (K.S. Puttaswamy Case, 2018) · बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण (Biometric Authentication) · मतदाता पहचान पत्र (EPIC) · निर्वाचक नामावली (Electoral Roll) · पंचायती राज संस्थाएँ (Panchayati Raj Institutions) · अनुच्छेद 243G और अनुच्छेद 243O (Articles 243G and 243O) · आनुपातिकता परीक्षण (Proportionality Test) · समावेशन और बहिष्करण त्रुटि (Inclusion and Exclusion Errors) · डेटा संरक्षण (Data Protection) · सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit)
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 243G: पंचायतों को आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय की योजनाएँ
- अनुच्छेद 21: निजता और व्यक्तिगत गरिमा का संरक्षण
- अनुच्छेद 324: निर्वाचक नामावली और निर्वाचन आयोग की भूमिका
अवधारणा प्रवाह
केंद्र द्वारा पंचायती राज योजनाओं में लाभार्थी पहचान के लिए आधार के स्थान पर बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण और EPIC नंबर का प्रस्ताव → EPIC नंबर का आधार मतदाता सूची, जो निर्वाचन आयोग द्वारा तैयार और अद्यतन की जाती है → बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण के साथ मिलाकर दो-स्तरीय सत्यापन, जिससे फर्जी लाभार्थियों की पहचान का दावा किया जाता है → सत्यापन की सटीकता पर निर्भर लाभ-वितरण; त्रुटि होने पर पात्र लाभार्थी बहिष्कृत हो सकते हैं → राज्य पंचायती राज विभागों के माध्यम से क्रियान्वयन, जिसमें संघीय समन्वय और प्रशासनिक क्षमता की परीक्षा होती है → निजता, डेटा-सुरक्षा और समावेशन के मानदंडों पर मूल्यांकन, जो अंततः नीति की वैधता और प्रभाव तय करता है
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. आधार अधिनियम, 2016 की धारा 7 के अंतर्गत राज्य ऐसी सब्सिडी और लाभों के लिए आधार को अनिवार्य कर सकता है, जिनका व्यय भारत की संचित निधि से किया जाता है।
2. के.एस. पुट्टस्वामी मामले (2018) में उच्चतम न्यायालय ने आधार अधिनियम के सभी प्रावधानों, जिनमें धारा 57 भी शामिल है, को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया।
3. मतदाता पहचान पत्र (EPIC) भारत निर्वाचन आयोग द्वारा जारी किया जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: धारा 7 के तहत उन लाभों के लिए आधार माँगा जा सकता है जिनका व्यय संचित निधि से होता है, और पुट्टस्वामी निर्णय ने इसे वैध माना। कथन 2 गलत है: न्यायालय ने धारा 57 को रद्द कर दिया था, जो निजी संस्थाओं द्वारा आधार माँगने की अनुमति देती थी। कथन 3 सही है: EPIC भारत निर्वाचन आयोग द्वारा जारी होता है। अतः केवल दो कथन सही हैं।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन पंचायती राज संस्थाओं की योजनाओं में लाभार्थी चयन के लिए निर्वाचक नामावली पर आधारित पहचान से जुड़ी सीमा को सबसे सटीक रूप से दर्शाता है?
कथन (A): मतदाता पहचान पत्र को सभी कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों की सार्वभौमिक पहचान का आधार नहीं बनाया जा सकता।
कारण (R): 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति, जो अनेक कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थी होते हैं, निर्वाचक के रूप में नामांकित होने के पात्र नहीं होते।
- (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
- (A) और (R) दोनों सही हैं, लेकिन (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
- (A) सही है, लेकिन (R) गलत है।
- (A) गलत है, लेकिन (R) सही है।
उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — (A) और (R) दोनों सही हैं। निर्वाचक बनने की न्यूनतम आयु 18 वर्ष है, इसलिए छात्रवृत्ति, आंगनवाड़ी या बाल कल्याण जैसी योजनाओं के नाबालिग लाभार्थी मतदाता पहचान पत्र से नहीं जुड़ सकते। इसी कारण मतदाता पहचान पत्र को सार्वभौमिक पहचान नहीं माना जा सकता, और यह तर्क (R) सीधे (A) की व्याख्या करता है।
Q3. भारतीय संविधान के किस अनुच्छेद के अंतर्गत पंचायतों से संबंधित निर्वाचन संबंधी मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप पर रोक लगाई गई है?
- अनुच्छेद 243G
- अनुच्छेद 243I
- अनुच्छेद 243K
- अनुच्छेद 243O
उत्तर: अनुच्छेद 243O — अनुच्छेद 243O पंचायतों के निर्वाचन संबंधी मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप पर रोक लगाता है। अनुच्छेद 243G पंचायतों की शक्तियों और दायित्वों से, अनुच्छेद 243I वित्त आयोग की स्थापना से, और अनुच्छेद 243K राज्य निर्वाचन आयोग की नियुक्ति से संबंधित है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ पंचायती राज योजनाओं में लाभार्थियों की पहचान के लिए आधार के स्थान पर बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण और मतदाता पहचान पत्र (EPIC) को प्राथमिक आधार बनाने का प्रस्ताव किया गया है। इससे प्रत्यक्ष लाभ अंतरण में फर्जी लाभार्थियों की रोकथाम, समावेशन और गोपनीयता के बीच जो व्यापार-विनिमय उत्पन्न होते हैं, उनका समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि ऐसे परिवर्तन के साथ कौन-से संवैधानिक और विधिक सुरक्षा उपाय अनिवार्य होने चाहिए, विशेषकर के.एस. पुट्टस्वामी मामले के संदर्भ में। (15 Marks)
रूपरेखा: MODEL-ANSWER SKELETON:
(1) प्रस्तावना: पंचायती राज संस्थाएँ अनुच्छेद 243 से 243O के ढाँचे में कार्य करती हैं और 73वें संशोधन (1992) के बाद ग्राम सभा (अनुच्छेद 243A) तथा अनुच्छेद 243G के अंतर्गत आर्थिक विकास एवं सामाजिक न्याय की योजनाएँ लागू करती हैं। लाभार्थी-पहचान का प्रश्न इसी प्रत्यक्ष लाभ अंतरण तंत्र से जुड़ा है।
(2) तथ्य-आधार: घोषणा केवल एक मंत्री के वक्तव्य के रूप में सामने आई है; नियमावली, अधिसूचना या योजना का नाम अभी स्पष्ट नहीं है, इसलिए उसका विश्लेषण प्रस्तावित ढाँचे तक सीमित रखना होगा।
(3) आधार अधिनियम, 2016 की धारा 7 और पुट्टस्वामी निर्णय (2018): धारा 7 के अंतर्गत लाभ के लिए आधार माँगा जा सकता है, पर न्यायालय ने आनुपातिकता परीक्षण (न्न.वाई. चंद्रचूड़ द्वारा प्रतिपादित चार चरण: वैध उद्देश्य, तर्कसंगत संबंध, न्यूनतम प्रतिबंधात्मक विकल्प, संतुलन) को आवश्यक माना। धारा 57 रद्द हुई।
(4) EPIC की सीमाएँ: यह मतदाता पहचान पत्र केवल 18 वर्ष से अधिक आयु के निर्वाचकों के लिए है; नाबालिग लाभार्थी, प्रवासी श्रमिक जिनका नामांकन अन्यत्र है, तथा निर्वाचक नामावली की त्रुटियाँ (मृत या दोहरी प्रविष्टियाँ) बहिष्करण त्रुटि बढ़ा सकती हैं। निर्वाचक नामावली का उद्देश्य मतदान है, कल्याण पहचान नहीं।
(5) बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण: अंगूठे के निशान क्षीण होने पर विफलता, सिग्नल-अभाव वाले क्षेत्र, और सार्वजनिक वितरण प्रणाली में अनुभव (झारखंड की संतोषी कुमारी मामला भुखमरी से जुड़ा विवाद) समावेशन-चुनौती दर्शाते हैं। सामाजिक अंकेक्षण (MGNREGA की धारा 17) फर्जीवाड़े की जाँच का वैकल्पिक तंत्र है।
(6) गोपनीयता और डेटा संरक्षण: पुट्टस्वामी निर्णय से अनुच्छेद 21 के अंतर्गत निजता का अधिकार स्थापित हुआ। न्यायमूर्ति बी.एन. श्रीकृष्ण समिति (2017) की सिफारिशों से डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 बना। बहु-पहचान डेटा (बायोमेट्रिक और मतदान डेटा) का उद्देश्य-सीमित उपयोग अनिवार्य है।
(7) संतुलित दृष्टिकोण: फर्जी लाभार्थी रोकने का वैध उद्देश्य है, पर अधिक प्रतिबंधात्मक विकल्प (आधार या अन्य पहचान का वैकल्पिक प्रयोग, ग्राम सभा सत्यापन, सामाजिक अंकेक्षण) पहले परखे जाने चाहिए।
(8) सुझाव: स्पष्ट विधिक आधार (कानून या नियम), उद्देश्य-सीमा, डेटा साझाकरण पर स्वतंत्र निगरानी, शिकायत निवारण, बहिष्करण पर वैकल्पिक सत्यापन, और अनुच्छेद 243G के अंतर्गत राज्य सरकारों के साथ परामर्श।
(9) निष्कर्ष: समर्थ परिवर्तन वही है जो फर्जीवाड़ा रोकने और समावेशन में संतुलन रखे और पुट्टस्वामी के आनुपातिकता मानदंड पर खरा उतरे।
स्रोत: aajtak.in
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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