राज्य वन बोर्ड में पहली बार शामिल हुए आदिवासी प्रतिनिधि: जानिए पूरा मामला

In a first, two tribal representatives included in State Wildlife Board — labelled illustration

राज्य वन बोर्ड में पहली बार शामिल हुए आदिवासी प्रतिनिधि: जानिए पूरा मामला

3D cutaway: In a first, two tribal representatives included in State Wildlife Board
3D cutaway: In a first, two tribal representatives included in State Wildlife Board

✎ राज्य वन्यजीव बोर्ड में जनजातीय प्रतिनिधियों का समावेशन वन संरक्षण में पारंपरिक ज्ञान को एकीकृत करने और जनजातीय भागीदारी सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — शासन, सामाजिक न्याय, जनजातीय कल्याण  |  GS Paper III — पर्यावरण, जैव विविधता, आपदा प्रबंधन
  • Prelims: राज्य वन्यजीव बोर्ड, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972, जनजातीय पारंपरिक ज्ञान, मानव-वन्यजीव संघर्ष, पारिस्थितिकी पर्यटन, पेरियार टाइगर रिजर्व
  • Essay: जनजातीय अधिकार और सतत विकास: एक सहजीवी संबंध, पर्यावरण संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भूमिका

त्वरित पुनरावृत्ति: राज्य वन्यजीव बोर्ड में जनजातीय प्रतिनिधियों का समावेशन वन संरक्षण में पारंपरिक ज्ञान को एकीकृत करने और जनजातीय भागीदारी सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

यह खबर चर्चा में क्यों?

हाल ही में, एक राज्य वन्यजीव बोर्ड में पहली बार दो जनजातीय प्रतिनिधियों को शामिल किया गया है। यह निर्णय जनजातीय भागीदारी सुनिश्चित करने और वन प्रबंधन में उनके पारंपरिक ज्ञान को एकीकृत करने के उद्देश्य से लिया गया है। इस कदम को ‘ऊरुनर्वु’ नामक वन विभाग की एक पहल के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है, जिसका लक्ष्य जनजातीय जीवन स्थितियों में सुधार करना और वन संरक्षण के लिए पारंपरिक ज्ञान का उपयोग करना है।

पृष्ठभूमि

  • भारत में जनजातीय समुदाय सदियों से वनों और वन्यजीवों के साथ सहजीवी संबंध साझा करते रहे हैं।
  • वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 (Wildlife Protection Act, 1972) के तहत राज्य वन्यजीव बोर्डों का गठन किया जाता है, जो वन्यजीव संरक्षण से संबंधित मामलों पर राज्य सरकार को सलाह देते हैं।
  • पारंपरिक रूप से, इन बोर्डों में विशेषज्ञों, अधिकारियों और गैर-सरकारी संगठनों के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाता था, लेकिन जनजातीय समुदायों का सीधा प्रतिनिधित्व अक्सर कम होता था।
  • मानव-वन्यजीव संघर्ष (Human-Wildlife Conflict) भारत के कई हिस्सों में एक बढ़ती हुई समस्या है, जिसके समाधान में स्थानीय समुदायों का ज्ञान महत्वपूर्ण हो सकता है।
  • जनजातीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान को अक्सर जैव विविधता संरक्षण और सतत वन प्रबंधन के लिए अमूल्य माना जाता है।
  • सरकारें जनजातीय कल्याण और उनके अधिकारों की सुरक्षा के लिए विभिन्न योजनाएं और पहल लागू करती रही हैं, जिसमें वन संसाधनों पर उनके अधिकारों को मान्यता देना भी शामिल है।

राज्य वन्यजीव बोर्ड और जनजातीय भागीदारी

  • राज्य वन्यजीव बोर्ड (State Wildlife Board) का गठन वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की धारा 6 के तहत किया जाता है।
  • यह बोर्ड वन्यजीवों और उनके आवासों के संरक्षण से संबंधित सभी महत्वपूर्ण मामलों पर राज्य सरकार को सलाह देता है।
  • बोर्ड की अध्यक्षता मुख्यमंत्री करते हैं, और इसमें वन मंत्री, राज्य विधानमंडल के सदस्य, विभिन्न विभागों के अधिकारी और वन्यजीव संरक्षण से जुड़े गैर-सरकारी सदस्य शामिल होते हैं।
  • जनजातीय प्रतिनिधियों को शामिल करने का उद्देश्य वन प्रबंधन और संरक्षण रणनीतियों में स्थानीय समुदायों के अनुभव और पारंपरिक ज्ञान को एकीकृत करना है।
  • यह कदम जनजातीय समुदायों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल करके उनके अधिकारों और हितों को सुनिश्चित करने में मदद करेगा।
  • जनजातीय पारंपरिक ज्ञान में पौधों, जानवरों और पारिस्थितिक तंत्रों के बारे में गहन समझ शामिल होती है, जो संरक्षण प्रयासों को अधिक प्रभावी बना सकती है।
  • मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए जनजातीय समुदायों के अनुभव और निवारक उपायों का उपयोग किया जा सकता है।
  • यह पहल ‘ऊरुनर्वु’ जैसे कार्यक्रमों का एक हिस्सा है, जिसका लक्ष्य जनजातीय जीवन स्थितियों में सुधार करना और वन संरक्षण के लिए उनके ज्ञान का उपयोग करना है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
राज्य वन्यजीव बोर्ड में जनजातीय प्रतिनिधियों का समावेशन यह निर्णय जनजातीय समुदायों की पारंपरिक ज्ञान और वन प्रबंधन में भागीदारी सुनिश्चित करता है, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने में मदद मिलेगी।
पारंपरिक ज्ञान का उपयोग वन्यजीव संरक्षण और मानव-पशु संघर्ष (Human-Animal Conflict) के समाधान में जनजातीय समुदायों के सदियों पुराने ज्ञान और अनुभवों का लाभ उठाया जाएगा।
इकोटूरिज्म प्रस्ताव ₹50 करोड़ का इकोटूरिज्म प्रस्ताव, जिसमें थेक्कडी में ₹20 करोड़ का टाइगर संग्रहालय शामिल है, जनजातीय समुदायों के लिए आय के स्रोत और रोजगार के अवसर पैदा करेगा।
‘ऊरुनारवु’ पहल वन विभाग की यह पहल जनजातीय जीवन स्थितियों में सुधार और वन संरक्षण में पारंपरिक ज्ञान के उपयोग पर केंद्रित है।
जनजातीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर सरकार द्वारा जनजातीय बस्तियों में युवाओं के लिए रोजगार के अवसर सुनिश्चित किए जाएंगे, जिससे उनके आर्थिक सशक्तिकरण में मदद मिलेगी।
बुनियादी ढांचे का विकास जनजातीय बस्तियों में पेयजल की कमी को दूर करना, क्षतिग्रस्त सड़कों की मरम्मत और स्ट्रीट लाइट लगाना उनके जीवन स्तर में सुधार करेगा।

महत्व

सामाजिक महत्व

  • जनजातीय समुदायों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल करके उनके सशक्तिकरण को बढ़ावा मिलेगा।
  • पारंपरिक ज्ञान को मान्यता और सम्मान मिलेगा, जिससे सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण होगा।
  • मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने में जनजातीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी से समाधान अधिक प्रभावी होंगे।

पर्यावरणिक महत्व

  • वन्यजीव संरक्षण प्रयासों में स्थानीय समुदायों की भागीदारी से बेहतर परिणाम प्राप्त होंगे।
  • पारंपरिक ज्ञान का उपयोग करके पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) का अधिक स्थायी प्रबंधन संभव होगा।
  • जैव विविधता (Biodiversity) के संरक्षण में जनजातीय समुदायों की भूमिका को मजबूत किया जाएगा।

आर्थिक महत्व

  • इकोटूरिज्म और संबंधित परियोजनाओं से जनजातीय समुदायों के लिए आय के नए स्रोत और रोजगार के अवसर सृजित होंगे।
  • जनजातीय युवाओं को रोजगार मिलने से उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार होगा और पलायन रुकेगा।
  • बुनियादी ढांचे के विकास से जनजातीय क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ेंगी।

शासनिक महत्व

  • यह निर्णय समावेशी शासन (Inclusive Governance) और सहभागी लोकतंत्र (Participatory Democracy) के सिद्धांतों को मजबूत करता है।
  • राज्य वन्यजीव बोर्ड जैसे महत्वपूर्ण निकायों में जनजातीय प्रतिनिधित्व से नीति निर्माण अधिक न्यायसंगत और प्रभावी होगा।
  • सरकार और जनजातीय समुदायों के बीच विश्वास और सहयोग को बढ़ावा मिलेगा।

चुनौतियाँ

1. जनजातीय ज्ञान का दस्तावेजीकरण और संरक्षण

  • कई जनजातीय समुदायों का पारंपरिक ज्ञान मौखिक रूप से हस्तांतरित होता है, जिसके लुप्त होने का खतरा है।
  • इस ज्ञान को वैज्ञानिक रूप से मान्य और दस्तावेजीकृत करने की चुनौती है ताकि इसे प्रभावी ढंग से उपयोग किया जा सके।

2. मानव-वन्यजीव संघर्ष का प्रबंधन

  • वन्यजीवों के आवास सिकुड़ने और मानव बस्तियों के विस्तार के कारण संघर्ष बढ़ रहा है।
  • संघर्ष को कम करने के लिए प्रभावी और टिकाऊ समाधान खोजने की चुनौती है जो दोनों पक्षों के हितों की रक्षा करे।

3. जनजातीय समुदायों के लिए रोजगार और आजीविका

  • जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा और कौशल विकास की कमी के कारण रोजगार के अवसर सीमित हैं।
  • इकोटूरिज्म जैसी परियोजनाओं से प्राप्त लाभों का न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित करना एक चुनौती है।

4. बुनियादी ढांचे का विकास और सेवा वितरण

  • दूरस्थ जनजातीय बस्तियों तक पहुंचना और उन्हें आवश्यक सेवाएं (जैसे पेयजल, सड़क, बिजली) प्रदान करना चुनौतीपूर्ण है।
  • विकास परियोजनाओं के कार्यान्वयन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है।

5. प्रतिनिधित्व की प्रभावशीलता

  • बोर्ड में शामिल किए गए प्रतिनिधियों को अपने समुदाय की वास्तविक चिंताओं और आवश्यकताओं को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने की आवश्यकता है।
  • यह सुनिश्चित करना कि उनकी आवाज़ सुनी जाए और उनके सुझावों पर गंभीरता से विचार किया जाए।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
पारंपरिक ज्ञान का लुप्त होना जनजातीय समुदायों का अमूल्य ज्ञान मौखिक परंपराओं पर आधारित है, जिसके दस्तावेजीकरण के अभाव में खो जाने का खतरा है।
मानव-पशु संघर्ष में वृद्धि वन्यजीवों के आवासों के अतिक्रमण और मानव बस्तियों के विस्तार से संघर्ष बढ़ रहा है, जिससे जान-माल दोनों का नुकसान होता है।
जनजातीय क्षेत्रों में सीमित आजीविका के अवसर शिक्षा और कौशल की कमी के कारण जनजातीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर कम हैं, जिससे आर्थिक पिछड़ापन बना हुआ है।
बुनियादी ढांचे की कमी दूरस्थ जनजातीय बस्तियों में पेयजल, सड़क और बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है, जिससे जीवन स्तर प्रभावित होता है।
विकास परियोजनाओं का असमान लाभ इकोटूरिज्म जैसी परियोजनाओं से होने वाले लाभों का जनजातीय समुदायों तक समान रूप से न पहुंचना, जिससे असंतोष बढ़ सकता है।
प्रतिनिधित्व की प्रतीकात्मकता यह सुनिश्चित करना कि जनजातीय प्रतिनिधियों की भागीदारी केवल प्रतीकात्मक न हो, बल्कि उनके सुझावों को नीति निर्माण में वास्तविक रूप से शामिल किया जाए।

आगे की राह

  • जनजातीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण और संरक्षण किया जाए।
  • मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए समुदाय-आधारित समाधानों को बढ़ावा दिया जाए।
  • जनजातीय युवाओं के लिए कौशल विकास और रोजगार सृजन कार्यक्रमों को बढ़ाया जाए।
  • इकोटूरिज्म परियोजनाओं से प्राप्त आय का न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित किया जाए।
  • जनजातीय बस्तियों में पेयजल, सड़क और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं का त्वरित विकास किया जाए।
  • राज्य वन्यजीव बोर्ड में जनजातीय प्रतिनिधियों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में सक्रिय रूप से शामिल किया जाए।
  • जनजातीय समुदायों के साथ नियमित संवाद और परामर्श तंत्र स्थापित किया जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

राज्य वन्यजीव बोर्ड · जनजातीय प्रतिनिधित्व · वन प्रबंधन · पारंपरिक ज्ञान · मानव-वन्यजीव संघर्ष · पर्यावरण पर्यटन · वन अधिकार अधिनियम · आदिवासी कल्याण · स्थानीय समुदायों की भागीदारी · जैव विविधता संरक्षण · ग्राम सभा · अनुसूचित जनजाति

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘अनुच्छेद 46’: ‘राज्य कमजोर वर्गों के हितों का संवर्धन’}
  • {‘अनुच्छेद 244’: ‘अनुसूचित क्षेत्रों और जनजातीय क्षेत्रों का प्रशासन’}
  • {‘पांचवीं अनुसूची’: ‘अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों का प्रशासन’}
  • {‘छठी अनुसूची’: ‘असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के जनजातीय क्षेत्रों का प्रशासन’}

अवधारणा प्रवाह

जनजातीय प्रतिनिधियों का वन्यजीव बोर्ड में समावेशन  →  पारंपरिक ज्ञान और अनुभव का उपयोग  →  वन्यजीव संरक्षण और मानव-पशु संघर्ष में कमी  →  इकोटूरिज्म और रोजगार सृजन  →  जनजातीय समुदायों का सशक्तिकरण और विकास  →  सतत वन प्रबंधन और जैव विविधता संरक्षण

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राज्य वन्यजीव बोर्ड का अध्यक्ष मुख्यमंत्री होता है।
2. वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत राज्य वन्यजीव बोर्ड का गठन किया जाता है।
3. राज्य वन्यजीव बोर्ड में जनजातीय प्रतिनिधियों को शामिल करने का उद्देश्य वन प्रबंधन में उनके पारंपरिक ज्ञान को एकीकृत करना है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि राज्य वन्यजीव बोर्ड का अध्यक्ष मुख्यमंत्री होता है। कथन 2 सही है क्योंकि वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 6 के तहत राज्य वन्यजीव बोर्ड का गठन किया जाता है। कथन 3 सही है क्योंकि जनजातीय प्रतिनिधियों को शामिल करने का मुख्य उद्देश्य वन प्रबंधन में उनके पारंपरिक ज्ञान और भागीदारी को सुनिश्चित करना है।

Q2. वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही नहीं है?

  1. यह अधिनियम वन्यजीवों और उनके आवासों के संरक्षण का प्रावधान करता है।
  2. यह अधिनियम राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड और राज्य वन्यजीव बोर्ड के गठन का प्रावधान करता है।
  3. यह अधिनियम केवल लुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण पर केंद्रित है, न कि सभी वन्यजीवों पर।
  4. यह अधिनियम वन्यजीव अपराधों के लिए दंड का प्रावधान करता है।

उत्तर: यह अधिनियम केवल लुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण पर केंद्रित है, न कि सभी वन्यजीवों पर। — वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 केवल लुप्तप्राय प्रजातियों पर केंद्रित नहीं है, बल्कि यह सभी वन्यजीवों और उनके आवासों के संरक्षण के लिए एक व्यापक ढाँचा प्रदान करता है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ वन्यजीव संरक्षण में स्थानीय समुदायों, विशेषकर जनजातीय समुदायों की भागीदारी के महत्व का परीक्षण कीजिए। इस संदर्भ में, राज्य वन्यजीव बोर्ड में जनजातीय प्रतिनिधियों को शामिल करने के हालिया कदम के निहितार्थों पर चर्चा कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: वन्यजीव संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भूमिका का संक्षिप्त परिचय, विशेष रूप से जनजातीय समुदायों की।
2. स्थानीय समुदायों की भागीदारी का महत्व:
– पारंपरिक ज्ञान का उपयोग (जैसे वनस्पति, जीव-जंतु, पारिस्थितिकी तंत्र की समझ)।
– मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने में भूमिका।
– स्थायी वन प्रबंधन प्रथाओं को बढ़ावा देना।
– संरक्षण प्रयासों में स्वामित्व और जवाबदेही की भावना।
– वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 के प्रावधानों का संदर्भ।
3. राज्य वन्यजीव बोर्ड में जनजातीय प्रतिनिधियों को शामिल करने के निहितार्थ:
– नीति निर्माण में जनजातीय दृष्टिकोण का एकीकरण।
– निर्णय लेने की प्रक्रिया में पारदर्शिता और समावेशिता में वृद्धि।
– पारंपरिक ज्ञान का दस्तावेजीकरण और उपयोग।
– जनजातीय समुदायों के सशक्तिकरण और आजीविका के अवसरों में वृद्धि।
– बेहतर मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व के लिए रणनीतियाँ।
4. चुनौतियाँ और आगे की राह:
– प्रभावी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना।
– ज्ञान को नीति में बदलने की प्रक्रिया।
– क्षमता निर्माण और जागरूकता।
– अन्य हितधारकों के साथ समन्वय।
5. निष्कर्ष: समावेशी और सहभागी संरक्षण मॉडल की आवश्यकता पर बल।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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