केरल उच्च न्यायालय ने जीवनरक्षक दवाओं की ऊंची कीमत पर फैसला सुरक्षित रखा

Exhorbitant price of patented life-saving medicines: Kerala HC reserves verdict — diagram

केरल उच्च न्यायालय ने जीवनरक्षक दवाओं की ऊंची कीमत पर फैसला सुरक्षित रखा

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जीवन रक्षक दवा मूल्य नियंत्रण

✎ केरल उच्च न्यायालय का यह मामला पेटेंटेड जीवन रक्षक दवाओं की अत्यधिक कीमतों और सार्वजनिक स्वास्थ्य के अधिकार बनाम बौद्धिक संपदा अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता को रेखांकित करता है, जिसमें अनिवार्य लाइसेंसिंग जैसे…

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — शासन, संविधान और राजव्यवस्था  |  GS Paper III — विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, अर्थव्यवस्था
  • Prelims: पेटेंट अधिनियम, 1970, अनिवार्य लाइसेंसिंग, न्यायिक सक्रियता, जीवन का अधिकार (अनुच्छेद 21), बौद्धिक संपदा अधिकार, जनहित याचिका
  • Essay: जीवन का अधिकार बनाम बौद्धिक संपदा अधिकार: संतुलन की आवश्यकता, सार्वजनिक स्वास्थ्य और दवा पहुंच में न्यायपालिका की भूमिका

त्वरित पुनरावृत्ति: केरल उच्च न्यायालय का यह मामला पेटेंटेड जीवन रक्षक दवाओं की अत्यधिक कीमतों और सार्वजनिक स्वास्थ्य के अधिकार बनाम बौद्धिक संपदा अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता को रेखांकित करता है, जिसमें अनिवार्य लाइसेंसिंग जैसे प्रावधान महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

केरल उच्च न्यायालय ने पेटेंटेड जीवन रक्षक दवाओं की अत्यधिक कीमतों से संबंधित एक स्वतः संज्ञान (suo motu) मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। यह मामला एक स्तन कैंसर रोगी द्वारा दायर याचिका से शुरू हुआ था, जिसमें सरकार को दवा का पेटेंट लेने और उसे न्यूनतम संभव कीमत पर उपलब्ध कराने का निर्देश देने की मांग की गई थी। रोगी की मृत्यु के बाद, न्यायालय ने व्यापक जनहित को देखते हुए इस मामले को स्वतः संज्ञान के रूप में लिया।

पृष्ठभूमि

  • भारत में दवाओं की कीमतें एक संवेदनशील मुद्दा रही हैं, खासकर जीवन रक्षक दवाओं के संबंध में, जहां पेटेंट धारक कंपनियों के एकाधिकार के कारण कीमतें अक्सर बहुत अधिक होती हैं।
  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार की गारंटी देता है, जिसमें स्वास्थ्य का अधिकार भी निहित है। सर्वोच्च न्यायालय ने कई निर्णयों में इसे दोहराया है।
  • पेटेंट अधिनियम, 1970 (Patents Act, 1970) बौद्धिक संपदा अधिकारों की रक्षा करता है, लेकिन इसमें जनहित में अनिवार्य लाइसेंसिंग (Compulsory Licensing) जैसे प्रावधान भी हैं।
  • अनिवार्य लाइसेंसिंग एक सरकारी हस्तक्षेप है जो पेटेंट धारक की अनुमति के बिना किसी तीसरे पक्ष को पेटेंटेड उत्पाद का उत्पादन करने की अनुमति देता है, आमतौर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल या दवा की पहुंच सुनिश्चित करने के लिए।
  • न्यायालयों ने अतीत में सार्वजनिक स्वास्थ्य और दवा पहुंच से संबंधित मामलों में सक्रिय भूमिका निभाई है, जिसमें सरकार को आवश्यक निर्देश जारी किए गए हैं।
  • दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए भारत में राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (National Pharmaceutical Pricing Authority – NPPA) जैसी संस्थाएं भी कार्यरत हैं, जो आवश्यक दवाओं की सूची (National List of Essential Medicines – NLEM) के तहत दवाओं की कीमतों को विनियमित करती हैं।

अनिवार्य लाइसेंसिंग और जनहित में पेटेंट

  • अनिवार्य लाइसेंसिंग एक प्रावधान है जो सरकार को या किसी तीसरे पक्ष को पेटेंट धारक की अनुमति के बिना पेटेंटेड उत्पाद या प्रक्रिया का उत्पादन, उपयोग या बिक्री करने की अनुमति देता है।
  • यह प्रावधान विश्व व्यापार संगठन (WTO) के बौद्धिक संपदा अधिकारों के व्यापार-संबंधी पहलुओं (TRIPS) समझौते में भी निहित है, जो सदस्य देशों को सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए अनिवार्य लाइसेंसिंग का उपयोग करने की अनुमति देता है।
  • भारत में, पेटेंट अधिनियम, 1970 की धारा 84 और 92 अनिवार्य लाइसेंसिंग से संबंधित हैं। धारा 84 के तहत, कोई भी व्यक्ति पेटेंट प्रदान किए जाने के तीन साल बाद अनिवार्य लाइसेंस के लिए आवेदन कर सकता है यदि दवा जनता के लिए उचित मूल्य पर उपलब्ध नहीं है या पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं है।
  • धारा 92 सरकार को राष्ट्रीय आपातकाल, अत्यधिक तात्कालिकता या सार्वजनिक गैर-व्यावसायिक उपयोग के मामलों में अनिवार्य लाइसेंस जारी करने की अनुमति देती है।
  • अनिवार्य लाइसेंसिंग का मुख्य उद्देश्य पेटेंट धारक के एकाधिकार को तोड़कर आवश्यक दवाओं की पहुंच और सामर्थ्य सुनिश्चित करना है, खासकर विकासशील देशों में।
  • यह प्रावधान अक्सर दवा कंपनियों और सरकारों के बीच विवाद का विषय रहा है, जहां दवा कंपनियां अपने अनुसंधान और विकास निवेश की सुरक्षा की मांग करती हैं, जबकि सरकारें सार्वजनिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देती हैं।
  • भारत में पहला अनिवार्य लाइसेंस 2012 में नैटको फार्मा (Natco Pharma) को बायर (Bayer) की कैंसर रोधी दवा सोराफेनिब (Sorafenib) के जेनेरिक संस्करण का उत्पादन करने के लिए दिया गया था।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
पेटेंटशुदा जीवन रक्षक दवाएँ ये दवाएँ गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए महत्वपूर्ण होती हैं, लेकिन इनकी उच्च कीमतें मरीजों के लिए एक बड़ी चुनौती बन जाती हैं।
केरल उच्च न्यायालय का स्वतः संज्ञान (Suo Motu) मामला उच्च न्यायालय ने जनहित को ध्यान में रखते हुए इस मामले को स्वयं उठाया, जो न्यायपालिका की सक्रिय भूमिका को दर्शाता है।
पेटेंट का अधिग्रहण याचिका में सरकार से दवा के पेटेंट का अधिग्रहण करने और उसे कम कीमत पर उपलब्ध कराने का निर्देश देने की मांग की गई थी, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए पेटेंट कानूनों के लचीलेपन पर बहस छेड़ता है।
वैकल्पिक दवाओं पर विशेषज्ञ राय अदालत ने सस्ती, गैर-पेटेंटेड दवाओं को विकल्प के रूप में उपयोग करने की व्यवहार्यता पर विशेषज्ञ राय मांगी, जो दवा पहुंच और नवाचार के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता को उजागर करता है।
नैदानिक और विष विज्ञान संबंधी प्रोफाइल विशेषज्ञों ने बताया कि दो दवाओं के नैदानिक और विष विज्ञान संबंधी प्रोफाइल अलग-अलग थे, जिससे उनके प्रतिस्थापन की संभावना कम हो गई। यह दवा सुरक्षा और प्रभावकारिता के महत्व पर जोर देता है।

महत्व

सामाजिक महत्व

  • जीवन रक्षक दवाओं की पहुंच सुनिश्चित करना सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक न्याय के लिए महत्वपूर्ण है।
  • उच्च कीमतें मरीजों, विशेषकर निम्न आय वर्ग के लोगों के लिए एक गंभीर वित्तीय बोझ पैदा करती हैं, जिससे उपचार बाधित हो सकता है।

आर्थिक महत्व

  • दवाओं की उच्च कीमतें स्वास्थ्य सेवा लागत को बढ़ाती हैं, जिससे व्यक्तियों और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों दोनों पर दबाव पड़ता है।
  • पेटेंट कानूनों और दवाओं की सामर्थ्य के बीच संतुलन बनाना नवाचार को बढ़ावा देने और सार्वजनिक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है।

शासन और विनियामक महत्व

  • यह मामला सरकार की भूमिका पर प्रकाश डालता है कि वह कैसे पेटेंट कानूनों का उपयोग सार्वजनिक हित में कर सकती है, जैसे कि अनिवार्य लाइसेंसिंग (Compulsory Licensing) के माध्यम से।
  • न्यायपालिका की सक्रियता जनहित के मामलों में सरकार और निजी संस्थाओं को जवाबदेह ठहराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

चुनौतियाँ

1. दवाओं की सामर्थ्य और पहुंच

  • पेटेंटशुदा दवाओं की अत्यधिक कीमतें मरीजों के लिए उपचार को दुर्गम बना देती हैं, खासकर गंभीर और पुरानी बीमारियों के मामलों में।
  • भारत में स्वास्थ्य बीमा कवरेज की सीमा को देखते हुए, जेब से किया जाने वाला खर्च (Out-of-pocket expenditure) एक बड़ी बाधा है।

2. बौद्धिक संपदा अधिकार (Intellectual Property Rights) और सार्वजनिक स्वास्थ्य

  • पेटेंट प्रणाली दवा कंपनियों को अनुसंधान और विकास में निवेश के लिए प्रोत्साहन प्रदान करती है, लेकिन यह दवाओं की कीमतों को भी बढ़ाती है।
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य आवश्यकताओं और बौद्धिक संपदा अधिकारों के बीच संतुलन बनाना एक जटिल नीतिगत चुनौती है।

3. अनिवार्य लाइसेंसिंग का उपयोग

  • भारतीय पेटेंट अधिनियम, 1970 (Indian Patents Act, 1970) में अनिवार्य लाइसेंसिंग का प्रावधान है, जो कुछ शर्तों के तहत सरकार को पेटेंटशुदा दवा के उत्पादन की अनुमति देता है।
  • हालांकि, इसका उपयोग अक्सर विवादित होता है और अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों के तहत चुनौतियां पैदा कर सकता है।

4. दवा नियामक प्रणाली की भूमिका

  • दवा नियामक प्राधिकरणों को न केवल दवाओं की सुरक्षा और प्रभावकारिता सुनिश्चित करनी होती है, बल्कि उनकी सामर्थ्य और उपलब्धता पर भी ध्यान देना होता है।
  • जेनेरिक दवाओं (Generic Medicines) के उत्पादन और विपणन को बढ़ावा देना एक महत्वपूर्ण रणनीति है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
पेटेंटशुदा दवाओं की उच्च लागत गरीब और मध्यम वर्ग के मरीजों के लिए जीवन रक्षक दवाओं तक पहुंच में बाधा।
बौद्धिक संपदा अधिकार बनाम सार्वजनिक स्वास्थ्य दवा नवाचार को प्रोत्साहित करने और दवाओं की सामर्थ्य सुनिश्चित करने के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौती।
अनिवार्य लाइसेंसिंग का सीमित उपयोग अंतरराष्ट्रीय दबाव और कानूनी जटिलताओं के कारण सार्वजनिक स्वास्थ्य संकटों में भी इसका पूरी तरह से उपयोग नहीं हो पाता।
जेनेरिक विकल्पों की उपलब्धता कुछ बीमारियों के लिए प्रभावी और सुरक्षित जेनेरिक विकल्पों की कमी या उनके उपयोग पर संशय।
दवा नियामक ढांचे की प्रभावशीलता दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने और उनकी उपलब्धता सुनिश्चित करने में नियामक निकायों की सीमित शक्ति।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • प्रधानमंत्री जन औषधि परियोजना (Pradhan Mantri Jan Aushadhi Pariyojana)

आगे की राह

  • पेटेंट कानूनों में लचीलेपन का उपयोग करें, जैसे कि अनिवार्य लाइसेंसिंग का प्रावधान, सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थितियों और अत्यधिक कीमतों के मामलों में।
  • दवा अनुसंधान और विकास के लिए सार्वजनिक वित्त पोषण बढ़ाएँ, ताकि दवा कंपनियों पर पेटेंट के माध्यम से लागत वसूलने का दबाव कम हो।
  • जेनेरिक दवाओं के उत्पादन और उपयोग को सक्रिय रूप से बढ़ावा दें, और उनकी गुणवत्ता और प्रभावकारिता सुनिश्चित करने के लिए नियामक निगरानी मजबूत करें।
  • दवा मूल्य नियंत्रण तंत्रों को मजबूत करें और आवश्यक दवाओं की कीमतों पर एक पारदर्शी और न्यायसंगत नीति विकसित करें।
  • स्वास्थ्य बीमा कवरेज का विस्तार करें ताकि मरीजों पर दवाओं का वित्तीय बोझ कम हो सके।
  • अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर विकासशील देशों के लिए दवाओं तक पहुंच के अधिकार की वकालत करें और पेटेंट नियमों में सुधार का समर्थन करें।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

पेटेंट दवाएं · जीवन रक्षक दवाएं · सार्वजनिक स्वास्थ्य · अनिवार्य लाइसेंसिंग · बौद्धिक संपदा अधिकार · औषधि मूल्य नियंत्रण · जनहित याचिका · न्यायिक सक्रियता · ट्रिप्स समझौता · राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण · स्वास्थ्य का अधिकार · किफायती दवाएं

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 21’, ‘note’: ‘जीवन का अधिकार और स्वास्थ्य का अधिकार’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 38’, ‘note’: ‘राज्य लोक कल्याण की अभिवृद्धि करेगा’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 47’, ‘note’: ‘पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊंचा करना’}

अवधारणा प्रवाह

पेटेंटशुदा जीवन रक्षक दवाओं की उच्च कीमतें  →  मरीजों के लिए उपचार की दुर्गमता और वित्तीय बोझ  →  केरल उच्च न्यायालय द्वारा स्वतः संज्ञान  →  सरकार से पेटेंट अधिग्रहण और सस्ती उपलब्धता की मांग  →  पेटेंट कानून और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच संतुलन पर बहस  →  न्यायपालिका द्वारा जनहित में हस्तक्षेप

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत में पेटेंट अधिनियम, 1970, दवाओं पर पेटेंट प्रदान करने के लिए एक कानूनी ढाँचा प्रदान करता है।
2. अनिवार्य लाइसेंसिंग (Compulsory Licensing) का प्रावधान ट्रिप्स (TRIPS) समझौते के तहत उपलब्ध नहीं है।
3. राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) भारत में दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने वाली एक सरकारी नियामक एजेंसी है।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। भारत में पेटेंट अधिनियम, 1970, बौद्धिक संपदा अधिकारों, विशेष रूप से पेटेंट को नियंत्रित करता है, जिसमें दवाओं पर पेटेंट भी शामिल है।
कथन 2 गलत है। ट्रिप्स (TRIPS) समझौते के तहत अनिवार्य लाइसेंसिंग का प्रावधान उपलब्ध है, जो कुछ विशेष परिस्थितियों में सरकारों को पेटेंट धारक की अनुमति के बिना किसी पेटेंट उत्पाद का उत्पादन करने या उसका उपयोग करने की अनुमति देता है।
कथन 3 सही है। राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) भारत में दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने और उन्हें किफायती बनाने के लिए जिम्मेदार है।

Q2. अनिवार्य लाइसेंसिंग (Compulsory Licensing) के संबंध में, निम्नलिखित में से कौन सा कथन सबसे उपयुक्त है?

  1. यह पेटेंट धारक को उसके आविष्कार का विशेष रूप से उपयोग करने का अधिकार देता है।
  2. यह सरकार को जनहित में पेटेंट धारक की अनुमति के बिना किसी पेटेंट उत्पाद का उत्पादन करने या उसका उपयोग करने की अनुमति देता है।
  3. यह केवल उन दवाओं पर लागू होता है जो भारत में निर्मित नहीं होती हैं।
  4. यह केवल युद्ध या राष्ट्रीय आपातकाल की स्थिति में ही लागू किया जा सकता है।

उत्तर: यह सरकार को जनहित में पेटेंट धारक की अनुमति के बिना किसी पेटेंट उत्पाद का उत्पादन करने या उसका उपयोग करने की अनुमति देता है। — अनिवार्य लाइसेंसिंग (Compulsory Licensing) एक ऐसा प्रावधान है जो सरकार को जनहित में, जैसे कि सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल या दवाओं की अत्यधिक कीमत की स्थिति में, पेटेंट धारक की अनुमति के बिना किसी पेटेंट उत्पाद का उत्पादन करने या उसका उपयोग करने की अनुमति देता है। यह ट्रिप्स समझौते के तहत एक लचीलापन है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत में जीवन रक्षक दवाओं की अत्यधिक कीमतों से उत्पन्न चुनौतियों पर चर्चा कीजिए। इन चुनौतियों का समाधान करने में अनिवार्य लाइसेंसिंग (Compulsory Licensing) की भूमिका का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर की शुरुआत जीवन रक्षक दवाओं की अत्यधिक कीमतों की समस्या को परिभाषित करने से करें, जिसमें पेटेंट अधिकार और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच संतुलन का मुद्दा शामिल हो।
पहले भाग में, दवाओं की अत्यधिक कीमतों से उत्पन्न चुनौतियों पर चर्चा करें, जैसे कि:
* स्वास्थ्य तक पहुंच में बाधा: गरीब और कमजोर वर्गों के लिए दवाओं की अनुपलब्धता।
* स्वास्थ्य व्यय में वृद्धि: परिवारों और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों पर वित्तीय बोझ।
* नैतिक और मानवाधिकार संबंधी मुद्दे: स्वास्थ्य के अधिकार का उल्लंघन।
* बाजार एकाधिकार: पेटेंट धारकों द्वारा कीमतों का निर्धारण।
दूसरे भाग में, अनिवार्य लाइसेंसिंग (Compulsory Licensing) की भूमिका का आलोचनात्मक परीक्षण करें:
* अनिवार्य लाइसेंसिंग क्या है: इसकी परिभाषा और कानूनी आधार (पेटेंट अधिनियम, 1970 की धारा 84 और 92, ट्रिप्स समझौता)।
* इसके लाभ: दवाओं की उपलब्धता बढ़ाना, कीमतों को कम करना, प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना, सार्वजनिक स्वास्थ्य लक्ष्यों को प्राप्त करना।
* इसकी सीमाएं और चुनौतियां: अंतरराष्ट्रीय व्यापार विवादों की संभावना, अनुसंधान और विकास में निवेश पर संभावित नकारात्मक प्रभाव, बहुराष्ट्रीय कंपनियों का विरोध, गुणवत्ता नियंत्रण के मुद्दे।
* भारत में उदाहरण: सोराफेनिब (Sorafenib) के मामले का उल्लेख।
निष्कर्ष में, पेटेंट अधिकारों और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच एक संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल दें, जिसमें अनिवार्य लाइसेंसिंग एक महत्वपूर्ण उपकरण हो सकता है, लेकिन यह एकमात्र समाधान नहीं है। अन्य उपायों जैसे मूल्य नियंत्रण, सरकारी खरीद, और घरेलू अनुसंधान एवं विकास को भी शामिल करें।

स्रोत: The Hindu

Kerala PCS (Kerala PSC (KAS)) — राज्य PCS अभ्यास

Prelims: केरल उच्च न्यायालय द्वारा हाल ही में किस विषय पर निर्णय सुरक्षित रखा गया है?

  1. पेटेंट जीवन रक्षक दवाओं की अत्यधिक कीमत
  2. निजी अस्पतालों में मरीजों के अधिकार
  3. राज्य सरकार द्वारा दवाओं की कीमत नियंत्रण
  4. औषधि निर्माण में विदेशी निवेश

उत्तर: पेटेंट जीवन रक्षक दवाओं की अत्यधिक कीमत — केरल उच्च न्यायालय ने पेटेंट जीवन रक्षक दवाओं की अत्यधिक कीमत को लेकर चल रहे मामले में फैसला सुरक्षित रखा है।

Mains: केरल सरकार द्वारा जीवन रक्षक दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए उठाए गए कदमों का मूल्यांकन करते हुए, इसके संवैधानिक और कानूनी पहलुओं पर प्रकाश डालिए।


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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