जम्मू-कश्मीर में कब होंगे पंचायत चुनाव? ओबीसी आरक्षण का फैसला लंबित

Why panchayat polls in J&K might not happen anytime soon — diagram

जम्मू-कश्मीर में कब होंगे पंचायत चुनाव? ओबीसी आरक्षण का फैसला लंबित

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J&K panchayat polls delay

✎ जम्मू-कश्मीर में पंचायत चुनाव OBC आरक्षण पर सरकार के निर्णय के लंबित होने के कारण स्थगित हैं, जबकि राज्य निर्वाचन आयोग चुनाव कराने के लिए तैयार है, जो 73वें संविधान संशोधन अधिनियम के तहत स्थानीय स्वशासन और समावेशी प्रतिनिधित्व के…

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान – ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और आधारभूत संरचना  |  GS Paper II — संघ एवं राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व, संघीय ढाँचे से संबंधित विषय एवं चुनौतियाँ, स्थानीय स्तर पर शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण तथा उसकी चुनौतियाँ  |  GS Paper II — विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए सरकारी नीतियाँ और हस्तक्षेप तथा उनके अभिकल्पन और कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय
  • Prelims: जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019, पंचायती राज संस्थाएँ, अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण, राज्य निर्वाचन आयोग (SEC), अनुच्छेद 243D, 73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम
  • Essay: भारत में स्थानीय स्वशासन: चुनौतियाँ और संभावनाएँ, समावेशी लोकतंत्र की दिशा में आरक्षण की भूमिका

त्वरित पुनरावृत्ति: जम्मू-कश्मीर में पंचायत चुनाव OBC आरक्षण पर सरकार के निर्णय के लंबित होने के कारण स्थगित हैं, जबकि राज्य निर्वाचन आयोग चुनाव कराने के लिए तैयार है, जो 73वें संविधान संशोधन अधिनियम के तहत स्थानीय स्वशासन और समावेशी प्रतिनिधित्व के महत्त्व को रेखांकित करता है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

जम्मू-कश्मीर में पंचायत चुनाव अनिश्चितता का सामना कर रहे हैं, क्योंकि केंद्र शासित प्रदेश की सरकार ने अभी तक अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए आरक्षण के मुद्दे पर कोई निर्णय नहीं लिया है। पूर्ववर्ती स्थानीय निकायों का कार्यकाल 2024 में समाप्त हो गया था, और तब से जम्मू-कश्मीर में कोई निर्वाचित स्थानीय निकाय नहीं है। राज्य निर्वाचन आयोग (SEC) ने चुनाव कराने के लिए अपनी तैयारी पूरी कर ली है, लेकिन सरकार का कहना है कि चुनाव ‘उपयुक्त समय’ पर होंगे, जो OBC आरक्षण पर निर्णय लंबित होने के कारण रुका हुआ है।

पृष्ठभूमि

  • 2019 तक, जम्मू-कश्मीर में पंचायत चुनाव जम्मू-कश्मीर पंचायती राज अधिनियम के तहत होते थे, जिसमें OBC आरक्षण का प्रावधान नहीं था।
  • एक तीन सदस्यीय OBC आयोग ने फरवरी 2025 में सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी, लेकिन इस पर अभी तक कोई निर्णय नहीं लिया गया है।
  • पंचायती राज अधिनियम के अनुसार, ग्रामीण स्थानीय निकायों के चुनाव के लिए OBC आरक्षण जनसंख्या के अनुपात में होना चाहिए।
  • राज्य निर्वाचन आयोग ने सरकार को सूचित किया है कि उसने चुनाव कराने के लिए सभी आवश्यक अभ्यास पूरे कर लिए हैं और चुनाव की तारीखों के बारे में एक-दो महीने पहले सूचित करने को कहा है।

भारत में पंचायती राज संस्थाएँ और आरक्षण

  • पंचायती राज संस्थाएँ (Panchayati Raj Institutions – PRIs) भारत में ग्रामीण स्थानीय स्वशासन की प्रणाली हैं, जिन्हें 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा संवैधानिक दर्जा दिया गया था।
  • यह अधिनियम संविधान के भाग IX में अनुच्छेद 243 से 243O तक पंचायती राज से संबंधित प्रावधानों को जोड़ता है।
  • अनुच्छेद 243D पंचायतों में सीटों के आरक्षण का प्रावधान करता है, जिसमें अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण शामिल है।
  • यह अनुच्छेद महिलाओं के लिए कुल सीटों का कम से कम एक-तिहाई आरक्षण भी सुनिश्चित करता है।
  • राज्य विधानमंडल कानून द्वारा पंचायतों में पिछड़े वर्गों (OBCs) के लिए सीटों और अध्यक्षों के पदों के आरक्षण के लिए प्रावधान कर सकता है।
  • जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के बाद, केंद्र शासित प्रदेश में भी भारतीय संविधान के ये प्रावधान लागू होते हैं, जिससे OBC आरक्षण का मुद्दा प्रासंगिक हो गया है।
  • राज्य निर्वाचन आयोग (State Election Commission – SEC) भारत के संविधान के अनुच्छेद 243K के तहत गठित एक संवैधानिक निकाय है, जो पंचायतों और नगरपालिकाओं के चुनाव कराने, मतदाता सूचियाँ तैयार करने और चुनाव के पर्यवेक्षण, निर्देशन और नियंत्रण के लिए जिम्मेदार है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
जम्मू-कश्मीर में पंचायत चुनाव केंद्र शासित प्रदेश में जमीनी स्तर पर लोकतंत्र की बहाली और स्थानीय स्वशासन को मजबूत करना।
अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण का मुद्दा पंचायती राज अधिनियम के तहत OBC को उनकी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना, सामाजिक न्याय के सिद्धांत को बनाए रखना।
स्थानीय निकायों का कार्यकाल समाप्त जम्मू-कश्मीर में वर्तमान में कोई निर्वाचित स्थानीय निकाय नहीं हैं, जिससे शासन में निर्वाचित प्रतिनिधियों की कमी है।
OBC आयोग की रिपोर्ट OBC आरक्षण के संबंध में सरकार को सिफारिशें प्रदान करना, जो निर्णय लेने का आधार बनेगी।
राज्य चुनाव आयोग (SEC) की भूमिका पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों के संचालन के लिए आवश्यक तैयारी पूरी करना और सरकार से चुनाव की तारीखों की प्रतीक्षा करना।

महत्व

लोकतांत्रिक शासन

  • जम्मू-कश्मीर में पंचायती राज संस्थाओं (Panchayati Raj Institutions) का अभाव जमीनी स्तर पर लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को बाधित करता है।
  • स्थानीय निकायों के चुनाव से नागरिकों को स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया में भागीदारी का अवसर मिलता है।

सामाजिक न्याय

  • OBC आरक्षण का प्रावधान यह सुनिश्चित करता है कि समाज के वंचित वर्गों को स्थानीय स्वशासन में उचित प्रतिनिधित्व मिले।
  • आरक्षण के बिना चुनाव कराने से सामाजिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हो सकता है और कुछ वर्गों को प्रतिनिधित्व से वंचित किया जा सकता है।

प्रशासनिक प्रभाव

  • निर्वाचित स्थानीय निकायों की अनुपस्थिति में, प्रशासन का संचालन नौकरशाही के माध्यम से होता है, जिससे जवाबदेही और स्थानीय आवश्यकताओं के प्रति संवेदनशीलता प्रभावित हो सकती है।
  • पंचायतों की बहाली से स्थानीय विकास योजनाओं के प्रभावी कार्यान्वयन और सार्वजनिक सेवाओं की बेहतर डिलीवरी में मदद मिलेगी।

चुनौतियाँ

1. OBC आरक्षण पर निर्णय में देरी

  • जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा OBC आयोग की रिपोर्ट पर निर्णय न लेना चुनाव में देरी का मुख्य कारण है।
  • OBC आरक्षण के बिना पंचायती राज अधिनियम के प्रावधानों के तहत चुनाव कराना संभव नहीं है।

2. पंचायती राज संस्थाओं का निष्क्रिय होना

  • जम्मू-कश्मीर में सभी तीनों स्तरों की पंचायती राज संस्थाओं का कार्यकाल समाप्त हो चुका है, जिससे केंद्र शासित प्रदेश बिना निर्वाचित स्थानीय निकाय के है।
  • यह स्थिति स्थानीय शासन और विकास प्रक्रियाओं को प्रभावित करती है।

3. परिसीमन और आरक्षण की प्रक्रिया

  • OBC आरक्षण पर निर्णय के बाद, पंचायतों के निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन (delimitation) और आरक्षण की प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
  • यह एक समय लेने वाली प्रक्रिया है जो चुनाव में और देरी कर सकती है।

4. सरकार और SEC के बीच समन्वय

  • राज्य चुनाव आयोग ने चुनाव की तैयारी पूरी कर ली है, लेकिन सरकार की ओर से चुनाव की तारीखों पर कोई प्रतिबद्धता नहीं है।
  • दोनों संस्थाओं के बीच प्रभावी समन्वय की कमी चुनाव प्रक्रिया को बाधित कर रही है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
OBC आरक्षण पर निर्णय में देरी पंचायती राज अधिनियम के तहत आवश्यक आरक्षण के बिना चुनाव नहीं हो सकते, जिससे प्रक्रिया रुकी हुई है।
स्थानीय निकायों का कार्यकाल समाप्त जम्मू-कश्मीर में कोई निर्वाचित स्थानीय निकाय नहीं हैं, जिससे जमीनी स्तर पर लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का अभाव है।
OBC आयोग की रिपोर्ट पर कार्रवाई का अभाव रिपोर्ट प्रस्तुत होने के बावजूद सरकार द्वारा निर्णय न लेना चुनाव प्रक्रिया को अनिश्चित बनाता है।
परिसीमन और आरक्षण की आवश्यकता OBC आरक्षण पर निर्णय के बाद निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन और आरक्षण की लंबी प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
सरकार की ‘उचित समय’ की टिप्पणी चुनाव कराने के लिए कोई निश्चित समय-सीमा न होने से अनिश्चितता बनी हुई है।

आगे की राह

  • जम्मू-कश्मीर सरकार को OBC आयोग की रिपोर्ट पर तत्काल निर्णय लेना चाहिए ताकि आरक्षण का मुद्दा सुलझ सके।
  • OBC आरक्षण के प्रावधानों को पंचायती राज अधिनियम के अनुसार लागू करने के लिए आवश्यक विधायी और प्रशासनिक कदम उठाए जाने चाहिए।
  • राज्य चुनाव आयोग के साथ परामर्श कर चुनाव की तारीखों को अंतिम रूप दिया जाना चाहिए और एक स्पष्ट समय-सीमा निर्धारित की जानी चाहिए।
  • OBC आरक्षण लागू होने के बाद, पंचायतों के निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन और आरक्षण प्रक्रिया को शीघ्रता से पूरा किया जाना चाहिए।
  • स्थानीय स्वशासन को मजबूत करने और जमीनी स्तर पर लोकतंत्र को बहाल करने के लिए चुनाव प्रक्रिया को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
  • सरकार और राज्य चुनाव आयोग के बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया जाना चाहिए ताकि चुनाव संबंधी बाधाओं को दूर किया जा सके।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

जम्मू-कश्मीर पंचायती राज · अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण · स्थानीय स्वशासन · अनुच्छेद 243 · राज्य निर्वाचन आयोग (SEC) · 73वां संवैधानिक संशोधन अधिनियम · संघवाद · लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण · ग्राम पंचायत · ब्लॉक विकास परिषद · जिला विकास परिषद · परिसीमन

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 243 (भाग IX)’, ‘note’: ‘पंचायती राज संस्थाओं का गठन और शक्तियाँ’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 243D’, ‘note’: ‘पंचायतों में सीटों का आरक्षण’}

अवधारणा प्रवाह

जम्मू-कश्मीर में स्थानीय निकायों का कार्यकाल समाप्त।  →  OBC आरक्षण पर निर्णय लंबित होने से चुनाव में देरी।  →  OBC आयोग ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी।  →  राज्य चुनाव आयोग चुनाव कराने को तैयार, सरकार के निर्णय का इंतजार।  →  OBC आरक्षण पर निर्णय के बाद परिसीमन और चुनाव होंगे।  →  जमीनी स्तर पर लोकतांत्रिक शासन की बहाली का मार्ग प्रशस्त होगा।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 73वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम ने भारत में त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक दर्जा दिया।
2. जम्मू-कश्मीर में पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा कराए जाते हैं।
3. अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए आरक्षण का प्रावधान 73वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम के तहत अनिवार्य है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। 73वें संशोधन ने पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा दिया। कथन 2 सही है। राज्य निर्वाचन आयोग (State Election Commission) पंचायतों और नगरपालिकाओं के चुनाव कराता है। कथन 3 गलत है। 73वें संशोधन में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षण अनिवार्य है, जबकि OBC आरक्षण राज्यों के विवेक पर छोड़ दिया गया है।

Q2. भारत में पंचायती राज संस्थाओं के संबंध में, निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही नहीं है?

  1. पंचायतों का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है।
  2. पंचायतों के चुनाव कराने का निर्णय राज्य सरकार द्वारा लिया जाता है।
  3. पंचायतों के विघटन की स्थिति में छह महीने के भीतर चुनाव कराना अनिवार्य है।
  4. राज्य विधानमंडल कानून द्वारा पंचायतों को वित्तीय शक्तियां प्रदान कर सकता है।

उत्तर: पंचायतों के चुनाव कराने का निर्णय राज्य सरकार द्वारा लिया जाता है। — पंचायतों के चुनाव कराने का निर्णय राज्य सरकार द्वारा राज्य निर्वाचन आयोग के परामर्श से लिया जाता है, लेकिन चुनाव कराने की जिम्मेदारी राज्य निर्वाचन आयोग की होती है। चुनाव कराने में देरी का निर्णय राज्य सरकार का नहीं होता, बल्कि यह संवैधानिक बाध्यता है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ जम्मू-कश्मीर में पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों में देरी के कारणों का विश्लेषण कीजिए। लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण के संदर्भ में इस देरी के संभावित प्रभावों की भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: जम्मू-कश्मीर में पंचायती राज संस्थाओं (PRI) की वर्तमान स्थिति और चुनावों में देरी का संक्षिप्त उल्लेख।
2. देरी के कारण: OBC आरक्षण पर निर्णय लंबित होना, OBC आयोग की रिपोर्ट पर कार्रवाई न होना, सरकार का ‘उचित समय’ पर चुनाव कराने का बयान, परिसीमन और निर्वाचन क्षेत्रों के आरक्षण की प्रक्रिया का लंबित होना। जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के बाद नियमों में बदलाव का उल्लेख।
3. लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण पर प्रभाव: स्थानीय स्तर पर जवाबदेही की कमी, विकास परियोजनाओं में जनता की भागीदारी का अभाव, जमीनी स्तर पर शासन का कमजोर होना, केंद्र शासित प्रदेश में लोकतांत्रिक प्रक्रिया का बाधित होना, संवैधानिक प्रावधानों (73वें संशोधन) के उद्देश्यों का कमजोर पड़ना।
4. संवैधानिक और वैधानिक प्रावधान: 73वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम के तहत पंचायती राज का महत्व, अनुच्छेद 243 के तहत चुनाव की अनिवार्यता, राज्य निर्वाचन आयोग की भूमिका।
5. निष्कर्ष: लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को मजबूत करने और संवैधानिक जनादेश का पालन करने के लिए समय पर चुनाव कराने की आवश्यकता पर बल।

स्रोत: The Indian Express


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