22 Sep राज्यों द्वारा सरकारी प्रतिभूतियों की नीलामी में ₹16,750 करोड़ का सफल संग्रह
✎ राज्य सरकारी प्रतिभूतियाँ (SGS) राज्य सरकारों द्वारा अपने वित्तीय घाटे को पूरा करने और विकासात्मक परियोजनाओं को वित्तपोषित करने के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक के माध्यम से बाज़ार से उधार लेने का एक महत्वपूर्ण साधन हैं।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय | GS Paper III — सरकारी बजट
- Prelims: राज्य विकास ऋण (State Development Loans – SDLs), राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit), खुला बाज़ार परिचालन (Open Market Operations – OMO), भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI), सरकारी प्रतिभूतियाँ (Government Securities – G-Secs), राजकोषीय संघवाद (Fiscal Federalism), मुद्रास्फीति (Inflation)
- Essay: राजकोषीय संघवाद की चुनौतियाँ और भारत के आर्थिक विकास में इसकी भूमिका, भारतीय अर्थव्यवस्था में भारतीय रिज़र्व बैंक की बदलती भूमिका: एक आलोचनात्मक विश्लेषण
त्वरित पुनरावृत्ति: राज्य सरकारी प्रतिभूतियाँ (SGS) राज्य सरकारों द्वारा अपने वित्तीय घाटे को पूरा करने और विकासात्मक परियोजनाओं को वित्तपोषित करने के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक के माध्यम से बाज़ार से उधार लेने का एक महत्वपूर्ण साधन हैं।
यह खबर चर्चा में क्यों?
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने हाल ही में विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा जारी की गई राज्य सरकारी प्रतिभूतियों (State Government Securities – SGS) की उपज/मूल्य-आधारित नीलामी के परिणाम घोषित किए हैं। इस नीलामी के माध्यम से आंध्र प्रदेश, गोवा, गुजरात, जम्मू और कश्मीर, महाराष्ट्र, पंजाब और राजस्थान सहित कई राज्यों ने कुल 16,750 करोड़ रुपये की राशि जुटाई है। यह नीलामी राज्यों के राजकोषीय प्रबंधन और भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा ऋण प्रबंधन में निभाई जाने वाली महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाती है।
पृष्ठभूमि
- राज्य सरकारी प्रतिभूतियाँ (SGS) या राज्य विकास ऋण (State Development Loans – SDLs) राज्य सरकारों द्वारा बाज़ार से धन उधार लेने के लिए जारी किए गए ऋण साधन हैं।
- ये प्रतिभूतियाँ केंद्र सरकार की प्रतिभूतियों के समान होती हैं, लेकिन इन्हें राज्य सरकारें जारी करती हैं और इनकी परिपक्वता अवधि आमतौर पर 5 से 20 वर्ष तक होती है।
- राज्य सरकारें इन निधियों का उपयोग अपने बजटीय घाटे को पूरा करने, विकासात्मक परियोजनाओं को वित्तपोषित करने और अन्य सार्वजनिक व्यय को पूरा करने के लिए करती हैं।
- भारतीय रिज़र्व बैंक, केंद्र सरकार के साथ-साथ राज्य सरकारों के लिए भी ऋण प्रबंधक का कार्य करता है, जो इन प्रतिभूतियों की नीलामी का संचालन करता है।
- इन नीलामियों में वाणिज्यिक बैंक, बीमा कंपनियाँ, भविष्य निधि और अन्य वित्तीय संस्थान भाग लेते हैं, जो इन प्रतिभूतियों को खरीदते हैं।
- नीलामी में प्राप्त उपज (yield) राज्य सरकारों द्वारा भुगतान की जाने वाली ब्याज दर को दर्शाती है, जो बाज़ार में प्रचलित ब्याज दरों और राज्य की वित्तीय स्थिति पर निर्भर करती है।
राज्य सरकारी प्रतिभूतियाँ (State Government Securities – SGS) क्या हैं?
- राज्य सरकारी प्रतिभूतियाँ (SGS) भारत में राज्य सरकारों द्वारा जारी किए गए ऋण साधन हैं, जिन्हें आमतौर पर राज्य विकास ऋण (State Development Loans – SDLs) के रूप में जाना जाता है।
- ये प्रतिभूतियाँ राज्य सरकारों को अपने वित्तीय संसाधनों को बढ़ाने और बजटीय आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम बनाती हैं।
- SGS को भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा नीलामी के माध्यम से जारी किया जाता है, जो राज्य सरकारों के लिए ऋण प्रबंधक के रूप में कार्य करता है।
- इन प्रतिभूतियों की परिपक्वता अवधि अलग-अलग होती है, जो आमतौर पर 5 से 20 वर्ष के बीच होती है, और इन पर निश्चित या परिवर्तनीय ब्याज दरें (कूपन दरें) होती हैं।
- SGS को ‘सांविधिक तरलता अनुपात’ (Statutory Liquidity Ratio – SLR) के तहत बैंकों द्वारा निवेश के लिए पात्र माना जाता है, जिससे इनकी मांग बनी रहती है।
- इन प्रतिभूतियों में निवेश करने वाले निवेशकों में वाणिज्यिक बैंक, सहकारी बैंक, बीमा कंपनियाँ, भविष्य निधि, पेंशन निधि और अन्य वित्तीय संस्थान शामिल हैं।
- SGS की नीलामी उपज-आधारित या मूल्य-आधारित हो सकती है, जहाँ उपज (yield) वह प्रभावी रिटर्न है जो निवेशक को प्रतिभूति पर मिलता है।
- राज्य सरकारें इन निधियों का उपयोग बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं, सामाजिक कल्याण योजनाओं और अन्य विकासात्मक गतिविधियों के वित्तपोषण के लिए करती हैं, जो राज्य के आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| राज्य सरकारी प्रतिभूतियाँ (State Government Securities – SGS) | ये राज्य सरकारों द्वारा बाज़ार से ऋण जुटाने के लिए जारी किए गए ऋण साधन हैं। ये राज्य के राजकोषीय प्रबंधन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। |
| उपज/मूल्य आधारित नीलामी (Yield/Price Based Auction) | यह वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) राज्य सरकारों की ओर से इन प्रतिभूतियों को बेचता है। इसमें निवेशक प्रतिभूतियों के लिए अपनी अपेक्षित उपज या मूल्य के आधार पर बोली लगाते हैं। |
| पुनः-जारी करना (Re-issue) | इसका अर्थ है कि पहले से जारी की गई प्रतिभूतियों को फिर से बेचा जा रहा है। यह प्रक्रिया तरलता बनाए रखने और ऋण प्रबंधन को सुव्यवस्थित करने में मदद करती है। |
| कट-ऑफ उपज (Cut-off Yield) | यह उच्चतम स्वीकार्य उपज है जिस पर प्रतिभूतियाँ बेची जाती हैं। यह राज्य सरकारों के लिए ऋण की लागत को दर्शाता है। |
| कार्यकाल (Tenor) | यह वह अवधि है जिसके लिए प्रतिभूतियाँ जारी की जाती हैं, जैसे 5 साल, 15 साल या 20 साल। यह राज्य के दीर्घकालिक वित्तीय नियोजन को दर्शाता है। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- राज्य सरकारी प्रतिभूतियों की नीलामी राज्य सरकारों के लिए विकासात्मक परियोजनाओं और दैनिक प्रशासनिक खर्चों को वित्तपोषित करने के लिए महत्वपूर्ण है।
- यह राज्यों के राजकोषीय स्वास्थ्य और बाज़ार से ऋण जुटाने की उनकी क्षमता का संकेतक है।
- नीलामी में प्राप्त उपज (yield) राज्यों के लिए ऋण की लागत को दर्शाती है, जो उनकी भविष्य की उधार लेने की लागत को प्रभावित करती है।
राजकोषीय प्रबंधन
- यह नीलामी राज्य सरकारों को उनके राजकोषीय घाटे (fiscal deficit) को पूरा करने में मदद करती है, जिससे वे अपने बजट लक्ष्यों को प्राप्त कर सकें।
- RBI द्वारा नीलामी का संचालन केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संघवाद (financial federalism) को दर्शाता है, जहाँ RBI राज्यों के लिए एक बैंकर और ऋण प्रबंधक के रूप में कार्य करता है।
बाज़ार और निवेशक
- राज्य सरकारी प्रतिभूतियाँ निवेशकों, जैसे बैंकों, बीमा कंपनियों और पेंशन फंडों के लिए एक सुरक्षित निवेश विकल्प प्रदान करती हैं।
- यह नीलामी भारतीय ऋण बाज़ार की तरलता और गहराई को बढ़ाती है, जिससे वित्तीय स्थिरता को बढ़ावा मिलता है।
चुनौतियाँ
1. बढ़ती ऋण लागत
- उच्च कट-ऑफ उपज राज्य सरकारों के लिए ऋण की बढ़ती लागत को दर्शाती है, जिससे उनके वित्तीय बोझ में वृद्धि होती है।
- बढ़ती ब्याज दरें राज्यों के राजस्व का एक बड़ा हिस्सा ऋण सेवा (debt servicing) में लगा सकती हैं, जिससे विकासात्मक व्यय के लिए कम धन उपलब्ध होगा।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: सरकारी बजट, राजकोषीय नीति
2. राजकोषीय अनुशासन का अभाव
- कुछ राज्यों में लगातार उच्च राजकोषीय घाटा और ऋण स्तर उनकी वित्तीय स्थिरता के लिए चिंता का विषय हो सकता है।
- अप्रत्याशित व्यय या राजस्व में कमी राज्यों के ऋण प्रबंधन को और जटिल बना सकती है।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन
3. बाज़ार की अस्थिरता
- वैश्विक और घरेलू आर्थिक कारक, जैसे मुद्रास्फीति (Inflation) या मौद्रिक नीति में बदलाव, SGS की मांग और उपज को प्रभावित कर सकते हैं।
- बाज़ार की अस्थिरता के कारण राज्यों के लिए अनुकूल शर्तों पर ऋण जुटाना मुश्किल हो सकता है।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: पूंजी बाज़ार, मौद्रिक नीति
4. राजस्व सृजन की सीमाएँ
- राज्यों के पास अपने स्वयं के राजस्व स्रोतों को बढ़ाने की सीमित क्षमता होती है, जिससे वे केंद्र सरकार के हस्तांतरण और बाज़ार उधार पर अधिक निर्भर हो जाते हैं।
- GST क्षतिपूर्ति के समाप्त होने के बाद कई राज्यों को राजस्व संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: संघ-राज्य वित्तीय संबंध
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| उच्च उधार लागत | राज्यों के वित्तीय बोझ में वृद्धि, विकासात्मक व्यय पर नकारात्मक प्रभाव। |
| राजकोषीय घाटा | अस्थिर ऋण स्तर, भविष्य की पीढ़ियों पर बोझ। |
| बाज़ार जोखिम | ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव, निवेशकों की बदलती प्राथमिकताएँ। |
| राजस्व निर्भरता | केंद्र सरकार के हस्तांतरण और बाज़ार उधार पर अत्यधिक निर्भरता। |
आगे की राह
- राज्यों को अपने राजकोषीय घाटे को कम करने और ऋण स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए राजकोषीय विवेक का पालन करना चाहिए।
- राजस्व आधार को मजबूत करने के लिए राज्यों को अपने स्वयं के कर और गैर-कर राजस्व स्रोतों को बढ़ाने के उपाय करने चाहिए।
- सार्वजनिक व्यय की दक्षता और प्रभावशीलता में सुधार किया जाना चाहिए, ताकि संसाधनों का इष्टतम उपयोग हो सके।
- राज्यों को अपनी उधार लेने की रणनीतियों में विविधता लानी चाहिए और दीर्घकालिक ऋण प्रबंधन योजनाओं पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
- भारतीय रिज़र्व बैंक और केंद्र सरकार को राज्यों के वित्तीय स्वास्थ्य की निगरानी जारी रखनी चाहिए और आवश्यकतानुसार सहायता प्रदान करनी चाहिए।
- राज्यों को पूंजीगत व्यय को प्राथमिकता देनी चाहिए जो दीर्घकालिक आर्थिक संवृद्धि (economic growth) और राजस्व सृजन को बढ़ावा दे।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
राज्य विकास ऋण · राज्य सरकार प्रतिभूतियाँ · राजकोषीय घाटा · राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम · भारतीय रिज़र्व बैंक · मुद्रास्फीति · खुले बाज़ार परिचालन · राजकोषीय संघवाद · राजकोषीय समेकन · ऋण प्रबंधन
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘Article 293’: ‘राज्यों द्वारा उधार लेने की शक्ति।’}
- {‘अनुच्छेद 280’: ‘वित्त आयोग (Finance Commission) की सिफारिशें।’}
- {‘सातवीं अनुसूची’: ‘संघ और राज्य सूची में वित्तीय विषय।’}
अवधारणा प्रवाह
राज्य सरकारें विकासात्मक व्यय के लिए धन जुटाती हैं। → भारतीय रिज़र्व बैंक SGS की नीलामी करता है। → निवेशक SGS खरीदते हैं, राज्य को धन मिलता है। → राज्य अपने राजकोषीय घाटे को पूरा करते हैं। → उच्च उपज से राज्यों पर ऋण का बोझ बढ़ता है। → राजकोषीय विवेक दीर्घकालिक स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राज्य सरकार प्रतिभूतियाँ (State Government Securities – SGS) राज्य सरकारों द्वारा जारी किए गए ऋण साधन हैं।
2. भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) राज्य सरकारों के लिए SGS की नीलामी का प्रबंधन करता है।
3. SGS पर प्रतिफल (yield) राज्य सरकारों की उधार लेने की लागत को दर्शाता है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई भी नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। SGS राज्य सरकारों द्वारा अपने राजकोषीय घाटे को वित्तपोषित करने और विकासात्मक परियोजनाओं के लिए धन जुटाने हेतु जारी किए गए ऋण साधन हैं। कथन 2 सही है। RBI राज्य सरकारों के लिए SGS की नीलामी का प्रबंधन करता है, जो केंद्र और राज्यों के बीच एक महत्वपूर्ण वित्तीय संबंध को दर्शाता है। कथन 3 सही है। SGS पर प्रतिफल वह ब्याज दर है जो निवेशकों को प्राप्त होती है, और यह सीधे राज्य सरकारों की उधार लेने की लागत को प्रभावित करती है।
Q2. अभिकथन (A): राज्य सरकारें अपने राजकोषीय घाटे को वित्तपोषित करने के लिए राज्य विकास ऋण (State Development Loans – SDL) जारी करती हैं।
कारण (R): SDLs भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा खुले बाज़ार परिचालन (Open Market Operations – OMO) के माध्यम से बेचे जाते हैं।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है। — अभिकथन (A) सही है। राज्य विकास ऋण राज्य सरकारों द्वारा अपने राजकोषीय घाटे को वित्तपोषित करने और विकासात्मक व्यय के लिए धन जुटाने हेतु जारी किए जाते हैं। कारण (R) भी सही है। भारतीय रिज़र्व बैंक राज्य सरकारों की ओर से इन ऋणों की नीलामी का प्रबंधन करता है, जो एक प्रकार का खुला बाज़ार परिचालन है, जहाँ सरकारें प्रतिभूतियाँ बेचकर धन जुटाती हैं। इसलिए, R, A की सही व्याख्या है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ राज्य विकास ऋण (State Development Loans – SDL) क्या हैं और राज्य सरकारों के राजकोषीय प्रबंधन में उनकी क्या भूमिका है? भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा SDL की नीलामी प्रक्रिया और अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभावों की विवेचना कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: एक आदर्श उत्तर में निम्नलिखित बिंदु शामिल होने चाहिए:
1. **परिचय:** राज्य विकास ऋण (SDL) की परिभाषा – राज्य सरकारों द्वारा जारी किए गए दीर्घकालिक ऋण साधन, जो उनके राजकोषीय घाटे को वित्तपोषित करने और विकासात्मक परियोजनाओं के लिए धन जुटाने हेतु उपयोग किए जाते हैं।
2. **राजकोषीय प्रबंधन में भूमिका:**
* राजकोषीय घाटे का वित्तपोषण।
* पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure) और विकासात्मक परियोजनाओं के लिए संसाधन जुटाना।
* राज्यों के लिए वित्तीय स्वायत्तता का एक महत्वपूर्ण स्रोत।
* राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (FRBM) अधिनियम के तहत निर्धारित उधार सीमाओं का पालन।
3. **RBI द्वारा नीलामी प्रक्रिया:**
* RBI राज्य सरकारों के लिए एक एजेंट के रूप में कार्य करता है।
* नीलामी की घोषणा और कैलेंडर।
* प्रतिफल-आधारित (Yield-based) और मूल्य-आधारित (Price-based) नीलामी के तरीके।
* प्राथमिक डीलरों (Primary Dealers), बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों की भागीदारी।
* कट-ऑफ प्रतिफल/मूल्य का निर्धारण।
4. **अर्थव्यवस्था पर प्रभाव:**
* **राज्यों के लिए:** उधार लेने की लागत, वित्तीय अनुशासन, विकासात्मक क्षमता।
* **केंद्र-राज्य संबंध:** राजकोषीय संघवाद का एक पहलू।
* **मुद्रा बाज़ार:** तरलता (Liquidity) और ब्याज दरों पर प्रभाव।
* **समग्र अर्थव्यवस्था:** सार्वजनिक निवेश, आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) और मुद्रास्फीति पर अप्रत्यक्ष प्रभाव।
* **ऋण स्थिरता:** राज्यों के बढ़ते ऋण स्तरों पर चिंताएँ और राजकोषीय समेकन (Fiscal Consolidation) की आवश्यकता।
5. **निष्कर्ष:** SDLs राज्य वित्त के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनके विवेकपूर्ण प्रबंधन और RBI की भूमिका के माध्यम से राजकोषीय स्थिरता बनाए रखना आवश्यक है।
स्रोत: RBI
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
Related guides on our sites
- Best economics services coaching
- Best economics optional coaching
- Best economics optional coaching for upsc
- best teacher of economics optional
- आंध्र प्रदेश सरकार ने बुजुर्ग पेंशनरों को वापस दी अतिरिक्त पेंशन राशि: मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू का फैसला - September 22, 2026
- Andhra Pradesh Restores Additional Pension for Elderly Pensioners: Key Details for UPSC - September 22, 2026
- उत्तर तमिलनाडु में विस्तारित स्कूल ब्रेकफास्ट योजना का शुभारंभ, जानें लाभ - September 22, 2026

No Comments