20 Oct बच्चों में मोटापे से लड़ने के लिए सरकारी नीति कैसे करेगी मदद? जानिए प्रमुख पहल
✎ बाल मोटापा ऊर्जा-असंतुलन से उत्पन्न होता है, इसलिए इसका समाधान केवल व्यक्तिगत आहार पर नहीं, बल्कि भोजन-परिवेश, विद्यालय नीति और शारीरिक गतिविधि से जुड़े संरचनात्मक हस्तक्षेपों पर निर्भर है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II — स्वास्थ्य एवं सामाजिक क्षेत्र (पोषण, लोक स्वास्थ्य और नीतिगत हस्तक्षेप) | सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II — अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ और उनके दिशा-निर्देश (विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनिसेफ़)
- Prelims: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के बाल मोटापा प्रबंधन संबंधी दिशा-निर्देश (2026), यूनिसेफ़ (UNICEF) चाइल्ड न्यूट्रिशन ग्लोबल रिपोर्ट 2025 और कुपोषण के रूप, बॉडी मास इंडेक्स (BMI) और दक्षिण एशियाई शरीर-संरचना की विशेषता, मेटाबॉलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टीटोटिक लिवर डिजीज (MASLD), अनुच्छेद 47: पोषण स्तर उठाना और लोक स्वास्थ्य सुधार राज्य का कर्तव्य, खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 तथा भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI), पोषण अभियान (POSHAN Abhiyaan) और फिट इंडिया आंदोलन
- Essay: मोटापा और अल्पपोषण: एक साथ मौजूद दोहरा पोषण भार, भोजन का परिवेश बदले बिना स्वस्थ जीवनशैली संभव नहीं: नीति और व्यक्तिगत उत्तरदायित्व
त्वरित पुनरावृत्ति: बाल मोटापा ऊर्जा-असंतुलन से उत्पन्न होता है, इसलिए इसका समाधान केवल व्यक्तिगत आहार पर नहीं, बल्कि भोजन-परिवेश, विद्यालय नीति और शारीरिक गतिविधि से जुड़े संरचनात्मक हस्तक्षेपों पर निर्भर है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने 7 अक्टूबर 2026 को 29 दिन से 10 वर्ष से कम आयु के बच्चों में मोटापे के एकीकृत प्रबंधन हेतु पहली बार दिशा-निर्देश जारी किए। इनमें आहार-हस्तक्षेप, शारीरिक गतिविधि, निष्क्रिय व्यवहार और नींद, व्यवहार-परिवर्तन कार्यक्रम, डिजिटल स्वास्थ्य हस्तक्षेप, औषधि-उपचार (Pharmacotherapy) और बैरिएट्रिक सर्जरी (Bariatric Surgery) जैसे विकल्पों की सिफारिश की गई है। यह विषय इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि बाल मोटापा अब विकसित देशों तक सीमित समस्या नहीं रहा, और भारत जैसे निम्न-मध्य आय वाले देशों में इसकी दर तेज़ी से बढ़ रही है। इस संदर्भ में केवल व्यक्तिगत आहार-सुधार पर्याप्त नहीं माना जा रहा, बल्कि भोजन-परिवेश और सार्वजनिक नीति की भूमिका पर ध्यान केंद्रित हो रहा है।
पृष्ठभूमि
- यूनिसेफ़ की चाइल्ड न्यूट्रिशन ग्लोबल रिपोर्ट 2025 के अनुसार विद्यालय-आयु के बच्चों और किशोरों में मोटापा पहली बार विश्व स्तर पर कम वजन (Underweight) से अधिक प्रचलित कुपोषण का रूप बन गया; लगभग 18.8 करोड़ बच्चे मोटापे से ग्रस्त हैं, जो लगभग हर दसवें बच्चे के बराबर है।
- वर्ष 2000 से 2022 के बीच दक्षिण एशियाई देशों में 5 से 19 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों में अधिक वजन का प्रचलन लगभग पाँच गुना बढ़ा।
- अनुमान है कि वर्ष 2030 तक भारत में 5 से 19 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 2.7 करोड़ बच्चे और किशोर मोटापे से प्रभावित होंगे, जो वैश्विक भार का लगभग 11 प्रतिशत है।
- भारत में अल्पपोषण की समस्या अब भी बनी हुई है, जबकि अधिक पोषण से जुड़ी समस्याएँ भी तेज़ी से उभर रही हैं; इस स्थिति को दोहरा पोषण भार कहा जाता है।
- भारत में पहले से कुछ संस्थागत पहलें मौजूद हैं, जैसे एकीकृत बाल विकास सेवा (ICDS, 1975), पोषण अभियान (2018) और फिट इंडिया आंदोलन (2019), जिनका दायरा मुख्यतः पोषण-वितरण और जीवनशैली जागरूकता तक है।
बाल मोटापा क्या है?
- बाल मोटापा वह स्थिति है जिसमें बच्चे के शरीर में ऊर्जा का सेवन उसके व्यय से लगातार अधिक होता है, जिससे अतिरिक्त वसा जमा होती है। यह ऊर्जा-असंतुलन की समस्या है।
- इसके प्रमुख कारण हैं: वसा और शर्करा से भरपूर खाद्य पदार्थों का बढ़ता सेवन, आहार में विविधता और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी, शारीरिक गतिविधि में कमी तथा स्क्रीन-आधारित निष्क्रिय मनोरंजन।
- बॉडी मास इंडेक्स (BMI) आयु और लिंग के मानक वक्र से तुलना कर अधिक वजन और मोटापे का आकलन करने का सामान्य पैमाना है।
- दक्षिण एशियाई शरीर-संरचना की विशेषता यह है कि सामान्य BMI होते हुए भी शरीर में उदर और आंतरिक वसा अधिक तथा मांसपेशी कम हो सकती है, जिससे चयापचय-संबंधी जोखिम बढ़ते हैं।
- बाल मोटापे से टाइप-2 मधुमेह, हृदय रोग और MASLD जैसे गैर-संचारी रोग (NCD) पहले वयस्कता की बीमारियाँ मानी जाती थीं, अब बच्चों और किशोरों में भी इनका निदान हो रहा है।
- WHO के दिशा-निर्देशों के मुख्य स्तंभ हैं: भोजन-परिवेश और जीवनशैली में सुधार, विद्यालयों में शर्करा-युक्त पेयों की सीमा, भोजन और मोटापा संबंधी मानक निर्धारण तथा प्रारंभिक हस्तक्षेप कार्यक्रम।
- भोजन-परिवेश (Food Environment) से आशय है कि बच्चों के आसपास कौन-से भोजन उपलब्ध हैं, उनका विज्ञापन कैसे होता है और उनकी कीमत क्या है; इसे नियंत्रित करना नीति का कार्य है, जो संविधान के अनुच्छेद 47 की भावना से भी जुड़ता है।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| WHO के पहले दिशा-निर्देश (7 अक्टूबर) | 29 दिन से 10 वर्ष से कम आयु के बच्चों में स्थूलता (Obesity) के समेकित प्रबंधन के लिए WHO ने पहली बार वैश्विक दिशा-निर्देश जारी किए। इनमें आहार, शारीरिक गतिविधि, व्यवहार परिवर्तन, डिजिटल स्वास्थ्य हस्तक्षेप, औषधि चिकित्सा और बैरियाट्रिक सर्जरी जैसे विकल्प शामिल हैं। |
| ऊर्जा असंतुलन | बच्चों में अधिक वजन और स्थूलता का मूल कारण कैलोरी के सेवन और व्यय के बीच असंतुलन है। वसा और शर्करा से भरपूर, पोषक विविधता में कमजोर आहार तथा कम शारीरिक गतिविधि इसके प्रमुख कारक हैं। |
| कुपोषण के स्वरूप में बदलाव | UNICEF की Child Nutrition Global Report 2025 के अनुसार स्कूली आयु के बच्चों और किशोरों में स्थूलता पहली बार वैश्विक स्तर पर कम वजन (Underweight) से अधिक प्रचलित कुपोषण का रूप बन गई है। लगभग 18.8 करोड़ बच्चे, यानी लगभग हर दसवाँ बच्चा, इससे प्रभावित है। |
| दक्षिण एशियाई शारीरिक संरचना | दक्षिण एशियाई लोगों में सामान्य BMI के साथ शरीर और पेट में अधिक वसा तथा कम मांसपेशी द्रव्यमान पाया जाता है। इससे वसा का केंद्रीय (Central) वितरण होता है, जो मधुमेह और हृदय रोगों के जोखिम को बढ़ाता है। |
| भारत के लिए अनुमान | 2000 से 2022 के बीच दक्षिण एशिया में बच्चों में अधिक वजन का प्रसार लगभग पाँच गुना हो गया। अनुमान है कि 2030 तक भारत में 5 से 19 वर्ष आयु वर्ग के 2.7 करोड़ से अधिक बच्चे और किशोर स्थूलता से प्रभावित होंगे, जो वैश्विक बोझ का लगभग 11 प्रतिशत है। |
महत्व
स्वास्थ्य और रोग-भार
- स्थूलता से जुड़े असंचारी रोग (NCD) जैसे टाइप-2 मधुमेह, हृदय रोग और MASLD अब वयस्कता के बजाय बच्चों और किशोरों में भी पाए जा रहे हैं।
- जाँच (Screening) की आयु घटानी होगी, क्योंकि जटिलताएँ जैसे दीर्घकालिक गुर्दा रोग और यकृत रोग उत्पादक आयु में ही प्रकट होंगी।
आर्थिक और मानव संसाधन
- कार्यशील आयु में असंचारी रोगों का बोझ बढ़ने से श्रम उत्पादकता घटती है और स्वास्थ्य व्यय बढ़ता है।
- बाल स्वास्थ्य में निवेश भविष्य के मानव पूँजी (Human Capital) निर्माण का आधार है, इसलिए इसे नीतिगत प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
सामाजिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य
- स्थूलता अब केवल समृद्ध समाजों की समस्या नहीं रही। निम्न और मध्यम आय वाले देशों में इसका तेज़ प्रसार सामाजिक असमानता के नए आयाम जोड़ता है।
- बच्चों के पोषण स्तर का सीधा संबंध मातृ स्वास्थ्य, विद्यालय उपस्थिति और दीर्घकालिक शैक्षणिक प्रदर्शन से है।
शासन और नीति-निर्माण
- WHO के दिशा-निर्देश राष्ट्रीय नीतियों के लिए साक्ष्य-आधारित ढाँचा प्रदान करते हैं, जिससे विभिन्न देश अपने संदर्भ के अनुसार नीति बना सकते हैं।
- आहार वातावरण (Food Environment) में सुधार के लिए खाद्य विपणन, विद्यालय पोषण और लेबलिंग जैसे क्षेत्रों में अंतर-विभागीय समन्वय आवश्यक है।
चुनौतियाँ
1. आहार वातावरण की चुनौती
- बच्चों के आसपास उच्च वसा और उच्च शर्करा वाले खाद्य पदार्थ सहज उपलब्ध और आकर्षक हैं, जबकि पौष्टिक विकल्प महँगे या दुर्लभ हैं।
- विपणन और विज्ञापन के माध्यम से बच्चों की खाद्य पसंद प्रभावित होती है, जिससे व्यक्तिगत चयन की स्वतंत्रता सीमित हो जाती है।
- शर्करा-युक्त पेय पदार्थों को विद्यालयों में सीमित करना एक प्रमुख नीतिगत उपाय है, परंतु उसका प्रभावी पालन चुनौतीपूर्ण है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: सरकारी नीतियाँ और हस्तक्षेप; GS-2: स्वास्थ्य से संबंधित विषय
2. जीवनशैली और शारीरिक निष्क्रियता
- मनोरंजन की गतिविधियाँ स्क्रीन-आधारित होती जा रही हैं और शारीरिक खेल का समय घट रहा है।
- परिवहन के साधनों में बदलाव से पैदल चलने और साइकिल चलाने की आदत कम हुई है।
- नींद की अवधि और गुणवत्ता में कमी भी स्थूलता के जोखिम से जुड़ी है, जिसे WHO के दिशा-निर्देश अलग से संबोधित करते हैं।
यूपीएससी लिंक: GS-2: स्वास्थ्य; GS-2: शहरी नियोजन और परिवहन से संबंधित मुद्दे
3. जाँच और प्रारंभिक पहचान की कमी
- बाल्यावस्था में BMI और शरीर की संरचना की नियमित जाँच प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में पर्याप्त रूप से नहीं होती।
- दक्षिण एशियाई शारीरिक संरचना के कारण सामान्य BMI वाले बच्चों में भी जोखिम छिपा रह सकता है, जिससे केवल BMI आधारित मानक अपर्याप्त हो सकते हैं।
- आरंभिक हस्तक्षेप के अभाव में असंचारी रोगों का बोझ किशोरावस्था तक पहुँच जाता है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: स्वास्थ्य सेवाएँ और प्राथमिक स्वास्थ्य तंत्र; GS-3: स्वास्थ्य और मानव संसाधन
4. कुपोषण का दोहरा बोझ
- भारत में कम वजन, रक्ताल्पता और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी अब भी मौजूद है, जबकि अधिक वजन और स्थूलता तेज़ी से बढ़ रही है।
- इस दोहरे बोझ (Double Burden) के कारण नीतियों को एक साथ कुपोषण के दोनों सिरों से निपटना पड़ता है, जो जटिल है।
- एक ही परिवार या समुदाय में अल्पपोषण और अतिपोषण दोनों देखे जा सकते हैं, जिससे लक्षित हस्तक्षेप कठिन हो जाता है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: सामाजिक क्षेत्र में विकास; GS-3: खाद्य सुरक्षा और कृषि-पोषण संबंध
5. अंतर-विभागीय समन्वय का अभाव
- पोषण, विद्यालय शिक्षा, खाद्य सुरक्षा, विपणन नियमन और शहरी नियोजन अलग-अलग मंत्रालयों और निकायों के दायरे में आते हैं।
- दिशा-निर्देशों को विद्यालय स्तर तक लागू करने के लिए स्थानीय निकायों और शिक्षा तंत्र का सहयोग आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: केंद्र-राज्य संबंध और नीति-क्रियान्वयन; GS-2: शासन में समन्वय तंत्र
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| विद्यालयों में शर्करा-युक्त पेय | बच्चों के दैनिक सेवन में वृद्धि; सीमित करने के नियम का प्रभावी पालन और निगरानी कठिन |
| खाद्य विपणन और विज्ञापन | उच्च वसा और उच्च शर्करा वाले उत्पादों का आक्रामक प्रचार बच्चों की पसंद को प्रभावित करता है |
| BMI आधारित मानक की सीमा | दक्षिण एशियाई शरीर संरचना में सामान्य BMI के बावजूद वसा का जमाव हो सकता है, जिससे पहचान चूक सकती है |
| शारीरिक निष्क्रियता | स्क्रीन-आधारित मनोरंजन और कम पैदल यात्रा से ऊर्जा व्यय घट रहा है |
| दोहरा कुपोषण बोझ | अल्पपोषण और अतिपोषण दोनों की उपस्थिति से नीतियों का लक्ष्य विभाजित होता है |
| स्वास्थ्य तंत्र की तैयारी | प्राथमिक स्वास्थ्य स्तर पर नियमित जाँच, परामर्श और दीर्घकालिक अनुवर्ती देखभाल की क्षमता सीमित है |
आगे की राह
- विद्यालयों में शर्करा-युक्त पेय और अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थों की बिक्री पर स्पष्ट और लागू होने योग्य नियम बनाए जाएँ, साथ ही उनकी नियमित निगरानी की व्यवस्था हो।
- बच्चों के लिए आहार और स्थूलता संबंधी राष्ट्रीय दिशा-निर्देश तैयार किए जाएँ, जो WHO के समेकित प्रबंधन ढाँचे और भारतीय आहार परंपराओं दोनों पर आधारित हों।
- दक्षिण एशियाई शरीर संरचना को ध्यान में रखते हुए BMI के साथ कमर की परिधि और शरीर की संरचना जैसे संकेतकों को जाँच प्रक्रिया में शामिल किया जाए।
- प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और आंगनवाड़ी केंद्रों में बाल्यावस्था की नियमित जाँच और प्रारंभिक हस्तक्षेप की व्यवस्था सुदृढ़ की जाए।
- विद्यालय पाठ्यक्रम में पोषण, शारीरिक गतिविधि और स्क्रीन-समय के बारे में स्वास्थ्य शिक्षा को नियमित रूप से शामिल किया जाए।
- खाद्य विपणन, लेबलिंग और विज्ञापन नियमन में स्वास्थ्य, उपभोक्ता संरक्षण और खाद्य सुरक्षा से जुड़ी संस्थाओं के बीच समन्वय बढ़ाया जाए।
- शहरी नियोजन में खेल के मैदानों, सुरक्षित पैदल मार्गों और साइकिल ट्रैक को प्राथमिकता दी जाए, ताकि शारीरिक गतिविधि सुलभ हो।
- कुपोषण के दोनों सिरों, अल्पपोषण और अतिपोषण, को एक समेकित पोषण नीति के अंतर्गत संबोधित करने के लिए आँकड़ा-संचालित निगरानी प्रणाली विकसित की जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
बाल स्थूलता (Childhood Obesity) · ऊर्जा असंतुलन (Energy Imbalance) · खाद्य परिवेश (Food Environment) · गैर-संचारी रोग (Non-Communicable Diseases – NCDs) · अल्पपोषण (Undernutrition) · मेटाबॉलिक डिसफंक्शन-संबंधित स्टीटोटिक लिवर रोग (MASLD) · राज्य के नीति-निदेशक तत्व (Directive Principles of State Policy) · अनुच्छेद 47 (Article 47) · खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 (Food Safety and Standards Act, 2006) · भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) · पोषण अभियान (POSHAN Abhiyaan) · फिट इंडिया आंदोलन (Fit India Movement)
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 47: पोषण स्तर और लोक स्वास्थ्य सुधार का राज्य का कर्तव्य
- अनुच्छेद 39(च): बच्चों के स्वस्थ विकास के अवसर और संरक्षण
अवधारणा प्रवाह
अधिक कैलोरी सेवन और कम शारीरिक गतिविधि से ऊर्जा असंतुलन उत्पन्न होता है → उच्च वसा और शर्करा वाले आहार तथा स्क्रीन-आधारित जीवनशैली से बच्चों में स्थूलता बढ़ती है → दक्षिण एशियाई शरीर संरचना में पेट और शरीर में वसा का केंद्रीय जमाव होता है → बचपन की स्थूलता से मधुमेह, हृदय रोग और MASLD जैसे असंचारी रोग किशोरावस्था में प्रकट होते हैं → WHO के दिशा-निर्देश आहार, गतिविधि और व्यवहार परिवर्तन के साथ प्रारंभिक हस्तक्षेप का साक्ष्य-आधारित ढाँचा देते हैं → राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर आहार वातावरण, विद्यालय नीति और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार से रोग-भार घटाने का लक्ष्य रखा जाता है
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अनुच्छेद 47 राज्य को पोषण स्तर ऊँचा करने और लोक स्वास्थ्य सुधारने का दायित्व सौंपता है।
2. भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) की स्थापना खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 के अंतर्गत हुई है।
3. बाल स्थूलता केवल आनुवंशिक कारणों से होती है और आहार तथा शारीरिक गतिविधि से इसका कोई संबंध नहीं है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: अनुच्छेद 47 राज्य के नीति-निदेशक तत्वों में आता है और पोषण स्तर व लोक स्वास्थ्य से जुड़ा है। कथन 2 सही है: FSSAI खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 के तहत स्थापित वैधानिक प्राधिकरण है। कथन 3 गलत है: बाल स्थूलता मूलतः ऊर्जा असंतुलन से जुड़ी है, यानी कैलोरी के सेवन और व्यय के बीच असंतुलन, जिसमें उच्च वसा व शर्करा वाले खाद्य पदार्थ और कम शारीरिक गतिविधि प्रमुख कारक हैं।
Q2. निम्नलिखित में से दो कथनों पर विचार कीजिए:
अभिकथन (A): निम्न और मध्यम आय वाले देशों में बाल स्थूलता तेजी से बढ़ रही है और भारत भी इसमें शामिल है।
कारण (R): उच्च वसा और उच्च शर्करा वाले प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के बढ़ते सेवन तथा कम शारीरिक गतिविधि से ऊर्जा असंतुलन उत्पन्न होता है।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए।
- (a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
- (b) (A) और (R) दोनों सही हैं, परंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
- (c) (A) सही है, परंतु (R) गलत है।
- (d) (A) गलत है, परंतु (R) सही है।
उत्तर: (a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — अभिकथन और कारण दोनों तथ्यात्मक रूप से सही हैं। WHO और UNICEF के अध्ययन बताते हैं कि निम्न और मध्यम आय वाले देशों में स्थूलता बढ़ रही है। कारण सीधे अभिकथन की व्याख्या करता है, क्योंकि ऊर्जा असंतुलन ही स्थूलता का मूल तंत्र है।
Q3. निम्नलिखित सुमेलों पर विचार कीजिए:
सूची I (कार्यक्रम/प्रावधान) — सूची II (संबंधित पक्ष)
1. अनुच्छेद 47 — a. राज्य के नीति-निदेशक तत्व
2. ईट राइट इंडिया (Eat Right India) — b. भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) की पहल
3. पोषण अभियान (POSHAN Abhiyaan) — c. महिला एवं बाल विकास मंत्रालय का कार्यक्रम
4. फिट इंडिया आंदोलन (Fit India Movement) — d. युवा कार्य और खेल मंत्रालय की पहल
सही सुमेलन चुनिए।
- 1-a, 2-b, 3-c, 4-d
- 1-b, 2-a, 3-d, 4-c
- 1-a, 2-c, 3-b, 4-d
- 1-c, 2-b, 3-a, 4-d
उत्तर: 1-a, 2-b, 3-c, 4-d — अनुच्छेद 47 नीति-निदेशक तत्वों का प्रावधान है। ईट राइट इंडिया FSSAI की पहल है। पोषण अभियान महिला एवं बाल विकास मंत्रालय का कार्यक्रम है। फिट इंडिया आंदोलन युवा कार्य और खेल मंत्रालय द्वारा शुरू किया गया है। अन्य विकल्पों में कम से कम एक युग्म गलत है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ बाल स्थूलता अब केवल समृद्ध समाजों की समस्या नहीं रही, बल्कि यह निम्न और मध्यम आय वाले देशों में भी तेजी से फैल रही है। भारत के संदर्भ में खाद्य परिवेश और जीवनशैली को नियंत्रित करने वाली नीतियों की प्रभावशीलता का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि क्या स्वैच्छिक उपाय (Voluntary Measures) इस चुनौती से निपटने के लिए पर्याप्त हैं, या बाध्यकारी वैधानिक हस्तक्षेप अनिवार्य हो जाता है। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल उत्तर संरचना:
1. परिचय: WHO द्वारा 7 अक्टूबर को जारी बाल स्थूलता प्रबंधन के पहले वैश्विक दिशानिर्देश (29 दिन से 10 वर्ष से कम आयु के बच्चों हेतु) का उल्लेख; UNICEF Child Nutrition Global Report 2025 के अनुसार विद्यालयी आयु के बच्चों में स्थूलता पहली बार वैश्विक स्तर पर अल्पपोषण से अधिक प्रचलित रूप बनी; लगभग 18.8 करोड़ (188 million) बच्चे प्रभावित, यानी हर दस में से एक।
2. स्थिति और कारण: ऊर्जा असंतुलन की अवधारणा; उच्च वसा-शर्करा और कम पोषक विविधता वाले खाद्य पदार्थ; मनोरंजक गतिविधियों और परिवहन में कमी; दक्षिण एशियाई ‘सामान्य BMI-उच्च शरीर व उदर वसा-कम पेशी द्रव्यमान’ फेनोटाइप; 2000 से 2022 तक दक्षिण एशिया में प्रचलन लगभग पाँच गुना; भारत में 2030 तक लगभग 2.7 करोड़ (27 million) बच्चे व किशोर, वैश्विक भार का लगभग 11 प्रतिशत।
3. स्वास्थ्य परिणाम: टाइप 2 मधुमेह, हृदय-रोग और MASLD जैसे गैर-संचारी रोगों का वयस्कता से पहले प्रकट होना; जाँच की आयु-सीमा घटाने की आवश्यकता; दोहरे भार (अल्पपोषण व स्थूलता साथ-साथ) की समस्या।
4. संवैधानिक और विधिक आधार: अनुच्छेद 47 (पोषण स्तर और लोक स्वास्थ्य); अनुच्छेद 21 के अंतर्गत स्वास्थ्य का अधिकार; खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 के तहत लेबलिंग, विज्ञापन-नियमन और मानक निर्धारण; FSSAI की भूमिका।
5. मौजूदा नीतिगत ढाँचा: ईट राइट इंडिया (FSSAI); पोषण अभियान (महिला एवं बाल विकास मंत्रालय); फिट इंडिया आंदोलन (युवा कार्य और खेल मंत्रालय); गैर-संचारी रोगों की रोकथाम और नियंत्रण हेतु राष्ट्रीय कार्यक्रम (NP-NCD); आयुष्मान आरोग्य मंदिर पर स्क्रीनिंग। WHO दिशानिर्देशों के स्तंभ: खाद्य परिवेश, जीवनशैली, भोजन व स्थूलता संबंधी दिशानिर्देश, स्वास्थ्य शिक्षा और प्रारंभिक हस्तक्षेप, जिनमें विद्यालयों में शर्करा-युक्त पेयों पर सीमा प्रमुख है।
6. समालोचनात्मक विश्लेषण: नीतियों की प्रभावशीलता की सीमाएँ, जैसे विज्ञापनों का प्रभाव, विद्यालय परिसर के बाहर उपलब्धता, खाद्य लेबलिंग की समझ, क्रियान्वयन में राज्यों की भिन्नता, तथा शहरी-ग्रामीण अंतर।
7. स्वैच्छिक बनाम बाध्यकारी उपाय: स्वैच्छिक उपायों के पक्ष में तर्क (उद्योग-सहभागिता, नवाचार, कम अनुपालन लागत); बाध्यकारी उपायों के पक्ष में तर्क (सार्वजनिक स्वास्थ्य की सामूहिक प्रकृति, व्यावसायिक हितों और उपभोक्ता हितों में टकराव, बच्चों की सुरक्षा का दायित्व); संतुलित दृष्टिकोण, जिसमें विधिक मानक, निगरानी तंत्र और स्वैच्छिक सहभागिता का समन्वय हो।
8. निष्कर्ष: बाल स्थूलता को अनुच्छेद 47 के संवैधानिक आदर्श के संदर्भ में एकीकृत नीति के रूप में देखने की आवश्यकता; आँकड़ों पर आधारित निगरानी और विद्यालय-स्तरीय हस्तक्षेप की भूमिका।
स्रोत: The Indian Express
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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