19 Oct पीची वन्यजीव अभयारण्य में 36 नई प्रजातियों की खोज, जैव विविधता में वृद्धि
✎ पश्चिमी घाट की स्थानिक प्रजातियों का अभिलेखन और प्रजाति-सूची का नियमित संवर्धन ही जैव विविधता संरक्षण नीति का वैज्ञानिक आधार है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र III — पर्यावरण, पारिस्थितिकी, जैव विविधता एवं संरक्षण (Environment, Ecology, Biodiversity and Conservation) | सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र I — भारत का भौतिक भूगोल (पश्चिमी घाट का भूआकृति एवं वनस्पति वितरण)
- Prelims: पश्चिमी घाट (Western Ghats) और इसकी स्थानिक प्रजातियाँ (Endemic Species), जैव विविधता हॉटस्पॉट (Biodiversity Hotspot) की अवधारणा, वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूचियाँ (Wildlife Protection Act, 1972 — Schedules), भारतीय मोर (Indian Peafowl) — राष्ट्रीय पक्षी, ओडोनेटा (Odonata) — सुई-पतंगे और ड्रैगनफ्लाई-डैमसेलफ्लाई वर्ग, मलबार ग्रे हॉर्नबिल (Malabar Grey Hornbill) और मलबार पैराकीट (Malabar Parakeet) जैसी पश्चिमी घाट की स्थानिक पक्षी प्रजातियाँ, पश्चिमी घाट का विश्व विरासत स्थल (UNESCO World Heritage Site) के रूप में वर्गीकरण
- Essay: प्रजाति-सूची और सूक्ष्म सर्वेक्षण: जैव विविधता संरक्षण की नींव, विकास और पारिस्थितिक संरक्षण के बीच संतुलन: पश्चिमी घाट का उदाहरण
त्वरित पुनरावृत्ति: पश्चिमी घाट की स्थानिक प्रजातियों का अभिलेखन और प्रजाति-सूची का नियमित संवर्धन ही जैव विविधता संरक्षण नीति का वैज्ञानिक आधार है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केरलम (Keralam) के त्रिशूर ज़िले में स्थित पेची क्षेत्र में वन एवं वन्यजीव विभाग ने ट्रैवनकोर नेचर हिस्ट्री सोसाइटी (Travancore Nature History Society – TNHS), तिरुवनंतपुरम के सहयोग से 8 से 11 अक्टूबर तक चार दिवसीय सर्वेक्षण किया। यह सर्वेक्षण चिम्मोनी वन्यजीव अभयारण्य, पेची-वाझानी वन्यजीव अभयारण्य और चुलन्नूर मोर अभयारण्य में 10 आधार शिविरों के माध्यम से किया गया। इसमें पक्षियों, तितलियों और ओडोनेटा वर्ग की कुल 395 प्रजातियाँ दर्ज हुईं, जिनमें से 36 प्रजातियाँ पहले की प्रजाति-सूची में नई जोड़ी गईं। इनमें 24 प्रजातियाँ पश्चिमी घाट की स्थानिक प्रजातियाँ हैं। इस उपलब्धि से यह रेखांकित हुआ है कि व्यवस्थित ऋतुवार सूचीकरण और वर्गीकरण-विज्ञान के स्तर पर पहचान की पुष्टि (Taxonomic Verification) संरक्षण नीति के लिए कितनी आवश्यक है।
पृष्ठभूमि
- पश्चिमी घाट भारत के पश्चिमी तटीय क्षेत्र में फैली एक पर्वत श्रृंखला है, जो गुजरात से लेकर तमिलनाडु और केरल तक विस्तृत है। इसे वर्ष 2012 में यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत स्थल के रूप में मान्यता दी गई।
- पश्चिमी घाट और श्रीलंका को विश्व के जैव विविधता हॉटस्पॉट में सम्मिलित किया जाता है। यहाँ की वनस्पति और जीव-जंतुओं में उच्च स्तर की स्थानिकता पाई जाती है।
- भारत में वन्यजीव संरक्षण का मुख्य विधिक आधार वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 है, जिसके अंतर्गत संरक्षित क्षेत्रों, जैसे अभयारण्य और राष्ट्रीय उद्यान, की स्थापना और प्रजातियों की सुरक्षा के लिए अनुसूचियाँ बनाई गई हैं।
- जैव विविधता के संरक्षण और उपयोग से संबंधित संस्थागत ढाँचा जैव विविधता अधिनियम, 2002 पर आधारित है, जिसके तहत राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (National Biodiversity Authority) और राज्य स्तरीय जैव विविधता बोर्ड कार्य करते हैं।
- जैव विविधता पर नियमित वैज्ञानिक आँकड़े नीति-निर्माण के लिए आधार प्रदान करते हैं, क्योंकि किसी क्षेत्र की संरक्षण प्राथमिकताएँ उसकी प्रजाति-संरचना और स्थानिकता के आधार पर तय होती हैं।
जैव विविधता सूचीकरण (Biodiversity Inventory) क्या है?
- जैव विविधता सूचीकरण किसी निश्चित भू-क्षेत्र में पाई जाने वाली वनस्पति और जीव-जंतु प्रजातियों की व्यवस्थित गणना और अभिलेखन की प्रक्रिया है। इसके परिणाम प्रजाति-सूची (Checklist) के रूप में संकलित किए जाते हैं।
- प्रजाति-सूची में नई प्रजाति का जुड़ना यह दर्शाता है कि उस क्षेत्र की जैव विविधता के बारे में पूर्व जानकारी अधूरी थी, या प्रजाति का क्षेत्र में नया अभिलेख मिला है।
- स्थानिक प्रजाति (Endemic Species) वह प्रजाति है जो किसी एक विशेष भौगोलिक क्षेत्र के अतिरिक्त विश्व में अन्यत्र नहीं पाई जाती। पश्चिमी घाट में पक्षियों, तितलियों और ओडोनेटा की अनेक स्थानिक प्रजातियाँ मिलती हैं।
- ओडोनेटा (Odonata) कीटों का एक वर्ग है, जिसमें ड्रैगनफ्लाई (सुई-पतंगे) और डैमसेलफ्लाई सम्मिलित हैं। ये प्रजातियाँ जल-स्रोतों की स्वच्छता और आर्द्रभूमि के स्वास्थ्य के संकेतक (Bioindicator) मानी जाती हैं।
- तितलियाँ भी पर्यावरणीय संकेतक हैं, क्योंकि उनकी उपस्थिति और विविधता वनस्पति-आवरण और सूक्ष्म-जलवायु की स्थिति को दर्शाती है।
- ऋतुवार सर्वेक्षण इसलिए आवश्यक हैं क्योंकि कई प्रजातियाँ केवल मानसून या विशेष मौसम में सक्रिय होती हैं, इसलिए एक ही मौसम के अध्ययन से पूरी तस्वीर नहीं मिलती।
- वन्यजीव अभयारण्य वह संरक्षित क्षेत्र है जहाँ वन्यजीवों के संरक्षण को प्राथमिकता दी जाती है, परंतु इसमें सामान्यतः मानव गतिविधियों पर सीमित नियंत्रण के साथ स्थानीय उपयोग की अनुमति भी हो सकती है।
- वर्गीकरण-विज्ञान (Taxonomy) के स्तर पर प्रजाति की सटीक पहचान सुनिश्चित करना आवश्यक है, ताकि गलत अभिलेख से संरक्षण नीति प्रभावित न हो।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| सर्वेक्षण का क्षेत्र और अवधि | केरलम के पीची क्षेत्र में 8 से 11 अक्टूबर तक चार दिवसीय सर्वेक्षण हुआ। इसमें चिम्मोनी वन्यजीव अभयारण्य, पीची-वाझानी वन्यजीव अभयारण्य और चुलन्नूर मोर अभयारण्य को 10 आधार शिविरों (Base Camps) के माध्यम से कवर किया गया। |
| कुल अभिलेखित प्रजातियाँ | पक्षी (165), तितलियाँ (174) और ओडोनेटा (Odonata) वर्ग (56) मिलाकर कुल 395 प्रजातियाँ दर्ज हुईं। ओडोनेटा वर्ग में ड्रैगनफ्लाई और डैमसेलफ्लाई आते हैं। |
| सूची में जुड़ी नई प्रजातियाँ | पूर्व सूची (Checklist) में 36 नई प्रजातियाँ जोड़ी गईं, जिनमें पक्षियों की 8, तितलियों की 22 और ओडोनेटा की 6 प्रजातियाँ हैं। यह किसी क्षेत्र की जैव विविधता के पूर्ण दस्तावेज़ीकरण में कमी को दर्शाता है। |
| पश्चिमी घाट की स्थानिक (Endemic) प्रजातियाँ | पश्चिमी घाट (Western Ghats) की कुल 24 स्थानिक प्रजातियाँ दर्ज हुईं: पक्षी 5, तितलियाँ 11 और ओडोनेटा 8। यह इस भू-दृश्य के संरक्षण-मूल्य को रेखांकित करता है। |
| सर्वेक्षण की पद्धति | मौसमी और व्यवस्थित (Systematic) सूची-निर्माण के साथ वर्गीकरण-विज्ञान (Taxonomy) के आधार पर प्रजाति-सत्यापन किया गया। इससे आँकड़ों की वैज्ञानिक विश्वसनीयता बढ़ती है। |
| संस्थागत साझेदारी | वन एवं वन्यजीव विभाग और तिरुवनंतपुरम स्थित ट्रावनकोर नेचर हिस्ट्री सोसाइटी (TNHS) की साझेदारी से सर्वेक्षण हुआ। इससे सरकारी विभाग और गैर-सरकारी वैज्ञानिक संगठन के बीच सहयोग का उदाहरण मिलता है। |
महत्व
पारिस्थितिक महत्व
- पश्चिमी घाट विश्व की प्रमुख जैव विविधता वाले क्षेत्रों में गिना जाता है और इसे यूनेस्को (UNESCO) की विश्व धरोहर स्थल सूची में शामिल किया गया है। पीची के वन इसी भू-दृश्य का हिस्सा हैं।
- स्थानिक प्रजातियाँ अपने सीमित भौगोलिक क्षेत्र में ही पाई जाती हैं, इसलिए उनके आवास का संरक्षण सबसे अधिक आवश्यक है।
- तितलियों और ओडोनेटा वर्ग के जीव परागण, कीट-नियंत्रण और जल-गुणवत्ता के संकेतक के रूप में पारिस्थितिक तंत्र के स्वास्थ्य को दर्शाते हैं।
वैज्ञानिक और शोध महत्व
- सूची में जुड़ी नई प्रजातियाँ किसी क्षेत्र की ज्ञात जैव विविधता के आधार-आँकड़े (Baseline Data) को समृद्ध करती हैं।
- वर्गीकरण-विज्ञान के सत्यापन से प्रजातियों की पहचान में त्रुटियाँ कम होती हैं और भविष्य के दीर्घकालिक अध्ययन संभव होते हैं।
नीतिगत और शासन महत्व
- वन्यजीव संरक्षण के लिए सूची-आधारित और मौसमी सर्वेक्षण संरक्षित क्षेत्रों के प्रबंधन योजनाओं में ठोस आधार प्रदान करते हैं।
- जैविक विविधता अधिनियम, 2002 (Biological Diversity Act, 2002) के अंतर्गत जैव-संसाधनों के दस्तावेज़ीकरण का महत्व इसी प्रकार के सर्वेक्षणों से और स्पष्ट होता है।
चुनौतियाँ
1. आवास विखंडन और अतिक्रमण का खतरा
- संरक्षित क्षेत्रों के बाहर के वन और गलियारे (Corridors) खंडित होने से स्थानिक प्रजातियों की आवाजाही और आनुवंशिक विविधता प्रभावित होती है।
- कृषि विस्तार, बुनियादी ढाँचा और बस्तियों का दबाव सीमांत क्षेत्रों में वन्यजीव आवासों को सिकोड़ता है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: पर्यावरण संरक्षण और जैव विविधता
2. स्थानिक प्रजातियों की असुरक्षा
- स्थानिक प्रजातियों का वितरण सीमित होता है, इसलिए एक ही क्षेत्र में आवास-क्षति से उनके विलुप्त होने का जोखिम अधिक होता है।
- जलवायु परिवर्तन से तापमान और वर्षा के पैटर्न बदलते हैं, जिससे ओडोनेटा जैसे जल-निर्भर जीवों के प्रजनन स्थल प्रभावित होते हैं।
यूपीएससी लिंक: GS-3: जलवायु परिवर्तन का जैव विविधता पर प्रभाव
3. आँकड़ों की कमी और सूचियों की अपूर्णता
- कई क्षेत्रों में प्रजातियों की सूचियाँ पुरानी या अपूर्ण हैं, जिससे नीति-निर्माण में सटीक आँकड़ों का अभाव रहता है।
- विशेषज्ञ वर्गीकरण-विज्ञानियों की संख्या सीमित है, इसलिए नई प्रजातियों का सत्यापन धीमा होता है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: जैव विविधता संरक्षण के संस्थागत उपाय
4. मानव-वन्यजीव संघर्ष और सह-अस्तित्व
- वन क्षेत्र के समीप रहने वाले समुदायों और वन्यजीवों के बीच संसाधनों को लेकर टकराव बढ़ सकता है।
- संरक्षण नीतियों में स्थानीय समुदायों की भागीदारी न होने से उनका समर्थन कम हो सकता है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: शासन में सामुदायिक भागीदारी
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| आवास का विखंडन | संरक्षित क्षेत्रों के बीच वन-गलियारे टूटने से प्रजातियों का प्रवास और आनुवंशिक आदान-प्रदान बाधित होता है। |
| स्थानिक प्रजातियों का सीमित वितरण | छोटे और विशिष्ट आवासों में क्षति होने से पूरी प्रजाति के विलुप्त होने का खतरा बढ़ता है। |
| आधार-आँकड़ों की अपूर्णता | पुरानी या अधूरी सूचियाँ नीति-निर्माण और संरक्षण-योजना की सटीकता को कम करती हैं। |
| जलवायु परिवर्तन का प्रभाव | बदलते मौसम और जल-स्रोतों से ओडोनेटा और तितलियों के जीवन-चक्र पर असर पड़ता है। |
| विशेषज्ञता की सीमित उपलब्धता | वर्गीकरण-विज्ञानियों की कमी से नई प्रजातियों के सत्यापन और दस्तावेज़ीकरण में देरी होती है। |
आगे की राह
- संरक्षित क्षेत्रों के बीच वन-गलियारों की पहचान और उनके संरक्षण के लिए भू-उपयोग योजना में समन्वय किया जाए।
- पीची और अन्य क्षेत्रों में मौसमी जैव-सर्वेक्षण को नियमित और दीर्घकालिक बनाया जाए ताकि प्रजाति-परिवर्तन का आकलन हो सके।
- स्थानिक प्रजातियों के आवासों को अलग से चिह्नित कर उन्हें अतिक्रमण और निर्माण-गतिविधियों से सुरक्षित रखा जाए।
- वन विभाग, विश्वविद्यालयों और गैर-सरकारी वैज्ञानिक संगठनों के बीच डेटा साझाकरण का एक औपचारिक तंत्र बनाया जाए।
- वर्गीकरण-विज्ञान के प्रशिक्षण और विशेषज्ञ-क्षमता निर्माण पर ध्यान दिया जाए।
- स्थानीय समुदायों को जैव-निगरानी (Biomonitoring) में शामिल किया जाए ताकि संरक्षण में उनकी भागीदारी बढ़े।
- जैव विविधता अधिनियम, 2002 और वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के प्रावधानों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाए।
- जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को ध्यान में रखते हुए जल-स्रोतों और आर्द्रभूमि के संरक्षण को प्राथमिकता दी जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 48A: पर्यावरण और वन-वन्यजीव संरक्षण का राज्य का दायित्व
- अनुच्छेद 51A(g): प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा का मौलिक कर्तव्य
अवधारणा प्रवाह
पश्चिमी घाट के संरक्षित क्षेत्रों में मौसमी व्यवस्थित सर्वेक्षण का आयोजन → पक्षी, तितली और ओडोनेटा वर्ग की प्रजातियों का अभिलेखन और वर्गीकरण-विज्ञान से सत्यापन → पूर्व सूची में 36 नई प्रजातियों का जुड़ना और 24 स्थानिक प्रजातियों की पुष्टि → जैव विविधता के आधार-आँकड़ों का समृद्ध होना → संरक्षण नीति, प्रबंधन योजना और आवास-सुरक्षा के लिए वैज्ञानिक आधार का निर्माण → आवास-विखंडन और जलवायु परिवर्तन से स्थानिक प्रजातियों की सुरक्षा हेतु दीर्घकालिक निगरानी की आवश्यकता
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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