01 Sep सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई 20-25 के छात्र आंदोलनों में दर्ज एफआईआर खारिज की
✎ सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 142 का प्रयोग करते हुए छात्र विरोध प्रदर्शनों से संबंधित FIR रद्द कीं, जो 'पूर्ण न्याय' सुनिश्चित करने की उसकी असाधारण शक्ति को दर्शाती है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान: ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और मूल संरचना | GS Paper II — कार्यपालिका और न्यायपालिका का गठन और कार्य; सरकार के मंत्रालय और विभाग; दबाव समूह और औपचारिक/अनौपचारिक संघ तथा शासन प्रणाली में उनकी भूमिका | GS Paper II — मूल अधिकार, राज्य के नीति निदेशक तत्त्व और मूल कर्तव्य
- Prelims: अनुच्छेद 142, सर्वोच्च न्यायालय की असाधारण शक्तियाँ, FIR रद्द करना, विरोध प्रदर्शन का अधिकार, न्यायिक सक्रियता, मूल अधिकार
- Essay: लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शनों का महत्त्व और सीमाएँ, न्यायपालिका की भूमिका: नागरिकों के अधिकारों का संरक्षक
त्वरित पुनरावृत्ति: सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 142 का प्रयोग करते हुए छात्र विरोध प्रदर्शनों से संबंधित FIR रद्द कीं, जो ‘पूर्ण न्याय’ सुनिश्चित करने की उसकी असाधारण शक्ति को दर्शाती है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने जुलाई 20-25 के बीच हुए छात्र विरोध प्रदर्शनों से संबंधित दिल्ली, बिहार, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और असम में दर्ज की गई प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) को रद्द कर दिया है। न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग करते हुए यह निर्णय लिया, ताकि युवा प्रदर्शनकारियों के भविष्य की संभावनाओं को ध्यान में रखा जा सके। न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया कि इस अवधि के दौरान देश के किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में दर्ज ऐसे सभी मामलों को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा और उन्हें बंद माना जाएगा।
पृष्ठभूमि
- जुलाई 20-25 के बीच विभिन्न राज्यों में छात्रों द्वारा विरोध प्रदर्शन किए गए थे।
- इन विरोध प्रदर्शनों के दौरान कई छात्रों के खिलाफ विभिन्न आरोपों में FIR दर्ज की गई थीं।
- केंद्र सरकार ने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व को आश्वासन दिया था कि प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस ले लिया जाएगा।
- सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सर्वोच्च न्यायालय को सूचित किया कि केंद्र सरकार इस आश्वासन के प्रति प्रतिबद्ध है।
- न्यायालय ने दिल्ली पुलिस को जंतर-मंतर पर मौजूद 2,873 व्यक्तियों के खिलाफ एक एकल FIR दर्ज करने की अनुमति दी, जिनके गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड थे, लेकिन यह FIR केवल शारीरिक क्षति और संपत्ति के विनाश के आरोपों तक ही सीमित होगी।
संविधान का अनुच्छेद 142 क्या है?
- अनुच्छेद 142 भारतीय संविधान का एक महत्त्वपूर्ण प्रावधान है जो सर्वोच्च न्यायालय को ‘पूर्ण न्याय’ (complete justice) करने की असाधारण शक्ति प्रदान करता है।
- यह अनुच्छेद सर्वोच्च न्यायालय को ऐसे आदेश या डिक्री पारित करने का अधिकार देता है जो किसी भी लंबित मामले में पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हों।
- इस शक्ति का उपयोग उन स्थितियों में किया जाता है जहाँ मौजूदा कानून या प्रक्रियाएँ न्याय प्रदान करने में अपर्याप्त साबित होती हैं।
- अनुच्छेद 142 के तहत पारित आदेश तब तक लागू रहते हैं जब तक संसद द्वारा कोई कानून नहीं बनाया जाता है जो ऐसे आदेशों को नियंत्रित करता हो।
- यह शक्ति सर्वोच्च न्यायालय को विधायिका और कार्यपालिका के दायरे से बाहर जाकर भी न्याय सुनिश्चित करने में सक्षम बनाती है।
- इस शक्ति का प्रयोग संयम से और असाधारण परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए, ताकि शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का उल्लंघन न हो।
- यह शक्ति सर्वोच्च न्यायालय को एक ‘सक्रिय’ भूमिका निभाने और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने में मदद करती है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| अनुच्छेद 142 का प्रयोग | सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) की असाधारण शक्ति का प्रदर्शन, पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने हेतु। |
| FIRs रद्द करना | छात्र प्रदर्शनकारियों के भविष्य की संभावनाओं की रक्षा करना और आपराधिक कार्यवाही का अंत करना। |
| पैन-इंडिया विस्तार | देश भर के सभी संबंधित मामलों पर आदेश का प्रभाव, न्याय की एकरूपता सुनिश्चित करना। |
| नई FIRs पर रोक | भविष्य में इसी तरह के विरोध प्रदर्शनों के संबंध में उत्पीड़न को रोकना। |
| गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों के लिए अपवाद | कानून के शासन को बनाए रखते हुए हिंसा और संपत्ति के नुकसान के मामलों को संबोधित करना। |
| मुआवजा नीति का निर्देश | छात्रों के कल्याण के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने का प्रयास। |
महत्व
न्यायिक महत्व
- सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 142 (Article 142) के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग, ‘पूर्ण न्याय’ (complete justice) के सिद्धांत को रेखांकित करता है।
- यह निर्णय विरोध प्रदर्शनों से संबंधित आपराधिक कार्यवाही को समाप्त करने के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल कायम करता है, विशेषकर जब युवा प्रदर्शनकारियों के भविष्य की संभावनाएँ दांव पर हों।
- यह न्यायिक समीक्षा (judicial review) और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संरक्षण में न्यायपालिका की भूमिका को मजबूत करता है।
शासन और नीति महत्व
- केंद्र सरकार द्वारा प्रदर्शनकारियों के खिलाफ मामलों को वापस लेने का आश्वासन शासन में विश्वास बहाली के महत्व को दर्शाता है।
- छात्रों की आत्महत्याओं के संबंध में अखिल भारतीय मुआवजा नीति (pan-India compensation policy) बनाने का निर्देश सरकार की सामाजिक कल्याण और नीति निर्माण की जिम्मेदारी को उजागर करता है।
- यह निर्णय सरकार और नागरिक समाज के बीच संवाद और सहमति के महत्व पर जोर देता है, विशेषकर विरोध प्रदर्शनों के प्रबंधन में।
सामाजिक और नागरिक स्वतंत्रता महत्व
- यह निर्णय शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन (peaceful protest) के अधिकार को बनाए रखने में मदद करता है, जो लोकतंत्र का एक मूलभूत स्तंभ है।
- यह युवा प्रदर्शनकारियों के भविष्य को आपराधिक रिकॉर्ड के बोझ से बचाता है, जिससे उन्हें समाज में सकारात्मक योगदान करने का अवसर मिलता है।
- यह नागरिक स्वतंत्रता (civil liberties) और राज्य की शक्ति के बीच संतुलन स्थापित करने में मदद करता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि असहमति को आपराधिक न बनाया जाए।
चुनौतियाँ
1. विरोध प्रदर्शनों का प्रबंधन
- शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की आवश्यकता के बीच संतुलन स्थापित करना।
- विरोध प्रदर्शनों के दौरान हिंसा और संपत्ति के नुकसान को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करना।
यूपीएससी लिंक: शासन, कानून और व्यवस्था
2. युवाओं का भविष्य और आपराधिक रिकॉर्ड
- युवा प्रदर्शनकारियों के भविष्य पर आपराधिक मामलों के संभावित नकारात्मक प्रभावों को कम करना।
- यह सुनिश्चित करना कि छोटे-मोटे अपराधों के लिए आपराधिक रिकॉर्ड उनके शैक्षिक और व्यावसायिक अवसरों को बाधित न करें।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय, मानव संसाधन
3. न्यायिक सक्रियता और शक्ति पृथक्करण
- अनुच्छेद 142 के तहत सर्वोच्च न्यायालय की व्यापक शक्तियों का प्रयोग और शक्ति पृथक्करण (separation of powers) के सिद्धांत के साथ इसका सामंजस्य।
- कार्यपालिका और विधायिका के दायरे में हस्तक्षेप से बचना, जबकि ‘पूर्ण न्याय’ सुनिश्चित करना।
यूपीएससी लिंक: संविधान, न्यायपालिका
4. मुआवजा नीतियों का कार्यान्वयन
- छात्रों की आत्महत्याओं के लिए एक समान और प्रभावी अखिल भारतीय मुआवजा नीति तैयार करना।
- नीति के कार्यान्वयन में केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय सुनिश्चित करना।
यूपीएससी लिंक: शासन, सामाजिक न्याय
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| विरोध प्रदर्शनों का अधिकार बनाम सार्वजनिक व्यवस्था | लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के बीच नाजुक संतुलन। |
| युवा प्रदर्शनकारियों का भविष्य | आपराधिक मामलों के कारण शैक्षिक और रोजगार के अवसरों पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव। |
| अनुच्छेद 142 का प्रयोग | न्यायिक सक्रियता की सीमाएँ और शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत का सम्मान। |
| हिंसा और संपत्ति का नुकसान | विरोध प्रदर्शनों के दौरान होने वाली हिंसा और सार्वजनिक/निजी संपत्ति के नुकसान को रोकना। |
| केंद्र-राज्य समन्वय | अखिल भारतीय नीतियों के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए विभिन्न सरकारों के बीच सहयोग की आवश्यकता। |
| छात्रों की मानसिक स्वास्थ्य सहायता | छात्रों के बीच आत्महत्याओं को रोकने के लिए व्यापक सहायता प्रणालियों की कमी। |
आगे की राह
- शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों के अधिकार को बनाए रखते हुए सार्वजनिक व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश और मानक संचालन प्रक्रियाएँ (SOPs) विकसित की जानी चाहिए।
- विरोध प्रदर्शनों के दौरान हिंसा और संपत्ति के नुकसान को रोकने के लिए प्रभावी भीड़ नियंत्रण तकनीकों और गैर-घातक बल के उपयोग पर पुलिस कर्मियों को प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।
- छात्रों के बीच मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों को संबोधित करने और शैक्षणिक दबावों से निपटने में सहायता प्रदान करने के लिए एक व्यापक नीति तैयार की जानी चाहिए।
- केंद्र और राज्य सरकारों को छात्रों से संबंधित मुद्दों, विशेषकर शैक्षणिक तनाव और आत्महत्याओं के मामलों में मुआवजे और सहायता के लिए एक समान अखिल भारतीय नीति बनाने हेतु मिलकर काम करना चाहिए।
- विरोध प्रदर्शनों से संबंधित मामलों में युवा प्रदर्शनकारियों के भविष्य की संभावनाओं पर पड़ने वाले प्रभाव को कम करने के लिए कानूनी सहायता और परामर्श प्रदान किया जाना चाहिए।
- सरकार और नागरिक समाज के बीच नियमित संवाद और जुड़ाव को बढ़ावा दिया जाना चाहिए ताकि विरोध प्रदर्शनों के अंतर्निहित कारणों को समझा जा सके और उन्हें संबोधित किया जा सके।
- न्यायपालिका को अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग करते समय ‘पूर्ण न्याय’ के सिद्धांत को बनाए रखते हुए शक्ति पृथक्करण के सिद्धांतों का सम्मान करना जारी रखना चाहिए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
अनुच्छेद 142 · पूर्ण न्याय · मौलिक अधिकार · विरोध प्रदर्शन का अधिकार · आपराधिक कार्यवाही रद्द करना · न्यायिक सक्रियता · राज्य नीति निर्माण · छात्र आंदोलन · कानून का शासन · नागरिक स्वतंत्रता
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘अनुच्छेद 142’: ‘सर्वोच्च न्यायालय की असाधारण शक्तियाँ’}
- {‘अनुच्छेद 19(1)(a)’: ‘वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार’}
- {‘अनुच्छेद 19(1)(b)’: ‘शांतिपूर्वक और बिना हथियारों के एकत्र होने का अधिकार’}
- {‘अनुच्छेद 21’: ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार’}
अवधारणा प्रवाह
छात्रों द्वारा विरोध प्रदर्शन → FIRs का पंजीकरण → सर्वोच्च न्यायालय में याचिका → अनुच्छेद 142 का प्रयोग → FIRs रद्द करना और नई FIRs पर रोक → मुआवजा नीति का निर्देश → युवाओं के भविष्य की सुरक्षा और न्याय सुनिश्चित करना
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों के प्रयोग के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. अनुच्छेद 142 सर्वोच्च न्यायालय को उन मामलों में ‘पूर्ण न्याय’ करने के लिए असाधारण शक्तियाँ प्रदान करता है जहाँ कोई मौजूदा कानून पर्याप्त प्रावधान नहीं करता है।
2. इन शक्तियों का प्रयोग केवल केंद्र सरकार की सिफारिश पर ही किया जा सकता है।
3. सर्वोच्च न्यायालय इस अनुच्छेद के तहत किसी भी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर सकता है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है क्योंकि अनुच्छेद 142 सर्वोच्च न्यायालय को ‘पूर्ण न्याय’ करने के लिए विवेकाधीन शक्तियाँ प्रदान करता है। कथन 2 गलत है क्योंकि इन शक्तियों का प्रयोग न्यायालय अपने विवेक से करता है, न कि सरकार की सिफारिश पर। कथन 3 सही है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ FIR रद्द करके इस शक्ति का प्रयोग किया है।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा मौलिक अधिकार भारत में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के अधिकार का आधार है?
- समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14)
- स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19)
- शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23)
- संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32)
उत्तर: स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19) — अनुच्छेद 19(1)(a) वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्ण और बिना हथियारों के एकत्र होने की स्वतंत्रता प्रदान करता है, जो शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के अधिकार का आधार हैं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत सर्वोच्च न्यायालय की ‘पूर्ण न्याय’ करने की असाधारण शक्तियों की विवेचना कीजिए। हाल ही में छात्र प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध FIR रद्द करने के निर्णय के आलोक में इन शक्तियों के प्रयोग के महत्व और सीमाओं का विश्लेषण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर में अनुच्छेद 142 का विस्तृत परिचय, इसकी संवैधानिक स्थिति और ‘पूर्ण न्याय’ के सिद्धांत की व्याख्या शामिल होनी चाहिए। छात्र प्रदर्शनकारियों के मामले में इसके प्रयोग का उल्लेख करें, जिसमें FIR रद्द करने और अखिल भारतीय नीति बनाने का निर्देश शामिल है। इसके महत्व को रेखांकित करें, जैसे कि नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा, युवा प्रदर्शनकारियों के भविष्य पर प्रभाव और न्यायिक सक्रियता। साथ ही, इसकी संभावित सीमाओं और आलोचनाओं पर भी चर्चा करें, जैसे कि न्यायिक अतिरेक की संभावना और स्थापित कानूनों को दरकिनार करने का जोखिम। विभिन्न न्यायिक निर्णयों (जैसे भोपाल गैस त्रासदी मामला) का संदर्भ देना उचित होगा।
स्रोत: orissapost.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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