अनुसूचित जनजातियों की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के सरकारी प्रयास

अनुसूचित जनजातियों की सांस्कृतिक पहचान, भाषा और पारंपरिक अधिकारों के संरक्षण हेतु उपाय — concept mind map

अनुसूचित जनजातियों की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के सरकारी प्रयास

जनजातीय विरासत संरक्षण ढांचाजनजातीय कार्य मंत्रालयनोडल मंत्रालयनीतिगत मार्गदर्शनजनजातीय अनुसंधान संस्थान (संरक्षणदस्तावेज़ीकरणडिजिटल पहलेंट्राइबएक्सआदि वाणीकानूनPESA अधिनियमवन अधिकार अधिनियमसंविधानपांचवी अनुसूचीछठी अनुसूची
जनजातीय विरासत संरक्षण ढांचा

✎ जनजातीय कार्य मंत्रालय जनजातीय अनुसंधान संस्थानों (TRI) को वित्तीय सहायता और ट्राइबएक्स तथा आदि वाणी जैसी डिजिटल पहलों के माध्यम से जनजातीय सांस्कृतिक पहचान, भाषा और पारंपरिक अधिकारों के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है, जबकि…

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper I — भारतीय समाज, भारतीय संस्कृति, जनजातीय मुद्दे  |  GS Paper II — भारतीय संविधान, संघवाद, सामाजिक न्याय, कल्याणकारी योजनाएँ
  • Prelims: जनजातीय कार्य मंत्रालय, जनजातीय अनुसंधान संस्थान (TRI), पांचवीं अनुसूची, पेसा अधिनियम, 1996, वन अधिकार अधिनियम, 2006, ट्राइबएक्स (Tribex), आदि वाणी, केंद्र प्रायोजित योजनाएँ
  • Essay: भारत में जनजातीय समुदायों का सशक्तिकरण: चुनौतियाँ और समाधान, सांस्कृतिक विविधता का संरक्षण: एक राष्ट्रीय अनिवार्यता

त्वरित पुनरावृत्ति: जनजातीय कार्य मंत्रालय जनजातीय अनुसंधान संस्थानों (TRI) को वित्तीय सहायता और ट्राइबएक्स तथा आदि वाणी जैसी डिजिटल पहलों के माध्यम से जनजातीय सांस्कृतिक पहचान, भाषा और पारंपरिक अधिकारों के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है, जबकि संवैधानिक और वैधानिक प्रावधानों का कार्यान्वयन मुख्यतः राज्य सरकारों का दायित्व है।

यह खबर चर्चा में क्यों?

केंद्रीय जनजातीय कार्य राज्यमंत्री ने राज्यसभा को सूचित किया कि जनजातीय कार्य मंत्रालय, जनजातीय कला रूपों, भाषाओं, मौखिक परंपराओं और देशज ज्ञान प्रणालियों सहित जनजातीय विरासत के संरक्षण, दस्तावेज़ीकरण और संवर्धन के लिए विभिन्न उपाय कर रहा है। इनमें ‘जनजातीय अनुसंधान संस्थानों (TRI) को सहायता’ नामक केंद्र प्रायोजित योजना के तहत वित्तीय सहायता प्रदान करना और ट्राइबएक्स तथा आदि वाणी जैसी डिजिटल पहलें शामिल हैं।

पृष्ठभूमि

  • भारत में जनजातीय समुदाय देश की कुल जनसंख्या का लगभग 8.6 प्रतिशत हैं और उनकी अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान, भाषाएँ तथा पारंपरिक जीवन-शैली है।
  • संविधान में जनजातीय समुदायों के अधिकारों और हितों की रक्षा के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं, जिनमें पांचवीं और छठी अनुसूचियाँ प्रमुख हैं।
  • जनजातीय कार्य मंत्रालय (Ministry of Tribal Affairs) जनजातीय समुदायों के समग्र विकास और कल्याण के लिए नोडल मंत्रालय है।
  • जनजातीय अनुसंधान संस्थान (TRI) जनजातीय संस्कृति, भाषा, रीति-रिवाजों और पारंपरिक ज्ञान के दस्तावेज़ीकरण, संरक्षण तथा संवर्धन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • जनजातीय क्षेत्रों में स्वशासन को मजबूत करने के लिए पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 (PESA) और वन अधिकारों की मान्यता के लिए अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 जैसे महत्वपूर्ण कानून बनाए गए हैं।
  • डिजिटल पहलें जैसे ट्राइबएक्स और एआई-आधारित अनुवाद उपकरण ‘आदि वाणी’ जनजातीय भाषाओं और कला रूपों को संरक्षित करने तथा उन्हें व्यापक दर्शकों तक पहुँचाने में सहायक हैं।

जनजातीय सांस्कृतिक संरक्षण और संबंधित पहलें

  • जनजातीय कार्य मंत्रालय जनजातीय विरासत के संरक्षण, दस्तावेज़ीकरण और संवर्धन के लिए ‘जनजातीय अनुसंधान संस्थानों (TRI) को सहायता’ नामक केंद्र प्रायोजित योजना के तहत 29 जनजातीय अनुसंधान संस्थानों को वित्तीय सहायता प्रदान करता है।
  • ये TRI संबंधित राज्य सरकारों/संघ राज्य क्षेत्र प्रशासनों के प्रशासनिक नियंत्रण में कार्य करते हैं और मंत्रालय से प्राप्त वित्तीय सहायता से अनुमोदित वार्षिक कार्य योजनाओं का कार्यान्वयन करते हैं।
  • TRI जनजातीय भाषाओं, लोककथाओं, रीति-रिवाजों और पारंपरिक ज्ञान के दस्तावेज़ीकरण, सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन, जनजातीय संग्रहालयों के सुदृढ़ीकरण और अनुसंधान के प्रकाशन जैसी गतिविधियाँ संचालित करते हैं।
  • ट्राइबएक्स (पूर्ववर्ती आदि संस्कृति) डिजिटल मंच जनजातीय सांस्कृतिक संसाधनों के दस्तावेज़ीकरण और प्रदर्शन के लिए एक महत्वपूर्ण डिजिटल पहल है, जिसमें जनजातीय कला रूपों जैसे सोहराई पेंटिंग और डोकरा शिल्प को अल्पकालिक प्रमाणपत्र पाठ्यक्रमों के रूप में शामिल किया गया है।
  • मंत्रालय ने ‘आदि वाणी’ नामक एक एआई-आधारित अनुवाद उपकरण भी विकसित किया है, जो जनजातीय भाषाओं (जैसे संथाली और मुंडारी) और हिंदी/अंग्रेज़ी के बीच पाठ एवं वाक् अनुवाद के माध्यम से उनके संरक्षण और व्यापक सुगम्यता में सहायता करता है।
  • संविधान की पांचवीं अनुसूची, पेसा अधिनियम, 1996 और वन अधिकार अधिनियम, 2006 के प्रावधानों सहित अनुसूचित क्षेत्रों से संबंधित संवैधानिक सुरक्षा उपायों और वैधानिक प्रावधानों का कार्यान्वयन मुख्यतः राज्य सरकार का दायित्व है।
  • जनजातीय कार्य मंत्रालय नीतिगत मार्गदर्शन, परामर्श और क्षमता-निर्माण सहायता प्रदान करता है, जबकि TRI साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण और प्रभावी कार्यान्वयन में सहायता देने हेतु अनुसंधान, अध्ययन और दस्तावेज़ीकरण का कार्य करते हैं।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
जनजातीय अनुसंधान संस्थान (TRI) जनजातीय विरासत के संरक्षण, दस्तावेज़ीकरण और संवर्धन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये संस्थान राज्य सरकारों के प्रशासनिक नियंत्रण में कार्य करते हैं।
ट्राइबएक्स (Tribex) डिजिटल मंच जनजातीय सांस्कृतिक संसाधनों के दस्तावेज़ीकरण और प्रदर्शन के लिए एक डिजिटल पहल है, जो जनजातीय कला रूपों को अल्पकालिक प्रमाणपत्र पाठ्यक्रमों के रूप में बढ़ावा देता है।
आदि वाणी (Aadi Vaani) AI-आधारित अनुवाद उपकरण जनजातीय भाषाओं (जैसे संथाली और मुंडारी) और हिंदी/अंग्रेज़ी के बीच पाठ एवं वाक् अनुवाद को सुगम बनाता है, जिससे इन भाषाओं का संरक्षण और व्यापक सुगम्यता सुनिश्चित होती है।
संवैधानिक और सांविधिक प्रावधान संविधान की पांचवीं अनुसूची, पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 (पेसा) और वन अधिकार अधिनियम, 2006 जैसे प्रावधान जनजातीय अधिकारों और पहचान के संरक्षण के लिए कानूनी ढाँचा प्रदान करते हैं।
केंद्र प्रायोजित योजना “जनजातीय अनुसंधान संस्थानों को सहायता” जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा TRI को वित्तीय सहायता प्रदान करती है, जिससे अनुसंधान, दस्तावेज़ीकरण, संग्रहालयों की स्थापना और जनजातीय ज्ञान के प्रसार जैसी गतिविधियाँ संभव होती हैं।

महत्व

सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व

  • जनजातीय कला रूपों, भाषाओं, मौखिक परंपराओं और देशज ज्ञान प्रणालियों का संरक्षण भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विविधता को बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
  • जनजातीय पहचान और आत्म-सम्मान को सुदृढ़ करता है, जिससे हाशिए पर पड़े समुदायों का सशक्तिकरण होता है।
  • डिजिटल पहलों और AI-आधारित उपकरणों के माध्यम से जनजातीय भाषाओं की सुगम्यता और प्रसार बढ़ता है, जिससे अंतर-पीढ़ीगत ज्ञान हस्तांतरण को बढ़ावा मिलता है।

शासन और नीति निर्माण महत्व

  • जनजातीय अनुसंधान संस्थान साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण और संवैधानिक तथा सांविधिक प्रावधानों के प्रभावी कार्यान्वयन में सहायता करते हैं।
  • जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा प्रदान किया गया नीतिगत मार्गदर्शन और क्षमता-निर्माण सहायता राज्य सरकारों को जनजातीय कल्याण कार्यक्रमों को बेहतर ढंग से लागू करने में सक्षम बनाती है।
  • डिजिटल दस्तावेज़ीकरण और अनुसंधान जनजातीय समुदायों की विशिष्ट आवश्यकताओं और चुनौतियों को समझने में मदद करता है, जिससे लक्षित हस्तक्षेप संभव होते हैं।

शैक्षिक और अनुसंधान महत्व

  • जनजातीय अनुसंधान संस्थान जनजातीय संस्कृति, इतिहास और समाज पर गहन अनुसंधान को बढ़ावा देते हैं, जिससे अकादमिक ज्ञान का विस्तार होता है।
  • प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम और प्रशिक्षण कार्यक्रम जनजातीय कला रूपों और शिल्पों को पुनर्जीवित करने और कौशल विकास को बढ़ावा देने में मदद करते हैं।
  • जनजातीय संग्रहालयों का सुदृढ़ीकरण और प्रकाशन जनजातीय ज्ञान को व्यापक दर्शकों तक पहुँचाता है, जिससे जागरूकता और सम्मान बढ़ता है।

चुनौतियाँ

1. जनजातीय भाषाओं का क्षरण

  • आधुनिक शिक्षा प्रणाली और मुख्यधारा की भाषाओं के प्रभाव के कारण कई जनजातीय भाषाएँ विलुप्त होने के कगार पर हैं।
  • इन भाषाओं में साहित्य और दस्तावेज़ीकरण की कमी उनके संरक्षण को और अधिक चुनौतीपूर्ण बनाती है।

2. पारंपरिक ज्ञान का दस्तावेज़ीकरण और संरक्षण

  • जनजातीय समुदायों का पारंपरिक ज्ञान, जैसे कि औषधीय प्रथाएँ और कृषि तकनीकें, मौखिक रूप से हस्तांतरित होती हैं और इनके दस्तावेज़ीकरण की धीमी गति से इनके लुप्त होने का खतरा है।
  • आधुनिक जीवनशैली और बाहरी प्रभावों के कारण युवा पीढ़ी में पारंपरिक ज्ञान के प्रति रुचि कम हो रही है।

3. संसाधनों की कमी और कार्यान्वयन चुनौतियाँ

  • जनजातीय अनुसंधान संस्थानों को वित्तीय सहायता और मानव संसाधनों की कमी का सामना करना पड़ सकता है, जिससे उनके कार्यक्रमों के प्रभावी कार्यान्वयन में बाधा आती है।
  • राज्य सरकारों और जनजातीय कार्य मंत्रालय के बीच समन्वय और जवाबदेही सुनिश्चित करना एक चुनौती हो सकती है।

4. डिजिटल खाई और पहुंच

  • डिजिटल मंचों और AI-आधारित उपकरणों का उपयोग करने के लिए जनजातीय क्षेत्रों में डिजिटल साक्षरता और इंटरनेट कनेक्टिविटी की आवश्यकता होती है, जो अभी भी एक चुनौती है।
  • दूरस्थ जनजातीय क्षेत्रों में इन तकनीकी समाधानों को प्रभावी ढंग से पहुँचाना और उनका उपयोग सुनिश्चित करना कठिन हो सकता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
जनजातीय भाषाओं का विलुप्तीकरण मुख्यधारा के प्रभाव और दस्तावेज़ीकरण की कमी के कारण कई जनजातीय भाषाएँ लुप्त हो रही हैं।
पारंपरिक ज्ञान का क्षरण मौखिक परंपराओं पर निर्भरता और आधुनिक प्रभावों के कारण देशज ज्ञान प्रणालियाँ खतरे में हैं।
संसाधनों की अपर्याप्तता जनजातीय अनुसंधान संस्थानों को वित्तीय और मानव संसाधनों की कमी का सामना करना पड़ता है, जिससे कार्यक्रमों का प्रभावी कार्यान्वयन बाधित होता है।
डिजिटल पहुंच की कमी दूरस्थ जनजातीय क्षेत्रों में डिजिटल साक्षरता और इंटरनेट कनेक्टिविटी की कमी तकनीकी पहलों के लाभों को सीमित करती है।
नीति कार्यान्वयन में अंतराल संवैधानिक और सांविधिक प्रावधानों के कार्यान्वयन में राज्य-स्तरीय चुनौतियाँ और समन्वय की कमी देखी जा सकती है।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • जनजातीय अनुसंधान संस्थानों (TRI) को सहायता

आगे की राह

  • जनजातीय भाषाओं के संरक्षण के लिए व्यापक भाषाई सर्वेक्षण और दस्तावेज़ीकरण कार्यक्रम शुरू किए जाएं, जिसमें स्थानीय समुदायों को शामिल किया जाए।
  • जनजातीय पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों, जैसे कि औषधीय पौधों और कृषि पद्धतियों, को वैज्ञानिक रूप से मान्य और संरक्षित करने के लिए अनुसंधान को बढ़ावा दिया जाए।
  • जनजातीय अनुसंधान संस्थानों को पर्याप्त वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान की जाए, साथ ही उनकी स्वायत्तता और क्षमता निर्माण को सुदृढ़ किया जाए।
  • डिजिटल साक्षरता कार्यक्रमों को जनजातीय क्षेत्रों में विस्तारित किया जाए और इंटरनेट कनेक्टिविटी में सुधार किया जाए ताकि डिजिटल पहलों का अधिकतम लाभ उठाया जा सके।
  • जनजातीय कला रूपों और शिल्पों को बढ़ावा देने के लिए बाजार संपर्क और उद्यमिता विकास कार्यक्रमों को प्रोत्साहित किया जाए, जिससे कारीगरों को आर्थिक लाभ मिल सके।
  • संविधान की पांचवीं अनुसूची, पेसा अधिनियम और वन अधिकार अधिनियम जैसे संवैधानिक और सांविधिक प्रावधानों के प्रभावी कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए राज्य सरकारों के साथ समन्वय बढ़ाया जाए।
  • जनजातीय समुदायों को सांस्कृतिक संरक्षण और विकास पहलों में सक्रिय रूप से शामिल किया जाए, जिससे उनकी भागीदारी और स्वामित्व सुनिश्चित हो।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

जनजातीय सांस्कृतिक संरक्षण · जनजातीय अनुसंधान संस्थान (TRI) · आदि वाणी · ट्राइबएक्स · पांचवीं अनुसूची · पेसा अधिनियम 1996 · वन अधिकार अधिनियम 2006 · जनजातीय कार्य मंत्रालय · डिजिटल पहलें · सांस्कृतिक पहचान

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • पांचवीं अनुसूची: अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण से संबंधित प्रावधान।

अवधारणा प्रवाह

जनजातीय संस्कृति और भाषा का क्षरण  →  जनजातीय कार्य मंत्रालय की पहचान  →  TRI को सहायता योजना और डिजिटल पहलें  →  जनजातीय विरासत का संरक्षण और संवर्धन  →  साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण और कार्यान्वयन

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. जनजातीय कार्य मंत्रालय, केंद्र प्रायोजित योजना ‘जनजातीय अनुसंधान संस्थानों (टीआरआई) को सहायता’ के अंतर्गत जनजातीय अनुसंधान संस्थानों को वित्तीय सहायता प्रदान करता है।
2. ‘आदि वाणी’ एक AI-आधारित अनुवाद उपकरण है जो जनजातीय भाषाओं और हिंदी/अंग्रेज़ी के मध्य पाठ एवं वाक् अनुवाद को सुगम बनाता है।
3. संविधान की पांचवीं अनुसूची के प्रावधानों का कार्यान्वयन मुख्यतः केंद्र सरकार का दायित्व है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। जनजातीय कार्य मंत्रालय केंद्र प्रायोजित योजना ‘जनजातीय अनुसंधान संस्थानों (टीआरआई) को सहायता’ के अंतर्गत टीआरआई को वित्तीय सहायता प्रदान करता है। कथन 2 सही है। ‘आदि वाणी’ एक AI-आधारित अनुवाद उपकरण है। कथन 3 गलत है। पांचवीं अनुसूची के प्रावधानों का कार्यान्वयन मुख्यतः राज्य सरकार का दायित्व है।

Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा अधिनियम अनुसूचित जनजातियों के पारंपरिक अधिकारों के संरक्षण से संबंधित है?
1. पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 (पेसा)
2. अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006
3. वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

  1. केवल 1 और 2
  2. केवल 2 और 3
  3. केवल 1 और 3
  4. 1, 2 और 3

उत्तर: केवल 1 और 2 — पेसा अधिनियम, 1996 और वन अधिकार अधिनियम, 2006 दोनों ही अनुसूचित जनजातियों के पारंपरिक अधिकारों के संरक्षण से संबंधित हैं। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 वन्यजीवों और उनके आवासों के संरक्षण से संबंधित है, हालांकि इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव जनजातीय समुदायों पर हो सकता है, लेकिन यह सीधे उनके पारंपरिक अधिकारों के संरक्षण से संबंधित नहीं है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत में अनुसूचित जनजातियों की सांस्कृतिक पहचान, भाषा और पारंपरिक अधिकारों के संरक्षण में जनजातीय अनुसंधान संस्थानों (टीआरआई) की भूमिका का परीक्षण कीजिए। इस संबंध में जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा की गई डिजिटल पहलों का भी उल्लेख कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: परिचय में जनजातीय समुदायों के महत्व और उनकी सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण की आवश्यकता पर प्रकाश डालें। मुख्य भाग में, जनजातीय अनुसंधान संस्थानों (टीआरआई) की भूमिका का विस्तार से वर्णन करें, जिसमें उनके कार्य (अनुसंधान, दस्तावेज़ीकरण, संवर्धन, संग्रहालयों का सुदृढ़ीकरण, प्रशिक्षण) और ‘जनजातीय अनुसंधान संस्थानों को सहायता’ योजना के तहत वित्तीय सहायता का उल्लेख हो। इसके बाद, जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा की गई डिजिटल पहलों जैसे ‘ट्राइबएक्स’ (डिजिटल मंच, प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम) और ‘आदि वाणी’ (AI-आधारित अनुवाद उपकरण) पर चर्चा करें। संवैधानिक और सांविधिक प्रावधानों (पांचवीं अनुसूची, पेसा अधिनियम, वन अधिकार अधिनियम) का संक्षिप्त उल्लेख करें जो इस संरक्षण को आधार प्रदान करते हैं। अंत में, एक संतुलित निष्कर्ष प्रस्तुत करें जो इन प्रयासों के महत्व और भविष्य की चुनौतियों को रेखांकित करे।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

No Comments

Post A Comment