ओबीसी क्रीमी लेयर: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की अर्जी खारिज की

ओबीसी क्रीमी लेयर: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की अर्जी खारिज की

ओबीसी क्रीमी लेयर: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की अर्जी खारिज की

ओबीसी क्रीमी लेयर: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की अर्जी खारिज की — ओबीसी क्रीमी लेयर: सुप्रीम कोर्ट के फैसले
आरेख: ओबीसी क्रीमी लेयर: सुप्रीम कोर्ट के फैसले

✎ क्रीमी लेयर का सिद्धांत (इंद्रा साहनी, 1992) केवल OBC पर लागू होता है, और सुप्रीम कोर्ट के अनुसार इसके निर्धारण में माता-पिता की आय के साथ उनका पद और सामाजिक स्थिति भी देखी जानी चाहिए।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — Polity and Governance (संविधान के मूल अधिकार, सामाजिक न्याय हेतु आरक्षण, न्यायपालिका की भूमिका)
  • Prelims: क्रीमी लेयर (Creamy Layer) और इसका ओबीसी आरक्षण से संबंध, इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (1992) मामला, अनुच्छेद 15(4) और 15(5): सामाजिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों हेतु विशेष प्रावधान, अनुच्छेद 16(4): पदों में पिछड़े वर्गों के पक्ष में आरक्षण, अनुच्छेद 14 और 16 में समानता का अधिकार, अनुच्छेद 338B (राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग) और अनुच्छेद 342A (102वां संविधान संशोधन, 2018), राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (National Commission for Backward Classes) की संवैधानिक स्थिति, न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का कार्यान्वयन
  • Essay: सामाजिक न्याय और समानता: आरक्षण का लक्ष्य बनाम लाभ का वास्तविक वितरण, आर्थिक आधार बनाम सामाजिक पिछड़ापन: क्या आरक्षण की पात्रता का निर्धारण केवल आय से होना चाहिए?

त्वरित पुनरावृत्ति: क्रीमी लेयर का सिद्धांत (इंद्रा साहनी, 1992) केवल OBC पर लागू होता है, और सुप्रीम कोर्ट के अनुसार इसके निर्धारण में माता-पिता की आय के साथ उनका पद और सामाजिक स्थिति भी देखी जानी चाहिए।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें 11 मार्च को दिए गए फैसले को लागू करने में राहत मांगी गई थी। उस फैसले में अदालत ने कहा था कि ओबीसी आरक्षण के लिए क्रीमी लेयर तय करते समय माता-पिता की आमदनी को ही आधार मानना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके पद और सामाजिक स्थिति को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। केंद्र ने इस फैसले को अचानक लागू करने से प्रशासनिक जटिलताएं बढ़ने का हवाला देते हुए UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2025 और 2026 के संदर्भ में छूट मांगी थी। सरकारी संस्थानों की विशाल संख्या और राज्यों से परामर्श की आवश्यकता को देखते हुए इसके क्रियान्वयन में लगभग दो वर्ष लग सकते हैं। अदालत ने 2004 के उस आदेश को गलत माना, जिसमें सरकारी कर्मचारियों के बच्चों के लिए पद-आधारित व्यवस्था थी, जबकि PSU, बैंक और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के बच्चों पर आय-आधारित नियम लागू किए गए थे। अदालत के अनुसार यह भेद अनुच्छेद 14 और 16 में निहित समानता के अधिकार के विरुद्ध है।

पृष्ठभूमि

  • इंद्रा साहनी मामले (1992) में सुप्रीम कोर्ट ने पिछड़े वर्गों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण को वैध ठहराया, परंतु यह शर्त जोड़ी कि आरक्षण का लाभ पिछड़े वर्गों के संपन्न तबके (क्रीमी लेयर) तक नहीं पहुंचना चाहिए। यह सिद्धांत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति पर लागू नहीं होता।
  • 1993 में कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के कार्यालय ज्ञापन के माध्यम से क्रीमी लेयर की व्यवस्था लागू की गई और आय व अन्य मानदंडों के आधार पर इसकी पहचान का ढांचा तैयार हुआ। 2017 में आय सीमा ₹8 लाख वार्षिक तय की गई, जिसे समय-समय पर संशोधित करने का प्रावधान रहा है।
  • संविधान संशोधनों से आरक्षण का संवैधानिक ढांचा विकसित हुआ है: पहला संशोधन (1951) ने अनुच्छेद 15(4) जोड़ा, 93वें संशोधन (2005) ने अनुच्छेद 15(5) के माध्यम से शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण का प्रावधान किया, और 102वें संशोधन (2018) ने राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा दिया।
  • सरकारी सेवाओं में पिछड़े वर्गों का प्रतिनिधित्व विभिन्न विभागों, रेलवे, बैंकों, अर्धसैनिक बलों और विश्वविद्यालयों में बढ़ा है। इसी संदर्भ में 2016 के बाद करीब 3 लाख 70 हज़ार ओबीसी नियुक्तियों का उल्लेख किया गया है, जिससे पुराने निर्णयों को पिछली तारीख से लागू करने पर विवाद की आशंका जताई गई है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर क्रीमी लेयर से जुड़े मुद्दों पर निर्देश दिए हैं, जिनमें आय के साथ-साथ सामाजिक व आर्थिक स्थिति के मूल्यांकन की आवश्यकता पर बल दिया गया है। वर्तमान फैसला इसी न्यायिक विकास की कड़ी है।

क्रीमी लेयर क्या है?

  • क्रीमी लेयर वह संपन्न और प्रभावशाली वर्ग है, जिसे पिछड़े वर्गों के लिए निर्धारित आरक्षण के लाभ से बाहर रखा जाता है, ताकि आरक्षण का लाभ वास्तव में सबसे पिछड़े व्यक्तियों तक पहुंचे।
  • इसकी अवधारणा इंद्रा साहनी मामले (1992) से जुड़ी है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने पिछड़ेपन का निर्धारण केवल जाति के आधार पर नहीं, बल्कि आर्थिक व सामाजिक स्थिति के आधार पर भी करने का सिद्धांत दिया।
  • क्रीमी लेयर का सिद्धांत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति पर लागू नहीं होता; यह केवल अन्य पिछड़े वर्गों (OBC) के लिए लागू होता है।
  • पारंपरिक रूप से आय, संपत्ति, कृषि भूमि और पद जैसे मानदंडों का प्रयोग होता रहा है। वर्तमान फैसले में अदालत ने माता-पिता के पद और सामाजिक स्थिति को भी प्रासंगिक माना है।
  • संवैधानिक आधार अनुच्छेद 15(4), 15(5) और 16(4) हैं, जबकि समानता का सिद्धांत अनुच्छेद 14 और 16 में निहित है। आरक्षण और समानता के बीच संतुलन इसी सिद्धांत का मूल उद्देश्य है।
  • सरकारी कर्मचारियों और गैर-सरकारी कर्मचारियों के बच्चों के लिए अलग-अलग मानदंड रखने की व्यवस्था की न्यायिक जांच इस मामले में की गई, जिसमें भेद को समानता के विरुद्ध माना गया।
  • न्यायिक निर्णय का क्रियान्वयन प्रशासनिक प्रक्रिया, राज्यों के साथ समन्वय और पुराने चयन व नियुक्तियों की वैधता से जुड़ा होता है, इसलिए संक्रमण-काल की व्यवस्था पर विचार किया जाता है।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
मुख्य निर्णय सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार की वह अर्जी खारिज की जिसमें 11 मार्च के फैसले को लागू करने में राहत (छूट) मांगी गई थी।
न्यायालय का मूल तर्क क्रीमी लेयर (Creamy Layer) तय करते समय केवल माता-पिता की आय पर्याप्त नहीं है। उनके पद और सामाजिक स्थिति को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
2004 के आदेश पर टिप्पणी न्यायालय ने वह सरकारी आदेश (2004) गलत माना, जिसमें PSU, बैंक और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के बच्चों पर वेतन-आधारित आय से क्रीमी लेयर लागू होती थी, जबकि सरकारी कर्मचारियों के बच्चों के लिए पद-आधारित व्यवस्था रखी गई थी।
संवैधानिक आधार न्यायालय ने इस भेद को अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 16 में निहित समानता के अधिकार के विरुद्ध माना।
केंद्र की दलील फैसले को अचानक लागू करने से प्रशासनिक जटिलता बढ़ने, UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2025 और 2026 की प्रक्रिया प्रभावित होने और पिछली तारीख से लागू होने पर विवाद बढ़ने का हवाला दिया गया।
प्रभावित नियुक्तियां 2016 के बाद केंद्र सरकार, रेलवे, बैंक, अर्धसैनिक बलों और विश्वविद्यालयों में लगभग 3 लाख 70 हज़ार OBC नियुक्तियां हुई हैं।

महत्व

सामाजिक न्याय और समानता

  • क्रीमी लेयर का सिद्धांत यह सुनिश्चित करता है कि आरक्षण का लाभ पिछड़े वर्गों के वास्तव में वंचित हिस्से तक पहुंचे और सम्पन्न परिवार इसका एकाधिकार न करें।
  • पद और सामाजिक स्थिति को शामिल करने से मूल्यांकन आय की तुलना में अधिक व्यापक और यथार्थ-परक बनता है।
  • अनुच्छेद 14 और 16 की कसौटी पर भेदभावपूर्ण व्यवस्था का सुधार सामाजिक न्याय और समान अवसर दोनों को मजबूत करता है।

संवैधानिक और न्यायिक

  • यह निर्णय न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की भूमिका को दर्शाता है, जहां न्यायालय कार्यपालिका के पुराने आदेश की संवैधानिकता परखता है।
  • इससे स्पष्ट होता है कि आरक्षण नीति में वर्गीकरण का आधार तर्कसंगत और समान होना चाहिए, अन्यथा वह अनुच्छेद 14 की कसौटी पर टिक नहीं पाता।
  • केंद्र की राहत की अर्जी खारिज होने से न्यायालय के निर्णय की बाध्यकारी प्रकृति और उसके कार्यान्वयन की अपेक्षा रेखांकित होती है।

प्रशासनिक और नीतिगत

  • नियुक्ति, कैडर आवंटन और प्रशिक्षण जैसी प्रक्रियाओं पर इसका सीधा असर होता है, इसलिए कार्यान्वयन की योजना आवश्यक है।
  • राज्यों, केंद्रीय संस्थानों और सार्वजनिक उपक्रमों के बीच समन्वय के बिना एक समान नीति लागू करना कठिन है।

चुनौतियाँ

1. कार्यान्वयन की प्रशासनिक जटिलता

  • केंद्र सरकार, रेलवे, बैंक, अर्धसैनिक बलों और विश्वविद्यालयों में बड़ी संख्या में पदों की समीक्षा करनी होगी।
  • राज्यों से परामर्श और बड़ी संख्या में सरकारी संस्थानों के कारण कार्यान्वयन में लगभग 2 वर्ष तक लग सकते हैं।

2. पिछली तारीख से लागू करने का विवाद

  • यदि फैसले को पूर्वप्रभावी रूप से लागू किया गया तो पूर्व में हुई नियुक्तियों को लेकर नए मुकदमे और विवाद बढ़ सकते हैं।
  • चयनित अभ्यर्थियों के अधिकार और विश्वास के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण है।

3. निजी क्षेत्र के पदों का मानकीकरण

  • निजी क्षेत्र के पदों को सरकारी पदों के समकक्ष मानने के लिए स्पष्ट मानदंड और समय दोनों की आवश्यकता है।
  • PSU, बैंक और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों की श्रेणी तय करने में पद, वेतन और सामाजिक स्थिति के बीच व्यावहारिक सामंजस्य कठिन है।

4. केंद्र-राज्य समन्वय

  • OBC सूची और आरक्षण से जुड़े कई विषय राज्य स्तर पर भी लागू होते हैं, इसलिए राज्यों की सहमति और सहयोग अनिवार्य है।
  • अलग-अलग राज्यों में क्रीमी लेयर के नियम और प्रशासनिक व्यवस्था भिन्न हो सकती है।

5. नीति की स्थिरता और पारदर्शिता

  • 2004 के आदेश के दोषपूर्ण माने जाने से यह स्पष्ट होता है कि नीतिगत आदेशों की संवैधानिक जांच पहले से होनी चाहिए।
  • बार-बार बदलते नियमों से लाभार्थियों और संस्थानों दोनों में अनिश्चितता बढ़ती है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
कार्यान्वयन की समय-सीमा लगभग 2 वर्ष तक का समय लग सकता है, जिससे नियुक्ति और प्रशासनिक प्रक्रियाएं प्रभावित होंगी।
पूर्वप्रभाव पिछली तारीख से लागू करने पर नए विवाद और बड़ी संख्या में मुकदमों की आशंका है।
भर्ती प्रक्रियाएं UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2025 और 2026 के कैडर, सेवा आवंटन और प्रशिक्षण पर असर पड़ सकता है।
निजी क्षेत्र का मानकीकरण निजी क्षेत्र के पदों को सरकारी पदों के समकक्ष मानने हेतु स्पष्ट मानदंड और पर्याप्त समय आवश्यक है।
समानता बनाम वास्तविक वंचना आय के साथ पद और सामाजिक स्थिति को जोड़ने पर मूल्यांकन की जटिलता बढ़ती है।

आगे की राह

  • संशोधित मानदंडों को स्पष्ट दिशानिर्देशों (Guidelines) के रूप में जारी किया जाए, ताकि सभी विभागों में एक समान व्याख्या हो।
  • पूर्वप्रभाव से बचते हुए चरणबद्ध कार्यान्वयन योजना बनाई जाए, जिससे चल रही भर्तियों और प्रशिक्षण पर न्यूनतम असर पड़े।
  • राज्यों और केंद्रीय संस्थानों के साथ परामर्श तंत्र स्थापित किया जाए, ताकि सूचना और प्रक्रिया में एकरूपता रहे।
  • पद, वेतन और सामाजिक स्थिति से जुड़े मानदंडों के लिए स्पष्ट और मापनीय पैमाने तय किए जाएं।
  • निजी क्षेत्र और PSU के पदों के समकक्षता-निर्धारण हेतु विशेषज्ञ समिति से परामर्श लिया जाए।
  • आरक्षण से जुड़े रिकॉर्ड और नियुक्तियों के आंकड़ों का डिजिटल और सार्वजनिक रिकॉर्ड बनाए रखा जाए, ताकि विवाद कम हों।
  • लाभार्थियों के लिए सूचना और शिकायत निवारण की प्रणाली मजबूत की जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

क्रीमी लेयर (Creamy Layer) · अन्य पिछड़ा वर्ग (Other Backward Classes – OBC) · सामाजिक न्याय · अनुच्छेद 15(4) और 16(4) · इंदिरा साहनी वाद (Indra Sawhney Case, 1992) · समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14 और 16) · सामाजिक एवं शैक्षणिक पिछड़ापन · न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) · पूर्वव्यापी प्रभाव (Retrospective Effect) · प्रशासनिक सुधार और सिविल सेवा भर्ती

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 14: विधि के समक्ष समानता; पद-आधारित भेद की कसौटी।
  • अनुच्छेद 16: लोक नियोजन में अवसर की समानता; आरक्षण का आधार।
  • अनुच्छेद 338B: राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की सलाहकारी भूमिका।

अवधारणा प्रवाह

संवैधानिक ढांचा: अनुच्छेद 14 और 16 में समानता तथा पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान।  →  क्रीमी लेयर का सिद्धांत: आरक्षण का लाभ सम्पन्न वर्ग तक सीमित करने हेतु मानदंड तय किए गए।  →  2004 का सरकारी आदेश: वेतन-आधारित आय से क्रीमी लेयर का निर्धारण और सरकारी कर्मचारियों के लिए पद-आधारित भेद।  →  सर्वोच्च न्यायालय का फैसला (11 मार्च): केवल आय नहीं, पद और सामाजिक स्थिति भी देखी जाए; 2004 के आदेश का भेद समानता के विरुद्ध माना गया।  →  केंद्र सरकार की राहत की अर्जी: प्रशासनिक जटिलता और भर्ती प्रक्रियाओं के आधार पर लागू करने में छूट मांगी गई।  →  सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अर्जी खारिज: फैसले के अनुपालन की अपेक्षा बनी रही, और अब कार्यान्वयन की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. क्रीमी लेयर की अवधारणा का सिद्धांत सर्वप्रथम इंदिरा साहनी वाद (1992) में प्रतिपादित किया गया था।
2. क्रीमी लेयर की पहचान के लिए केवल माता-पिता की आय ही एकमात्र मानदंड है।
3. अनुच्छेद 340 राष्ट्रपति को सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की दशा की जाँच हेतु आयोग नियुक्त करने की शक्ति देता है।

उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: इंदिरा साहनी वाद (1992) में सर्वोच्च न्यायालय ने OBC आरक्षण को वैध ठहराते हुए क्रीमी लेयर को लाभ से बाहर रखने का सिद्धांत दिया। कथन 2 गलत है: हाल के निर्णय में न्यायालय ने कहा कि माता-पिता की आय देखना पर्याप्त नहीं है, उनका पद और सामाजिक स्थिति भी देखी जानी चाहिए। कथन 3 सही है: अनुच्छेद 340 के अंतर्गत राष्ट्रपति पिछड़े वर्गों की दशा की जाँच हेतु आयोग नियुक्त कर सकते हैं।

Q2. निम्नलिखित में से प्रत्येक में दो कथन दिए गए हैं- एक अभिकथन (A) और एक कारण (R)। नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए।

अभिकथन (A): सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि क्रीमी लेयर तय करते समय केवल माता-पिता की आमदनी देखना काफी नहीं है।
कारण (R): माता-पिता का सरकारी या सार्वजनिक पद तथा उनकी सामाजिक स्थिति भी क्रीमी लेयर के निर्धारण में प्रासंगिक कारक हैं।

  1. (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
  2. (A) और (R) दोनों सही हैं, परंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
  3. (A) सही है, परंतु (R) गलत है।
  4. (A) गलत है, परंतु (R) सही है।

उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — अभिकथन और कारण दोनों सही हैं। केवल आय को मानदंड मानने की सीमा पर न्यायालय ने ज़ोर दिया, और इसी कारण पद व सामाजिक स्थिति को शामिल करने की बात कही गई। अतः कारण अभिकथन की सही व्याख्या करता है।

Q3. निम्नलिखित सूचियों का मिलान कीजिए:

सूची I (अनुच्छेद)
A. अनुच्छेद 15(4)
B. अनुच्छेद 16(4)
C. अनुच्छेद 338B
D. अनुच्छेद 342A

सूची II (प्रावधान)
1. राष्ट्रपति द्वारा सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को अधिसूचित करने की शक्ति
2. राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (National Commission for Backward Classes) से संबंधित प्रावधान
3. शिक्षण संस्थानों में पिछड़े वर्गों की उन्नति हेतु विशेष उपबंध
4. सार्वजनिक नियोजन में पिछड़े वर्गों के पर्याप्त प्रतिनिधित्व न होने की स्थिति में आरक्षण

सही मिलान का कूट चुनिए:

  1. A-3, B-4, C-2, D-1
  2. A-4, B-3, C-1, D-2
  3. A-3, B-1, C-2, D-4
  4. A-2, B-4, C-3, D-1

उत्तर: A-3, B-4, C-2, D-1 — अनुच्छेद 15(4) शिक्षण संस्थानों में विशेष उपबंध से संबंधित है (A-3)। अनुच्छेद 16(4) सार्वजनिक नियोजन में पिछड़े वर्गों के आरक्षण से संबंधित है (B-4)। अनुच्छेद 338B राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग से जुड़ा है (C-2)। अनुच्छेद 342A के अंतर्गत राष्ट्रपति सूची अधिसूचित करते हैं (D-1)। ये प्रावधान 102वें संविधान संशोधन (2018) से जुड़े हैं।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ ओबीसी आरक्षण में क्रीमी लेयर का निर्धारण केवल माता-पिता की आय के आधार पर नहीं किया जा सकता, बल्कि उनके पद और सामाजिक स्थिति को भी देखना होगा। इस दृष्टिकोण की समालोचनात्मक जाँच कीजिए। साथ ही बताइए कि यदि ऐसे नियम को अचानक और पूर्वव्यापी प्रभाव से लागू किया जाए तो कौन-सी प्रशासनिक और कानूनी जटिलताएँ उत्पन्न हो सकती हैं। (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर की संरचना:
(1) संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 15(4) और 16(4) के अंतर्गत पिछड़े वर्गों के लिए विशेष उपबंध; अनुच्छेद 14 और 16(1) में समानता का अधिकार। अनुच्छेद 16(4) को ‘पर्याप्त प्रतिनिधित्व’ की कसौटी से जोड़ें।
(2) इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ (1992, नौ-न्यायाधीशीय पीठ): OBC आरक्षण की वैधता; अनुच्छेद 16(4) की गैर-संपूर्णता; क्रीमी लेयर को लाभ से बाहर रखने का सिद्धांत; 1993 के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के ज्ञापन का संदर्भ। 2004 के उस आदेश का उल्लेख करें जिसे हालिया निर्णय में गलत माना गया (सरकारी कर्मचारियों और PSU/बैंक/निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के बच्चों के लिए अलग मानदंड)।
(3) मानदंड पर बहस: ‘केवल आय’ बनाम ‘आय, पद और सामाजिक स्थिति’। पक्ष में तर्क: आर्थिक संपन्नता के बावजूद सामाजिक भेदभाव बना रहता है; आरक्षण का उद्देश्य वास्तविक पिछड़ेपन तक लाभ पहुँचाना है (इंदिरा साहनी में सामाजिक पिछड़ेपन पर बल)। विपक्ष में तर्क: पद और सामाजिक स्थिति का आकलन व्यक्तिपरक और प्रशासनिक रूप से कठिन है; आय का सत्यापन अपेक्षाकृत वस्तुनिष्ठ है; मानदंडों की अस्पष्टता से मुकदमेबाज़ी बढ़ सकती है। मार्क गैलेंटर (Marc Galanter, ‘Competing Equalities’) द्वारा भारतीय आरक्षण नीति के विश्लेषण का संदर्भ दें।
(4) पूर्वव्यापी और अचानक लागू करने के परिणाम: 2016 के बाद केंद्र सरकार, रेलवे, बैंक, अर्धसैनिक बलों और विश्वविद्यालयों में लगभग 3 लाख 70 हज़ार OBC नियुक्तियों की पुनर्समीक्षा का प्रश्न; UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2025 व 2026 में कैडर और सेवा आवंटन तथा प्रशिक्षण पर असर; राज्यों के साथ समन्वय में लगभग 2 वर्ष; निजी क्षेत्र के पदों को सरकारी पदों के समकक्ष मानने की जटिलता; अनुच्छेद 14 के अंतर्गत विश्वास-आधारित अपेक्षाओं (legitimate expectation) का प्रश्न; नए विवाद और मुकदमे।
(5) संस्थागत भूमिका: राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (अनुच्छेद 338B) की सलाहकार भूमिका; अनुच्छेद 342A के अंतर्गत सूची-निर्माण; न्यायिक समीक्षा की सीमा।
(6) निष्कर्ष: संतुलित और तर्कसंगत मानदंड, स्पष्ट दिशानिर्देश, क्रमिक (prospective) कार्यान्वयन और राज्यों से परामर्श का सुझाव देते हुए सामाजिक न्याय तथा प्रशासनिक स्थिरता के बीच संतुलन दिखाएँ।

स्रोत: abplive.com


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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