क्या न्यायविदों को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश नियुक्त किया जा सकता है? संविधान क्या कहता है?

Can jurists be appointed as Supreme Court Judges? | Explained — diagram

क्या न्यायविदों को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश नियुक्त किया जा सकता है? संविधान क्या कहता है?

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✎ अनुच्छेद 124(3) सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए 'प्रतिष्ठित न्यायविद्' के रूप में एक वैकल्पिक मार्ग प्रदान करता है, जिसका उद्देश्य न्यायपालिका में विविधता और विशेषज्ञता लाना है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान: महत्वपूर्ण प्रावधान, कार्यप्रणाली, नियुक्तियाँ  |  GS Paper II — न्यायपालिका की संरचना, संगठन और कार्यप्रणाली
  • Prelims: अनुच्छेद 124(3), सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति, प्रतिष्ठित न्यायविद्, संविधान सभा बहस, न्यायिक स्वतंत्रता, न्यायिक सक्रियता
  • Essay: भारतीय न्यायपालिका में विविधता और विशेषज्ञता का महत्व, संविधान की मूल भावना और वर्तमान न्यायिक नियुक्तियाँ

त्वरित पुनरावृत्ति: अनुच्छेद 124(3) सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए ‘प्रतिष्ठित न्यायविद्’ के रूप में एक वैकल्पिक मार्ग प्रदान करता है, जिसका उद्देश्य न्यायपालिका में विविधता और विशेषज्ञता लाना है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

हाल ही में, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां ने इस बात पर प्रश्न उठाया कि संविधान का वह प्रावधान, जो एक ‘प्रतिष्ठित न्यायविद्’ (distinguished jurist) को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करने की अनुमति देता है, 76 वर्षों से अधिक समय से अप्रयुक्त क्यों है। उन्होंने अनुच्छेद 124(3) का उल्लेख करते हुए इस बात पर जोर दिया कि इस प्रावधान के तहत अभी तक किसी भी कानूनी शिक्षाविद् को सर्वोच्च न्यायालय में पदोन्नत नहीं किया गया है, जबकि यह न्यायपालिका में विविधता लाने के लिए एक महत्वपूर्ण मार्ग हो सकता है।

पृष्ठभूमि

  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 124(3) सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए तीन मार्गों का प्रावधान करता है।
  • इन मार्गों में उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में कम से कम पाँच वर्ष का अनुभव, उच्च न्यायालय के अधिवक्ता के रूप में कम से कम दस वर्ष का अनुभव, या राष्ट्रपति की राय में एक ‘प्रतिष्ठित न्यायविद्’ होना शामिल है।
  • संविधान में ‘प्रतिष्ठित न्यायविद्’ की परिभाषा या उनके लिए न्यूनतम पेशेवर अनुभव की कोई विशिष्ट शर्त नहीं है।
  • संविधान सभा की बहसों से पता चलता है कि इस प्रावधान को न्यायपालिका में पेशेवर पृष्ठभूमि की विविधता लाने के उद्देश्य से जोड़ा गया था।
  • संविधान सभा के सदस्यों ने इस बात पर जोर दिया था कि उत्कृष्ट कानूनी और न्यायिक ज्ञान केवल न्यायाधीशों या अधिवक्ताओं तक ही सीमित नहीं होता है।
  • अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय में फेलिक्स फ्रैंकफर्टर की नियुक्ति का उदाहरण भी संविधान सभा में दिया गया था।

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति और ‘प्रतिष्ठित न्यायविद्’ का प्रावधान क्या है?

  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 124(3) सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त होने के लिए पात्रता मानदंड निर्धारित करता है।
  • इसके अनुसार, एक व्यक्ति सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने के योग्य होगा यदि वह: (क) कम से कम पाँच वर्षों तक किसी उच्च न्यायालय (या लगातार दो या अधिक उच्च न्यायालयों) का न्यायाधीश रहा हो; या (ख) कम से कम दस वर्षों तक किसी उच्च न्यायालय (या लगातार दो या अधिक उच्च न्यायालयों) का अधिवक्ता रहा हो; या (ग) राष्ट्रपति की राय में एक प्रतिष्ठित न्यायविद् हो।
  • ‘प्रतिष्ठित न्यायविद्’ का प्रावधान न्यायपालिका में ऐसे व्यक्तियों को शामिल करने का अवसर प्रदान करता है जिनके पास न्यायिक सेवा या वकालत का पारंपरिक अनुभव नहीं है, लेकिन कानून के क्षेत्र में उनका गहरा अकादमिक ज्ञान और विद्वत्ता है।
  • संविधान निर्माताओं का उद्देश्य इस प्रावधान के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय में विभिन्न दृष्टिकोणों और विशेषज्ञता को लाना था, जिससे न्यायिक निर्णयों की गुणवत्ता और विविधता में वृद्धि हो सके।
  • यह प्रावधान न्यायपालिका को केवल सेवाकालीन न्यायाधीशों और वकीलों तक सीमित रखने के बजाय कानूनी शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं और सैद्धांतिक विशेषज्ञों के लिए भी द्वार खोलता है।
  • हालांकि, भारत में इस प्रावधान का अभी तक उपयोग नहीं किया गया है, जिससे न्यायपालिका में विशेषज्ञता और विविधता लाने के मूल संवैधानिक उद्देश्य पर सवाल उठते हैं।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
संविधान का अनुच्छेद 124(3) सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए तीन मार्गों का प्रावधान करता है।
विशिष्ट विधिवेत्ता (Distinguished Jurist) का प्रावधान यह मार्ग पारंपरिक न्यायिक सेवा या वकालत से परे, कानूनी विद्वानों और शिक्षाविदों को सर्वोच्च न्यायालय में लाने की अनुमति देता है।
उद्देश्य सर्वोच्च न्यायालय की पीठ में व्यावसायिक पृष्ठभूमि में विविधता लाना।
संविधान सभा की बहसें दर्शाती हैं कि इस प्रावधान का उद्देश्य न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए राष्ट्रपति के पास विकल्पों का व्यापक क्षेत्र खोलना था।
वर्तमान स्थिति यह प्रावधान 76 से अधिक वर्षों से अप्रयुक्त है, किसी भी कानूनी शिक्षाविद को इसके तहत सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्त नहीं किया गया है।

महत्व

न्यायपालिका पर प्रभाव

  • विशिष्ट विधिवेत्ताओं की नियुक्ति से सर्वोच्च न्यायालय में विविध दृष्टिकोण और विशेषज्ञता आ सकती है, जिससे न्यायिक निर्णयों की गुणवत्ता और गहराई बढ़ सकती है।
  • यह कानूनी शिक्षाविदों और विद्वानों को न्यायपालिका में सीधे योगदान करने का अवसर प्रदान करेगा, जिससे कानूनी सिद्धांत और व्यवहार के बीच की खाई पट सकती है।

संस्थागत सुदृढीकरण

  • संविधान निर्माताओं के मूल इरादे को साकार करने से संवैधानिक प्रावधानों के प्रति सम्मान और उनके पूर्ण उपयोग को बढ़ावा मिलेगा।
  • यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता और क्षमता को मजबूत कर सकता है, क्योंकि यह केवल पारंपरिक कानूनी करियर पथों तक सीमित नहीं रहेगा।

वैश्विक उदाहरण

  • संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देशों में प्रतिष्ठित शिक्षाविदों की न्यायिक नियुक्तियों ने न्यायशास्त्र के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, जैसा कि फेलिक्स फ्रैंकफर्टर के मामले में देखा गया है।
  • भारत भी इस मार्ग का उपयोग करके अपनी न्यायपालिका को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक विविध और गतिशील बना सकता है।

चुनौतियाँ

1. परिभाषा का अभाव

  • संविधान में ‘विशिष्ट विधिवेत्ता’ की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है, जिससे इस श्रेणी के तहत नियुक्ति के लिए मानदंड निर्धारित करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
  • यह अस्पष्टता संभावित रूप से मनमानी नियुक्तियों या राजनीतिक हस्तक्षेप की आशंका को जन्म दे सकती है।

2. न्यायिक नियुक्तियों की प्रक्रिया

  • कॉलेजियम प्रणाली (Collegium System) के तहत न्यायाधीशों की नियुक्ति में मुख्य रूप से उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों और वकीलों पर ध्यान केंद्रित किया जाता है, जिससे विशिष्ट विधिवेत्ताओं के लिए मार्ग अवरुद्ध हो जाता है।
  • इस प्रावधान का उपयोग न करने के पीछे कॉलेजियम की भूमिका और उसके कार्यप्रणाली पर विचार करना आवश्यक है।

3. व्यावसायिक अनुभव की कमी

  • पारंपरिक न्यायिक सेवा या वकालत के अनुभव के बिना, एक विधिवेत्ता के पास अदालती कार्यवाही और न्यायिक प्रशासन का सीधा अनुभव नहीं हो सकता है, जो एक चुनौती बन सकता है।
  • न्यायाधीश के रूप में कार्य करने के लिए केवल सैद्धांतिक ज्ञान ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि व्यावहारिक अनुभव भी महत्वपूर्ण होता है।

4. संस्थागत जड़ता

  • 76 से अधिक वर्षों से इस प्रावधान का उपयोग न होना एक प्रकार की संस्थागत जड़ता को दर्शाता है, जहाँ स्थापित प्रथाओं को बदलना मुश्किल होता है।
  • इस प्रावधान को सक्रिय करने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति और न्यायिक सुधारों की आवश्यकता हो सकती है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
‘विशिष्ट विधिवेत्ता’ की अपरिभाषित प्रकृति नियुक्ति के लिए वस्तुनिष्ठ मानदंडों की कमी, मनमानी की संभावना।
कॉलेजियम प्रणाली का प्रभुत्व पारंपरिक मार्गों पर अत्यधिक निर्भरता, अन्य योग्य उम्मीदवारों की उपेक्षा।
न्यायिक अनुभव का अभाव विधिवेत्ताओं के पास अदालती कार्यवाही और प्रशासन का सीधा अनुभव न होना।
संविधान निर्माताओं के इरादे का उल्लंघन विविधता लाने के मूल उद्देश्य की पूर्ति न होना।
न्यायपालिका में विविधता की कमी केवल पारंपरिक पृष्ठभूमि वाले न्यायाधीशों तक सीमित रहने से न्यायिक दृष्टिकोणों का संकुचित होना।

आगे की राह

  • ‘विशिष्ट विधिवेत्ता’ की स्पष्ट और वस्तुनिष्ठ परिभाषा विकसित की जानी चाहिए, जिसमें शैक्षणिक योग्यता, प्रकाशन, कानूनी अनुसंधान और संवैधानिक कानून में योगदान जैसे मानदंड शामिल हों।
  • कॉलेजियम प्रणाली को इस प्रावधान पर विचार करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए और एक पारदर्शी प्रक्रिया स्थापित की जानी चाहिए।
  • एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया जा सकता है जो विशिष्ट विधिवेत्ताओं की पहचान करने और उनकी योग्यता का आकलन करने के लिए सिफारिशें दे।
  • कानूनी शिक्षाविदों और विद्वानों को न्यायपालिका में योगदान करने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु जागरूकता अभियान चलाए जा सकते हैं।
  • संविधान सभा की बहसों के मूल उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए, न्यायपालिका में विविधता लाने के लिए सक्रिय कदम उठाए जाने चाहिए।
  • अन्य देशों के सफल मॉडलों का अध्ययन किया जा सकता है जहाँ प्रतिष्ठित शिक्षाविदों को उच्च न्यायालयों में नियुक्त किया गया है।
  • इस प्रावधान के उपयोग को लेकर न्यायपालिका, कार्यपालिका और कानूनी बिरादरी के बीच व्यापक विचार-विमर्श और सहमति बनाई जानी चाहिए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

न्यायाधीशों की नियुक्ति · भारत का सर्वोच्च न्यायालय · संविधान का अनुच्छेद 124(3) · प्रतिष्ठित विधिवेत्ता · न्यायिक नियुक्तियाँ · संविधान सभा बहस · न्यायिक स्वतंत्रता · न्यायिक सक्रियता · न्यायिक संयम · कॉलेजियम प्रणाली

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 124(3)’, ‘note’: ‘सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति’}

अवधारणा प्रवाह

अनुच्छेद 124(3) में ‘विशिष्ट विधिवेत्ता’ का प्रावधान  →  संविधान निर्माताओं का उद्देश्य: न्यायपालिका में विविधता  →  76 वर्षों से प्रावधान का अप्रयुक्त रहना  →  न्यायिक नियुक्तियों की कॉलेजियम प्रणाली का प्रभुत्व  →  न्यायपालिका में विविधता और विशेषज्ञता की कमी  →  संविधान के मूल भावना को साकार करने की आवश्यकता

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. भारत के संविधान का अनुच्छेद 124(3) सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए तीन मार्गों का प्रावधान करता है।
2. एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करने का प्रावधान संविधान सभा की बहस के दौरान जोड़ा गया था।
3. भारत में अब तक किसी भी प्रतिष्ठित विधिवेत्ता को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त नहीं किया गया है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि अनुच्छेद 124(3) उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, उच्च न्यायालय के अधिवक्ता और प्रतिष्ठित विधिवेत्ता के तीन मार्गों का उल्लेख करता है। कथन 2 सही है क्योंकि ‘प्रतिष्ठित विधिवेत्ता’ श्रेणी को संविधान सभा की बहस के दौरान शामिल किया गया था ताकि न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए व्यापक विकल्प मिल सकें। कथन 3 भी सही है क्योंकि यह प्रावधान 76 वर्षों से अधिक समय से अप्रयुक्त है और किसी भी विधिवेत्ता को इस श्रेणी के तहत नियुक्त नहीं किया गया है।

Q2. अभिकथन (A): भारत के संविधान का अनुच्छेद 124(3) राष्ट्रपति की राय में एक ‘प्रतिष्ठित विधिवेत्ता’ को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करने की अनुमति देता है।
कारण (R): संविधान सभा का उद्देश्य सर्वोच्च न्यायालय की पीठ में पेशेवर पृष्ठभूमि में विविधता लाना था।

  1. A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
  4. A असत्य है, लेकिन R सत्य है।

उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि अनुच्छेद 124(3) में ‘प्रतिष्ठित विधिवेत्ता’ का प्रावधान स्पष्ट रूप से उल्लिखित है। कारण (R) भी सही है क्योंकि संविधान सभा की बहसों से पता चलता है कि इस प्रावधान को शामिल करने का मुख्य उद्देश्य न्यायिक नियुक्तियों में विविधता लाना था। कारण (R) अभिकथन (A) की सही व्याख्या करता है क्योंकि विविधता लाने का उद्देश्य ही इस प्रावधान को शामिल करने का कारण था।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत के संविधान के अनुच्छेद 124(3) में ‘प्रतिष्ठित विधिवेत्ता’ के रूप में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के प्रावधान पर चर्चा करें। यह प्रावधान अब तक अप्रयुक्त क्यों रहा है और इसके उपयोग से भारतीय न्यायपालिका को क्या लाभ हो सकते हैं? (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** अनुच्छेद 124(3) और ‘प्रतिष्ठित विधिवेत्ता’ प्रावधान का संक्षिप्त परिचय।
2. **प्रावधान का विवरण:** संविधान में ‘प्रतिष्ठित विधिवेत्ता’ की श्रेणी का उल्लेख, इसकी परिभाषा का अभाव और संविधान निर्माताओं का मूल उद्देश्य (संविधान सभा की बहस, एच.वी. कामथ, एम. अनंतशयनम आयंगर के विचार, फेलिक्स फ्रैंकफर्टर का उदाहरण)।
3. **अप्रयुक्त रहने के कारण:**
* ‘प्रतिष्ठित विधिवेत्ता’ की स्पष्ट परिभाषा का अभाव।
* न्यायाधीशों की नियुक्ति में कॉलेजियम प्रणाली का प्रभुत्व।
* कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच संभावित गतिरोध या हितों का टकराव।
* न्यायिक सेवा और कानूनी पेशे से बाहर के व्यक्तियों को नियुक्त करने में अनिच्छा या संदेह।
4. **संभावित लाभ:**
* न्यायपालिका में विविधता लाना (विभिन्न पृष्ठभूमि, अकादमिक विशेषज्ञता)।
* कानून के विकास में अकादमिक दृष्टिकोण का समावेश।
* न्यायिक संयम और न्यायिक सक्रियता के सिद्धांतों को संतुलित करने में मदद।
* न्यायिक समीक्षा और संवैधानिक व्याख्या को समृद्ध करना।
* कानूनी शिक्षा और अनुसंधान को प्रोत्साहन।
5. **निष्कर्ष:** प्रावधान के महत्व को रेखांकित करते हुए, इसके उपयोग की संभावनाओं और चुनौतियों पर संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करना।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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