11 Sep शुष्क भूमि को ताकत बनाने: शिवराज चौहान का विज्ञान-नीति-बाज़ार दृष्टिकोण
✎ शुष्क भूमि कृषि, विज्ञान, नीति और बाजार समर्थन के माध्यम से खाद्य एवं पोषण सुरक्षा तथा किसान समृद्धि के लिए एक महत्वपूर्ण समाधान है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भूगोल (भारत एवं विश्व का भौतिक, सामाजिक एवं आर्थिक भूगोल) | GS Paper III — अर्थव्यवस्था (कृषि, खाद्य सुरक्षा, प्रौद्योगिकी) | GS Paper III — पर्यावरण (जलवायु परिवर्तन, सतत विकास)
- Prelims: शुष्क भूमि कृषि, खाद्य सुरक्षा, पोषण सुरक्षा, जलवायु सहनशीलता, ICRISAT, राष्ट्रीय कृषि विज्ञान परिसर (NASC)
- Essay: भारत में कृषि क्षेत्र का सतत विकास: चुनौतियाँ और समाधान, जलवायु परिवर्तन और खाद्य सुरक्षा: एक वैश्विक परिप्रेक्ष्य
त्वरित पुनरावृत्ति: शुष्क भूमि कृषि, विज्ञान, नीति और बाजार समर्थन के माध्यम से खाद्य एवं पोषण सुरक्षा तथा किसान समृद्धि के लिए एक महत्वपूर्ण समाधान है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने ‘ड्राईलैंड कांग्रेस 2026’ के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए शुष्क भूमि कृषि में बदलाव लाने, खाद्य एवं पोषण सुरक्षा को मजबूत करने और किसानों की आजीविका को बेहतर बनाने के लिए विज्ञान, नीति एवं बाजार समर्थन पर आधारित एक समग्र दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने जोर दिया कि शुष्क भूमि को कमजोरी नहीं समझना चाहिए बल्कि सही वैज्ञानिक उपायों, नीतियों एवं बाजार के समर्थन से ये भारत और ऐसे ही चुनौतियों का सामना कर रहे अन्य क्षेत्रों के लिए ताकत का स्रोत बन सकते हैं।
पृष्ठभूमि
- ‘ड्राईलैंड कांग्रेस 2026’ का आयोजन 10 सितंबर 2026 से नई दिल्ली में हो रहा है, जिसमें 25 से अधिक देशों के 800 से अधिक प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं।
- इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य शुष्क भूमि पर खेती करने वाले समुदायों के लिए आजीविका के बेहतर अवसर उत्पन्न करना, फसलों की सहन-क्षमता को मजबूत करना, शुष्क भूमि वाले इलाकों का सतत प्रबंधन, पोषण, बाजार और नीतियों पर ध्यान केंद्रित करना है।
- शुष्क भूमि (Drylands) वे क्षेत्र हैं जहाँ वर्षा कम होती है और वाष्पीकरण अधिक होता है, जिससे जल की कमी बनी रहती है। ये क्षेत्र वैश्विक भूमि क्षेत्र का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा हैं और विश्व की एक तिहाई से अधिक आबादी का घर हैं।
- भारत में भी शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्र काफी विस्तृत हैं, जहाँ कृषि मुख्य रूप से वर्षा पर निर्भर करती है और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति अधिक संवेदनशील है।
शुष्क भूमि कृषि (Dryland Agriculture) क्या है?
- शुष्क भूमि कृषि उन कृषि पद्धतियों को संदर्भित करती है जो कम वर्षा वाले क्षेत्रों में फसलों के उत्पादन के लिए अपनाई जाती हैं। इन क्षेत्रों में वार्षिक वर्षा 750 मिमी से कम होती है।
- इसका मुख्य उद्देश्य सीमित जल संसाधनों का अधिकतम उपयोग करना और ऐसी फसलें उगाना है जो सूखे और उच्च तापमान के प्रति सहनशील हों।
- प्रमुख तकनीकों में जल संचयन (Water Harvesting), मृदा नमी संरक्षण (Soil Moisture Conservation), शुष्क प्रतिरोधी फसलों की किस्मों का उपयोग (Drought-Resistant Crop Varieties), और एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन (Integrated Nutrient Management) शामिल हैं।
- शुष्क भूमि कृषि खाद्य सुरक्षा, विशेषकर विकासशील देशों में, के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उन क्षेत्रों में भोजन उपलब्ध कराती है जहाँ सिंचाई के साधन सीमित हैं।
- यह किसानों की आजीविका में सुधार करने में मदद करती है, खासकर छोटे और सीमांत किसानों के लिए जो अक्सर इन क्षेत्रों में निवास करते हैं।
- जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों के कारण शुष्क भूमि कृषि की प्रासंगिकता और बढ़ गई है, क्योंकि यह बदलती जलवायु परिस्थितियों के अनुकूलन में सहायक है।
- बाजरा (Millets), ज्वार (Sorghum), रागी (Finger Millet) और कुछ दालें (Pulses) शुष्क भूमि में उगाई जाने वाली प्रमुख फसलें हैं, जो पोषण सुरक्षा में भी योगदान करती हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| शुष्क भूमि कृषि | खाद्य एवं पोषण सुरक्षा तथा किसानों की आजीविका में सुधार की क्षमता। |
| समग्र दृष्टिकोण | विज्ञान, नीति और बाजार समर्थन को एकीकृत करके शुष्क भूमि में परिवर्तन लाना। |
| अंतर्राष्ट्रीय सहयोग | 25 से अधिक देशों के 800 से अधिक प्रतिनिधियों का ‘ड्राईलैंड कांग्रेस 2026’ में एक साथ आना, वैश्विक समाधानों के लिए। |
| किसान-केंद्रित नीति | उत्पादन वृद्धि के साथ-साथ किसानों की आजीविका और समृद्धि को सफलता का पैमाना मानना। |
| अनुसंधान एवं नवाचार | ICRISAT जैसे संस्थानों द्वारा शुष्क भूमि कृषि में वैज्ञानिक प्रगति और तकनीकी समाधानों का दस्तावेजीकरण। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- शुष्क भूमि को उत्पादक क्षेत्रों में बदलकर कृषि उत्पादन में वृद्धि करना, जिससे राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मजबूत होती है।
- किसानों की आय में वृद्धि और ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक संवृद्धि को बढ़ावा देना, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहां कृषि मुख्य आजीविका है।
- कृषि-आधारित उद्योगों को बढ़ावा देना, जैसे प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन, जिससे रोजगार के अवसर पैदा होते हैं।
सामाजिक महत्व
- खाद्य एवं पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करना, विशेषकर शुष्क भूमि वाले क्षेत्रों में जहां खाद्य असुरक्षा का खतरा अधिक होता है।
- किसानों की आजीविका में सुधार और गरीबी उन्मूलन में सहायता करना, जिससे सामाजिक समानता को बढ़ावा मिलता है।
- ग्रामीण समुदायों को सशक्त बनाना और पलायन को कम करना, जिससे क्षेत्रीय संतुलन बना रहता है।
पर्यावरणीय महत्व
- जलवायु परिवर्तन के प्रति सहनशील फसलों और कृषि प्रणालियों को विकसित करके शुष्क भूमि के सतत प्रबंधन को बढ़ावा देना।
- जल संरक्षण और मृदा स्वास्थ्य में सुधार के लिए वैज्ञानिक तरीकों का उपयोग, जिससे पारिस्थितिक संतुलन बना रहता है।
- जैव विविधता का संरक्षण और मरुस्थलीकरण (Desertification) को रोकना, जो शुष्क भूमि क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण पर्यावरणीय चिंताएं हैं।
रणनीतिक महत्व
- भारत को शुष्क भूमि कृषि में एक वैश्विक नेता के रूप में स्थापित करना, जिससे अन्य विकासशील देशों के साथ ज्ञान साझा करने का अवसर मिलता है।
- अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और साझेदारी को मजबूत करना, विशेष रूप से अफ्रीका जैसे क्षेत्रों के साथ, जहां शुष्क भूमि की चुनौतियां समान हैं।
- कृषि अनुसंधान एवं विकास में निवेश को बढ़ावा देना, जिससे भविष्य की खाद्य सुरक्षा चुनौतियों का सामना करने की क्षमता बढ़ती है।
चुनौतियाँ
1. जल उपलब्धता
- शुष्क भूमि क्षेत्रों में वर्षा की कमी और अनियमितता कृषि उत्पादन के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
- भूजल स्तर में गिरावट और सिंचाई के सीमित साधन किसानों के लिए बड़ी बाधाएँ उत्पन्न करते हैं।
यूपीएससी लिंक: कृषि, सिंचाई, जल संसाधन
2. मृदा गुणवत्ता
- शुष्क भूमि की मृदा में अक्सर पोषक तत्वों की कमी होती है और जैविक पदार्थ कम होते हैं, जिससे फसल उत्पादकता प्रभावित होती है।
- मृदा अपरदन (Soil Erosion) और लवणता (Salinity) जैसी समस्याएं भी शुष्क भूमि कृषि को प्रभावित करती हैं।
यूपीएससी लिंक: मृदा स्वास्थ्य, कृषि उत्पादकता
3. जलवायु परिवर्तन
- बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा पैटर्न और सूखे की बढ़ती आवृत्ति शुष्क भूमि कृषि को और अधिक संवेदनशील बनाती है।
- जलवायु परिवर्तन के कारण कीटों और बीमारियों का प्रकोप भी बढ़ सकता है, जिससे फसलों को नुकसान होता है।
यूपीएससी लिंक: जलवायु परिवर्तन, कृषि पर प्रभाव
4. बाजार और नीतिगत समर्थन का अभाव
- शुष्क भूमि में उगाई जाने वाली फसलों के लिए अक्सर उचित बाजार पहुंच और मूल्य समर्थन का अभाव होता है।
- किसानों को उन्नत बीज, उर्वरक और कृषि उपकरणों तक पहुंच में कठिनाई होती है, और नीतिगत प्रोत्साहन कम होते हैं।
यूपीएससी लिंक: कृषि विपणन, कृषि नीतियां
5. प्रौद्योगिकी और ज्ञान का प्रसार
- वैज्ञानिक अनुसंधान और नवाचारों का किसानों तक प्रभावी ढंग से न पहुंच पाना एक बड़ी चुनौती है।
- किसानों को नई तकनीकों और सर्वोत्तम प्रथाओं के बारे में शिक्षित करने के लिए पर्याप्त विस्तार सेवाओं (Extension Services) का अभाव है।
यूपीएससी लिंक: कृषि प्रौद्योगिकी, ज्ञान प्रसार
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| पानी की कमी | फसल उत्पादन और पशुधन के लिए अपर्याप्त जल संसाधन। |
| मृदा क्षरण | पोषक तत्वों की कमी और मृदा की उर्वरता में गिरावट। |
| जलवायु भेद्यता | बढ़ते सूखे, बाढ़ और अनियमित मौसम पैटर्न का कृषि पर नकारात्मक प्रभाव। |
| कम उत्पादकता | पारंपरिक कृषि पद्धतियों और सीमित संसाधनों के कारण कम फसल उपज। |
| बाजार पहुंच | किसानों को अपनी उपज के लिए उचित मूल्य और बाजार तक सीमित पहुंच। |
| ज्ञान का अंतर | वैज्ञानिक नवाचारों और आधुनिक कृषि तकनीकों तक किसानों की सीमित पहुंच। |
आगे की राह
- जल संरक्षण और प्रबंधन के लिए वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting), सूक्ष्म सिंचाई (Micro-irrigation) और जल-कुशल फसलों को बढ़ावा देना।
- मृदा स्वास्थ्य में सुधार के लिए जैविक खेती (Organic Farming), फसल चक्र (Crop Rotation) और मृदा परीक्षण (Soil Testing) को प्रोत्साहित करना।
- जलवायु-सहनशील फसल किस्मों (Climate-resilient Crop Varieties) का विकास और प्रसार करना, जो शुष्क परिस्थितियों में बेहतर प्रदर्शन कर सकें।
- किसानों को उन्नत कृषि तकनीकों, बाजार की जानकारी और वित्तीय सहायता तक पहुंच प्रदान करने के लिए विस्तार सेवाओं को मजबूत करना।
- शुष्क भूमि उत्पादों के लिए मूल्य संवर्धन (Value Addition) और प्रसंस्करण इकाइयों को बढ़ावा देना, जिससे किसानों को बेहतर मूल्य मिल सके।
- सार्वजनिक-निजी भागीदारी (Public-Private Partnership) को बढ़ावा देना ताकि अनुसंधान, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और बाजार लिंकेज को मजबूत किया जा सके।
- नीतिगत ढांचे को मजबूत करना जो शुष्क भूमि कृषि के लिए विशेष प्रोत्साहन और समर्थन प्रदान करे, जिसमें बीमा और ऋण सुविधाएं शामिल हों।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
शुष्क भूमि कृषि · खाद्य सुरक्षा · पोषण सुरक्षा · किसानों की आजीविका · जलवायु सहनशीलता · सतत कृषि · कृषि प्रणाली · बाजार समर्थन · वैज्ञानिक उपाय · नीतिगत हस्तक्षेप · एकीकृत दृष्टिकोण · कृषि अनुसंधान
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 48’, ‘note’: ‘कृषि और पशुपालन का संगठन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 48A’, ‘note’: ‘पर्यावरण का संरक्षण और संवर्धन’}
अवधारणा प्रवाह
शुष्क भूमि की चुनौतियाँ (जल, मृदा, जलवायु) → वैज्ञानिक अनुसंधान एवं प्रौद्योगिकी विकास → नीतिगत समर्थन एवं बाजार लिंकेज → जलवायु-सहनशील कृषि प्रणालियों का विकास → खाद्य सुरक्षा, पोषण एवं किसान समृद्धि
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. ‘ड्राईलैंड कांग्रेस 2026’ का आयोजन नई दिल्ली में किया गया है।
2. इस कांग्रेस का मुख्य उद्देश्य शुष्क भूमि पर खेती करने वाले समुदायों के लिए आजीविका के अवसर बढ़ाना है।
3. केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री ने शुष्क भूमि को कमजोरी नहीं, बल्कि शक्ति का स्रोत बताया है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि ‘ड्राईलैंड कांग्रेस 2026’ का आयोजन नई दिल्ली में 10 सितंबर 2026 से हो रहा है। कथन 2 भी सही है क्योंकि सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य शुष्क भूमि पर खेती करने वाले समुदायों के लिए आजीविका के बेहतर अवसर उत्पन्न करना है। कथन 3 भी सही है क्योंकि केंद्रीय मंत्री ने शुष्क भूमि को सही वैज्ञानिक उपायों, नीतियों और बाजार समर्थन से शक्ति का स्रोत बताया है।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा संस्थान ‘ड्राईलैंड कांग्रेस 2026’ के आयोजकों में शामिल है?
- भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR)
- अंतर्राष्ट्रीय अर्ध-शुष्क उष्णकटिबंधीय फसल अनुसंधान संस्थान (ICRISAT)
- कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE)
- उपर्युक्त सभी
उत्तर: उपर्युक्त सभी — समाचार के अनुसार, ‘ड्राईलैंड कांग्रेस 2026’ में ICAR, ICRISAT और DARE के अधिकारी और पूर्व महानिदेशक शामिल हैं, जो इसके आयोजन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ शुष्क भूमि कृषि में बदलाव लाने के लिए विज्ञान, नीति और बाजार समर्थन पर आधारित एक समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता पर चर्चा कीजिए। भारत में खाद्य एवं पोषण सुरक्षा तथा किसानों की आजीविका को बेहतर बनाने में यह दृष्टिकोण किस प्रकार सहायक हो सकता है? (15 Marks)
रूपरेखा: परिचय में शुष्क भूमि कृषि की वर्तमान स्थिति और उसकी चुनौतियों को संक्षेप में बताएं। ‘समग्र दृष्टिकोण’ के घटकों (विज्ञान, नीति, बाजार समर्थन) का विस्तार से वर्णन करें, जिसमें वैज्ञानिक अनुसंधान, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, अनुकूल नीतियों (जैसे सिंचाई, बीज, ऋण), और बाजार लिंकेज (जैसे फसल बीमा, न्यूनतम समर्थन मूल्य) शामिल हों। फिर, यह बताएं कि यह दृष्टिकोण खाद्य सुरक्षा (उत्पादन वृद्धि, फसल विविधीकरण), पोषण सुरक्षा (पोषक तत्वों से भरपूर फसलों को बढ़ावा), और किसानों की आजीविका (आय वृद्धि, जोखिम कम करना) को कैसे मजबूत कर सकता है। निष्कर्ष में, शुष्क भूमि को शक्ति के स्रोत के रूप में बदलने की क्षमता पर जोर दें।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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