24 Oct वन अधिकार अधिनियम के कार्यान्वयन पर तीसरा क्षेत्रीय समीक्षा सम्मेलन: प्रमुख बिंदु और चुनौतियाँ
✎ वन अधिकार अधिनियम, 2006 वन-आश्रित समुदायों को व्यक्तिगत, सामुदायिक और सामुदायिक वन संसाधन (CFR) अधिकार प्रदान करता है; दावों की प्रक्रिया ग्राम सभा से शुरू होती है, नोडल मंत्रालय जनजातीय कार्य मंत्रालय है, और आदिम जनजाति समूहों…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — शासन: अनुसूचित जनजातियों और वन-आश्रित समुदायों के लिए कल्याणकारी नीतियां तथा उनके कार्यान्वयन की व्यवस्था | GS Paper II — राजव्यवस्था: पंचायती राज संस्थाओं और ग्राम सभा की संवैधानिक एवं वैधानिक भूमिका | GS Paper III — पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी: वन संरक्षण, सतत विकास और वन-आश्रित समुदायों की आजीविका के बीच संतुलन | GS Paper I — समाज: भारत में जनजातीय समुदायों की विविधता और आदिम जनजाति समूह (PVTG)
- Prelims: वन अधिकार अधिनियम, 2006 (Forest Rights Act — FRA): नोडल मंत्रालय जनजातीय कार्य मंत्रालय, ग्राम सभा: वन अधिकार दावों की प्रक्रिया शुरू करने वाली इकाई, सामुदायिक वन संसाधन अधिकार (Community Forest Resource Rights — CFR), आदिम जनजाति समूह (PVTG): देश में कुल 75 समूह, आवास अधिकार: विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों के लिए, 13 दिसंबर 2005: अधिनियम में वन भूमि पर कब्जे की पात्रता की कट-ऑफ तिथि, पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 (PESA), राष्ट्रीय वन अधिकार पोर्टल (FRA Portal) और iGOT पर उपलब्ध प्रशिक्षण पाठ्यक्रम
- Essay: वन संरक्षण और जनजातीय अधिकारों में संतुलन: क्या सतत विकास संभव है?, अधिकार-आधारित शासन में प्रक्रियागत न्याय: दावों का पारदर्शी और समयबद्ध निपटान क्यों आवश्यक है?
त्वरित पुनरावृत्ति: वन अधिकार अधिनियम, 2006 वन-आश्रित समुदायों को व्यक्तिगत, सामुदायिक और सामुदायिक वन संसाधन (CFR) अधिकार प्रदान करता है; दावों की प्रक्रिया ग्राम सभा से शुरू होती है, नोडल मंत्रालय जनजातीय कार्य मंत्रालय है, और आदिम जनजाति समूहों के लिए आवास अधिकार का विशेष प्रावधान है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
जनजातीय कार्य मंत्रालय ने जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर में वन अधिकार अधिनियम के कार्यान्वयन पर तीसरा क्षेत्रीय समीक्षा सम्मेलन आयोजित किया। इसके साथ ही बेंगलुरु और कोलकाता में हुए सम्मेलनों के बाद यह श्रृंखला पूरी हुई। सम्मेलन में महाराष्ट्र, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गोवा, राजस्थान और जम्मू-कश्मीर के अधिकारियों ने लंबित दावों, वन अधिकारों की मान्यता, सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों और आजीविका योजनाओं के समन्वय की समीक्षा की। मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 31 अगस्त 2026 तक लगभग 54 लाख दावे प्राप्त हुए थे, जिनमें से 43.56 लाख (80.64 प्रतिशत) का निपटारा हो चुका था। लगभग 25.42 लाख अधिकार-पत्र वितरित किए गए, जबकि 10.45 लाख दावे लंबित और 18.13 लाख दावे खारिज थे। सम्मेलन में खारिज दावों के लिए तर्कसंगत आदेश, दावेदार को सूचना और अपील के वैधानिक अधिकार की सुरक्षा पर विशेष बल दिया गया। यह सम्मेलन 27 जुलाई 2026 को जनजातीय कार्य मंत्रालय और पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के संयुक्त संचार के बाद हुआ, जिसमें सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन योजनाओं को वन विभाग की कार्ययोजनाओं से जोड़ने पर सहमति बनी थी।
पृष्ठभूमि
- भारतीय वन अधिनियम, 1927 सहित औपनिवेशिक वन कानूनों ने वन-आश्रित समुदायों के पारंपरिक उपयोग के अधिकारों को सीमित कर दिया था। वन अधिकार अधिनियम इसी ऐतिहासिक अन्याय के निवारण के लिए लाया गया।
- वन अधिकार अधिनियम 2006 में पारित हुआ और 1 जनवरी 2008 से लागू हुआ। इसके नियम 2008 में अधिसूचित हुए और बाद में 2012 में संशोधित किए गए।
- अधिनियम के अंतर्गत दावों की जांच त्रि-स्तरीय समितियों द्वारा होती है: उप-मंडल स्तरीय समिति, जिला स्तरीय समिति और राज्य स्तरीय निगरानी समिति। अंतिम प्रमाणन ग्राम सभा की अनुशंसा से जुड़ा है।
- इस अधिनियम का क्षेत्र केवल अनुसूचित क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। यह देश भर में लागू है, जबकि पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा की शक्तियों को विस्तृत करता है।
- सामुदायिक वन संसाधन अधिकार और वन संरक्षण के बीच समन्वय की आवश्यकता बढ़ी है, क्योंकि वन संरक्षण से जुड़े कानूनी ढांचे में भी संशोधन होते रहे हैं।
- जनजातीय कार्य मंत्रालय ने क्षेत्रीय समीक्षा सम्मेलनों की श्रृंखला के माध्यम से राज्यवार प्रगति, लंबित मामलों और प्रशासनिक बाधाओं की नियमित निगरानी को संस्थागत रूप दिया है।
वन अधिकार अधिनियम क्या है?
- वन अधिकार अधिनियम (Forest Rights Act — FRA), 2006 का पूरा नाम अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 है। इसका उद्देश्य वन-आश्रित समुदायों के वैधानिक अधिकारों को मान्यता देना है।
- अधिनियम तीन प्रमुख प्रकार के अधिकार मान्यता देता है: व्यक्तिगत वन अधिकार (जैसे आवास और कृषि हेतु भूमि), सामुदायिक अधिकार (जैसे लघु वनोपज का उपयोग) और सामुदायिक वन संसाधन अधिकार (CFR)।
- कृषि के लिए भूमि का दावा वही व्यक्ति कर सकता है जो 13 दिसंबर 2005 से पूर्व उस भूमि पर वास्तव में काबिज रहा हो। एक दावे में अधिकतम भूमि की सीमा अधिनियम में निर्धारित है।
- दावों की प्रक्रिया ग्राम सभा से शुरू होती है। ग्राम सभा सत्यापन करके अनुशंसा करती है, और अंतिम निर्णय त्रि-स्तरीय समितियों द्वारा लिया जाता है। खारिज दावे के विरुद्ध अपील का वैधानिक प्रावधान है।
- आदिम जनजाति समूहों (PVTG) को आवास अधिकार (habitat rights) प्रदान किए जाते हैं, जिससे उनके पारंपरिक निवास क्षेत्र की सुरक्षा होती है। देश में ऐसे 75 समूह चिह्नित हैं, जिनमें से अब तक 11 के आवास अधिकारों को मान्यता मिली है।
- अधिनियम की धारा के अनुसार वन अधिकार प्राप्त होने तक ऐसे निवासियों को बेदखल नहीं किया जा सकता। यह प्रावधान अधिकारों की सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार है।
- मान्यता प्राप्त अधिकारों को राजस्व अभिलेखों में दर्ज करने से लाभार्थी पीएम-किसान (PM-KISAN) तथा कृषि, मत्स्य पालन और आजीविका संबंधी योजनाओं के पात्र बन सकते हैं।
- नोडल मंत्रालय जनजातीय कार्य मंत्रालय है। राज्य सरकारें दावों का निपटान करती हैं, और राष्ट्रीय वन अधिकार पोर्टल (FRA Portal) के माध्यम से अभिलेखों की डिजिटल निगरानी होती है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| अधिनियम की पृष्ठभूमि | अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 (Scheduled Tribes and Other Traditional Forest Dwellers (Recognition of Forest Rights) Act, 2006) वन-आश्रित समुदायों के ऐतिहासिक अन्याय के निवारण के लिए बना; यह व्यक्तिगत वन अधिकार, सामुदायिक वन अधिकार और सामुदायिक वन संसाधन अधिकार (CFRR) को मान्यता देता है |
| दावा प्रक्रिया | दावों की शुरुआत ग्राम सभा से होती है और निपटान उप-विभागीय तथा जिला स्तरीय समितियों के माध्यम से किया जाता है; खारिज दावों के लिए अपील का वैधानिक अधिकार सुरक्षित है |
| अधिकार-पत्र और राजस्व अभिलेख | मान्यता प्राप्त अधिकार राजस्व अभिलेखों में दर्ज होते हैं, जिससे पीएम-किसान तथा कृषि, मत्स्य पालन और आजीविका योजनाओं का लाभ लेना सरल होता है |
| नोडल एवं सहयोगी मंत्रालय | जनजातीय कार्य मंत्रालय नोडल मंत्रालय है; 27 जुलाई 2026 को जारी संयुक्त संचार के माध्यम से पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के साथ समन्वय सुनिश्चित किया गया |
| राष्ट्रीय एफआरए पोर्टल | राज्यों के एफआरए अभिलेखों को एप्लिकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस (API) के माध्यम से राष्ट्रीय पोर्टल से जोड़ने का लक्ष्य है, जिससे डिजिटल निगरानी संभव होती है |
| क्षेत्रीय समीक्षा श्रृंखला | बेंगलुरु (10 सितंबर 2026), कोलकाता (9 अक्टूबर 2026) और श्रीनगर (23 अक्टूबर 2026) के सम्मेलनों के साथ यह श्रृंखला संपन्न हुई; इसमें सात राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों ने भाग लिया |
महत्व
सामाजिक न्याय एवं गरिमा
- वन अधिकार अधिनियम वन-आश्रित समुदायों की गरिमा और पहचान की रक्षा करता है, जो संविधान के समतामूलक दृष्टिकोण से जुड़ा है
- विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTG) के आवास अधिकारों की मान्यता से उनकी सामाजिक सुरक्षा सुदृढ़ होती है
आर्थिक एवं आजीविका
- लगभग 238 लाख एकड़ भूमि पर 25.42 लाख अधिकार-पत्र वितरित होने से वन-आश्रित परिवारों को भूमि-आधारित आजीविका का आधार मिला है
- मान्यता प्राप्त अधिकारों के राजस्व अभिलेखों में दर्ज होने से कृषि और मत्स्य पालन की योजनाओं तक पहुँच बढ़ती है
पर्यावरणीय एवं सतत विकास
- सामुदायिक वन संसाधन अधिकार वन संरक्षण को स्थानीय सहभागिता से जोड़ते हैं, जिससे संरक्षण और आजीविका साथ-साथ आगे बढ़ते हैं
- वन विभाग की कार्ययोजनाओं और सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन योजनाओं का समन्वय सतत प्रबंधन का व्यावहारिक ढाँचा प्रदान करता है
शासन एवं संघीय समन्वय
- बहु-राज्य समीक्षा से राज्यों के अनुभव साझा होते हैं और जिला-वार कार्ययोजनाओं के माध्यम से समान मानकों की दिशा में प्रगति होती है
- केंद्र और राज्यों के बीच नीतिगत समन्वय तथा ग्राम सभाओं की भागीदारी से सहभागी शासन की भावना सुदृढ़ होती है
चुनौतियाँ
1. लंबित दावे और निपटान की धीमी गति
- 31 अगस्त 2026 तक प्राप्त लगभग 54 लाख दावों में से 10.45 लाख दावे लंबित थे, जो प्रशासनिक विलंब का संकेत है
- दावों के समयबद्ध निपटान के लिए राज्यों को जिला-वार कार्ययोजनाएँ बनाने की आवश्यकता है, विशेषकर गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा और हिमाचल प्रदेश में
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय; सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में प्रशासनिक बाधाएँ
2. खारिज दावों की उच्च दर और तर्कसंगत आदेश
- निपटाए गए 43.56 लाख दावों में से 18.13 लाख दावे खारिज किए गए, जो लगभग 41.6 प्रतिशत है
- प्रत्येक खारिज दावे के लिए तर्कसंगत आदेश और दावेदार को सूचना देना तथा अपील का अधिकार सुरक्षित रखना आवश्यक है
यूपीएससी लिंक: शासन में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व; प्रशासनिक निर्णयों की न्यायिक समीक्षा
3. PVTG के आवास अधिकारों की धीमी मान्यता
- देश के 75 विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों में से अब तक केवल 11 के आवास अधिकारों को मान्यता मिली है
- इन समूहों की विशिष्ट सामाजिक-आर्थिक स्थिति को देखते हुए विशेष प्रक्रिया और प्राथमिकता की आवश्यकता है
यूपीएससी लिंक: अनुसूचित जनजातियाँ; PVTG का संवैधानिक और नीतिगत संरक्षण
4. दुर्गम भूगोल और मौसमी चरवाहा जीवन
- जम्मू-कश्मीर में दुर्गम इलाके, बिखरी हुई बस्तियाँ और मौसमी चरवाहा गतिविधियाँ दावा प्रक्रिया को जटिल बनाती हैं
- स्थानीय रूप से उपयुक्त प्रशासनिक व्यवस्था और स्थानीय भाषा में सूचना-प्रसार आवश्यक है
यूपीएससी लिंक: पर्वतीय एवं दुर्गम क्षेत्रों का प्रशासन; पशुपालन और घुमंतू समुदाय
5. वन विभाग और ग्राम सभा के बीच समन्वय
- सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन योजनाओं को वन विभाग की कार्ययोजनाओं के साथ जोड़ना एक चुनौती है
- वन संरक्षण के लक्ष्य और सामुदायिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखने हेतु स्पष्ट प्रक्रियात्मक ढाँचा चाहिए
यूपीएससी लिंक: वन संरक्षण एवं जनजातीय अधिकारों का संतुलन; पर्यावरण शासन
6. डिजिटल एकीकरण और ग्राम सभा की क्षमता
- राज्य के अभिलेखों का राष्ट्रीय एफआरए पोर्टल से API के माध्यम से एकीकरण तकनीकी और प्रशासनिक दोनों स्तर पर जटिल है
- ग्राम सभाओं और अधिकारियों की क्षमता निर्माण के लिए iGOT पर उपलब्ध निःशुल्क पाठ्यक्रमों का उपयोग बढ़ाना आवश्यक है
यूपीएससी लिंक: ई-शासन और डिजिटल इंडिया के सिद्धांत; पंचायती राज में ग्राम सभा की भूमिका
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| लंबित दावे | 10.45 लाख दावे लंबित होने से पात्र परिवारों को अधिकार-पत्र देर से मिलते हैं |
| खारिज दावे | 18.13 लाख दावे खारिज होना तभी स्वीकार्य है जब आदेश तर्कसंगत हों और अपील का अधिकार सुरक्षित रहे |
| PVTG आवास अधिकार | 75 में से केवल 11 समूहों की मान्यता से सबसे कमजोर समुदायों का आवास सुरक्षित नहीं हो पाता |
| भूगोल और मौसमी आवागमन | दुर्गम क्षेत्र और चरवाहा गतिविधियाँ दावा दर्ज करने और सत्यापन में बाधा बनती हैं |
| वन विभाग के साथ समन्वय | सामुदायिक वन संसाधन योजनाओं और वन कार्ययोजनाओं में विरोध से सतत प्रबंधन प्रभावित हो सकता है |
| डिजिटल अभिलेख | पोर्टल पर अधूरे या असंगत अभिलेख नीति-निगरानी को कमजोर करते हैं |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN)
- धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान (DA-JGUA)
- जनजातीय अनुसंधान संस्थानों को सहायता योजना
आगे की राह
- लंबित दावों के निपटान के लिए जिला-वार समयबद्ध कार्ययोजनाएँ लागू की जाएँ और उनकी नियमित समीक्षा हो
- खारिज दावों की पुनर्समीक्षा के लिए तर्कसंगत आदेश, सूचना और अपील की प्रक्रिया को मानकीकृत किया जाए
- PVTG के आवास अधिकारों की मान्यता के लिए विशेष प्रक्रिया और प्राथमिकता-आधारित समय-सीमा तय की जाए
- सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन योजनाओं और वन विभाग की कार्ययोजनाओं के बीच संयुक्त समन्वय तंत्र बनाया जाए
- ग्राम सभाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए क्षमता निर्माण कार्यक्रम, विशेषकर iGOT के निःशुल्क पाठ्यक्रमों के माध्यम से, चलाए जाएँ
- राज्य स्तरीय निगरानी समितियों की तिमाही बैठकें और मासिक प्रगति रिपोर्ट नियमित रूप से सुनिश्चित की जाएँ
- राज्य के अभिलेखों का राष्ट्रीय एफआरए पोर्टल से पूर्ण एकीकरण कर वास्तविक समय की निगरानी स्थापित की जाए
- दुर्गम और पर्वतीय क्षेत्रों के लिए स्थानीय रूप से उपयुक्त प्रशासनिक व्यवस्था और घुमंतू समुदायों के लिए विशेष सत्यापन प्रक्रिया अपनाई जाए
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
वन अधिकार अधिनियम, 2006 · सामुदायिक वन संसाधन अधिकार · ग्राम सभा · विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह · वन-आधारित आजीविका · दावों का निपटारा · वन संरक्षण · सतत विकास · जनजातीय कार्य मंत्रालय · राष्ट्रीय एफआरए पोर्टल
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 243A: ग्राम सभा की भूमिका का संवैधानिक आधार
- अनुच्छेद 342: PVTG की अनुसूचित जनजाति के रूप में अधिसूचना
- अनुच्छेद 46: अनुसूचित जनजातियों के आर्थिक हितों का संरक्षण
अवधारणा प्रवाह
वन-आश्रित समुदाय ग्राम सभा के माध्यम से व्यक्तिगत, सामुदायिक या आवास संबंधी दावे प्रस्तुत करते हैं → उप-विभागीय और जिला स्तरीय समितियाँ दावों का सत्यापन कर उनका निपटान करती हैं → स्वीकृत दावों पर अधिकार-पत्र जारी होते हैं और मान्यता प्राप्त अधिकार राजस्व अभिलेखों में दर्ज होते हैं → दर्ज अभिलेख राष्ट्रीय एफआरए पोर्टल के माध्यम से निगरानी में आते हैं और योजनाओं (जैसे पीएम-किसान) की पात्रता तय करते हैं → खारिज दावों पर तर्कसंगत आदेश और अपील का अधिकार सुनिश्चित होने से प्रक्रिया की वैधता बनी रहती है → राज्य-स्तरीय समीक्षा और क्षेत्रीय सम्मेलनों में बाधाओं की पहचान कर समयबद्ध कार्य योजनाएँ तय होती हैं → सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन योजनाएँ वन विभाग की कार्ययोजनाओं से जुड़कर सतत वन संरक्षण और आजीविका सुनिश्चित करती हैं
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. वन अधिकार अधिनियम, 2006, केवल अनुसूचित जनजातियों को वन अधिकारों की मान्यता प्रदान करता है।
2. इस अधिनियम के तहत सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों (CFRR) की मान्यता में ग्राम सभा की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
3. जनजातीय कार्य मंत्रालय वन अधिकार अधिनियम के कार्यान्वयन के लिए नोडल मंत्रालय है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 गलत है क्योंकि वन अधिकार अधिनियम, 2006 अनुसूचित जनजातियों के साथ-साथ अन्य परंपरागत वन निवासियों को भी वन अधिकारों की मान्यता प्रदान करता है। कथन 2 सही है, सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों की मान्यता और प्रबंधन में ग्राम सभा की केंद्रीय भूमिका होती है। कथन 3 सही है, जनजातीय कार्य मंत्रालय वन अधिकार अधिनियम के कार्यान्वयन के लिए जिम्मेदार नोडल मंत्रालय है।
Q2. वन अधिकार अधिनियम, 2006 के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है?
- यह अधिनियम वन भूमि पर व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकारों को मान्यता देता है।
- यह अधिनियम वन संरक्षण और सतत विकास को बढ़ावा देता है।
- इस अधिनियम के तहत खारिज किए गए दावों की अपील का कोई प्रावधान नहीं है।
- विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTGs) के आवास अधिकारों को मान्यता देना इस अधिनियम का एक महत्वपूर्ण पहलू है।
उत्तर: इस अधिनियम के तहत खारिज किए गए दावों की अपील का कोई प्रावधान नहीं है। — वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत खारिज किए गए दावों के लिए अपील करने का वैधानिक अधिकार सुरक्षित है, जैसा कि जनजातीय कार्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव ने भी उल्लेख किया है। अतः, विकल्प C सही नहीं है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ वन अधिकार अधिनियम, 2006 वन-आधारित समुदायों के अधिकारों को मान्यता देने और वन संरक्षण को बढ़ावा देने में एक महत्वपूर्ण उपकरण है। इसके कार्यान्वयन में आने वाली प्रमुख चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए तथा इन चुनौतियों से निपटने के लिए आवश्यक कदमों पर चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर में वन अधिकार अधिनियम, 2006 (FRA) के उद्देश्यों का संक्षिप्त परिचय दें। अधिनियम के कार्यान्वयन में आने वाली प्रमुख चुनौतियों को विस्तार से बताएं, जैसे: लंबित दावों की बड़ी संख्या, खारिज किए गए दावों की अपर्याप्त समीक्षा, सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों (CFRR) की धीमी मान्यता, राजस्व अभिलेखों में अधिकारों का दर्ज न होना, विभिन्न विभागों के बीच समन्वय की कमी, ग्राम सभाओं की सीमित भागीदारी, जागरूकता और क्षमता निर्माण का अभाव, और विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTGs) के आवास अधिकारों की धीमी प्रगति। इन चुनौतियों से निपटने के लिए सुझाए गए कदमों पर चर्चा करें, जिनमें शामिल हैं: समयबद्ध कार्ययोजनाएं, खारिज किए गए दावों की तर्कसंगत समीक्षा, CFRR प्रबंधन योजनाओं का वन विभाग की कार्ययोजनाओं के साथ समन्वय, राजस्व अभिलेखों में अधिकारों का पंजीकरण, अंतर-विभागीय समन्वय में सुधार, ग्राम सभाओं का सशक्तिकरण, जागरूकता कार्यक्रम, iGOT जैसे प्लेटफार्मों का उपयोग, और राष्ट्रीय एफआरए पोर्टल के साथ राज्य अभिलेखों का एकीकरण।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
Jammu & Kashmir PCS (JKPSC (KAS)) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: वन अधिकार अधिनियम, 2006 के कार्यान्वयन पर तीसरे क्षेत्रीय समीक्षा सम्मेलन का आयोजन श्रीनगर में किसके द्वारा किया गया था?
- A. राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग
- B. वन एवं पर्यावरण मंत्रालय, भारत सरकार
- C. जम्मू एवं कश्मीर राज्य वन विभाग
- D. नीति आयोग
उत्तर: B. वन एवं पर्यावरण मंत्रालय, भारत सरकार — वन अधिकार अधिनियम के कार्यान्वयन पर तीसरा क्षेत्रीय समीक्षा सम्मेलन श्रीनगर में वन एवं पर्यावरण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा आयोजित किया गया था।
Mains: वन अधिकार अधिनियम, 2006 के प्रमुख प्रावधानों की चर्चा करते हुए, जम्मू एवं कश्मीर राज्य में इसके प्रभावी कार्यान्वयन के लिए आवश्यक सुधारों पर प्रकाश डालिए।
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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