विकसित भारत 2047: राष्ट्रीय शहरी सम्मेलन 2026 में उठे प्रमुख सुधार और नीति सुझाव

विकसित भारत 2047: राष्ट्रीय शहरी सम्मेलन 2026 में उठे प्रमुख सुधार और नीति सुझाव

विकसित भारत 2047: राष्ट्रीय शहरी सम्मेलन 2026 में उठे प्रमुख सुधार और नीति सुझाव

विकसित भारत 2047 की ओर शहरी सुधार प्रक्रियासमस्या पहचानशहरी प्रशासन में कमीसुझाव एकत्रराष्ट्रीय शहरी सम्मेलन 2026नीति निर्माणनीति आयोग के सुझावकार्यान्वयनराष्ट्रीय शहरी मिशननिगरानीसेवाओं की गुणवत्तासुधारसंस्थागत क्षमता बढ़ाना
विकसित भारत 2047 की ओर शहरी सुधार प्रक्रिया

✎ शहरी शासन की सफलता का पैमाना परियोजनाओं का पूरा होना नहीं, बल्कि सेवाओं की गुणवत्ता है, और इसके लिए 74वें संविधान संशोधन के अनुरूप नगर निकायों को शक्ति, वित्तीय स्वायत्तता और जवाबदेही देना आवश्यक है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper I — भारतीय समाज (शहरीकरण, शहरी समस्याएँ और उनका समाधान)  |  GS Paper II — राजव्यवस्था (73वाँ और 74वाँ संविधान संशोधन, नगर निकाय, सहकारी संघवाद, केन्द्र-राज्य-स्थानीय शासन संबंध)  |  GS Paper II — शासन (सेवाओं की सुपुर्दगी, नागरिक-केंद्रित प्रशासन, जवाबदेही)  |  GS Paper III — अर्थव्यवस्था (शहरी बुनियादी ढांचा, नगर निकायों का वित्त, राजस्व-स्रोत, किफायती आवास, आर्थिक संवृद्धि)  |  GS Paper III — पर्यावरण (ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, पुराने कचरे का निपटान, चक्रीय अर्थव्यवस्था)
  • Prelims: 74वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 (भाग IXA, अनुच्छेद 243Q–243ZG), अनुच्छेद 243W (नगर निकायों की शक्तियाँ और दायित्व) तथा अनुच्छेद 243X (नगर निकायों के वित्त), बारहवीं अनुसूची (नगर निकायों के 18 कार्य), अनुच्छेद 243Y (राज्य वित्त आयोग), अटल नवीकरण और शहरी परिवर्तन मिशन (AMRUT) और प्रधानमंत्री स्वनिधि (PM SVANidhi), स्वच्छ भारत मिशन-शहरी (Swachh Bharat Mission-Urban), ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 और विरासती कचरे का जैव-उपचार (Biomining), सिटी इकोनॉमिक रीजन (City Economic Regions) और अर्बन चैलेंज फंड (Urban Challenge Fund)
  • Essay: शहर: विकसित भारत की इंजन या चुनौती?, सुदृढ़ शहरी शासन के लिए सशक्त नगर निकाय: शक्ति, वित्त और जवाबदेही का समन्वय

त्वरित पुनरावृत्ति: शहरी शासन की सफलता का पैमाना परियोजनाओं का पूरा होना नहीं, बल्कि सेवाओं की गुणवत्ता है, और इसके लिए 74वें संविधान संशोधन के अनुरूप नगर निकायों को शक्ति, वित्तीय स्वायत्तता और जवाबदेही देना आवश्यक है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय ने भुवनेश्वर में ‘राष्ट्रीय शहरी सम्मेलन 2026’ का आयोजन किया, जिसका उद्देश्य ‘विकसित भारत 2047’ की दिशा में शहरी प्रशासन, शहरी योजना और सेवाओं की आपूर्ति को सुदृढ़ करने के व्यावहारिक सुझाव जुटाना था। सम्मेलन में सात तकनीकी सत्र हुए। समापन सत्र में मंत्रालय के शहरी विकास विभाग के सचिव ने इस बात पर बल दिया कि सफलता को परियोजना के पूरा होने के बजाय सेवाओं की गुणवत्ता से आँका जाए, और नगर निकायों की संस्थागत क्षमता, विभिन्न एजेंसियों के समन्वय, नगर निकायों की वित्तीय स्थिति और जवाबदेही को सुधारा जाए। नीति आयोग के सदस्य ने शहरी स्थानीय निकायों को अधिक शक्तियाँ और वित्तीय अधिकार सौंपने, अपने राजस्व-स्रोत मजबूत करने, भूमि-उपयोग योजना में सुधार करने तथा परिवहन-केंद्रित और मिश्रित-उपयोग विकास को बढ़ावा देने का आग्रह किया। सम्मेलन में ‘अर्बन चैलेंज फंड’ और ‘सिटी इकोनॉमिक रीजन’ जैसी पहलों के संदर्भ में राज्यों से संरचनात्मक सुधार करने और राष्ट्रीय शहरी मिशनों की निधि को सुधारों के क्रियान्वयन से जोड़ने का सुझाव दिया गया।

पृष्ठभूमि

  • भारत में शहरीकरण तेजी से बढ़ रहा है। जनगणना 2011 के अनुसार देश की लगभग 31.16 प्रतिशत जनसंख्या शहरों में रहती थी, और शहरी क्षेत्र आर्थिक उत्पादन में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
  • 1992 से पहले नगरपालिकाओं को संवैधानिक दर्जा नहीं था। 74वें संविधान संशोधन ने नगर पालिकाओं और नगर निगमों को संवैधानिक आधार दिया, नियमित चुनाव, राज्य वित्त आयोग और बारहवीं अनुसूची के 18 कार्य निर्धारित किए। इसके बावजूद कार्यों और वित्तीय अधिकारों का वास्तविक हस्तांतरण कई राज्यों में अपूर्ण रहा है।
  • 2014 में स्वच्छ भारत मिशन-शहरी, 2015 में अमृत और स्मार्ट सिटी मिशन, तथा 2020 में प्रधानमंत्री स्वनिधि जैसे राष्ट्रीय शहरी मिशन आरंभ हुए। इन मिशनों से जल, स्वच्छता, अपशिष्ट प्रबंधन, शहरी आवागमन और वित्तीय समावेशन में प्रगति हुई है।
  • ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 के बाद पुराने कचरे (विरासती कचरा) के निपटान पर विशेष ध्यान दिया गया है। सम्मेलन में बताया गया कि देश के आधे से अधिक विरासती कचरे का निपटान हो चुका है, और अब नए कचरे को जमा होने से रोकना प्राथमिकता है।
  • ‘विकसित भारत 2047’ का लक्ष्य वर्ष 2047 तक विकसित भारत बनाने का दीर्घकालिक दृष्टिकोण है, जिसमें शहर आर्थिक संवृद्धि के मुख्य केंद्र माने गए हैं। शहरी शासन की सहकारी संघवाद की भावना के अंतर्गत केंद्र, राज्यों और नगर निकायों के सहयोग पर आधारित है, क्योंकि नगर निकाय संविधान की राज्य सूची के विषय हैं।

शहरी प्रशासन और नगर निकाय क्या हैं?

  • नगर निकाय वे स्थानीय स्वशासन संस्थाएँ हैं जो शहरी क्षेत्रों में नगर पालिका, नगर परिषद और नगर निगम के रूप में कार्य करती हैं। इनका गठन राज्य विधानमंडल के कानून के तहत होता है।
  • 74वें संविधान संशोधन के अंतर्गत अनुच्छेद 243W राज्य विधानमंडल को नगर निकायों को स्वशासन की इकाई के रूप में कार्य करने हेतु शक्तियाँ और अधिकार सौंपने का अधिकार देता है। अनुच्छेद 243X नगर निकायों के वित्त से संबंधित है।
  • अनुच्छेद 243I और 243Y के अंतर्गत गठित राज्य वित्त आयोग राज्य और नगर निकायों के बीच करों, शुल्कों और अनुदानों के वितरण की सिफारिश करता है।
  • बारहवीं अनुसूची में नगर नियोजन, जल आपूर्ति, सार्वजनिक स्वास्थ्य, स्वच्छता, अपशिष्ट प्रबंधन, नगरीय वानिकी और झुग्गी सुधार जैसे 18 विषय सूचीबद्ध हैं।
  • नगर निकायों के प्रमुख स्वयं के राजस्व स्रोतों में संपत्ति कर, उपयोगकर्ता शुल्क, विकास शुल्क और विज्ञापन शुल्क आते हैं। इनकी कमजोरी के कारण नगर निकाय प्रायः राज्य और केंद्र के अनुदानों पर निर्भर रहते हैं।
  • सेवाओं की आपूर्ति में सुधार के लिए संस्थागत क्षमता, विभिन्न एजेंसियों (जल, विद्युत, परिवहन, नगर निकाय) के बीच समन्वय, डिजिटल प्रबंधन और सेवा-स्तर मानकों का निर्धारण आवश्यक है।
  • परिवहन-केंद्रित विकास (Transit Oriented Development) में मेट्रो और बस स्टेशनों के निकट उच्च घनत्व और मिश्रित-उपयोग वाले आवास व व्यावसायिक क्षेत्र विकसित किए जाते हैं, जिससे आवागमन की लागत घटती है और किफायती आवास को बढ़ावा मिलता है।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
सम्मेलन का स्वरूप ‘राष्ट्रीय शहरी सम्मेलन 2026’ का आयोजन आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय ने भुवनेश्वर में किया। इसमें सात तकनीकी सत्र हुए और नीतिगत चर्चाओं को कार्यान्वयन योग्य समाधानों में बदलने पर बल दिया गया।
केंद्रीय ढाँचा ‘अमृत’ (Atal Mission for Rejuvenation and Urban Transformation, AMRUT), ‘स्वच्छ भारत मिशन-शहरी’ (Swachh Bharat Mission-Urban, SBM-U) और ‘पीएम स्वनिधि’ (PM SVANidhi) जैसे राष्ट्रीय शहरी मिशनों की प्रगति को उपलब्धि के रूप में रेखांकित किया गया।
सेवा-उन्मुख मूल्यांकन सफलता को परियोजना पूरी होने के बजाय सेवाओं की गुणवत्ता के आधार पर आँकने का सिद्धांत रखा गया। इससे परिणाम-आधारित शासन की दिशा मजबूत होती है।
वित्तीय सुधार का प्रस्ताव शहरी स्थानीय निकायों के अपने राजस्व स्रोतों को सुदृढ़ करने और केंद्रीय मिशनों की फंडिंग को संरचनात्मक सुधारों के क्रियान्वयन से जोड़ने का सुझाव दिया गया।
सहकारी संघवाद का भाव मंत्रालय ने राज्यों, शहरों और सहयोगी संस्थानों के साथ मिलकर काम करने का संकल्प दोहराया, जो सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) की भावना के अनुरूप है।
लक्ष्य-वर्ष ‘विकसित भारत 2047’ के विजन से शहरी नियोजन को जोड़ा गया, ताकि शहर आर्थिक विकास के वाहक के रूप में अपनी क्षमता का पूरा उपयोग कर सकें।

महत्व

प्रशासनिक

  • सेवाओं की गुणवत्ता को सफलता का मानदंड बनाने से परिणाम-आधारित शासन को बल मिलता है।
  • विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय और संस्थागत क्षमता सुदृढ़ करने पर ध्यान से नगर प्रशासन की जवाबदेही बढ़ती है।
  • शहरी स्थानीय निकायों को अधिक शक्तियाँ सौंपने की चर्चा विकेंद्रीकरण की दिशा में संकेत देती है।

आर्थिक

  • शहरी स्थानीय निकायों की वित्तीय स्थिति सुधरने से वे स्वयं के राजस्व (Own Source Revenue) पर अधिक निर्भर हो सकते हैं।
  • उच्च घनत्व और मिश्रित-उपयोग विकास से आर्थिक उत्पादकता और रोजगार केंद्रों की पहुँच बढ़ती है।
  • केंद्रीय मिशनों की फंडिंग को सुधारों से जोड़ने का प्रस्ताव प्रोत्साहन-आधारित वित्तपोषण की ओर इशारा करता है।

सामाजिक और आवासीय

  • रोजगार केंद्रों और सार्वजनिक परिवहन के निकट किफायती आवास से श्रमिकों की आवाजाही और जीवन-स्तर दोनों सुधरते हैं।
  • वित्तीय समावेशन और पथ-विक्रेताओं के लिए ‘पीएम स्वनिधि’ जैसी योजनाएँ शहरी असंगठित वर्ग की पहुँच बढ़ाती हैं।

पर्यावरणीय

  • पुराने संचित कचरे (Legacy Waste) के वैज्ञानिक निपटान और नए कचरे के जमाव को रोकने पर बल पर्यावरणीय स्थिरता से जुड़ा है।
  • चक्रीय दृष्टिकोण अपनाने से निर्माण कार्यों में संसाधनों की बचत और अपशिष्ट में कमी संभव है।

चुनौतियाँ

1. नगर निकायों की वित्तीय कमजोरी

  • अधिकांश शहरी स्थानीय निकाय संपत्ति कर जैसे अपने राजस्व स्रोतों का पूरा उपयोग नहीं कर पाते और केंद्र व राज्य के अनुदानों पर अधिक निर्भर रहते हैं।
  • वित्तीय स्वायत्तता सीमित होने से दीर्घकालिक अवसंरचना योजना प्रभावित होती है।

2. शक्तियों के हस्तांतरण में अंतर

  • संविधान ने बारहवीं अनुसूची में शहरी स्थानीय निकायों के कार्य सूचीबद्ध किए हैं, परंतु व्यवहार में कई कार्य राज्य एजेंसियों के पास रहते हैं।
  • इससे जल आपूर्ति, परिवहन और नियोजन जैसे विषयों में जवाबदेही का विभाजन धुंधला हो जाता है।

3. बहु-एजेंसी समन्वय की चुनौती

  • शहरी सेवाएँ नगर निगम, विकास प्राधिकरण, जल बोर्ड और परिवहन निकायों जैसी अनेक एजेंसियों द्वारा दी जाती हैं।
  • एजेंसियों के बीच समन्वय न होने पर परियोजनाएँ विलंबित होती हैं और सेवाओं की गुणवत्ता प्रभावित होती है।

4. किफायती आवास और भूमि-उपयोग नियोजन

  • पारंपरिक भूमि-उपयोग योजनाएँ अक्सर कठोर होती हैं, जिससे उच्च घनत्व और मिश्रित-उपयोग विकास सीमित रहता है।
  • शहरी भूमि की ऊँची कीमतें किफायती आवास की उपलब्धता कम करती हैं और श्रमिक वर्ग को दूर बसने के लिए बाध्य करती हैं।

5. ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की समस्या

  • पुराने संचित कचरे का निपटान और नए कचरे के जमाव पर रोक, दोनों साथ-साथ चलने वाली चुनौतियाँ हैं।
  • अपशिष्ट के स्रोत पर पृथक्करण और पुनर्चक्रण की क्षमता अब भी असमान है।

6. सुधारों और फंडिंग का संबंध

  • केंद्रीय मिशनों की फंडिंग को सुधारों के क्रियान्वयन से जोड़ने पर राज्यों की भागीदारी और समय-सीमा का प्रश्न उठता है।
  • प्रोत्साहन-आधारित अनुदान से सुधारों की गति बढ़ सकती है, परंतु असमान राज्य क्षमता इसमें बाधा बन सकती है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
राजस्व संग्रह शहरी स्थानीय निकायों की स्वयं की आय सीमित होने से वे नियमित सेवा-वितरण और रखरखाव पर निर्भर अनुदानों के भरोसे रहते हैं।
शक्ति और कार्यों का हस्तांतरण बारहवीं अनुसूची के कार्य सौंपने में राज्यों की भूमिका निर्णायक है, और इसमें एकरूपता नहीं दिखती।
समन्वय का अभाव कई एजेंसियों के बीच जिम्मेदारी स्पष्ट न होने से परियोजनाओं में देरी और दोहराव होता है।
आवास की किफायत ऊँची भूमि कीमतें और कठोर भूमि-उपयोग नियम किफायती आवास को रोजगार केंद्रों से दूर धकेलते हैं।
अपशिष्ट प्रबंधन संचित कचरे का निपटान और नए कचरे के स्रोत पर पृथक्करण में क्षमता और निगरानी की कमी बनी हुई है।
जवाबदेही परियोजना-पूर्ति के बजाय सेवा-गुणवत्ता के मापन के लिए स्पष्ट संकेतक और सार्वजनिक रिपोर्टिंग आवश्यक हैं।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • अमृत (Atal Mission for Rejuvenation and Urban Transformation, AMRUT)
  • स्वच्छ भारत मिशन-शहरी (Swachh Bharat Mission-Urban, SBM-U)
  • पीएम स्वनिधि (PM SVANidhi)
  • अर्बन चैलेंज फंड (Urban Challenge Fund)

आगे की राह

  • शहरी स्थानीय निकायों के संपत्ति कर और उपयोगकर्ता शुल्क जैसे राजस्व स्रोतों का आधार बढ़ाया जाए तथा मूल्यांकन और वसूली की प्रक्रिया डिजिटल की जाए।
  • राज्य वित्त आयोगों की सिफारिशों को समय पर लागू किया जाए, ताकि शहरी स्थानीय निकायों को वित्तीय हस्तांतरण पारदर्शी ढंग से हो।
  • बारहवीं अनुसूची के कार्यों का स्पष्ट हस्तांतरण और कार्य-विभाजन का लिखित ढाँचा तैयार किया जाए।
  • बहु-एजेंसी समन्वय के लिए महानगरीय नियोजन समिति जैसे मंचों को सक्रिय किया जाए और एकीकृत शहरी योजना तैयार हो।
  • सेवा-गुणवत्ता के सूचक तय कर उन्हें सार्वजनिक डैशबोर्ड पर प्रकाशित किया जाए, ताकि परियोजना-पूर्ति के साथ परिणामों का भी मूल्यांकन हो।
  • उच्च घनत्व, मिश्रित-उपयोग और परिवहन-केन्द्रित विकास (Transit-Oriented Development, TOD) को भूमि-उपयोग नियमों में समाहित किया जाए।
  • केंद्रीय मिशनों की फंडिंग को सुधारों के चरणबद्ध क्रियान्वयन से जोड़ते समय राज्यों की क्षमता-वृद्धि के लिए तकनीकी सहायता दी जाए।
  • पुराने संचित कचरे के वैज्ञानिक निपटान के साथ स्रोत पर पृथक्करण और चक्रीय दृष्टिकोण को निर्माण कार्यों में अपनाया जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

शहरी स्थानीय निकाय (Urban Local Bodies) · 74वाँ संविधान संशोधन (74th Constitutional Amendment) · अनुच्छेद 243W (Article 243W) · बारहवीं अनुसूची (Twelfth Schedule) · राज्य वित्त आयोग (State Finance Commission) · सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) · परिवहन-केन्द्रित विकास (Transit-Oriented Development) · उच्च घनत्व व मिश्रित-उपयोग विकास (High-Density and Mixed-Use Development) · चक्रीय अर्थव्यवस्था (Circular Economy) · पुराने कचरे का निपटान (Legacy Waste Remediation) · सेवा-गुणवत्ता आधारित शासन (Service-Quality-Based Governance) · विकसित भारत 2047 (Viksit Bharat 2047)

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 243W: शहरी स्थानीय निकायों की शक्तियाँ और कार्य
  • अनुच्छेद 243X: नगरपालिकाओं के वित्त संबंधी प्रावधान
  • अनुच्छेद 243Y: राज्य वित्त आयोग की सिफारिशें
  • अनुच्छेद 243ZE: महानगरीय नियोजन समिति का गठन
  • बारहवीं अनुसूची: शहरी स्थानीय निकायों के कार्य

अवधारणा प्रवाह

शहरी जनसंख्या में वृद्धि से सेवाओं और बुनियादी ढाँचे की माँग बढ़ती है।  →  केंद्रीय मिशनों (अमृत, स्वच्छ भारत मिशन-शहरी, पीएम स्वनिधि) से जल, स्वच्छता, परिवहन और वित्तीय समावेशन का विस्तार होता है।  →  सेवा-गुणवत्ता और संस्थागत क्षमता की कमी से परियोजना-पूर्ति और परिणामों के बीच अंतर बना रहता है।  →  शहरी स्थानीय निकायों की वित्तीय स्वायत्तता और शक्तियों के हस्तांतरण से जवाबदेही और नियोजन क्षमता बढ़ती है।  →  राजस्व-सुधार, सुधार-आधारित फंडिंग और उच्च घनत्व व परिवहन-केन्द्रित विकास से किफायती आवास और आर्थिक उत्पादकता सुदृढ़ होती है।  →  सहकारी संघवाद के तहत राज्यों के साथ साझेदारी से सुधारों का क्रियान्वयन होता है।  →  सुधारों के परिणामस्वरूप ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य की दिशा में समावेशी, टिकाऊ और भविष्य-उन्मुख शहर बनते हैं।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 74वें संविधान संशोधन द्वारा संविधान में भाग IXA जोड़ा गया, जो नगरपालिकाओं से संबंधित है।
2. अनुच्छेद 243W राज्य विधानमंडल को नगरपालिकाओं को शक्तियाँ, अधिकार और उत्तरदायित्व सौंपने के लिए सक्षम बनाता है।
3. संविधान की बारहवीं अनुसूची में नगरपालिकाओं के अधिकार-क्षेत्र में आने वाले 18 विषय सूचीबद्ध हैं।

उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. उपर्युक्त कोई नहीं

उत्तर: केवल तीन — कथन 1 सही है: 74वें संशोधन (1992) द्वारा भाग IXA जोड़ा गया, जो नगरपालिकाओं से संबंधित है। कथन 2 सही है: अनुच्छेद 243W शक्तियों, अधिकारों और उत्तरदायित्वों के हस्तांतरण का प्रावधान करता है, जिसका निर्णय राज्य विधानमंडल करता है। कथन 3 सही है: बारहवीं अनुसूची में 18 विषय हैं, जो नगरपालिकाओं के कार्य-क्षेत्र को परिभाषित करते हैं। अतः तीनों कथन सही हैं।

Q2. निम्नलिखित पर विचार कीजिए:
अभिकथन (A): शहरी स्थानीय निकायों के अपने राजस्व स्रोत उनकी वित्तीय स्वायत्तता के लिए केन्द्रीय महत्व रखते हैं।
कारण (R): संपत्ति कर शहरी स्थानीय निकायों का प्रमुख स्वयं का राजस्व स्रोत है, और इसके सुदृढ़ होने से वे अनुदानों पर कम निर्भर रहते हैं।

नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:

  1. (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
  2. (A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
  3. (A) सही है, किन्तु (R) गलत है।
  4. (A) गलत है, किन्तु (R) सही है।

उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — अभिकथन सही है: स्वयं का राजस्व बढ़ने से शहरी स्थानीय निकायों की स्वायत्तता और जवाबदेही बढ़ती है। कारण भी सही है: संपत्ति कर शहरी स्थानीय निकायों का प्रमुख स्वयं का राजस्व स्रोत है। कारण अभिकथन की सही व्याख्या करता है, क्योंकि स्वयं के राजस्व का सुदृढ़ होना ही अनुदान-निर्भरता घटाता है।

Q3. निम्नलिखित सूचियों का सही मिलान कीजिए:

सूची I (योजना)
1. अमृत
2. स्वच्छ भारत मिशन-शहरी
3. पीएम स्वनिधि

सूची II (मुख्य क्षेत्र/विशेषता)
a. जल आपूर्ति और सीवरेज
b. ठोस अपशिष्ट प्रबंधन और स्वच्छता
c. सड़क-किनारे विक्रेताओं को संपार्श्विक-मुक्त कार्यशील पूंजी ऋण

सही कूट का चयन कीजिए:

  1. 1-a, 2-b, 3-c
  2. 1-b, 2-a, 3-c
  3. 1-a, 2-c, 3-b
  4. 1-c, 2-a, 3-b

उत्तर: 1-a, 2-b, 3-c — अमृत (अटल मिशन फॉर रेजुवेनेशन एंड अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन) का मुख्य फोकस जल आपूर्ति और सीवरेज पर है। स्वच्छ भारत मिशन-शहरी का केन्द्र स्वच्छता और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन है। पीएम स्वनिधि योजना सड़क-किनारे विक्रेताओं को संपार्श्विक-मुक्त कार्यशील पूंजी ऋण देने से संबंधित है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत के शहरों में प्रशासनिक और वित्तीय अधिकार अब भी निर्वाचित शहरी स्थानीय निकायों के बजाय राज्य सरकारों और विशेष प्रयोजन एजेंसियों के पास अधिक केन्द्रित हैं, जबकि 74वें संविधान संशोधन से शहरी स्थानीय निकायों को स्वशासन की संस्थाओं के रूप में स्थापित किया गया था। इस अंतर के कारणों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए और शहरी स्थानीय निकायों की वित्तीय स्थिति व जवाबदेही सुधारने के उपाय सुझाइए। साथ ही उत्तर दीजिए कि केन्द्रीय शहरी मिशनों के अनुदान को सुधारों के क्रियान्वयन से जोड़ने पर सहकारी संघवाद की कार्यप्रणाली पर क्या प्रभाव पड़ सकता है। (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर-संरचना: (1) प्रस्तावना: 74वाँ संविधान संशोधन (1992) द्वारा भाग IXA जोड़ना और नगरपालिकाओं को स्वशासन की संस्था बनाने का उद्देश्य; ‘राष्ट्रीय शहरी सम्मेलन 2026’ (भुवनेश्वर) में केन्द्रीय आवासन और शहरी कार्य मंत्री श्री मनोहर लाल तथा नीति आयोग के सदस्य श्री राजीव गौबा के विचारों का उल्लेख। (2) संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 243W (शक्तियाँ, अधिकार और उत्तरदायित्व राज्य विधानमंडल द्वारा सौंपे जाने का प्रावधान); अनुच्छेद 243X (कर, शुल्क, पथकर और फीस लगाने की शक्ति); अनुच्छेद 243I और 243Y (राज्य वित्त आयोग का गठन और सिफारिशें); अनुच्छेद 243ZA (राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा निर्वाचन); अनुच्छेद 243U (पाँच वर्ष का कार्यकाल); अनुच्छेद 243ZE (महानगर योजना समिति); बारहवीं अनुसूची के 18 विषय। (3) अंतर के कारण: राज्यों द्वारा कार्यों का आंशिक हस्तांतरण; विशेष प्रयोजन एजेंसियों और पैरास्टेटल निकायों का उदय; नगर निकायों की स्वयं के राजस्व पर निर्भरता की कमी, संपत्ति कर के मूल्यांकन और वसूली की कमजोरी; राज्य वित्त आयोगों की सिफारिशों का अनियमित क्रियान्वयन; निर्वाचित परिषदों में विलंब या निलंबन जैसी व्यावहारिक समस्याएँ; बहु-एजेंसी समन्वय का अभाव। (4) सुधार-उपाय: स्वयं के राजस्व स्रोतों (संपत्ति कर, उपयोगकर्ता शुल्क) का सुदृढ़ीकरण; पंद्रहवें वित्त आयोग द्वारा शहरी स्थानीय निकायों को दिए गए अनुदानों की भूमिका; नियमित लेखांकन और सेवा-स्तर मानक; भूमि-उपयोग योजना में सुधार; परिवहन-केन्द्रित विकास और उच्च घनत्व व मिश्रित-उपयोग विकास। (5) सहकारी संघवाद: सुधार-शर्त आधारित अनुदान (जैसे अर्बन चैलेंज फंड) के पक्ष और विपक्ष; राज्य स्वायत्तता बनाम केन्द्रीय प्रोत्साहन का संतुलन; अंतर-राज्य तुलना और ‘सिटी इकोनॉमिक रीजन्स’ जैसी अवधारणाओं की भूमिका। (6) निष्कर्ष: सेवा-गुणवत्ता आधारित शासन की ओर बढ़ना और ‘विकसित भारत 2047’ के संदर्भ में संतुलित संघीय ढाँचे की आवश्यकता।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)


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