सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित अरावली पैनल को रिपोर्ट देने के लिए 6 महीने का विस्तार चाहिए

SC-appointed Aravalli panel seeks six-month extension for submitting its final report — diagram

सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित अरावली पैनल को रिपोर्ट देने के लिए 6 महीने का विस्तार चाहिए

Aravalli HPC processSC Order25 May committee formationField Assessment6-11 Aug site visitsFinal ReportDue 28 Feb 2027Policy FrameworkRegulatory guidelines for govts
Aravalli HPC process

✎ सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त अरावली उच्च-शक्ति समिति ने अरावली पर्वतमाला के व्यापक मूल्यांकन के लिए छह महीने का विस्तार माँगा है, जिसमें 'अरावली पारिस्थितिकी तंत्र परिदृश्य (AEL) ढाँचा' का उपयोग करके बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाने…

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper I — भूगोल (भारत का भूगोल)  |  GS Paper III — पर्यावरण और पारिस्थितिकी (पर्यावरण संरक्षण, पर्यावरणीय प्रभाव आकलन)
  • Prelims: अरावली पर्वतमाला, सर्वोच्च न्यायालय, उच्च-शक्ति समिति (HPC), पर्यावरण संरक्षण, भू-स्थानिक मूल्यांकन, पारिस्थितिकी तंत्र परिदृश्य (AEL) ढाँचा
  • Essay: पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के बीच संतुलन, न्यायिक सक्रियता और पर्यावरण शासन

त्वरित पुनरावृत्ति: सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त अरावली उच्च-शक्ति समिति ने अरावली पर्वतमाला के व्यापक मूल्यांकन के लिए छह महीने का विस्तार माँगा है, जिसमें ‘अरावली पारिस्थितिकी तंत्र परिदृश्य (AEL) ढाँचा’ का उपयोग करके बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया गया है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) द्वारा नियुक्त अरावली उच्च-शक्ति समिति (High-Powered Committee – HPC) ने अपनी अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए छह महीने का विस्तार माँगा है। समिति ने सर्वोच्च न्यायालय को सूचित किया है कि अरावली पर्वतमाला का एक व्यापक और विश्वसनीय मूल्यांकन करने के लिए उसे अतिरिक्त समय की आवश्यकता है, जिसमें स्थानिक, पारिस्थितिक, भूवैज्ञानिक, जलवैज्ञानिक, सामाजिक-आर्थिक और हितधारक साक्ष्यों को एक साथ लाना शामिल है।

पृष्ठभूमि

  • सर्वोच्च न्यायालय ने 25 मई को एक आदेश के माध्यम से इस समिति का गठन किया था।
  • समिति को अरावली पर्वतमाला की परिभाषा और सीमांकन (delineation) पर केंद्र सरकार की रिपोर्ट की स्वतंत्र समीक्षा करने का कार्य सौंपा गया था।
  • समिति की अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत करने की मूल समय-सीमा 31 अगस्त थी।
  • समिति ने अपनी अनुपालन रिपोर्ट (compliance report) में कहा है कि एक व्यापक रिपोर्ट के लिए भू-स्थानिक मूल्यांकन, संवेदनशीलता विश्लेषण, विशेषज्ञ जांच, क्षेत्रीय और हितधारक सत्यापन तथा संश्लेषण की वैज्ञानिक प्रक्रिया को पूरा करने के लिए अतिरिक्त समय आवश्यक है।
  • समिति ने अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत करने की समय-सीमा 28 फरवरी, 2027 तक बढ़ाने का आग्रह किया है।
  • समिति ने 6 से 11 अगस्त के बीच अरावली के प्रत्यक्ष मूल्यांकन के लिए क्षेत्रीय दौरे किए, जिसके दौरान जन सुनवाई भी हुई।

अरावली पर्वतमाला और समिति का दृष्टिकोण

  • अरावली पर्वतमाला पश्चिमी भारत में एक पर्वत श्रृंखला है, जो उत्तर-पूर्व दिशा में लगभग 692 किलोमीटर तक फैली हुई है। यह गुजरात से शुरू होकर राजस्थान और हरियाणा से होते हुए दिल्ली तक जाती है।
  • यह भारत की सबसे पुरानी वलित पर्वत श्रृंखलाओं (fold mountain ranges) में से एक है और इसका पर्यावरणीय महत्व अत्यधिक है, विशेषकर थार मरुस्थल के विस्तार को रोकने में।
  • अरावली क्षेत्र में अवैध खनन, शहरीकरण और वनों की कटाई जैसी गतिविधियों के कारण गंभीर पर्यावरणीय क्षरण हुआ है।
  • समिति का मानना है कि अरावली से संबंधित मुद्दे केवल तकनीकी सीमांकन से परे हैं और इन्हें ‘एकल भू-भाग-आधारित मानदंड’ या ‘साक्ष्य के एकल स्रोत’ के माध्यम से ठीक से संबोधित नहीं किया जा सकता है।
  • एक व्यापक मूल्यांकन के लिए अरावली के व्यापक भूवैज्ञानिक, भू-आकृतिक, जलवैज्ञानिक, जैव-भौगोलिक, पारिस्थितिक, जैव विविधता, खनिज-संसाधन और सामाजिक-आर्थिक आयामों की जांच आवश्यक है।
  • समिति ने ‘अरावली पारिस्थितिकी तंत्र परिदृश्य (Aravalli Ecosystem Landscape – AEL) ढाँचा’ नामक एक प्रस्तावित विधि का सुझाव दिया है।
  • यह ढाँचा विभिन्न सामाजिक-पारिस्थितिक विशेषताओं वाले क्षेत्रों की पहचान करने में मदद कर सकता है और संरक्षण तथा प्रबंधन के लिए भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों को सूचित कर सकता है।
  • यह ढाँचा ऐसे क्षेत्रों को संबोधित करने में मौजूदा नियामक ढाँचे की पर्याप्तता का आकलन भी कर सकता है।
  • समिति ने सुझाव दिया है कि इस ढाँचे की डोमेन विशेषज्ञों और संबंधित हितधारकों द्वारा समीक्षा और प्रतिक्रिया प्राप्त की जानी चाहिए।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
अरावली उच्चाधिकार प्राप्त समिति (Aravalli High-Powered Committee – HPC) सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित, अरावली रेंज की परिभाषा और सीमांकन पर केंद्र की रिपोर्ट की स्वतंत्र समीक्षा कर रही है।
रिपोर्ट प्रस्तुत करने की समय-सीमा समिति ने ‘व्यापक और बचाव योग्य’ मूल्यांकन के लिए छह महीने का विस्तार मांगा है, जो 28 फरवरी, 2027 तक है।
अरावली पारिस्थितिकी तंत्र परिदृश्य (Aravalli Ecosystem Landscape – AEL) ढाँचा अरावली के व्यापक भूवैज्ञानिक, भू-आकृतिक, जल-वैज्ञानिक, जैव-भौगोलिक, पारिस्थितिक, जैव विविधता, खनिज-संसाधन और सामाजिक-आर्थिक आयामों की जाँच के लिए प्रस्तावित पद्धति।
बहु-आयामी दृष्टिकोण समिति ने केवल एक भू-भाग-आधारित मानदंड या साक्ष्य के एकल स्रोत के बजाय स्थानिक, पारिस्थितिक, भूवैज्ञानिक, जल-वैज्ञानिक, सामाजिक-आर्थिक और हितधारक साक्ष्यों को एक साथ लाने पर जोर दिया है।
क्षेत्रीय दौरे और जन सुनवाई समिति ने अरावली का प्रत्यक्ष मूल्यांकन करने और सार्वजनिक सुनवाई आयोजित करने के लिए क्षेत्रीय दौरे किए हैं।

महत्व

पर्यावरण और पारिस्थितिकी

  • अरावली रेंज भारत के सबसे पुराने वलित पर्वतों में से एक है और उत्तरी भारत के लिए एक महत्वपूर्ण पारिस्थितिक गलियारा है, विशेष रूप से राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली में मरुस्थलीकरण (Desertification) को रोकने में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण है।
  • इसका उचित सीमांकन और संरक्षण जैव विविधता (Biodiversity) के लिए महत्वपूर्ण है, जिसमें कई स्थानिक प्रजातियाँ और वन्यजीव गलियारे शामिल हैं।

शासन और नीति निर्माण

  • सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त समिति का कार्य अरावली के संरक्षण और प्रबंधन के लिए एक मजबूत नियामक ढाँचा तैयार करने में मदद करेगा।
  • यह केंद्र और राज्य सरकारों के लिए भविष्य की पर्यावरण नीतियों और विकास परियोजनाओं के लिए एक स्पष्ट दिशानिर्देश प्रदान करेगा, जिससे अनियंत्रित खनन और अतिक्रमण पर रोक लगेगी।

न्यायिक सक्रियता और पर्यावरण न्याय

  • सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप पर्यावरण संरक्षण के प्रति न्यायिक सक्रियता को दर्शाता है, जो प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा में न्यायपालिका की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करता है।
  • यह सुनिश्चित करता है कि वैज्ञानिक और व्यापक मूल्यांकन के आधार पर निर्णय लिए जाएँ, जिससे पर्यावरण न्याय (Environmental Justice) को बढ़ावा मिले।

सामाजिक-आर्थिक प्रभाव

  • अरावली क्षेत्र में रहने वाले समुदायों की आजीविका और सांस्कृतिक विरासत इस पर्वत श्रृंखला के स्वास्थ्य से गहराई से जुड़ी हुई है।
  • संरक्षण के प्रयासों से स्थानीय समुदायों के लिए स्थायी आजीविका के अवसर पैदा हो सकते हैं और उनके पारंपरिक अधिकारों की रक्षा हो सकती है।

चुनौतियाँ

1. अरावली का सीमांकन और परिभाषा

  • अरावली के भौगोलिक और पारिस्थितिक क्षेत्रों को सटीक रूप से परिभाषित करना जटिल है, क्योंकि यह केवल भू-भाग-आधारित मानदंड से परे है।
  • विभिन्न हितधारकों, जैसे खनन उद्योग, रियल एस्टेट डेवलपर्स और स्थानीय समुदायों के बीच हितों का टकराव एक चुनौती है।

2. पर्यावरण क्षरण

  • अवैध खनन, शहरीकरण और अतिक्रमण ने अरावली की पारिस्थितिकी को गंभीर रूप से प्रभावित किया है, जिससे जैव विविधता का नुकसान और भूजल स्तर में गिरावट आई है।
  • जलवायु परिवर्तन के प्रभाव, जैसे अनियमित वर्षा पैटर्न, अरावली के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र पर अतिरिक्त दबाव डाल रहे हैं।

3. अंतर-राज्यीय समन्वय

  • अरावली रेंज कई राज्यों (गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली) में फैली हुई है, जिससे संरक्षण और प्रबंधन के लिए प्रभावी अंतर-राज्यीय समन्वय की आवश्यकता होती है।
  • विभिन्न राज्यों में अलग-अलग नियामक ढाँचे और प्रवर्तन तंत्र चुनौतियाँ पैदा करते हैं।

4. वैज्ञानिक डेटा और हितधारक एकीकरण

  • विभिन्न वैज्ञानिक विषयों (भूवैज्ञानिक, जल-वैज्ञानिक, पारिस्थितिक) से डेटा को एकीकृत करना और इसे सामाजिक-आर्थिक विचारों के साथ संतुलित करना जटिल है।
  • स्थानीय समुदायों, विशेषज्ञों और सरकारी एजेंसियों सहित सभी हितधारकों को प्रभावी ढंग से शामिल करना और उनकी चिंताओं को संबोधित करना महत्वपूर्ण है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
अरावली का जटिल सीमांकन केवल एक भू-भाग-आधारित मानदंड से परे व्यापक भूवैज्ञानिक, पारिस्थितिक और सामाजिक-आर्थिक आयामों को शामिल करने की आवश्यकता।
पर्यावरण क्षरण अवैध खनन, शहरीकरण और अतिक्रमण से जैव विविधता का नुकसान और पारिस्थितिक संतुलन में गड़बड़ी।
अंतर-राज्यीय समन्वय का अभाव विभिन्न राज्यों में फैली अरावली रेंज के लिए एकीकृत संरक्षण और प्रबंधन नीतियों को लागू करने में कठिनाई।
वैज्ञानिक डेटा एकीकरण विभिन्न वैज्ञानिक साक्ष्यों और हितधारकों के विचारों को एक व्यापक और बचाव योग्य रिपोर्ट में संयोजित करने की चुनौती।
नियामक ढाँचे की पर्याप्तता मौजूदा नियामक ढाँचे की अरावली के विभिन्न socio-ecological विशेषताओं को संबोधित करने की क्षमता का मूल्यांकन।

आगे की राह

  • अरावली पारिस्थितिकी तंत्र परिदृश्य (AEL) ढाँचे को अपनाना, जो व्यापक भूवैज्ञानिक, पारिस्थितिक और सामाजिक-आर्थिक आयामों को एकीकृत करता है।
  • अरावली के विभिन्न क्षेत्रों के लिए विशिष्ट संरक्षण और प्रबंधन रणनीतियों को विकसित करना, उनकी अनूठी socio-ecological विशेषताओं के आधार पर।
  • अवैध खनन और अतिक्रमण को रोकने के लिए प्रवर्तन तंत्र को मजबूत करना और मौजूदा पर्यावरण कानूनों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करना।
  • अरावली रेंज से जुड़े राज्यों के बीच प्रभावी अंतर-राज्यीय समन्वय और सहयोग को बढ़ावा देना।
  • स्थानीय समुदायों, विशेषज्ञों और अन्य हितधारकों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में सक्रिय रूप से शामिल करना।
  • अरावली के पारिस्थितिक स्वास्थ्य की निगरानी के लिए एक मजबूत निगरानी प्रणाली स्थापित करना, जिसमें नियमित वैज्ञानिक मूल्यांकन और डेटा संग्रह शामिल हो।
  • अरावली के महत्व के बारे में जन जागरूकता बढ़ाना और संरक्षण प्रयासों में सार्वजनिक भागीदारी को प्रोत्साहित करना।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

अरावली उच्चाधिकार प्राप्त समिति · सर्वोच्च न्यायालय · पर्यावरण संरक्षण · पारिस्थितिक तंत्र · भू-स्थानिक मूल्यांकन · सतत विकास · नियामक ढाँचा · अरावली पारिस्थितिकी परिदृश्य ढाँचा · जैव विविधता · वन्यजीव संरक्षण · खनन गतिविधियाँ · संघवाद

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 48A’, ‘note’: ‘राज्य द्वारा पर्यावरण का संरक्षण और सुधार’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 51A(g)’, ‘note’: ‘नागरिकों का पर्यावरण की रक्षा का कर्तव्य’}

अवधारणा प्रवाह

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अरावली पर समिति का गठन  →  समिति द्वारा व्यापक मूल्यांकन की आवश्यकता  →  अरावली पारिस्थितिकी तंत्र परिदृश्य (AEL) ढाँचे का प्रस्ताव  →  वैज्ञानिक डेटा, हितधारक साक्ष्य का एकीकरण  →  अरावली के संरक्षण और प्रबंधन के लिए सिफारिशें  →  पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास को बढ़ावा

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अरावली पर्वत श्रृंखला भारत के पश्चिमी भाग में स्थित एक प्राचीन वलित पर्वत श्रृंखला है।
2. अरावली पारिस्थितिकी परिदृश्य (AEL) ढाँचा केवल तकनीकी सीमांकन पर केंद्रित है और इसमें सामाजिक-आर्थिक आयाम शामिल नहीं हैं।
3. अरावली उच्चाधिकार प्राप्त समिति का गठन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अरावली रेंज की परिभाषा और सीमांकन पर केंद्र की रिपोर्ट की समीक्षा के लिए किया गया था।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। अरावली पर्वत श्रृंखला भारत के पश्चिमी भाग में स्थित एक प्राचीन वलित पर्वत श्रृंखला है, जो गुजरात से दिल्ली तक फैली हुई है।
कथन 2 गलत है। अरावली पारिस्थितिकी परिदृश्य (AEL) ढाँचा व्यापक भूवैज्ञानिक, भू-आकृतिक, जल-वैज्ञानिक, जैव-भौगोलिक, पारिस्थितिक, जैव विविधता, खनिज-संसाधन और सामाजिक-आर्थिक आयामों की जांच करता है।
कथन 3 सही है। अरावली उच्चाधिकार प्राप्त समिति का गठन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अरावली रेंज की परिभाषा और सीमांकन पर केंद्र की रिपोर्ट की स्वतंत्र समीक्षा के लिए किया गया था।

Q2. अरावली पर्वत श्रृंखला के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा कथन सबसे उपयुक्त है?

  1. यह केवल राजस्थान राज्य तक ही सीमित है।
  2. यह भारत की सबसे नई वलित पर्वत श्रृंखला है।
  3. यह गुजरात से दिल्ली तक फैली हुई है और इसमें विभिन्न पारिस्थितिक और भूवैज्ञानिक विशेषताएं हैं।
  4. इसका मुख्य रूप से कृषि गतिविधियों के लिए उपयोग किया जाता है।

उत्तर: यह गुजरात से दिल्ली तक फैली हुई है और इसमें विभिन्न पारिस्थितिक और भूवैज्ञानिक विशेषताएं हैं। — अरावली पर्वत श्रृंखला गुजरात से दिल्ली तक फैली हुई है और इसमें विभिन्न पारिस्थितिक और भूवैज्ञानिक विशेषताएं हैं, जो इसे एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन बनाती हैं। यह भारत की सबसे पुरानी वलित पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है, न कि सबसे नई, और यह केवल राजस्थान तक सीमित नहीं है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ अरावली पर्वत श्रृंखला के पर्यावरणीय महत्व पर चर्चा कीजिए और इसके संरक्षण में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त समितियों की भूमिका का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** अरावली पर्वत श्रृंखला का संक्षिप्त परिचय (भौगोलिक विस्तार, प्राचीनता) और इसके पर्यावरणीय महत्व का उल्लेख।
2. **अरावली का पर्यावरणीय महत्व:**
* **पारिस्थितिक गलियारा:** वन्यजीवों के लिए महत्वपूर्ण गलियारा।
* **जल पुनर्भरण:** भूजल पुनर्भरण में भूमिका (उदाहरण: दिल्ली, हरियाणा)।
* **जैव विविधता:** विभिन्न वनस्पतियों और जीवों का निवास स्थान।
* **मरुस्थलीकरण का अवरोध:** थार रेगिस्तान के विस्तार को रोकने में भूमिका।
* **जलवायु नियामक:** स्थानीय जलवायु को प्रभावित करना।
3. **संरक्षण में सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका:**
* **न्यायिक सक्रियता:** पर्यावरण संरक्षण के मामलों में सर्वोच्च न्यायालय की ऐतिहासिक भूमिका।
* **समितियों का गठन:** अरावली उच्चाधिकार प्राप्त समिति (Aravalli High-Powered Committee) के गठन का संदर्भ।
* **समिति के कार्य:** केंद्र की रिपोर्ट की समीक्षा, भू-स्थानिक मूल्यांकन, संवेदनशीलता विश्लेषण, हितधारक परामर्श।
* **’अरावली पारिस्थितिकी परिदृश्य (AEL) ढाँचा’:** इसके व्यापक दृष्टिकोण (भूवैज्ञानिक, जल-वैज्ञानिक, सामाजिक-आर्थिक आयाम) का उल्लेख।
4. **आलोचनात्मक परीक्षण:**
* **सकारात्मक पक्ष:** वैज्ञानिक और व्यापक मूल्यांकन सुनिश्चित करना, हितधारकों की भागीदारी, नियामक ढाँचे की पर्याप्तता का आकलन।
* **चुनौतियाँ/सीमाएँ:** रिपोर्ट प्रस्तुत करने में देरी, कार्यान्वयन की चुनौतियाँ, राज्यों के साथ समन्वय, राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता।
5. **निष्कर्ष:** अरावली के संरक्षण के लिए एक समग्र और बहु-आयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल, जिसमें न्यायिक हस्तक्षेप, वैज्ञानिक मूल्यांकन और नीतिगत कार्यान्वयन शामिल हों।

स्रोत: orissapost.com


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