01 Sep खरीफ 2026: बुवाई क्षेत्र में गिरावट, धान-धान उत्पादन पर असर, जानिए राज्यवार स्थिति
✎ 28 अगस्त 2026 तक की रिपोर्ट के अनुसार, खरीफ फसलों के कुल बुवाई क्षेत्र में पिछले वर्ष की तुलना में 18.91 लाख हेक्टेयर की कमी आई है, जिसमें चावल, श्री अन्न और तिलहन के क्षेत्र में गिरावट मुख्य कारक रहे, जबकि दलहन के क्षेत्र में…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भूगोल (भारत का भूगोल, कृषि) | GS Paper III — अर्थव्यवस्था (कृषि एवं संबंधित क्षेत्र, खाद्य सुरक्षा)
- Prelims: खरीफ फसलें, बुवाई क्षेत्र, चावल उत्पादन, दलहन उत्पादन, तिलहन उत्पादन, श्री अन्न (मोटे अनाज)
- Essay: भारत में कृषि क्षेत्र की चुनौतियाँ और अवसर, खाद्य सुरक्षा में खरीफ फसलों का महत्व
त्वरित पुनरावृत्ति: 28 अगस्त 2026 तक की रिपोर्ट के अनुसार, खरीफ फसलों के कुल बुवाई क्षेत्र में पिछले वर्ष की तुलना में 18.91 लाख हेक्टेयर की कमी आई है, जिसमें चावल, श्री अन्न और तिलहन के क्षेत्र में गिरावट मुख्य कारक रहे, जबकि दलहन के क्षेत्र में वृद्धि दर्ज की गई है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने 28 अगस्त 2026 तक खरीफ फसलों के लिए बुवाई क्षेत्र की प्रगतिशील रिपोर्ट जारी की है। यह रिपोर्ट विभिन्न खरीफ फसलों जैसे चावल, दालें, श्री अन्न (मोटे अनाज), तिलहन, गन्ना, जूट और कपास के बुवाई क्षेत्र में हुए परिवर्तनों को दर्शाती है, जो देश की कृषि स्थिति और खाद्य सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।
पृष्ठभूमि
- खरीफ फसलें वे फसलें हैं जिनकी बुवाई मानसून के आगमन के साथ जून-जुलाई में की जाती है और कटाई सितंबर-अक्टूबर में होती है।
- चावल भारत की प्रमुख खरीफ फसल है और देश की खाद्य सुरक्षा में इसका महत्वपूर्ण योगदान है।
- दलहन फसलें प्रोटीन का महत्वपूर्ण स्रोत हैं और मृदा उर्वरता बढ़ाने में सहायक होती हैं।
- श्री अन्न (मोटे अनाज) जैसे ज्वार, बाजरा, रागी आदि पोषण सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन के प्रति लचीलेपन के लिए महत्वपूर्ण हैं।
- तिलहन फसलें खाद्य तेलों का प्रमुख स्रोत हैं और भारत की खाद्य तेल आत्मनिर्भरता के लिए आवश्यक हैं।
- सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और विभिन्न योजनाओं के माध्यम से किसानों को खरीफ फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित करती है।
खरीफ फसलों का महत्व और वर्तमान स्थिति
- चावल: कुल बुवाई क्षेत्र में 14.36 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई है, जो पिछले वर्ष के 428.46 लाख हेक्टेयर की तुलना में 414.10 लाख हेक्टेयर रहा। कर्नाटक, तेलंगाना और झारखंड में सर्वाधिक कमी देखी गई।
- दलहन: कुल बुवाई क्षेत्र में 1.39 लाख हेक्टेयर की वृद्धि हुई है, जो पिछले वर्ष के 113.66 लाख हेक्टेयर की तुलना में 115.05 लाख हेक्टेयर हो गया है। उत्तर प्रदेश, झारखंड और तेलंगाना में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।
- श्री अन्न (मोटे अनाज): बुवाई क्षेत्र में 4.21 लाख हेक्टेयर की कमी आई है, जो पिछले वर्ष के 182.11 लाख हेक्टेयर की तुलना में 177.90 लाख हेक्टेयर रहा। कर्नाटक और महाराष्ट्र में सर्वाधिक कमी देखी गई।
- तिलहन: कुल बुवाई क्षेत्र में 1.00 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई है, जो पिछले वर्ष के 191.45 लाख हेक्टेयर की तुलना में 190.45 लाख हेक्टेयर रहा।
- गन्ना: बुवाई क्षेत्र में 0.41 लाख हेक्टेयर की कमी हुई है।
- जूट और मेस्ता: बुवाई क्षेत्र में 0.10 लाख हेक्टेयर की वृद्धि हुई है।
- कुल खरीफ बुवाई क्षेत्र में 18.91 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई है, जो पिछले वर्ष के 1090.01 लाख हेक्टेयर की तुलना में 1071.10 लाख हेक्टेयर रहा।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| खरीफ बुवाई क्षेत्र की साप्ताहिक रिपोर्ट | यह रिपोर्ट खरीफ फसलों की बुवाई के रुझानों का एक महत्वपूर्ण संकेतक है, जो कृषि क्षेत्र के प्रदर्शन और खाद्य सुरक्षा पर प्रभाव डालती है। |
| धान के बुवाई क्षेत्र में कमी | धान भारत की प्रमुख खरीफ फसल है। इसके बुवाई क्षेत्र में कमी खाद्य सुरक्षा, चावल के निर्यात और किसानों की आय को प्रभावित कर सकती है। |
| दलहन के बुवाई क्षेत्र में वृद्धि | दलहन प्रोटीन का एक महत्वपूर्ण स्रोत है और इसकी वृद्धि भारत की पोषण सुरक्षा के लिए सकारात्मक है। यह दालों के आयात पर निर्भरता कम करने में भी सहायक है। |
| श्री अन्न (मोटे अनाज) के बुवाई क्षेत्र में कमी | मोटे अनाज पोषण सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन के प्रति लचीलेपन के लिए महत्वपूर्ण हैं। इनके क्षेत्र में कमी पोषण संबंधी चुनौतियों को बढ़ा सकती है। |
| तिलहन के बुवाई क्षेत्र में कमी | तिलहन खाद्य तेलों का मुख्य स्रोत है। इसके क्षेत्र में कमी से खाद्य तेलों के आयात पर निर्भरता बढ़ सकती है और घरेलू कीमतों पर दबाव पड़ सकता है। |
| राज्य-वार भिन्नता | विभिन्न राज्यों में बुवाई क्षेत्र में वृद्धि या कमी क्षेत्रीय कृषि नीतियों, जलवायु परिस्थितियों और किसानों की प्राथमिकताओं को दर्शाती है। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- खरीफ फसलों का उत्पादन भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार है, जो लाखों किसानों की आजीविका को प्रभावित करता है।
- धान, दलहन और तिलहन जैसी प्रमुख फसलों के उत्पादन में उतार-चढ़ाव खाद्य मुद्रास्फीति (Food Inflation) और व्यापार संतुलन (Trade Balance) को सीधे प्रभावित करता है।
- कृषि क्षेत्र का प्रदर्शन सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में इसके योगदान के माध्यम से समग्र आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) को प्रभावित करता है।
खाद्य सुरक्षा और पोषण
- धान के उत्पादन में कमी से चावल की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है, जिससे खाद्य सुरक्षा संबंधी चिंताएँ बढ़ सकती हैं।
- दलहन के क्षेत्र में वृद्धि प्रोटीन की उपलब्धता सुनिश्चित करने और कुपोषण (Malnutrition) से निपटने में सहायक है।
- मोटे अनाज (श्री अन्न) के बुवाई क्षेत्र में कमी पोषण सुरक्षा के प्रयासों को बाधित कर सकती है, विशेषकर ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में।
कृषि नीति और योजना
- यह रिपोर्ट सरकार को कृषि नीतियों, जैसे न्यूनतम समर्थन मूल्य (Minimum Support Price – MSP) और फसल विविधीकरण (Crop Diversification) कार्यक्रमों की प्रभावशीलता का आकलन करने में मदद करती है।
- बुवाई के रुझान के आधार पर, सरकार सिंचाई सुविधाओं, बीज वितरण और ऋण उपलब्धता जैसी योजनाओं को समायोजित कर सकती है।
- यह डेटा कृषि अनुसंधान और विकास (Research and Development) के लिए प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की पहचान करने में भी महत्वपूर्ण है।
चुनौतियाँ
1. जलवायु परिवर्तन और मौसम संबंधी अनिश्चितताएँ
- अनियमित मानसून, सूखे की स्थिति और अप्रत्याशित वर्षा पैटर्न खरीफ फसलों की बुवाई और उपज को सीधे प्रभावित करते हैं।
- जलवायु परिवर्तन के कारण कीटों और बीमारियों का प्रकोप भी बढ़ रहा है, जिससे फसल हानि हो रही है।
यूपीएससी लिंक: कृषि, जलवायु परिवर्तन, आपदा प्रबंधन
2. जल संसाधनों का अभाव
- कई क्षेत्रों में सिंचाई के लिए पर्याप्त जल की अनुपलब्धता, विशेषकर मानसून की कमी वाले वर्षों में, बुवाई क्षेत्र को सीमित करती है।
- भूजल स्तर में गिरावट और जल-गहन फसलों पर अत्यधिक निर्भरता दीर्घकालिक जल सुरक्षा के लिए खतरा है।
यूपीएससी लिंक: जल संसाधन, सिंचाई, कृषि
3. फसल विविधीकरण का अभाव
- किसानों का पारंपरिक रूप से कुछ प्रमुख फसलों, जैसे धान, पर अत्यधिक निर्भर रहना, अन्य फसलों के लिए बुवाई क्षेत्र को कम करता है, जिससे जोखिम बढ़ता है।
- सरकार द्वारा फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने के प्रयासों के बावजूद, व्यवहार में इसे लागू करना एक चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: कृषि पद्धतियाँ, फसल पैटर्न
4. बाजार और मूल्य संबंधी चुनौतियाँ
- फसलों के लिए लाभकारी मूल्य न मिलना किसानों को वैकल्पिक फसलों की ओर बढ़ने से हतोत्साहित करता है।
- बाजार तक पहुँच की कमी, भंडारण सुविधाओं का अभाव और कटाई के बाद के नुकसान (Post-harvest Losses) किसानों की आय को प्रभावित करते हैं।
यूपीएससी लिंक: कृषि विपणन, किसानों की आय
5. कृषि ऋण और बीमा की पहुँच
- छोटे और सीमांत किसानों के लिए संस्थागत ऋण (Institutional Credit) तक पहुँच एक बड़ी चुनौती बनी हुई है, जिससे वे उन्नत कृषि तकनीकों को अपनाने में असमर्थ रहते हैं।
- फसल बीमा योजनाओं का सीमित कवरेज और जटिल प्रक्रियाएँ किसानों को प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान से पर्याप्त सुरक्षा प्रदान नहीं करती हैं।
यूपीएससी लिंक: कृषि वित्त, बीमा योजनाएँ
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| धान के बुवाई क्षेत्र में कमी | खाद्य सुरक्षा पर संभावित प्रभाव, चावल के निर्यात में कमी, किसानों की आय पर नकारात्मक असर। |
| श्री अन्न (मोटे अनाज) के क्षेत्र में कमी | पोषण सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव, जलवायु परिवर्तन के प्रति कृषि की संवेदनशीलता में वृद्धि। |
| तिलहन के क्षेत्र में कमी | खाद्य तेलों के आयात पर निर्भरता में वृद्धि, घरेलू बाजार में कीमतों पर दबाव। |
| राज्य-वार असमानताएँ | कुछ राज्यों में कृषि संकट की संभावना, क्षेत्रीय असंतुलन और विकास संबंधी असमानताएँ। |
| मौसम संबंधी अनिश्चितताएँ | फसल उत्पादन में अस्थिरता, किसानों के लिए आय का जोखिम, कृषि क्षेत्र की भेद्यता। |
| जल-गहन फसलों पर निर्भरता | जल संसाधनों पर अत्यधिक दबाव, भूजल स्तर में गिरावट, कृषि की दीर्घकालिक स्थिरता के लिए खतरा। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY)
- परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY)
- राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (NFSM)
- राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY)
- प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY)
आगे की राह
- जलवायु-लचीली कृषि पद्धतियों (Climate-Resilient Agricultural Practices) को बढ़ावा देना, जिसमें सूखे और बाढ़ प्रतिरोधी फसल किस्मों का उपयोग शामिल है।
- जल-कुशल सिंचाई तकनीकों (Water-Efficient Irrigation Techniques) जैसे ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई को व्यापक रूप से अपनाना और वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) को प्रोत्साहित करना।
- फसल विविधीकरण को बढ़ावा देना, विशेष रूप से धान जैसे जल-गहन फसलों से मोटे अनाज, दलहन और तिलहन जैसी कम जल-गहन फसलों की ओर बदलाव को प्रोत्साहित करना।
- किसानों को उन्नत बीज, उर्वरक और कृषि मशीनरी तक पहुँच प्रदान करने के लिए कृषि ऋण और सब्सिडी की उपलब्धता में सुधार करना।
- कृषि बाजार अवसंरचना (Agricultural Market Infrastructure) को मजबूत करना, जिसमें भंडारण सुविधाएँ, कोल्ड चेन और ई-नाम (e-NAM) जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म शामिल हैं, ताकि किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य मिल सके।
- फसल बीमा योजनाओं को अधिक प्रभावी और सुलभ बनाना, ताकि प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान के खिलाफ किसानों को पर्याप्त सुरक्षा मिल सके।
- कृषि अनुसंधान और विस्तार सेवाओं (Agricultural Research and Extension Services) को मजबूत करना ताकि किसानों तक नवीनतम कृषि तकनीकों और प्रथाओं का प्रसार हो सके।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
खरीफ फसलें · फसल विविधीकरण · कृषि उत्पादन · खाद्य सुरक्षा · न्यूनतम समर्थन मूल्य · जलवायु परिवर्तन · कृषि नीतियां · सिंचाई · कृषि क्षेत्र की चुनौतियाँ · किसानों की आय
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- [‘अनुच्छेद 38’, ‘राज्य लोक कल्याण की अभिवृद्धि का प्रयास करेगा।’]
- [‘अनुच्छेद 39’, ‘राज्य अपनी नीति का विशेषतः संचालन करेगा कि सभी नागरिकों को आजीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त हों।’]
- [‘अनुच्छेद 46’, ‘राज्य जनता के दुर्बल वर्गों के, विशेषकर अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के, शैक्षिक और आर्थिक हितों की विशेष सावधानी से अभिवृद्धि करेगा।’]
- [‘अनुच्छेद 47’, ‘राज्य पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊँचा करने तथा लोक स्वास्थ्य में सुधार करने को अपना प्राथमिक कर्तव्य मानेगा।’]
- [‘सातवीं अनुसूची’, ‘कृषि राज्य सूची का विषय है, केंद्र भी इसमें भूमिका निभाता है।’]
अवधारणा प्रवाह
मानसून की अनियमितता या कमी → बुवाई क्षेत्र में कमी या बदलाव → फसल उत्पादन में उतार-चढ़ाव → खाद्य सुरक्षा और किसानों की आय पर प्रभाव → कृषि नीतियों और योजनाओं का पुनर्मूल्यांकन → दीर्घकालिक कृषि स्थिरता और संवृद्धि
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. खरीफ फसलों की बुवाई मुख्य रूप से दक्षिण-पश्चिम मानसून के आगमन के साथ होती है।
2. धान, बाजरा और मक्का प्रमुख खरीफ फसलें हैं।
3. भारत में कुल दलहन उत्पादन में खरीफ दलहन का योगदान रबी दलहन से अधिक है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 और 2 सही हैं। खरीफ फसलें मानसून पर निर्भर करती हैं और धान, बाजरा, मक्का इसकी प्रमुख फसलें हैं। कथन 3 गलत है क्योंकि भारत में रबी दलहन का उत्पादन खरीफ दलहन से अधिक होता है।
Q2. कथन (A): भारत में हाल के वर्षों में धान के बुवाई क्षेत्र में कमी देखी गई है।
कारण (R): धान की खेती में कमी का एक प्रमुख कारण कर्नाटक, तेलंगाना और झारखंड जैसे राज्यों में वर्षा की कमी या अनियमितता है।
- A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सही है, लेकिन R गलत है।
- A गलत है, लेकिन R सही है।
उत्तर: A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — दिए गए आंकड़ों के अनुसार, धान के बुवाई क्षेत्र में कमी आई है और रिपोर्ट में कर्नाटक, तेलंगाना, झारखंड आदि राज्यों में कमी का उल्लेख किया गया है, जो वर्षा की अनियमितता से जुड़ा हो सकता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत में खरीफ फसलों के बुवाई क्षेत्र में हालिया रुझानों का विश्लेषण कीजिए। इन रुझानों को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों और खाद्य सुरक्षा पर इनके संभावित प्रभावों पर चर्चा कीजिए। (15 अंक)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: खरीफ फसलों का महत्व और वर्तमान रिपोर्ट का संक्षिप्त उल्लेख।
2. हालिया रुझानों का विश्लेषण:
क. धान, दलहन, श्री अन्न (मोटे अनाज) और तिलहन के बुवाई क्षेत्र में वृद्धि/कमी के आंकड़े प्रस्तुत करना। (जैसे धान में कमी, दलहन में वृद्धि, मोटे अनाज और तिलहन में कमी)
ख. प्रमुख राज्यों का उल्लेख जहां ये परिवर्तन देखे गए हैं।
3. रुझानों को प्रभावित करने वाले कारक:
क. जलवायु परिवर्तन और मौसमी वर्षा पैटर्न (मानसून की अनियमितता, सूखे की स्थिति)।
ख. न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और सरकारी नीतियां।
ग. फसल विविधीकरण के प्रयास।
घ. सिंचाई सुविधाओं की उपलब्धता।
ङ. किसानों की प्राथमिकताएं और बाजार की मांग।
च. कीट और रोग का प्रकोप।
4. खाद्य सुरक्षा पर संभावित प्रभाव:
क. धान जैसी प्रमुख फसल में कमी से राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा पर दबाव।
ख. दलहन उत्पादन में वृद्धि से प्रोटीन की उपलब्धता और आयात पर निर्भरता में कमी।
ग. मोटे अनाज में कमी से पोषण सुरक्षा पर प्रभाव।
घ. तिलहन में कमी से खाद्य तेलों के आयात पर निर्भरता में वृद्धि।
5. निष्कर्ष: इन चुनौतियों से निपटने के लिए आवश्यक सरकारी हस्तक्षेप और दीर्घकालिक रणनीतियों का सुझाव (जैसे जलवायु-लचीली कृषि, सिंचाई का विस्तार, अनुसंधान एवं विकास)।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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