26 Jul कर्नाटक आरक्षण अधिनियम 2022: नौवीं अनुसूची में शामिल करने का प्रस्ताव टला, जानिए क्यों?
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान – ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और आधारभूत संरचना। संघ एवं राज्यों के कार्य और उत्तरदायित्व, संघीय ढाँचे से संबंधित विषय एवं चुनौतियाँ। विभिन्न घटकों के बीच शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थाएँ। | GS Paper II — कार्यपालिका और न्यायपालिका का गठन और कार्य। सरकार के मंत्रालय एवं विभाग। | GS Paper II — सामाजिक न्याय – कमजोर वर्गों के लिए कल्याणकारी योजनाएँ तथा इन कमजोर वर्गों की सुरक्षा एवं बेहतरी के लिए गठित तंत्र, विधि, संस्थाएँ एवं निकाय।
- Prelims: नौवीं अनुसूची, अनुच्छेद 31B, न्यायिक समीक्षा, केशवानंद भारती वाद, इंदिरा साहनी वाद, आरक्षण सीमा, कर्नाटक आरक्षण अधिनियम, 2022
- Essay: भारतीय संविधान की आधारभूत संरचना और न्यायिक सक्रियता: संतुलन की खोज।, सामाजिक न्याय और आरक्षण नीति: संवैधानिक प्रावधान और व्यावहारिक चुनौतियाँ।
त्वरित पुनरावृत्ति: नौवीं अनुसूची में किसी अधिनियम को शामिल करने का उद्देश्य उसे न्यायिक समीक्षा से बचाना है, लेकिन केशवानंद भारती वाद के बाद यह सुरक्षा संविधान की आधारभूत संरचना के सिद्धांत के अधीन हो गई है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केंद्र सरकार ने कर्नाटक सरकार के ‘कर्नाटक अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (शैक्षिक संस्थानों में सीटों का आरक्षण और राज्य के तहत सेवाओं में नियुक्तियों या पदों का आरक्षण) अधिनियम, 2022’ को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल करने के प्रस्ताव को टाल दिया है। यह निर्णय इसलिए लिया गया क्योंकि यह अधिनियम वर्तमान में कर्नाटक उच्च न्यायालय में विचाराधीन है। केंद्रीय विधि और न्याय मंत्री श्री अर्जुन राम मेघवाल ने लोकसभा में एक लिखित जवाब में यह जानकारी दी।
पृष्ठभूमि
- कर्नाटक सरकार ने अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़ा वर्गों के लिए 56 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान करने वाला एक अधिनियम, ‘कर्नाटक अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (शैक्षिक संस्थानों में सीटों का आरक्षण और राज्य के तहत सेवाओं में नियुक्तियों या पदों का आरक्षण) अधिनियम, 2022’ पारित किया था।
- यह अधिनियम राज्य के आरक्षण ढांचे का एक हिस्सा है और इसमें कुल आरक्षण को 50 प्रतिशत की उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्धारित सीमा से ऊपर ले जाने का प्रावधान है।
- इस अधिनियम को कर्नाटक उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है, और मामला अभी भी न्यायालय में विचाराधीन है।
- कर्नाटक सरकार ने केंद्र सरकार से इस अधिनियम को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल करने का अनुरोध किया था।
- नौवीं अनुसूची में शामिल किए गए कानूनों को न्यायिक समीक्षा से कुछ हद तक सुरक्षा प्राप्त होती है, हालाँकि यह सुरक्षा केशवानंद भारती वाद के बाद सीमित हो गई है।
- केंद्र सरकार ने न्यायालय की कार्यवाही पूरी होने तक इस प्रस्ताव को उचित नहीं माना है।
संविधान की नौवीं अनुसूची और आरक्षण नीति
- नौवीं अनुसूची को प्रथम संविधान संशोधन अधिनियम, 1951 द्वारा संविधान में जोड़ा गया था। इसका मुख्य उद्देश्य भूमि सुधार कानूनों को न्यायिक समीक्षा से बचाना था।
- अनुच्छेद 31B नौवीं अनुसूची से संबंधित है, जो यह प्रावधान करता है कि नौवीं अनुसूची में शामिल किसी भी अधिनियम या विनियम को इस आधार पर शून्य नहीं माना जाएगा कि वह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।
- शुरुआत में, नौवीं अनुसूची में शामिल कानूनों को न्यायिक समीक्षा से पूर्ण प्रतिरक्षा प्राप्त थी। हालाँकि, आई.आर. कोएल्हो बनाम तमिलनाडु राज्य वाद (2007) में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि 24 अप्रैल, 1973 (केशवानंद भारती वाद का निर्णय) के बाद नौवीं अनुसूची में शामिल किए गए कानूनों को न्यायिक समीक्षा के अधीन किया जा सकता है, यदि वे संविधान की आधारभूत संरचना का उल्लंघन करते हैं।
- इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ वाद (1992), जिसे मंडल आयोग वाद के नाम से भी जाना जाता है, में सर्वोच्च न्यायालय ने आरक्षण के लिए 50 प्रतिशत की सीमा निर्धारित की थी। इस निर्णय में कहा गया था कि असाधारण परिस्थितियों को छोड़कर कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए।
- कई राज्य सरकारों ने विभिन्न कारणों से इस 50 प्रतिशत की सीमा का उल्लंघन करने का प्रयास किया है, जिससे कानूनी चुनौतियाँ उत्पन्न हुई हैं।
- आरक्षण नीति का उद्देश्य सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों को समाज की मुख्यधारा में लाना और उन्हें समान अवसर प्रदान करना है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| कर्नाटक आरक्षण अधिनियम, 2022 | यह अधिनियम कर्नाटक में अनुसूचित जातियों (SCs), अनुसूचित जनजातियों (STs) और अन्य पिछड़ा वर्गों (OBCs) के लिए कुल 56 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान करता है। यह राज्य के आरक्षण ढांचे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। |
| नौवीं अनुसूची में शामिल करने का प्रस्ताव | संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल किए गए कानूनों को न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) से कुछ हद तक संरक्षण प्राप्त होता है, हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर भी सीमाएं निर्धारित की हैं। कर्नाटक सरकार ने इस अधिनियम को नौवीं अनुसूची में शामिल करने का अनुरोध किया था। |
| केंद्र सरकार का निर्णय | केंद्र सरकार ने कर्नाटक उच्च न्यायालय में मामले के विचाराधीन होने का हवाला देते हुए इस प्रस्ताव को फिलहाल टाल दिया है। यह न्यायिक प्रक्रिया के सम्मान और विधायी व न्यायिक शक्तियों के संतुलन को दर्शाता है। |
| न्यायिक समीक्षा | यह न्यायपालिका की शक्ति है जिसके तहत वह विधायिका द्वारा पारित कानूनों और कार्यपालिका द्वारा जारी आदेशों की संवैधानिकता की जांच करती है। यदि कोई कानून या आदेश संविधान का उल्लंघन करता है, तो उसे असंवैधानिक घोषित किया जा सकता है। |
| आरक्षण की 50% सीमा | इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ मामले (1992) में सर्वोच्च न्यायालय ने आरक्षण की अधिकतम सीमा 50% निर्धारित की थी, जिसे विशेष परिस्थितियों को छोड़कर नहीं बढ़ाया जा सकता। कर्नाटक अधिनियम इस सीमा का उल्लंघन करता प्रतीत होता है। |
महत्व
न्यायिक-विधायी संबंध
- केंद्र सरकार का यह निर्णय न्यायिक प्रक्रिया के प्रति सम्मान को दर्शाता है। यह दर्शाता है कि विधायिका द्वारा पारित कानूनों को न्यायिक जांच से गुजरने देना महत्वपूर्ण है, विशेषकर जब वे संवैधानिक सिद्धांतों से संबंधित हों।
- यह संघवाद (Federalism) के सिद्धांत को भी परिलक्षित करता है, जहाँ केंद्र सरकार राज्य के अनुरोध पर विचार करते हुए न्यायिक प्रक्रिया के लंबित होने का सम्मान करती है।
सामाजिक न्याय और आरक्षण
- यह मामला भारत में आरक्षण नीति के जटिल पहलुओं को उजागर करता है, विशेष रूप से 50% की आरक्षण सीमा और सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों को न्याय प्रदान करने की आवश्यकता के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौती।
- यह अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़ा वर्गों के लिए आरक्षण के महत्व को रेखांकित करता है, जो ऐतिहासिक रूप से वंचित रहे हैं, लेकिन साथ ही यह भी दिखाता है कि ऐसे प्रावधानों को संवैधानिक सीमाओं के भीतर होना चाहिए।
संवैधानिक शासन
- यह घटना संवैधानिक सर्वोच्चता (Constitutional Supremacy) के सिद्धांत पर जोर देती है, जहाँ कोई भी कानून संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन नहीं कर सकता। न्यायिक समीक्षा इस सिद्धांत को बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण उपकरण है।
- नौवीं अनुसूची का उपयोग और उसकी न्यायिक समीक्षा की सीमाएं भारतीय संविधान के गतिशील स्वरूप और न्यायपालिका की भूमिका को दर्शाती हैं।
चुनौतियाँ
1. आरक्षण की 50% सीमा का उल्लंघन
- कर्नाटक आरक्षण अधिनियम, 2022 में कुल 56% आरक्षण का प्रावधान है, जो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इंदिरा साहनी मामले में निर्धारित 50% की सीमा का उल्लंघन करता है।
- यह संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाता है और भविष्य में अन्य राज्यों द्वारा भी ऐसी ही मांगें उठने की संभावना पैदा करता है, जिससे आरक्षण नीति में अनिश्चितता बढ़ सकती है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय, भारतीय संविधान
2. न्यायिक समीक्षा की भूमिका
- नौवीं अनुसूची में शामिल किए गए कानूनों को न्यायिक समीक्षा से बचाने का प्रयास न्यायपालिका की शक्ति को कमजोर कर सकता है, हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने ‘केशवानंद भारती’ मामले के बाद नौवीं अनुसूची के तहत शामिल कानूनों की भी न्यायिक समीक्षा की अनुमति दी है।
- यह संविधान के ‘मूल ढांचे’ (Basic Structure) के सिद्धांत पर आधारित है, जिसके अनुसार संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करने वाले किसी भी कानून को असंवैधानिक घोषित किया जा सकता है, भले ही वह नौवीं अनुसूची में हो।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान, न्यायपालिका
3. विधायी और न्यायिक शक्तियों का संतुलन
- राज्य विधानमंडल द्वारा पारित कानून को उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है, जो विधायिका और न्यायपालिका के बीच शक्ति संतुलन की जटिलता को दर्शाता है।
- केंद्र सरकार का प्रस्ताव टालना इस संतुलन को बनाए रखने का एक प्रयास है, लेकिन यह भविष्य में ऐसे मामलों में केंद्र और राज्यों के बीच संभावित टकराव को भी दर्शाता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान, संघवाद
4. सामाजिक-आर्थिक असमानता का समाधान
- आरक्षण का उद्देश्य सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों को मुख्यधारा में लाना है, लेकिन आरक्षण की सीमाएं और न्यायिक हस्तक्षेप इस उद्देश्य की प्राप्ति में बाधाएँ उत्पन्न कर सकते हैं।
- केवल आरक्षण पर निर्भरता के बजाय, शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक अवसरों तक समान पहुँच जैसे अन्य उपायों पर भी ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय, समावेशी विकास
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| आरक्षण की 50% सीमा | इंदिरा साहनी मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित 50% की सीमा का उल्लंघन संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाता है। |
| नौवीं अनुसूची और न्यायिक समीक्षा | नौवीं अनुसूची में शामिल करने का प्रयास न्यायिक समीक्षा से बचने का एक तरीका हो सकता है, जो न्यायपालिका की शक्ति को कमजोर कर सकता है और संविधान के मूल ढांचे के सिद्धांत का उल्लंघन कर सकता है। |
| न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान | मामले के विचाराधीन होने के बावजूद नौवीं अनुसूची में शामिल करने का अनुरोध न्यायिक प्रक्रिया के सम्मान के विरुद्ध होता। |
| संघवाद और केंद्र-राज्य संबंध | राज्य के कानून को नौवीं अनुसूची में शामिल करने का केंद्र का निर्णय केंद्र-राज्य संबंधों को प्रभावित कर सकता है, विशेषकर जब राज्य का कानून न्यायिक जांच के अधीन हो। |
| सामाजिक न्याय बनाम संवैधानिक सीमाएं | सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने की आवश्यकता और संवैधानिक रूप से निर्धारित सीमाओं के बीच संतुलन स्थापित करना एक चुनौती है। |
आगे की राह
- आरक्षण नीतियों को संवैधानिक प्रावधानों और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के अनुरूप बनाया जाना चाहिए, विशेष रूप से 50% की सीमा का सम्मान करते हुए।
- सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए केवल आरक्षण पर निर्भर रहने के बजाय, शिक्षा, कौशल विकास और आर्थिक सशक्तिकरण जैसे व्यापक उपायों पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए।
- न्यायपालिका की स्वतंत्रता और न्यायिक समीक्षा की शक्ति का सम्मान किया जाना चाहिए, क्योंकि यह संवैधानिक सर्वोच्चता और कानून के शासन को बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
- केंद्र और राज्य सरकारों के बीच आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दों पर संवाद और समन्वय को बढ़ावा दिया जाना चाहिए ताकि संवैधानिक विवादों से बचा जा सके।
- नौवीं अनुसूची के उपयोग को केवल असाधारण परिस्थितियों तक सीमित रखा जाना चाहिए, ताकि यह न्यायिक समीक्षा से बचने का एक सामान्य साधन न बन जाए।
- आरक्षण नीतियों की समय-समय पर समीक्षा की जानी चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वे अपने मूल उद्देश्य को पूरा कर रही हैं और ‘क्रीमी लेयर’ (Creamy Layer) जैसे मुद्दों का समाधान किया जा सके।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
नौवीं अनुसूची · न्यायिक समीक्षा · आरक्षण नीति · इंदिरा साहनी वाद · पचास प्रतिशत आरक्षण सीमा · संविधान संशोधन · संघवाद · राज्य विधानमंडल · उच्च न्यायालय · संवैधानिक प्रावधान
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 15(4) और 15(5)’, ‘note’: ‘शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 16(4)’, ‘note’: ‘सरकारी सेवाओं में आरक्षण’}
- {‘article’: ‘नौवीं अनुसूची’, ‘note’: ‘कुछ अधिनियमों और विनियमों का सत्यापन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 31B’, ‘note’: ‘नौवीं अनुसूची से संबंधित प्रावधान’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 226’, ‘note’: ‘उच्च न्यायालयों की रिट जारी करने की शक्ति’}
अवधारणा प्रवाह
कर्नाटक आरक्षण अधिनियम, 2022 पारित → अधिनियम में 56% आरक्षण का प्रावधान → राज्य सरकार द्वारा नौवीं अनुसूची में शामिल करने का अनुरोध → अधिनियम को कर्नाटक उच्च न्यायालय में चुनौती → केंद्र सरकार द्वारा प्रस्ताव टालने का निर्णय → न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान सुनिश्चित
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. संविधान की नौवीं अनुसूची के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इसे प्रथम संविधान संशोधन अधिनियम, 1951 द्वारा जोड़ा गया था।
2. इसमें शामिल कानूनों को न्यायिक समीक्षा से पूर्ण छूट प्राप्त है।
3. केशवानंद भारती वाद के बाद, नौवीं अनुसूची में शामिल कानूनों की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है यदि वे संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- केवल 1 और 2
- केवल 1 और 3
- केवल 2 और 3
- 1, 2 और 3
उत्तर: केवल 1 और 3 — कथन 1 सही है। नौवीं अनुसूची को भूमि सुधार कानूनों को न्यायिक चुनौती से बचाने के लिए जोड़ा गया था। कथन 2 गलत है। 2007 के आई.आर. कोएल्हो वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि 24 अप्रैल, 1973 (केशवानंद भारती वाद का निर्णय) के बाद नौवीं अनुसूची में शामिल कानूनों की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है। कथन 3 सही है। आई.आर. कोएल्हो वाद के अनुसार, यदि नौवीं अनुसूची में शामिल कोई कानून संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करता है, तो उसकी न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।
Q2. भारत में आरक्षण नीति के संदर्भ में, इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ वाद (1992) के मुख्य निर्णय क्या थे?
1. इसने केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा कुल आरक्षण की सीमा को 50 प्रतिशत तक सीमित कर दिया।
2. इसने क्रीमी लेयर (Creamy Layer) की अवधारणा को लागू किया।
3. इसने अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए पदोन्नति में आरक्षण को असंवैधानिक घोषित किया।
4. इसने आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण का मार्ग प्रशस्त किया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- केवल 1 और 2
- केवल 1, 2 और 3
- केवल 2 और 4
- केवल 1, 3 और 4
उत्तर: केवल 1 और 2 — कथन 1 और 2 सही हैं। इंदिरा साहनी वाद ने कुल आरक्षण की सीमा को 50 प्रतिशत तक सीमित कर दिया और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए क्रीमी लेयर की अवधारणा पेश की। कथन 3 गलत है। इस वाद ने पदोन्नति में आरक्षण को असंवैधानिक नहीं ठहराया, बल्कि इस पर कुछ प्रतिबंध लगाए, जिन्हें बाद में संवैधानिक संशोधनों द्वारा संबोधित किया गया। कथन 4 गलत है। आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) के लिए आरक्षण का प्रावधान 103वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2019 द्वारा किया गया था, जो इंदिरा साहनी वाद के बहुत बाद आया।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ संविधान की नौवीं अनुसूची का क्या महत्व है और न्यायिक समीक्षा के सिद्धांत पर इसके प्रभाव का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। क्या आरक्षण कानूनों को नौवीं अनुसूची में शामिल करने से संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन होता है? चर्चा कीजिए। (250 शब्द)
रूपरेखा: प्रश्न के पहले भाग में नौवीं अनुसूची के महत्व को स्पष्ट करें, जिसमें इसके निर्माण के उद्देश्य (भूमि सुधार) और शुरुआती दौर में न्यायिक समीक्षा से मिली छूट का उल्लेख हो। दूसरे भाग में न्यायिक समीक्षा पर इसके प्रभाव का आलोचनात्मक विश्लेषण करें, जिसमें केशवानंद भारती वाद और आई.आर. कोएल्हो वाद के निर्णयों का विशेष उल्लेख हो, जिन्होंने नौवीं अनुसूची में शामिल कानूनों को भी मूल ढांचे के सिद्धांत के तहत न्यायिक समीक्षा के दायरे में लाया। तीसरे भाग में आरक्षण कानूनों को नौवीं अनुसूची में शामिल करने के संवैधानिक निहितार्थों पर चर्चा करें, विशेष रूप से इंदिरा साहनी वाद द्वारा निर्धारित 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा और समानता के अधिकार के संदर्भ में। निष्कर्ष में, न्यायिक संतुलन और संवैधानिक सर्वोच्चता के महत्व पर जोर दें।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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