आंध्र प्रदेश में न्यायिक ढांचे के विकास के लिए केंद्र सरकार की 8.79 करोड़ रुपये की मंजूरी

आंध्र प्रदेश में न्यायिक ढांचे के विकास के लिए केंद्र सरकार की 8.79 करोड़ रुपये की मंजूरी

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान, न्यायपालिका की संरचना, संगठन और कार्यप्रणाली  |  GS Paper II — केंद्र एवं राज्यों के मध्य शक्तियों का पृथक्करण, वित्त आयोग के कार्य
  • Prelims: केंद्र प्रायोजित योजना (CSS), जिला और अधीनस्थ न्यायालय, न्यायिक अवसंरचना, न्याय विकास पोर्टल, अनुच्छेद 233-237, उच्च न्यायालय का अधीक्षण
  • Essay: भारत में न्याय तक पहुँच: चुनौतियाँ और समाधान, संघवाद और न्यायिक सुधारों की आवश्यकता

त्वरित पुनरावृत्ति: केंद्र प्रायोजित योजना 1993-94 से जिला और अधीनस्थ न्यायालयों में न्यायिक अवसंरचना के विकास के लिए केंद्र सरकार द्वारा वित्त पोषित एक महत्वपूर्ण पहल है, जिसका उद्देश्य राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों के संसाधनों को बढ़ाना और न्याय तक पहुँच में सुधार करना है।

यह खबर चर्चा में क्यों?

केंद्र सरकार ने आंध्र प्रदेश में न्यायिक अवसंरचना (Judicial Infrastructure) के विकास के लिए केंद्र प्रायोजित योजना (Centrally Sponsored Scheme – CSS) के तहत अपना समर्थन जारी रखा है। वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए आंध्र प्रदेश को 8.79 करोड़ रुपये की ‘मदर सैंक्शन’ जारी की गई है। यह योजना, जो 1993-94 से चल रही है, जिला और अधीनस्थ न्यायालयों में बुनियादी सुविधाओं जैसे न्यायालय कक्ष, न्यायिक अधिकारियों के लिए आवास, अधिवक्ताओं के लिए हॉल, शौचालय परिसर और डिजिटल कंप्यूटर कक्ष के निर्माण में सहायता करती है। योजना की समाप्ति तिथि को अस्थायी रूप से 30 सितंबर, 2026 तक बढ़ाया गया है, और इसकी प्रभावशीलता का मूल्यांकन एक तृतीय-पक्ष एजेंसी तथा विभाग-संबंधित संसदीय स्थायी समिति (DRPSC) द्वारा किया जाता है।

पृष्ठभूमि

  • जिला और अधीनस्थ न्यायालयों के लिए बुनियादी ढाँचा सुविधाएँ प्रदान करने की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य सरकारों/संघ राज्य क्षेत्रों (UTs) की होती है।
  • केंद्र सरकार राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों के संसाधनों को बढ़ाने के लिए 1993-94 से इस केंद्र प्रायोजित योजना को लागू कर रही है।
  • इस योजना के तहत पाँच प्रमुख घटक शामिल हैं: न्यायालय कक्ष, न्यायिक अधिकारियों के लिए आवासीय इकाइयाँ, अधिवक्ताओं के लिए हॉल, शौचालय परिसर और डिजिटल कंप्यूटर कक्ष।
  • योजना के तहत परियोजनाओं की पहचान संबंधित राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों और उच्च न्यायालयों द्वारा की जाती है।
  • राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों से विस्तृत मांग प्राप्त होने के बाद, उन्हें धनराशि का अस्थायी आवंटन किया जाता है और ‘मदर सैंक्शन’ जारी की जाती है।
  • योजना की प्रगति की निगरानी के लिए ‘न्याय विकास पोर्टल’ नामक एक ऑनलाइन निगरानी तंत्र मौजूद है।

भारत में न्यायिक अवसंरचना और केंद्र प्रायोजित योजना

  • भारत में न्यायिक प्रणाली तीन स्तरों पर कार्य करती है: सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court), उच्च न्यायालय (High Court) और अधीनस्थ न्यायालय (Subordinate Courts)। अधीनस्थ न्यायालयों में जिला न्यायालय (District Courts) और अन्य निचली अदालतें शामिल हैं।
  • न्यायिक अवसंरचना में न्यायालय भवनों, न्यायाधीशों और न्यायिक अधिकारियों के आवासों, कर्मचारियों के लिए सुविधाओं, डिजिटल कनेक्टिविटी और अन्य आवश्यक भौतिक संसाधनों का निर्माण और रखरखाव शामिल है।
  • एक सुदृढ़ न्यायिक अवसंरचना त्वरित न्याय सुनिश्चित करने, न्यायिक कार्यप्रणाली में दक्षता लाने और न्याय तक पहुँच को बेहतर बनाने के लिए महत्वपूर्ण है।
  • केंद्र प्रायोजित योजना (CSS) एक ऐसी योजना है जिसे केंद्र सरकार द्वारा वित्त पोषित किया जाता है लेकिन इसका कार्यान्वयन राज्य सरकारों द्वारा किया जाता है। इसमें केंद्र और राज्य के बीच एक निश्चित अनुपात में लागत साझा की जाती है।
  • इस योजना के तहत, आंध्र प्रदेश को पिछले पाँच वित्तीय वर्षों (2021-22 से 2025-26) में जिला न्यायालय अवसंरचना के निर्माण के लिए कुल 104.29 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं।
  • आंध्र प्रदेश में 31 मई, 2026 तक विभिन्न न्यायालयों में कुल 875 स्वीकृत न्यायिक पदों में से 137 पद रिक्त थे, जो न्यायिक प्रणाली पर अतिरिक्त दबाव डालते हैं।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
केन्द्र प्रायोजित योजना (Centrally Sponsored Scheme – CSS) जिला और अधीनस्थ न्यायालयों के लिए न्यायिक अवसंरचना के विकास हेतु केंद्र सरकार द्वारा 1993-94 से लागू। यह राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों के संसाधनों को पूरक बनाती है।
योजना के घटक न्यायालय कक्ष, न्यायिक अधिकारियों के लिए आवासीय इकाइयाँ, अधिवक्ताओं के लिए हॉल, शौचालय परिसर और डिजिटल कंप्यूटर कक्ष शामिल हैं।
मूल्यांकन तंत्र योजना की प्रभावशीलता का आकलन तृतीय-पक्ष एजेंसी और विभाग-संबंधित संसदीय स्थायी समिति (DRPSC) द्वारा किया जाता है।
परियोजना पहचान और वित्तपोषण परियोजनाओं की पहचान संबंधित राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों और उच्च न्यायालयों द्वारा की जाती है। विस्तृत मांग के बाद राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों को धनराशि का अस्थायी आवंटन और ‘मदर सैंक्शन’ जारी की जाती है।
न्याय विकास पोर्टल परियोजनाओं की प्रगति के संकलन और निगरानी के लिए एक ऑनलाइन निगरानी तंत्र।

महत्व

न्यायपालिका पर प्रभाव

  • बेहतर अवसंरचना से न्यायिक प्रक्रिया में तेजी आती है, जिससे मामलों के निपटान में लगने वाला समय कम होता है।
  • आधुनिक न्यायालय कक्ष और डिजिटल सुविधाएं न्यायिक अधिकारियों और अधिवक्ताओं को अधिक कुशलता से कार्य करने में मदद करती हैं।

शासन और नागरिक केंद्रितता

  • न्यायिक अवसंरचना में सुधार से नागरिकों तक न्याय की पहुँच बढ़ती है, विशेषकर दूरदराज के क्षेत्रों में।
  • यह योजना सुशासन (Good Governance) के सिद्धांतों को मजबूत करती है, जहाँ न्यायपालिका एक महत्वपूर्ण स्तंभ है।

संघवाद (Federalism) और केंद्र-राज्य संबंध

  • यह योजना दर्शाती है कि न्यायपालिका के लिए अवसंरचना प्रदान करने की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्यों की होने के बावजूद, केंद्र सरकार वित्तीय सहायता प्रदान करके सहकारी संघवाद को बढ़ावा देती है।
  • केंद्र और राज्य के बीच सहयोग न्यायिक प्रणाली को मजबूत करने और पूरे देश में एक समान न्यायिक मानक सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है।

चुनौतियाँ

1. परियोजनाओं का धीमा क्रियान्वयन

  • आंध्र प्रदेश में 2021 से पहले शुरू की गई दो परियोजनाएं अभी भी निर्माणाधीन हैं, जो क्रियान्वयन में देरी को दर्शाती हैं।
  • यह देरी लागत में वृद्धि और अपेक्षित लाभों को प्राप्त करने में विलंब का कारण बन सकती है।

2. न्यायिक रिक्तियाँ

  • आंध्र प्रदेश में 31.05.2026 तक 875 स्वीकृत पदों में से 137 न्यायिक पद रिक्त हैं।
  • न्यायिक पदों की रिक्तियाँ अवसंरचना के विकास के बावजूद न्याय वितरण प्रणाली पर दबाव डालती हैं और मामलों के बैकलॉग को बढ़ाती हैं।

3. धनराशि का उपयोग

  • पिछले पांच वर्षों में आंध्र प्रदेश को 104.29 करोड़ रुपये जारी किए गए, लेकिन कुछ वित्तीय वर्षों में (जैसे 2021-22 और 2024-25 में) जारी की गई धनराशि बहुत कम थी, जो धन के असमान उपयोग को दर्शाता है।
  • धनराशि का प्रभावी और समय पर उपयोग सुनिश्चित करना एक चुनौती है।

4. राज्य सरकारों पर निर्भरता

  • योजना की सफलता काफी हद तक राज्य सरकारों की पहल और वित्तीय प्रबंधन पर निर्भर करती है, क्योंकि प्राथमिक जिम्मेदारी उनकी है।
  • राज्यों के बीच क्षमता और प्रतिबद्धता में अंतर योजना के क्रियान्वयन में असमानता पैदा कर सकता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
न्यायिक अवसंरचना का क्रियान्वयन परियोजनाओं के क्रियान्वयन में देरी से लागत में वृद्धि और न्याय वितरण में बाधा।
न्यायिक पदों की रिक्तियाँ रिक्त पदों के कारण मामलों का बैकलॉग और न्यायपालिका पर कार्यभार में वृद्धि, अवसंरचना के लाभों को कम करना।
धनराशि का उपयोग राज्यों द्वारा जारी की गई धनराशि का असमान और कभी-कभी अपर्याप्त उपयोग, जिससे परियोजनाओं की प्रगति प्रभावित होती है।
राज्य सरकारों की क्षमता और प्रतिबद्धता राज्यों के बीच भिन्न-भिन्न क्षमताएं और प्राथमिकताएं योजना के क्रियान्वयन में असमानता पैदा कर सकती हैं।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • केन्द्र प्रायोजित योजना (Centrally Sponsored Scheme – CSS)

आगे की राह

  • परियोजनाओं के क्रियान्वयन में तेजी लाने के लिए राज्य सरकारों के साथ नियमित समन्वय और निगरानी तंत्र को मजबूत करना।
  • न्यायिक पदों की रिक्तियों को भरने के लिए उच्च न्यायालयों और राज्य लोक सेवा आयोगों के साथ मिलकर भर्ती प्रक्रिया को तेज करना।
  • राज्यों को आवंटित धनराशि के प्रभावी और समय पर उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहन (Performance-based incentives) और दंड (Penalties) का प्रावधान करना।
  • न्याय विकास पोर्टल जैसे ऑनलाइन निगरानी तंत्रों का अधिकतम उपयोग करके परियोजनाओं की प्रगति की वास्तविक समय पर निगरानी करना।
  • न्यायिक अवसंरचना के लिए दीर्घकालिक योजना और वित्तपोषण रणनीति विकसित करना, जिसमें केंद्र और राज्य दोनों की स्पष्ट भूमिकाएं हों।
  • न्यायिक अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए क्षमता निर्माण कार्यक्रमों पर ध्यान केंद्रित करना ताकि नई डिजिटल सुविधाओं का प्रभावी ढंग से उपयोग किया जा सके।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

न्यायिक अवसंरचना · केन्द्र प्रायोजित योजना (CSS) · जिला एवं अधीनस्थ न्यायालय · न्यायपालिका का सुदृढ़ीकरण · न्याय तक पहुँच · राज्यों की भूमिका · केन्द्र सरकार का समर्थन · न्याय विकास पोर्टल · न्यायिक रिक्तियाँ · संघवाद

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 233-237’, ‘note’: ‘अधीनस्थ न्यायालयों का संगठन और नियंत्रण’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 247’, ‘note’: ‘कुछ अतिरिक्त न्यायालयों की स्थापना की शक्ति’}

अवधारणा प्रवाह

न्यायिक अवसंरचना की कमी  →  केंद्र प्रायोजित योजना का शुभारंभ (1993-94)  →  राज्यों को वित्तीय सहायता और मदर सैंक्शन  →  न्यायालय कक्ष, आवासीय इकाइयों आदि का निर्माण  →  न्याय विकास पोर्टल द्वारा निगरानी  →  न्याय वितरण प्रणाली में सुधार और तेजी

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. जिला और अधीनस्थ न्यायालयों के लिए बुनियादी ढाँचा सुविधाओं के विकास हेतु केंद्र प्रायोजित योजना (CSS) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यह योजना वर्ष 1993-94 से लागू की गई है।
2. इस योजना के तहत न्यायालय कक्ष, न्यायिक अधिकारियों के लिए आवासीय इकाइयाँ और अधिवक्ताओं के लिए हॉल जैसे घटक शामिल हैं।
3. योजना की प्रभावशीलता का आकलन केवल विभाग-संबंधित संसदीय स्थायी समिति (DRPSC) द्वारा किया जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/कौन-से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 1 और 2
  3. केवल 2 और 3
  4. 1, 2 और 3

उत्तर: केवल 1 और 2 — कथन 1 सही है। यह योजना वर्ष 1993-94 से लागू की गई है। कथन 2 सही है। योजना में न्यायालय कक्ष, आवासीय इकाइयाँ, अधिवक्ताओं के लिए हॉल, शौचालय परिसर और डिजिटल कंप्यूटर कक्ष जैसे घटक शामिल हैं। कथन 3 गलत है। योजना का मूल्यांकन तृतीय-पक्ष एजेंसी और DRPSC दोनों द्वारा किया जाता है।

Q2. भारत में न्यायिक अवसंरचना के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है?

  1. जिला और अधीनस्थ न्यायालयों के लिए बुनियादी ढाँचा सुविधाओं की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य सरकारों की होती है।
  2. केंद्र प्रायोजित योजना के तहत परियोजनाओं की पहचान संबंधित राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों और उच्च न्यायालयों द्वारा की जाती है।
  3. न्याय विकास पोर्टल का उपयोग योजना के तहत परियोजनाओं की प्रगति के संकलन और निगरानी के लिए किया जाता है।
  4. केंद्र प्रायोजित योजना का उद्देश्य केवल उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय की अवसंरचना को मजबूत करना है।

उत्तर: केंद्र प्रायोजित योजना का उद्देश्य केवल उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय की अवसंरचना को मजबूत करना है। — कथन (d) सही नहीं है। केंद्र प्रायोजित योजना का उद्देश्य जिला और अधीनस्थ न्यायालयों में न्यायपालिका के लिए बुनियादी ढाँचा सुविधाओं का विकास करना है, न कि केवल उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय का। अन्य सभी कथन सही हैं।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत में जिला और अधीनस्थ न्यायालयों में न्यायिक अवसंरचना के विकास में केंद्र प्रायोजित योजना (CSS) की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। न्याय तक पहुँच सुनिश्चित करने में यह योजना कितनी प्रभावी रही है और इसकी चुनौतियों को दूर करने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं? (250 शब्द)

रूपरेखा: प्रश्न के पहले भाग में केंद्र प्रायोजित योजना (CSS) के उद्देश्यों, घटकों और कार्यान्वयन तंत्र का संक्षिप्त परिचय दें। योजना की भूमिका का विश्लेषण करें कि इसने न्यायिक अवसंरचना को कैसे सुदृढ़ किया है। दूसरे भाग में, योजना की प्रभावशीलता का आकलन करें, जिसमें इसकी सफलताओं और सीमाओं (जैसे न्यायिक रिक्तियाँ, परियोजनाओं का धीमा निष्पादन) दोनों को शामिल किया जाए। अंत में, चुनौतियों का समाधान करने और न्याय तक पहुँच को बेहतर बनाने के लिए ठोस सुझाव दें, जैसे कि धन के आवंटन में वृद्धि, परियोजना प्रबंधन में सुधार, और राज्य-केंद्र समन्वय को मजबूत करना।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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