तमिलनाडु विधेयक: गैर-योजना क्षेत्रों में आर्द्रभूमि विकास के लिए कलेक्टर की सहमति हटाने का प्रस्ताव

Tamil Nadu moves Bill to do away with Collector’s concurrence for wetland development in non-planning areas — diagram

तमिलनाडु विधेयक: गैर-योजना क्षेत्रों में आर्द्रभूमि विकास के लिए कलेक्टर की सहमति हटाने का प्रस्ताव

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✎ तमिलनाडु टाउन एंड कंट्री प्लानिंग एक्ट में प्रस्तावित संशोधन का उद्देश्य गैर-योजना क्षेत्रों में आर्द्रभूमि विकास के लिए जिला कलेक्टर की पूर्व सहमति की आवश्यकता को समाप्त करना है, जिससे नियोजन अनुमति प्रक्रियाओं में तेजी लाई जा…

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — शासन, संविधान और राजव्यवस्था  |  GS Paper III — पर्यावरण और आपदा प्रबंधन
  • Prelims: आर्द्रभूमि (Wetlands), टाउन एंड कंट्री प्लानिंग एक्ट, जिला कलेक्टर की भूमिका, शहरी विकास प्राधिकरण, पर्यावरण संरक्षण, स्थानीय स्वशासन
  • Essay: सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन, भारत में शहरी नियोजन की चुनौतियाँ और समाधान

त्वरित पुनरावृत्ति: तमिलनाडु टाउन एंड कंट्री प्लानिंग एक्ट में प्रस्तावित संशोधन का उद्देश्य गैर-योजना क्षेत्रों में आर्द्रभूमि विकास के लिए जिला कलेक्टर की पूर्व सहमति की आवश्यकता को समाप्त करना है, जिससे नियोजन अनुमति प्रक्रियाओं में तेजी लाई जा सके।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

तमिलनाडु विधानसभा में तमिलनाडु टाउन एंड कंट्री प्लानिंग एक्ट, 1971 में संशोधन के लिए एक विधेयक पेश किया गया है। इस विधेयक का उद्देश्य गैर-योजना क्षेत्रों (non-planning areas) में आर्द्रभूमि (wetlands) के विकास के लिए जिला कलेक्टर की पूर्व सहमति की आवश्यकता को समाप्त करना और स्थानीय प्राधिकरण को ऐसी आर्द्रभूमि के संबंध में पूर्व अनुमति देने के लिए निदेशक को सशक्त बनाना है। इसके अतिरिक्त, विधेयक शहरी विकास प्राधिकरण में पूर्णकालिक अध्यक्ष और सदस्य-सचिव की नियुक्ति का भी प्रावधान करता है।

पृष्ठभूमि

  • तमिलनाडु टाउन एंड कंट्री प्लानिंग एक्ट, 1971 राज्य में शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के नियोजन और विकास को विनियमित करता है।
  • तमिलनाडु अधिनियम 35, 1972 की धारा 47-ए का उप-खंड (2) यह अनिवार्य करता है कि स्थानीय प्राधिकरण गैर-योजना क्षेत्रों में भूमि के विकास के लिए अनुमति देने से पहले निदेशक की पूर्व सहमति प्राप्त करें।
  • आर्द्रभूमि के मामले में, विकास की अनुमति देने से पहले जिला कलेक्टर की पूर्व सहमति भी आवश्यक है।
  • आवास और शहरी विकास मंत्री बी. राजकुमार के अनुसार, जिला कलेक्टर की पूर्व सहमति की आवश्यकता से नियोजन अनुमति आवेदनों के प्रसंस्करण और निपटान में अनावश्यक देरी होती थी।
  • आर्द्रभूमि पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं जो जैव विविधता संरक्षण, जल विनियमन और जलवायु परिवर्तन शमन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • शहरीकरण और बुनियादी ढाँचा विकास के दबाव के कारण आर्द्रभूमि पर अतिक्रमण और उनके क्षरण का खतरा बढ़ गया है।
  • भारत में आर्द्रभूमि संरक्षण के लिए रामसर कन्वेंशन और आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 जैसे राष्ट्रीय कानून और अंतर्राष्ट्रीय समझौते मौजूद हैं।

आर्द्रभूमि (Wetlands) और उनका महत्व

  • आर्द्रभूमि ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ पानी पर्यावरण और संबंधित पौधों और जानवरों के जीवन को नियंत्रित करने वाला प्राथमिक कारक है। इनमें दलदल, कच्छभूमि, पीटभूमि और पानी के क्षेत्र शामिल हैं, चाहे वे प्राकृतिक हों या कृत्रिम, स्थायी हों या अस्थायी, स्थिर हों या बहते हों, ताजे, खारे या नमकीन पानी के हों।
  • ये पारिस्थितिक तंत्र पृथ्वी पर सबसे अधिक उत्पादक हैं और जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण आवास प्रदान करते हैं, जिनमें कई लुप्तप्राय प्रजातियाँ शामिल हैं।
  • आर्द्रभूमि बाढ़ नियंत्रण, भूजल पुनर्भरण, जल शुद्धिकरण, तटरेखा स्थिरीकरण और कटाव नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
  • ये क्षेत्र कार्बन पृथक्करण (carbon sequestration) के माध्यम से जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में भी मदद करते हैं।
  • आर्द्रभूमि स्थानीय समुदायों के लिए आजीविका के स्रोत (जैसे मछली पकड़ना, कृषि) और पर्यटन तथा मनोरंजन के अवसर भी प्रदान करती हैं।
  • भारत में आर्द्रभूमि संरक्षण के लिए आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 लागू हैं, जो विभिन्न गतिविधियों को विनियमित करते हैं और आर्द्रभूमि के पारिस्थितिक चरित्र को बनाए रखने का लक्ष्य रखते हैं।
  • रामसर कन्वेंशन (Ramsar Convention) आर्द्रभूमि के संरक्षण और स्थायी उपयोग के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय संधि है, जिसमें भारत भी एक हस्ताक्षरकर्ता देश है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
कलेक्टर की सहमति की अनिवार्यता समाप्त गैर-योजना क्षेत्रों में आर्द्रभूमि विकास परियोजनाओं के लिए योजना अनुमति प्राप्त करने में होने वाली अनावश्यक देरी को कम करेगा।
निदेशक को सशक्त बनाना स्थानीय प्राधिकरणों को आर्द्रभूमि के संबंध में पूर्व अनुमति देने का अधिकार अब निदेशक के पास होगा, जिससे प्रक्रिया सुव्यवस्थित होगी।
शहरी विकास प्राधिकरण में पूर्णकालिक अध्यक्ष और सदस्य-सचिव शहरी नियोजन, बुनियादी ढांचा विकास और शहरी संवृद्धि के विनियमन में अधिक ध्यान, निरंतरता और जवाबदेही सुनिश्चित करेगा।
जिला कलेक्टर का प्राधिकरण के सदस्य के रूप में बने रहना जिला प्रशासन के साथ प्रभावी समन्वय सुनिश्चित करेगा, जिससे विकास परियोजनाओं का सुचारु क्रियान्वयन हो सके।
तमिलनाडु नगर तथा ग्राम नियोजन अधिनियम, 1971 में संशोधन राज्य के शहरी और ग्रामीण विकास के लिए नियामक ढांचे को अद्यतन करेगा, जिससे विकास प्रक्रियाओं में दक्षता आएगी।

महत्व

शासन और प्रशासन

  • यह विधेयक योजना अनुमति प्रक्रियाओं को सरल बनाकर ‘ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस’ (Ease of Doing Business) को बढ़ावा देगा, जिससे निवेशकों और डेवलपर्स को लाभ होगा।
  • निर्णय लेने की प्रक्रिया में तेजी आएगी, जिससे शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में आवश्यक बुनियादी ढांचा परियोजनाओं का समय पर क्रियान्वयन सुनिश्चित होगा।
  • शहरी विकास प्राधिकरण को पूर्णकालिक नेतृत्व प्रदान करके, यह विधेयक संस्थागत क्षमता को मजबूत करेगा और दीर्घकालिक नियोजन पर अधिक ध्यान केंद्रित करेगा।

पर्यावरण और पारिस्थितिकी

  • हालांकि विधेयक प्रक्रिया को सरल बनाता है, आर्द्रभूमि (Wetlands) के विकास से संबंधित पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment) और सतत विकास (Sustainable Development) सिद्धांतों का पालन सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है।
  • आर्द्रभूमि पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र हैं जो जैव विविधता (Biodiversity) और जल विनियमन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनके विकास को विनियमित करने वाली नीतियों को पर्यावरण संरक्षण के साथ संतुलित करना आवश्यक है।

आर्थिक विकास

  • विकास परियोजनाओं के लिए अनुमोदन प्रक्रिया में तेजी लाने से निवेश आकर्षित होगा और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा, जिससे रोजगार सृजन हो सकता है।
  • शहरी नियोजन और बुनियादी ढांचे के विकास पर अधिक ध्यान केंद्रित करने से राज्य में समग्र आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) को गति मिल सकती है।

चुनौतियाँ

1. पर्यावरणीय संरक्षण और विकास के बीच संतुलन

  • आर्द्रभूमि पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं। कलेक्टर की सहमति हटाने से इन क्षेत्रों के अनियंत्रित विकास का जोखिम बढ़ सकता है, जिससे जैव विविधता और पारिस्थितिक संतुलन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
  • यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि विकास की गति पर्यावरण संरक्षण के सिद्धांतों का उल्लंघन न करे, विशेषकर जब संवेदनशील आर्द्रभूमि क्षेत्रों की बात हो।

2. स्थानीय प्रशासन की भूमिका में परिवर्तन

  • कलेक्टर की सहमति की अनिवार्यता समाप्त करने से स्थानीय स्तर पर आर्द्रभूमि के प्रबंधन और संरक्षण में जिला प्रशासन की सीधी भूमिका कम हो सकती है।
  • यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि स्थानीय स्तर पर पर्यावरण संबंधी चिंताओं को अभी भी प्रभावी ढंग से संबोधित किया जा सके, भले ही प्रक्रिया केंद्रीकृत हो।

3. निर्णय लेने में पारदर्शिता और जवाबदेही

  • जब निर्णय लेने की शक्ति एक ही प्राधिकरण में केंद्रित होती है, तो पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण हो जाता है।
  • यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि आर्द्रभूमि विकास की अनुमति देने की प्रक्रिया में सभी हितधारकों की भागीदारी हो और पर्यावरणीय नियमों का सख्ती से पालन किया जाए।

4. शहरी नियोजन और भूमि उपयोग का प्रबंधन

  • गैर-योजना क्षेत्रों में आर्द्रभूमि का विकास शहरी नियोजन के व्यापक ढांचे के भीतर होना चाहिए ताकि अनियोजित शहरीकरण और भूमि उपयोग संघर्षों से बचा जा सके।
  • यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि विकास योजनाएं दीर्घकालिक शहरी संवृद्धि और पर्यावरण संरक्षण के लक्ष्यों के साथ संरेखित हों।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
आर्द्रभूमि संरक्षण कलेक्टर की सहमति हटाने से आर्द्रभूमि के अनियंत्रित विकास का जोखिम बढ़ सकता है, जिससे पारिस्थितिक तंत्र को नुकसान हो सकता है।
पर्यावरणीय प्रभाव विकास परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभावों का पर्याप्त आकलन और शमन सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है, विशेषकर संवेदनशील आर्द्रभूमि क्षेत्रों में।
स्थानीय भागीदारी निर्णय लेने की प्रक्रिया में स्थानीय समुदायों और जिला प्रशासन की भागीदारी सुनिश्चित करना आवश्यक है ताकि स्थानीय चिंताओं को संबोधित किया जा सके।
पारदर्शिता का अभाव जब शक्ति एक प्राधिकरण में केंद्रित होती है, तो यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि अनुमोदन प्रक्रिया पारदर्शी हो और भ्रष्टाचार की गुंजाइश न हो।
अनियोजित विकास गैर-योजना क्षेत्रों में विकास को विनियमित करने के लिए एक मजबूत तंत्र के अभाव में अनियोजित शहरीकरण और भूमि उपयोग संघर्ष हो सकते हैं।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • राष्ट्रीय आर्द्रभूमि संरक्षण और प्रबंधन कार्यक्रम (National Wetland Conservation and Management Programme)

आगे की राह

  • आर्द्रभूमि विकास के लिए एक मजबूत पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) तंत्र स्थापित किया जाए, जो विकास परियोजनाओं को अनुमति देने से पहले उनके पर्यावरणीय प्रभावों का विस्तृत मूल्यांकन करे।
  • पर्यावरण विशेषज्ञों और स्थानीय समुदायों को आर्द्रभूमि विकास परियोजनाओं के अनुमोदन प्रक्रिया में शामिल किया जाए ताकि उनके इनपुट और चिंताओं को संबोधित किया जा सके।
  • आर्द्रभूमि के लिए एक व्यापक राज्य-स्तरीय आर्द्रभूमि नीति (State-level Wetland Policy) विकसित की जाए जो उनके संरक्षण, प्रबंधन और सतत उपयोग के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश प्रदान करे।
  • शहरी विकास प्राधिकरण को सशक्त बनाने के साथ-साथ, यह सुनिश्चित किया जाए कि उसके निर्णय लेने की प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही के उच्च मानक बनाए रखे जाएं।
  • आर्द्रभूमि के महत्व और उनके संरक्षण की आवश्यकता के बारे में जन जागरूकता अभियान चलाए जाएं।
  • आर्द्रभूमि के विकास के लिए एक एकीकृत भूमि उपयोग योजना (Integrated Land Use Planning) दृष्टिकोण अपनाया जाए, जो शहरी नियोजन, पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास के लक्ष्यों को संतुलित करे।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

आर्द्रभूमि संरक्षण · शहरी नियोजन · पर्यावरण शासन · स्थानीय स्वशासन · जिला कलेक्टर की भूमिका · टाउन एंड कंट्री प्लानिंग एक्ट · विकास बनाम पर्यावरण · संघवाद · जवाबदेही · सतत विकास

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘अनुच्छेद 243W’: ‘नगरपालिकाओं की शक्तियाँ, प्राधिकार और उत्तरदायित्व’}
  • {‘अनुच्छेद 243Z’: ‘जिला नियोजन समितियों का गठन’}
  • {‘अनुच्छेद 243ZD’: ‘महानगर नियोजन समितियों का गठन’}
  • {‘अनुच्छेद 48A’: ‘पर्यावरण का संरक्षण और संवर्धन’}
  • {‘अनुच्छेद 51A(g)’: ‘पर्यावरण की रक्षा और सुधार का कर्तव्य’}

अवधारणा प्रवाह

तमिलनाडु नगर तथा ग्राम नियोजन अधिनियम, 1971 में संशोधन का प्रस्ताव  →  गैर-योजना क्षेत्रों में आर्द्रभूमि विकास के लिए कलेक्टर की सहमति की अनिवार्यता समाप्त  →  निदेशक को स्थानीय प्राधिकरणों को पूर्व अनुमति देने का अधिकार  →  शहरी विकास प्राधिकरण में पूर्णकालिक अध्यक्ष और सदस्य-सचिव की नियुक्ति  →  योजना अनुमति प्रक्रियाओं में तेजी और दक्षता  →  आर्थिक विकास को बढ़ावा और पर्यावरणीय संतुलन की चुनौती

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. रामसर अभिसमय (Ramsar Convention) आर्द्रभूमि के संरक्षण और उनके सतत उपयोग के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय संधि है।
2. भारत में आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत अधिसूचित किए गए हैं।
3. किसी क्षेत्र को आर्द्रभूमि घोषित करने का अंतिम अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास होता है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 और 2 सही हैं। रामसर अभिसमय आर्द्रभूमियों के संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय ढाँचा है और भारत में आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत ही अधिसूचित किए गए हैं। कथन 3 गलत है क्योंकि राज्य सरकारें भी अपने अधिकार क्षेत्र में आर्द्रभूमियों की पहचान और विनियमन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, हालांकि केंद्र सरकार के नियम एक व्यापक ढाँचा प्रदान करते हैं।

Q2. अभिकथन (A): शहरी विकास प्राधिकरणों में पूर्णकालिक अध्यक्ष और सदस्य-सचिव की नियुक्ति से शहरी नियोजन में अधिक निरंतरता और जवाबदेही सुनिश्चित होती है।
कारण (R): स्थानिक नियोजन, अवसंरचना विकास और शहरी संवृद्धि के विनियमन के लिए निरंतर ध्यान और समय पर निर्णय लेने की आवश्यकता होती है।

  1. A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सही है, लेकिन R गलत है।
  4. A गलत है, लेकिन R सही है।

उत्तर: A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि पूर्णकालिक नियुक्तियाँ कार्य में अधिक समर्पण और निरंतरता लाती हैं। कारण (R) भी सही है क्योंकि शहरी नियोजन के कार्यों की प्रकृति ऐसी है कि उन्हें निरंतर और समर्पित ध्यान की आवश्यकता होती है। कारण (R) अभिकथन (A) की सही व्याख्या करता है क्योंकि इन्हीं आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पूर्णकालिक नियुक्तियाँ की जाती हैं।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ आर्द्रभूमि संरक्षण के संदर्भ में, स्थानीय अधिकारियों और जिला प्रशासन के बीच शक्तियों के वितरण से संबंधित हालिया विधायी परिवर्तनों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। क्या ये परिवर्तन पर्यावरण शासन को मजबूत करते हैं या कमजोर करते हैं? (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: आर्द्रभूमि के महत्व और उनके संरक्षण की आवश्यकता का संक्षिप्त उल्लेख। तमिलनाडु टाउन एंड कंट्री प्लानिंग एक्ट, 1971 में प्रस्तावित संशोधन का संदर्भ दें, जिसमें गैर-नियोजन क्षेत्रों में आर्द्रभूमि विकास के लिए जिला कलेक्टर की सहमति की आवश्यकता को समाप्त करने का प्रावधान है।
2. प्रस्तावित परिवर्तनों का विवरण: बिल के मुख्य प्रावधानों को स्पष्ट करें, जैसे जिला कलेक्टर की सहमति को समाप्त करना और निदेशक को अनुमति देने का अधिकार देना। शहरी विकास प्राधिकरण में पूर्णकालिक अध्यक्ष और सदस्य-सचिव की नियुक्ति का भी उल्लेख करें।
3. परिवर्तनों के पक्ष में तर्क: देरी कम करने, निर्णय प्रक्रिया में तेजी लाने, विशेषज्ञता और निरंतरता सुनिश्चित करने जैसे तर्कों पर चर्चा करें, जैसा कि सरकार द्वारा प्रस्तुत किया गया है।
4. परिवर्तनों के विपक्ष में तर्क/चिंताएँ: पर्यावरण संरक्षण पर संभावित नकारात्मक प्रभाव, स्थानीय स्तर पर जिला कलेक्टर की भूमिका के महत्व (जो स्थानीय पारिस्थितिकी और समुदाय से परिचित होता है), जवाबदेही में कमी की संभावना, और पर्यावरण नियमों के संभावित उल्लंघन पर प्रकाश डालें।
5. पर्यावरण शासन पर प्रभाव का विश्लेषण: इस बात का विश्लेषण करें कि ये परिवर्तन पर्यावरण शासन (Environmental Governance) को कैसे प्रभावित कर सकते हैं। क्या यह विकेन्द्रीकरण है या शक्तियों का केंद्रीकरण? क्या यह संरक्षण को प्राथमिकता देता है या विकास को? न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) और सतत विकास (Sustainable Development) के सिद्धांतों का उल्लेख करें।
6. निष्कर्ष: एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करें। यह सुझाव दें कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन आवश्यक है, और किसी भी विधायी परिवर्तन को दोनों उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए सावधानीपूर्वक विचार करना चाहिए। प्रभावी निगरानी और प्रवर्तन तंत्र के महत्व पर जोर दें।

स्रोत: The Hindu

Tamil Nadu PCS (TNPSC) — राज्य PCS अभ्यास

Prelims: तमिलनाडु सरकार द्वारा प्रस्तुत विधेयक के अनुसार, गैर-नियोजन क्षेत्रों में आर्द्रभूमि विकास के लिए किस अधिकारी की सहमति अब आवश्यक नहीं होगी?

  1. जिला कलेक्टर
  2. राजस्व विभाग के आयुक्त
  3. नगर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष
  4. पर्यावरण विभाग के सचिव

उत्तर: जिला कलेक्टर — विधेयक के अनुसार, गैर-नियोजन क्षेत्रों में आर्द्रभूमि विकास के लिए जिला कलेक्टर की सहमति अब आवश्यक नहीं होगी।

Mains: तमिलनाडु सरकार द्वारा प्रस्तुत ‘आर्द्रभूमि संरक्षण विधेयक, 2023’ के प्रमुख प्रावधानों का वर्णन करते हुए बताइए कि यह विधेयक राज्य की आर्द्रभूमि संरक्षण एवं विकास नीति को किस प्रकार प्रभावित करेगा।


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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