01 Sep तीन उच्च न्यायालयों में नए मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति: राजस्थान, मध्य प्रदेश, जम्मू-कश्मीर-लद्दाख में बदलाव
✎ उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और संबंधित राज्य के राज्यपाल के परामर्श से, कॉलेजियम प्रणाली की सिफारिशों के आधार पर की जाती है, जो न्यायिक स्वतंत्रता का एक…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान: महत्वपूर्ण प्रावधान, कार्यप्रणाली, संघ और राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व, न्यायपालिका की संरचना, संगठन और कार्यप्रणाली
- Prelims: उच्च न्यायालय, मुख्य न्यायाधीश, कॉलेजियम प्रणाली, न्यायिक नियुक्तियाँ, भारत का संविधान, अनुच्छेद 217, न्यायिक स्वतंत्रता
- Essay: भारतीय न्यायपालिका की स्वतंत्रता और जवाबदेही, संविधान की मूल संरचना और न्यायिक नियुक्तियों में उसकी भूमिका
त्वरित पुनरावृत्ति: उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और संबंधित राज्य के राज्यपाल के परामर्श से, कॉलेजियम प्रणाली की सिफारिशों के आधार पर की जाती है, जो न्यायिक स्वतंत्रता का एक महत्वपूर्ण पहलू है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) कॉलेजियम ने तीन उच्च न्यायालयों (High Courts) – राजस्थान, मध्य प्रदेश और जम्मू-कश्मीर व लद्दाख – के लिए नए मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति की सिफारिश की है। इन सिफारिशों पर संवैधानिक प्रक्रिया के तहत सरकार को निर्णय लेना है, जिसके बाद नियुक्तियाँ प्रभावी होंगी।
पृष्ठभूमि
- भारत के संविधान के तहत, न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए न्यायाधीशों की नियुक्ति एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है।
- उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, जिसमें उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और संबंधित राज्य के राज्यपाल से परामर्श किया जाता है।
- वर्ष 1993 से, न्यायाधीशों की नियुक्तियों और स्थानांतरण के लिए कॉलेजियम प्रणाली (Collegium System) विकसित हुई है, जिसमें उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और कुछ वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं।
- कॉलेजियम प्रणाली का उद्देश्य न्यायिक नियुक्तियों में कार्यपालिका के हस्तक्षेप को कम करना और न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखना है।
- उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का पद राज्य की न्यायिक प्रणाली में सर्वोच्च होता है और वे संबंधित उच्च न्यायालय के प्रशासनिक और न्यायिक कार्यों का नेतृत्व करते हैं।
- न्यायाधीशों की नियुक्ति में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर समय-समय पर बहस होती रही है, लेकिन कॉलेजियम प्रणाली वर्तमान में प्रभावी तंत्र है।
उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति प्रक्रिया
- उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति भारत के संविधान के अनुच्छेद 217 के तहत की जाती है।
- अनुच्छेद 217(1) के अनुसार, उच्च न्यायालय के प्रत्येक न्यायाधीश (जिसमें मुख्य न्यायाधीश भी शामिल हैं) की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India) और संबंधित राज्य के राज्यपाल (Governor) से परामर्श के बाद की जाती है।
- मुख्य न्यायाधीश के अलावा अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले में, संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से भी परामर्श किया जाता है।
- कॉलेजियम प्रणाली के तहत, उच्चतम न्यायालय का कॉलेजियम (जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश और उच्चतम न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं) उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के नाम की सिफारिश करता है।
- कॉलेजियम द्वारा की गई सिफारिशें केंद्रीय कानून मंत्रालय को भेजी जाती हैं, जो उन्हें प्रधानमंत्री और फिर राष्ट्रपति के पास अंतिम स्वीकृति के लिए भेजता है।
- राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद, नियुक्ति वारंट जारी किया जाता है और संबंधित मुख्य न्यायाधीश अपना पदभार ग्रहण करते हैं।
- यह प्रक्रिया न्यायिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने और योग्य व्यक्तियों को न्यायिक पदों पर नियुक्त करने के लिए डिज़ाइन की गई है।
- कॉलेजियम की सिफारिशें आमतौर पर सरकार द्वारा स्वीकार कर ली जाती हैं, हालांकि कुछ मामलों में सरकार पुनर्विचार के लिए सिफारिशें वापस भेज सकती है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| कॉलेजियम प्रणाली | उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति तथा स्थानांतरण का निर्धारण करती है। |
| मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति | उच्च न्यायालयों के कुशल संचालन और न्यायिक प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण। |
| न्यायिक स्वतंत्रता | न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने में कॉलेजियम की भूमिका। |
| पारदर्शिता का मुद्दा | कॉलेजियम प्रणाली में पारदर्शिता की कमी को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। |
| सरकार की भूमिका | कॉलेजियम की सिफारिशों पर अंतिम निर्णय सरकार द्वारा लिया जाता है, जो संवैधानिक प्रक्रिया का हिस्सा है। |
महत्व
न्यायिक प्रशासन
- उच्च न्यायालयों में मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति से न्यायिक प्रशासन में स्थिरता और निरंतरता आती है।
- मुख्य न्यायाधीश न्यायालय के प्रशासनिक प्रमुख होते हैं और मुकदमों के आवंटन तथा अन्य प्रशासनिक कार्यों की देखरेख करते हैं।
न्यायिक स्वतंत्रता
- कॉलेजियम प्रणाली न्यायिक स्वतंत्रता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, क्योंकि यह कार्यपालिका के हस्तक्षेप को सीमित करती है।
- योग्य और स्वतंत्र न्यायाधीशों की नियुक्ति न्यायपालिका की अखंडता और निष्पक्षता सुनिश्चित करती है।
संघवाद और राज्य न्यायपालिका
- राज्यों के उच्च न्यायालयों में मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति से राज्य स्तर पर न्याय प्रणाली मजबूत होती है।
- यह संघवाद के सिद्धांत को भी दर्शाता है, जहां केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर स्वतंत्र न्यायपालिका कार्य करती है।
चुनौतियाँ
1. कॉलेजियम प्रणाली में पारदर्शिता का अभाव
- कॉलेजियम की बैठकों और निर्णयों की प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी पर अक्सर सवाल उठते हैं।
- यह प्रणाली ‘अपारदर्शी’ होने के आरोपों का सामना करती है, जिससे जनता का विश्वास प्रभावित हो सकता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान: न्यायपालिका
2. नियुक्ति प्रक्रिया में देरी
- कॉलेजियम की सिफारिशों पर सरकार द्वारा निर्णय लेने में अक्सर देरी होती है, जिससे न्यायिक रिक्तियां बनी रहती हैं।
- यह देरी न्याय वितरण प्रणाली को प्रभावित करती है और मुकदमों के बोझ को बढ़ाती है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान: न्यायपालिका की कार्यप्रणाली
3. योग्यता और वरिष्ठता के मानदंड
- मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति में योग्यता और वरिष्ठता के मानदंडों को लेकर बहस होती रहती है।
- कभी-कभी वरिष्ठता को दरकिनार कर नियुक्ति किए जाने पर विवाद उत्पन्न होता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान: न्यायिक नियुक्तियाँ
4. न्यायिक सक्रियता और न्यायिक संयम
- कॉलेजियम के निर्णयों में न्यायिक सक्रियता और न्यायिक संयम के बीच संतुलन बनाए रखना एक चुनौती है।
- कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत का पालन महत्वपूर्ण है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान: शक्ति पृथक्करण
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| कॉलेजियम की कार्यप्रणाली | निर्णय लेने की प्रक्रिया में अस्पष्टता और जवाबदेही की कमी। |
| न्यायिक रिक्तियाँ | नियुक्ति प्रक्रिया में देरी के कारण उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के पद खाली रहना। |
| न्यायिक स्वतंत्रता बनाम जवाबदेही | न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखते हुए उसकी जवाबदेही सुनिश्चित करना। |
| कार्यपालिका-न्यायपालिका संबंध | नियुक्ति प्रक्रिया में दोनों अंगों के बीच संभावित टकराव। |
| बाहरी प्रभाव | नियुक्ति निर्णयों पर बाहरी दबाव या प्रभाव की संभावना। |
आगे की राह
- कॉलेजियम प्रणाली में अधिक पारदर्शिता लाने के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) विकसित की जानी चाहिए।
- न्यायिक नियुक्तियों के लिए एक निश्चित समय-सीमा निर्धारित की जाए ताकि रिक्तियों को समय पर भरा जा सके।
- नियुक्ति प्रक्रिया में योग्यता, अनुभव और अखंडता जैसे मानदंडों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
- न्यायिक नियुक्तियों में कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच परामर्श और सहयोग को बढ़ावा दिया जाए।
- न्यायिक रिक्तियों को कम करने के लिए न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति से पहले ही नियुक्ति प्रक्रिया शुरू की जाए।
- कॉलेजियम के निर्णयों के लिए एक तर्कसंगत आधार और कारणों का सार्वजनिक रूप से खुलासा किया जाना चाहिए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
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संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 124’, ‘note’: ‘सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 217’, ‘note’: ‘उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 222’, ‘note’: ‘एक उच्च न्यायालय से दूसरे में न्यायाधीशों का स्थानांतरण’}
अवधारणा प्रवाह
उच्च न्यायालयों में मुख्य न्यायाधीशों के पद रिक्त होते हैं। → सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम नए मुख्य न्यायाधीशों की सिफारिश करता है। → कॉलेजियम की सिफारिशें सरकार को भेजी जाती हैं। → सरकार संवैधानिक प्रक्रिया के तहत सिफारिशों पर विचार करती है। → राष्ट्रपति द्वारा मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति की जाती है। → नव नियुक्त मुख्य न्यायाधीश पदभार ग्रहण करते हैं और न्यायिक प्रशासन संभालते हैं।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम में भारत के मुख्य न्यायाधीश और सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं।
2. उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और संबंधित राज्य के राज्यपाल के परामर्श से की जाती है।
3. कॉलेजियम प्रणाली का उल्लेख भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124 में स्पष्ट रूप से किया गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम में भारत के मुख्य न्यायाधीश और सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं। कथन 2 भी सही है। उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और संबंधित राज्य के राज्यपाल के परामर्श से की जाती है (अनुच्छेद 217)। कथन 3 गलत है। कॉलेजियम प्रणाली संविधान में स्पष्ट रूप से उल्लिखित नहीं है, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों के माध्यम से विकसित हुई है।
Q2. अभिकथन (A): सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए सिफारिशें करता है।
कारण (R): कॉलेजियम प्रणाली न्यायिक नियुक्तियों में कार्यपालिका के हस्तक्षेप को कम करने के लिए विकसित की गई थी।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सत्य है, क्योंकि कॉलेजियम प्रणाली उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों सहित न्यायिक नियुक्तियों के लिए सिफारिशें करती है। कारण (R) भी सत्य है, क्योंकि कॉलेजियम प्रणाली का विकास न्यायिक नियुक्तियों में कार्यपालिका के अत्यधिक हस्तक्षेप को रोकने और न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से हुआ था। R, A की सही व्याख्या है क्योंकि कॉलेजियम की सिफारिशें इसी उद्देश्य की पूर्ति करती हैं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत में उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। क्या कॉलेजियम प्रणाली न्यायपालिका की स्वतंत्रता और जवाबदेही के बीच संतुलन स्थापित करने में सफल रही है? (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया का संक्षिप्त परिचय, जिसमें संवैधानिक प्रावधान (अनुच्छेद 217) और कॉलेजियम प्रणाली की भूमिका शामिल हो।
2. नियुक्ति प्रक्रिया का आलोचनात्मक परीक्षण: कॉलेजियम प्रणाली के तहत नियुक्ति प्रक्रिया का विस्तृत वर्णन। इसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश और सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों की भूमिका, संबंधित उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों और राज्य के राज्यपाल से परामर्श, और सरकार की अंतिम स्वीकृति शामिल होगी। आलोचनात्मक पहलुओं में पारदर्शिता की कमी, भाई-भतीजावाद के आरोप, और भौगोलिक/सामाजिक विविधता की कमी जैसे मुद्दे शामिल करें।
3. न्यायपालिका की स्वतंत्रता: कॉलेजियम प्रणाली ने किस प्रकार कार्यपालिका के हस्तक्षेप को कम करके न्यायपालिका की स्वतंत्रता को मजबूत किया है, इस पर चर्चा करें। ‘द्वितीय न्यायाधीश मामला’ (1993) और ‘तृतीय न्यायाधीश मामला’ (1998) के निर्णयों का उल्लेख करें।
4. जवाबदेही का मुद्दा: कॉलेजियम प्रणाली में जवाबदेही की कमी पर प्रकाश डालें। इसमें निर्णयों के पीछे के कारणों का सार्वजनिक न होना, आंतरिक मूल्यांकन की अपर्याप्तता, और न्यायिक नियुक्तियों पर बाहरी नियंत्रण की कमी जैसे बिंदु शामिल करें। राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) के प्रयास और उसे सर्वोच्च न्यायालय द्वारा असंवैधानिक घोषित किए जाने का उल्लेख करें।
5. संतुलन का मूल्यांकन: निष्कर्ष में यह मूल्यांकन करें कि क्या कॉलेजियम प्रणाली स्वतंत्रता और जवाबदेही के बीच एक प्रभावी संतुलन स्थापित कर पाई है। सुधारों के लिए सुझाव दें, जैसे कि पारदर्शिता बढ़ाना, चयन मानदंडों को स्पष्ट करना, और एक स्थायी सचिवालय की स्थापना।
6. निष्कर्ष: भविष्य की राह और न्यायपालिका की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम।
स्रोत: amarujala.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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