डीआरडीओ-उद्योग सहयोग: एमएसएमई-स्टार्टअप को सशक्त बनाने की नई पहल

'विमर्श' डीआरडीओ-उद्योग सहयोग बैठक: रक्षा मंत्री ने एमएसएमई और स्टार्ट-अप उद्यमों को सशक्त बनाने के लिए प्रमुख नीतिगत पह — diagram

डीआरडीओ-उद्योग सहयोग: एमएसएमई-स्टार्टअप को सशक्त बनाने की नई पहल

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DRDO-Industry Tech Transfer

✎ रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने और 'विकसित भारत' के लक्ष्य को साकार करने के लिए डीआरडीओ-उद्योग सहयोग, एमएसएमई और स्टार्ट-अप को सशक्त बनाने तथा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर केंद्रित नीतिगत पहलें महत्वपूर्ण हैं।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper III — अर्थव्यवस्था: भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाना, संवृद्धि, विकास तथा रोज़गार।  |  GS Paper III — विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी: स्वदेशीकरण, प्रौद्योगिकी का विकास और नई प्रौद्योगिकी का अनुप्रयोग।  |  GS Paper III — आंतरिक सुरक्षा: रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता।
  • Prelims: डीआरडीओ (DRDO), आत्मनिर्भर भारत, रक्षा विनिर्माण, एमएसएमई (MSME), स्टार्ट-अप, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, सॉफ्टवेयर सोर्स कोड साझाकरण, मेक इन इंडिया, आईडीईएक्स (iDEX), राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन
  • Essay: विकसित भारत @ 2047: तकनीकी आत्मनिर्भरता और आर्थिक सुदृढ़ता की ओर, रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण: भारत की सामरिक स्वायत्तता का मार्ग

त्वरित पुनरावृत्ति: रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने और ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को साकार करने के लिए डीआरडीओ-उद्योग सहयोग, एमएसएमई और स्टार्ट-अप को सशक्त बनाने तथा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर केंद्रित नीतिगत पहलें महत्वपूर्ण हैं।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

रक्षा मंत्री ने नई दिल्ली में ‘विमर्श’ डीआरडीओ-उद्योग सहयोग बैठक के दौरान एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम) और डीप-टेक स्टार्ट-अप उद्यमों को सशक्त बनाने के लिए कई नीतिगत पहलों की शुरुआत की। इन पहलों में तकनीकी और शुरुआती वित्तीय बाधाओं को कम करने के लिए एक व्यापक ढांचा, प्रत्यक्ष वित्त पोषण, इन्क्यूबेशन सहायता और डीआरडीओ परीक्षण सुविधाओं तक समर्पित पहुंच शामिल है। इसके अतिरिक्त, लाइसेंसधारी उद्योगों के साथ सॉफ्टवेयर सोर्स कोड साझा करने के लिए एक मानकीकृत और सुरक्षित ढांचा भी लॉन्च किया गया, जिससे रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलेगा।

पृष्ठभूमि

  • भारत सरकार ‘आत्मनिर्भर भारत’ के दृष्टिकोण के तहत रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने पर विशेष जोर दे रही है।
  • रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) भारत की रक्षा प्रौद्योगिकियों के अनुसंधान, डिजाइन और विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • एमएसएमई और स्टार्ट-अप को रक्षा आपूर्ति श्रृंखला में एकीकृत करना नवाचार को बढ़ावा देने और आयात निर्भरता को कम करने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
  • सरकार ने ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत रक्षा विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए कई सुधार किए हैं, जिसमें सकारात्मक स्वदेशीकरण सूचियों की अधिसूचना और रक्षा अनुसंधान एवं विकास बजट का एक हिस्सा निजी क्षेत्र को आवंटित करना शामिल है।
  • रक्षा नवाचार के लिए एक पारिस्थितिकी तंत्र बनाने हेतु ‘आईडीईएक्स (iDEX)’ और ‘एडीआईटीआई (ADITI)’ जैसी योजनाएं शुरू की गई हैं।
  • प्रौद्योगिकी हस्तांतरण (Technology Transfer) रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी उत्पादन क्षमताओं को बढ़ाने का एक प्रमुख माध्यम है।

डीआरडीओ-उद्योग सहयोग और संबंधित पहलें

  • डीआरडीओ-उद्योग सहयोग बैठक ‘विमर्श’ का उद्देश्य रक्षा आपूर्ति श्रृंखला में एमएसएमई और स्टार्ट-अप उद्यमों को एकीकृत करना है, जिससे भारत रक्षा विनिर्माण के लिए एक वैश्विक केंद्र बन सके।
  • नई नीतिगत पहलों में एमएसएमई और डीप-टेक स्टार्ट-अप के लिए तकनीकी और शुरुआती वित्तीय बाधाओं को कम करने हेतु प्रत्यक्ष वित्त पोषण, इन्क्यूबेशन सहायता और डीआरडीओ परीक्षण सुविधाओं तक समर्पित पहुंच शामिल है।
  • लाइसेंसधारी उद्योगों के साथ डीआरडीओ द्वारा विकसित सॉफ्टवेयर सोर्स कोड साझा करने के लिए एक मानकीकृत, सुरक्षित ढांचा लॉन्च किया गया है, जिससे सॉफ्टवेयर-संचालित रक्षा क्षमताओं को बढ़ावा मिलेगा।
  • तेरह विनिर्माण भागीदारों को नौ प्रौद्योगिकी हस्तांतरण लाइसेंसिंग समझौते (LATOTS) सौंपे गए, जिससे अत्याधुनिक प्रणालियों के वाणिज्यिक उत्पादन को सक्षम बनाया जा सके।
  • सोसाइटी ऑफ इंडियन डिफेंस मैन्युफैक्चरर्स (SIDM) और लघु उद्योग भारती (LUB) के साथ रणनीतिक समझौता ज्ञापनों का आदान-प्रदान किया गया, जिससे उद्योग की पहुंच का विस्तार हो और जमीनी स्तर पर भागीदारी को बढ़ावा मिले।
  • डीआरडीओ ने घरेलू रक्षा उद्यमों की विनिर्माण परिपक्वता का आकलन करने के लिए ‘सिस्टम फॉर एडवांस मैन्युफैक्चरिंग असेसमेंट एंड रेटिंग (SAMAR) वर्जन 2.0’ के लिए भारतीय गुणवत्ता परिषद के साथ एक अनुबंध पर भी हस्ताक्षर किए हैं।
  • रक्षा मंत्री ने जोर दिया कि डीआरडीओ-उद्योग सहयोग को अनुसंधान, डिजाइन, परीक्षण, प्रमाणन और विनिर्माण सहित पूरी मूल्य श्रृंखला में विस्तारित होना चाहिए।
  • ‘विकसित भारत’ का लक्ष्य केवल आर्थिक रूप से मजबूत राष्ट्र का निर्माण करना नहीं है, बल्कि इसे तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर, सामाजिक रूप से समावेशी, पर्यावरण की दृष्टि से टिकाऊ और रणनीतिक रूप से सुरक्षित बनाना भी है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
एमएसएमई और डीप-टेक स्टार्ट-अप के लिए व्यापक ढाँचा तकनीकी और शुरुआती वित्तीय बाधाओं को कम करना, प्रत्यक्ष वित्त पोषण और ऊष्मायन सहायता प्रदान करना।
सॉफ्टवेयर सोर्स कोड साझा करने के लिए ढाँचा सॉफ्टवेयर-संचालित रक्षा क्षमताओं को बढ़ाना और पुराने प्रबंधन को सुव्यवस्थित करना।
प्रौद्योगिकी हस्तांतरण लाइसेंसिंग समझौते (LATOTS) अत्याधुनिक प्रणालियों के वाणिज्यिक उत्पादन को सक्षम करना और घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देना।
सोसाइटी ऑफ इंडियन डिफेंस मैन्युफैक्चरर्स (SIDM) और लघु उद्योग भारती (LUB) के साथ समझौता ज्ञापन उद्योग तक पहुँच का विस्तार करना और जमीनी स्तर पर भागीदारी को बढ़ावा देना।
सिस्टम फॉर एडवांस मैन्युफैक्चरिंग असेसमेंट एंड रेटिंग (SAMAR) वर्जन 2.0 घरेलू रक्षा उद्यमों की विनिर्माण परिपक्वता का बेंचमार्किंग करना।

महत्व

आर्थिक महत्व

  • रक्षा विनिर्माण में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना, जिससे आयात निर्भरता कम होगी और विदेशी मुद्रा की बचत होगी।
  • घरेलू एमएसएमई और स्टार्ट-अप को सशक्त बनाना, जिससे रोजगार सृजन और आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) होगी।
  • भारत को रक्षा विनिर्माण के लिए एक वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करना, जिससे निर्यात क्षमता बढ़ेगी।

रणनीतिक महत्व

  • महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा मजबूत होगी।
  • रक्षा आपूर्ति श्रृंखला में लचीलापन और विश्वसनीयता बढ़ाना।
  • सॉफ्टवेयर-संचालित रक्षा क्षमताओं को उन्नत करना, जो आधुनिक युद्ध के लिए महत्वपूर्ण है।

तकनीकी महत्व

  • रक्षा अनुसंधान एवं विकास (Research and Development) में निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित करना।
  • अत्याधुनिक रक्षा प्रणालियों के स्वदेशी विकास और उत्पादन को गति देना।
  • नवाचार और दक्षता को बढ़ावा देना, जिससे रक्षा प्रौद्योगिकी में भारत की स्थिति मजबूत होगी।

चुनौतियाँ

1. तकनीकी हस्तांतरण और अवशोषण

  • डीआरडीओ (DRDO) द्वारा विकसित प्रौद्योगिकियों को उद्योग द्वारा प्रभावी ढंग से अवशोषित और व्यावसायिक रूप से उत्पादित करने में चुनौतियाँ।
  • उन्नत प्रौद्योगिकियों के लिए आवश्यक कुशल कार्यबल और बुनियादी ढाँचे की कमी।

2. वित्तीय और निवेश बाधाएँ

  • रक्षा क्षेत्र में एमएसएमई और स्टार्ट-अप के लिए पर्याप्त पूंजी तक पहुँच की कमी।
  • रक्षा परियोजनाओं में उच्च अनुसंधान एवं विकास लागत और लंबी विकास अवधि।

3. गुणवत्ता और मानकीकरण

  • घरेलू रक्षा उत्पादों के लिए वैश्विक गुणवत्ता मानकों को पूरा करने की चुनौती।
  • विनिर्माण प्रक्रियाओं और उत्पादों में मानकीकरण सुनिश्चित करना।

4. बौद्धिक संपदा अधिकार (Intellectual Property Rights) का प्रबंधन

  • प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के दौरान बौद्धिक संपदा अधिकारों की सुरक्षा और प्रबंधन सुनिश्चित करना।
  • सॉफ्टवेयर सोर्स कोड साझा करने से जुड़े सुरक्षा जोखिमों का प्रबंधन।

5. बाजार तक पहुँच और प्रतिस्पर्धा

  • घरेलू रक्षा उत्पादों के लिए एक स्थिर और विश्वसनीय बाजार सुनिश्चित करना।
  • वैश्विक रक्षा निर्माताओं के साथ प्रतिस्पर्धा करना।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
तकनीकी अवशोषण क्षमता उन्नत रक्षा प्रौद्योगिकियों को प्रभावी ढंग से अपनाने और उत्पादन करने की उद्योग की क्षमता।
स्टार्ट-अप के लिए वित्त पोषण उच्च जोखिम और लंबी अवधि वाली रक्षा परियोजनाओं के लिए पर्याप्त प्रारंभिक पूंजी की उपलब्धता।
गुणवत्ता नियंत्रण और प्रमाणन अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप घरेलू रक्षा उत्पादों की गुणवत्ता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करना।
साइबर सुरक्षा सॉफ्टवेयर सोर्स कोड साझा करने से उत्पन्न होने वाले संभावित साइबर खतरों से बचाव।
वैश्विक प्रतिस्पर्धा अंतर्राष्ट्रीय रक्षा बाजार में भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाना।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • मेक इन इंडिया (Make in India)
  • आईडीईएक्स (iDEX – Innovations for Defence Excellence)
  • एडीआईटीआई (ADITI – Acing Development of Innovative Technologies with iDEX)

आगे की राह

  • डीआरडीओ और उद्योग के बीच अनुसंधान, डिजाइन, परीक्षण और प्रमाणन सहित पूरी मूल्य श्रृंखला में सहयोग को गहरा करना।
  • एमएसएमई और स्टार्ट-अप के लिए वित्तीय सहायता तंत्र को और मजबूत करना, जिसमें प्रत्यक्ष वित्त पोषण और कर प्रोत्साहन शामिल हैं।
  • रक्षा क्षेत्र में कौशल विकास और क्षमता निर्माण कार्यक्रमों को बढ़ावा देना ताकि उन्नत प्रौद्योगिकियों को अवशोषित किया जा सके।
  • घरेलू रक्षा उत्पादों के लिए एक मजबूत परीक्षण और प्रमाणन पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना जो वैश्विक मानकों को पूरा करता हो।
  • रक्षा निर्यात को बढ़ावा देने के लिए एक आक्रामक रणनीति अपनाना और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में भारत की उपस्थिति बढ़ाना।
  • बौद्धिक संपदा अधिकारों की सुरक्षा के लिए एक मजबूत कानूनी और नियामक ढाँचा स्थापित करना।
  • साइबर सुरक्षा उपायों को मजबूत करना, विशेष रूप से सॉफ्टवेयर सोर्स कोड साझा करने के संदर्भ में।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

रक्षा विनिर्माण · आत्मनिर्भर भारत · रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) · सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) · स्टार्ट-अप · प्रौद्योगिकी हस्तांतरण · सॉफ्टवेयर सोर्स कोड साझाकरण · रक्षा निर्यात · मेक इन इंडिया · विकसित भारत

अवधारणा प्रवाह

डीआरडीओ द्वारा प्रौद्योगिकी विकास  →  उद्योग के साथ प्रौद्योगिकी हस्तांतरण  →  एमएसएमई और स्टार्ट-अप का सशक्तिकरण  →  घरेलू रक्षा विनिर्माण में वृद्धि  →  रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता  →  राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक संवृद्धि

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. ‘विमर्श’ डीआरडीओ-उद्योग सहयोग बैठक का उद्देश्य रक्षा आपूर्ति श्रृंखला में MSME और स्टार्ट-अप उद्यमों को एकीकृत करना है।
2. इस बैठक में लाइसेंसधारी उद्योगों के साथ डीआरडीओ द्वारा विकसित सॉफ्टवेयर सोर्स कोड साझा करने के लिए एक मानकीकृत ढांचा लॉन्च किया गया।
3. प्रौद्योगिकी विकास कोष के माध्यम से केवल बड़े रक्षा उद्योगों को अनुदान प्रदान किया जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 और 2 सही हैं। ‘विमर्श’ बैठक का मुख्य उद्देश्य रक्षा आपूर्ति श्रृंखला में MSME और स्टार्ट-अप को शामिल करना तथा सॉफ्टवेयर सोर्स कोड साझा करना है। कथन 3 गलत है क्योंकि प्रौद्योगिकी विकास कोष के माध्यम से स्टार्ट-अप को अनुदान प्रदान किया जाता है।

Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा/से रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार द्वारा की गई पहल/पहलों में शामिल है/हैं?
1. सकारात्मक स्वदेशीकरण सूचियों की अधिसूचना
2. ‘मेक इन इंडिया’ पहल
3. iDEX (रक्षा उत्कृष्टता के लिए नवाचार)
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।

  1. केवल 1 और 2
  2. केवल 2 और 3
  3. केवल 1 और 3
  4. 1, 2 और 3

उत्तर: 1, 2 और 3 — दिए गए सभी विकल्प (सकारात्मक स्वदेशीकरण सूचियाँ, ‘मेक इन इंडिया’ और iDEX) रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार द्वारा शुरू की गई प्रमुख पहलें हैं।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) तथा स्टार्ट-अप की भूमिका का परीक्षण कीजिए। ‘विमर्श’ डीआरडीओ-उद्योग सहयोग बैठक के संदर्भ में, इन उद्यमों को सशक्त बनाने के लिए की गई प्रमुख नीतिगत पहलों पर भी प्रकाश डालिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के लक्ष्य और MSME व स्टार्ट-अप के महत्व का संक्षिप्त परिचय।
2. MSME और स्टार्ट-अप की भूमिका: रक्षा विनिर्माण, नवाचार, अनुसंधान एवं विकास, रोजगार सृजन और निर्यात संवर्धन में इनकी भूमिका का विस्तृत वर्णन। ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के संदर्भ में इनकी प्रासंगिकता।
3. ‘विमर्श’ बैठक और नीतिगत पहलें:
a. तकनीकी और शुरुआती वित्तीय बाधाओं को कम करने के लिए व्यापक ढांचा: प्रत्यक्ष वित्त पोषण, इन्क्यूबेशन सहायता, DRDO परीक्षण सुविधाओं तक पहुंच।
b. सॉफ्टवेयर सोर्स कोड साझा करने के लिए मानकीकृत, सुरक्षित ढांचा।
c. प्रौद्योगिकी हस्तांतरण लाइसेंसिंग समझौते (LATOTS) का वितरण।
d. SIDM और लघु उद्योग भारती के साथ समझौता ज्ञापन।
e. SAMAR (System for Advance Manufacturing Assessment and Rating) वर्जन 2.0 के लिए भारतीय गुणवत्ता परिषद के साथ अनुबंध।
f. रक्षा अनुसंधान एवं विकास बजट का 25% निजी क्षेत्र को आवंटित करने का निर्णय।
g. प्रौद्योगिकी विकास कोष के माध्यम से स्टार्ट-अप को अनुदान।
h. iDEX (रक्षा उत्कृष्टता के लिए नवाचार) और ADITI जैसी पहलें।
4. निष्कर्ष: इन पहलों के माध्यम से रक्षा विनिर्माण में भारत को वैश्विक केंद्र बनाने और ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में MSME और स्टार्ट-अप के महत्व पर बल।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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