30 Oct डीआरडीओ ने अगली पीढ़ी के सेमीकंडक्टर्स पर ESTIC 2026 में प्रदर्शित किया तकनीकी नवाचार
✎ अर्धचालक तकनीक आर्थिक विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों से जुड़ी दोहरे उपयोग की तकनीक है, और भारत अर्धचालक मिशन तथा रक्षा अनुसंधान संस्थाओं के सहयोग से इसमें स्वदेशी क्षमता विकसित कर रहा है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी (अर्धचालक, रक्षा प्रौद्योगिकी, दोहरे उपयोग की तकनीक) | GS Paper III — अर्थव्यवस्था (औद्योगिक नीति, विनिर्माण और आपूर्ति शृंखला) | GS Paper II — शासन (सरकारी योजनाएँ और संस्थागत भूमिकाएँ)
- Prelims: अर्धचालक (Semiconductor) और सिलिकॉन की चालकता, भारत अर्धचालक मिशन (India Semiconductor Mission), डिज़ाइन लिंक्ड इंसेंटिव योजना (Design Linked Incentive Scheme), ATMP और OSAT सुविधाएँ, रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) और रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग, दोहरे उपयोग की प्रौद्योगिकी (Dual-use Technology), चिप्स टू स्टार्टअप कार्यक्रम (Chips to Startup Programme)
- Essay: तकनीकी संप्रभुता और रणनीतिक स्वायत्तता: आत्मनिर्भर भारत के संदर्भ में अर्धचालक का महत्व, रक्षा और नागरिक तकनीक का समन्वय: दोहरे उपयोग की प्रौद्योगिकी से राष्ट्रीय सुरक्षा तक
त्वरित पुनरावृत्ति: अर्धचालक तकनीक आर्थिक विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों से जुड़ी दोहरे उपयोग की तकनीक है, और भारत अर्धचालक मिशन तथा रक्षा अनुसंधान संस्थाओं के सहयोग से इसमें स्वदेशी क्षमता विकसित कर रहा है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने ESTIC 2026 में ‘अर्धचालक और अगली पीढ़ी की चिप’ विषय पर एक विषयगत सत्र का नेतृत्व किया और इस अवसर पर अपनी उन्नत प्रौद्योगिकियों का प्रदर्शन किया। यह समाचार इस बात का संकेत है कि रक्षा क्षेत्र के अनुसंधान संस्थान अर्धचालक और उन्नत चिप के क्षेत्र में अपनी भूमिका को स्पष्ट रूप से आगे बढ़ा रहे हैं। स्रोत में सत्र के वक्ताओं, तकनीकों के विवरण और सम्मेलन के पूर्ण स्वरूप की जानकारी सीमित है, इसलिए परीक्षा की दृष्टि से मुख्य बिंदु यह है कि नीति-स्तर पर अर्धचालक को रणनीतिक तकनीक के रूप में देखा जा रहा है और अनुसंधान तथा विकास संस्थाएँ इसमें सक्रिय हैं।
पृष्ठभूमि
- वैश्विक अर्धचालक आपूर्ति शृंखला में कुछ ही देशों और कंपनियों के पास डिज़ाइन, निर्माण और उपकरण निर्माण का केंद्रीकरण है, जिससे कोविड-19 के बाद आपूर्ति में व्यवधान की समस्या सामने आई।
- अमेरिका ने वर्ष 2022 में CHIPS and Science Act लागू किया, जिससे अर्धचालक विनिर्माण में घरेलू निवेश को प्रोत्साहन मिला। इससे अन्य देशों में भी स्वदेशी अर्धचालक क्षमता की नीतिगत चर्चा तेज़ हुई।
- भारत सरकार ने दिसंबर 2021 में भारत अर्धचालक मिशन को मंजूरी दी, जिसका संचालन इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की देखरेख में होता है। इसके अंतर्गत विनिर्माण, ATMP/OSAT और डिज़ाइन क्षेत्र में सहायता दी जाती है।
- रक्षा क्षेत्र में माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक्स और एवियोनिक्स की आवश्यकता बढ़ने के साथ रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन की भूमिका महत्वपूर्ण हुई है, क्योंकि सैन्य प्रणालियों में प्रयुक्त चिप की विश्वसनीयता और सुरक्षा सर्वोपरि होती है।
- सार्वजनिक मंच पर विषयगत सत्र और तकनीक-प्रदर्शन जैसे आयोजन अनुसंधान, उद्योग और शैक्षणिक संस्थानों के बीच समन्वय को बढ़ावा देने का माध्यम होते हैं।
अर्धचालक (Semiconductor) क्या है?
- अर्धचालक ऐसे पदार्थ हैं जिनकी विद्युत चालकता न तो पूर्ण चालक धातुओं जैसी होती है और न ही पूर्ण विद्रोही पदार्थों जैसी; सिलिकॉन इसका सबसे प्रचलित उदाहरण है।
- अर्धचालक पर ट्रांजिस्टर जैसी सूक्ष्म संरचनाएँ बनाकर एकीकृत परिपथ (Integrated Circuit) या चिप तैयार की जाती है, जो कंप्यूटर, मोबाइल, संचार उपकरण और रक्षा प्रणालियों का आधार है।
- अर्धचालक मूल्य शृंखला के प्रमुख चरण हैं: डिज़ाइन, वेफ़र निर्माण (Fabrication), पैकेजिंग और परीक्षण (ATMP/OSAT)। भारत में डिज़ाइन में सुदृढ़ क्षमता है, जबकि निर्माण और पैकेजिंग पर नीतिगत बल दिया जा रहा है।
- डिज़ाइन लिंक्ड इंसेंटिव योजना के अंतर्गत स्वदेशी चिप डिज़ाइन करने वाली कंपनियों और स्टार्टअप को वित्तीय सहायता दी जाती है, ताकि डिज़ाइन-स्तर पर घरेलू बौद्धिक संपदा विकसित हो।
- दोहरे उपयोग की तकनीक वह है जो नागरिक और सैन्य, दोनों उद्देश्यों में प्रयोग हो सकती है। अर्धचालक इसका प्रमुख उदाहरण है, इसलिए इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और औद्योगिक नीति दोनों के दृष्टिकोण से देखा जाता है।
- रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन रक्षा मंत्रालय के रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के अंतर्गत कार्य करता है और सैन्य आवश्यकताओं के लिए उन्नत प्रौद्योगिकी के विकास में अग्रणी है।
- आत्मनिर्भर भारत के अंतर्गत अर्धचालक क्षेत्र में स्वदेशी क्षमता बढ़ाना आयात-निर्भरता घटाने, आपूर्ति शृंखला के जोखिम को कम करने और तकनीकी संप्रभुता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक माना जाता है।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| विषय-केंद्रित सत्र का नेतृत्व | रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (Defence Research and Development Organisation – DRDO) ने ‘अर्धचालक और अगली पीढ़ी की चिप’ विषय पर सत्र का नेतृत्व किया, जिससे इस क्षेत्र की रणनीतिक प्रासंगिकता रेखांकित हुई। |
| विषय का चयन | अर्धचालक (Semiconductor) आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स, संचार, कंप्यूटिंग और रक्षा प्रणालियों का मूल आधार है, इसलिए इसकी अगली पीढ़ी की चिप पर चर्चा नीतिगत दृष्टि से महत्वपूर्ण है। |
| उन्नत प्रौद्योगिकियों का प्रदर्शन | ESTIC 2026 में DRDO द्वारा उन्नत प्रौद्योगिकियों के प्रदर्शन से प्रयोगशाला स्तर के अनुसंधान से उपयोग तक के मार्ग की झलक मिली। |
| आयोजन मंच | ESTIC 2026 में सरकारी अनुसंधान संगठन की भागीदारी से यह संदेश गया कि रक्षा-तकनीक का विकास सार्वजनिक संस्थानों की प्रमुख भूमिका से भी जुड़ा है। |
| संस्थागत भूमिका | DRDO रक्षा-उपयोगी प्रौद्योगिकियों के विकास और उनके स्वदेशीकरण के लिए उत्तरदायी है, और यह पहल आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य से सीधे जुड़ती है। |
महत्व
रणनीतिक
- अर्धचालक और उन्नत चिप पर स्वदेशी क्षमता से रक्षा प्रणालियों की सुरक्षा और परिचालन स्वायत्तता सुदृढ़ होती है।
- संवेदनशील सैन्य उपकरणों में विदेशी चिप पर निर्भरता घटने से आपूर्ति-शृंखला के व्यवधान का जोखिम कम होता है।
आर्थिक
- अर्धचालक मूल्य शृंखला में डिज़ाइन, निर्माण और परीक्षण के अवसर बढ़ने से उच्च-मूल्य रोजगार और औद्योगिक निवेश को गति मिल सकती है।
- रक्षा और सिविल दोनों क्षेत्रों में दोहरे उपयोग (Dual-use) की प्रौद्योगिकियाँ आर्थिक संवृद्धि के नए स्रोत बन सकती हैं।
वैज्ञानिक और तकनीकी
- अगली पीढ़ी की चिप पर अनुसंधान से उन्नत पदार्थ विज्ञान, डिज़ाइन और सत्यापन के क्षेत्रों में वैज्ञानिक क्षमता का विस्तार होता है।
- सार्वजनिक अनुसंधान संस्थानों और उद्योग के बीच सहयोग से तकनीक-हस्तांतरण की प्रक्रिया सशक्त होती है।
चुनौतियाँ
1. आयात पर निर्भरता
- अर्धचालक निर्माण की अनेक चरणों की प्रक्रिया, विशेषकर उन्नत फैब्रिकेशन, के लिए भारत अब भी विदेशी उपकरणों और सामग्री पर निर्भर है।
- आयात निर्भरता रक्षा परियोजनाओं की समयबद्धता और लागत दोनों को प्रभावित कर सकती है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: आत्मनिर्भर भारत, औद्योगिक नीति और रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता
2. सुरक्षित आपूर्ति-शृंखला
- वैश्विक अर्धचालक आपूर्ति-शृंखला भू-राजनीतिक तनाव और निर्यात नियंत्रणों से प्रभावित होती रही है।
- संवेदनशील रक्षा घटकों के लिए विश्वसनीय और सत्यापित आपूर्ति-शृंखला तैयार करना एक चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: आंतरिक सुरक्षा, रक्षा तकनीक और आपूर्ति-शृंखला की सुरक्षा
3. कुशल मानव संसाधन की कमी
- चिप डिज़ाइन, वीएलएसआई (VLSI) और सत्यापन जैसे क्षेत्रों में उच्च कौशल वाले विशेषज्ञों की संख्या सीमित है।
- शैक्षणिक संस्थानों के पाठ्यक्रम और उद्योग की आवश्यकताओं के बीच तालमेल की कमी बनी हुई है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: कौशल विकास, मानव संसाधन और शिक्षा-उद्योग समन्वय
4. अनुसंधान से उद्योग तक का अंतराल
- प्रयोगशाला स्तर की सफल प्रौद्योगिकी को व्यावसायिक उत्पाद में बदलना धीमी और जोखिम भरी प्रक्रिया है।
- पेटेंट, लाइसेंसिंग और तकनीक-हस्तांतरण की स्पष्ट व्यवस्था न होने से निजी निवेश हतोत्साहित हो सकता है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का अनुप्रयोग, बौद्धिक संपदा अधिकार
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| आयात निर्भरता | उन्नत चिप और उपकरणों के विदेशी स्रोतों पर निर्भरता से रक्षा परियोजनाओं में देरी और लागत वृद्धि का जोखिम। |
| आपूर्ति-शृंखला की सुरक्षा | भू-राजनीतिक तनाव और निर्यात नियंत्रण से संवेदनशील घटकों की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। |
| कुशल मानव संसाधन | डिज़ाइन और सत्यापन विशेषज्ञों की सीमित संख्या से अनुसंधान की गति धीमी पड़ सकती है। |
| अनुसंधान से उत्पादन तक का अंतराल | प्रयोगशाला की सफलता को औद्योगिक उत्पाद में बदलने की व्यवस्था कमजोर होने से नवाचार का लाभ सीमित रहता है। |
| बौद्धिक संपदा प्रबंधन | पेटेंट और तकनीक-हस्तांतरण के स्पष्ट ढाँचे के अभाव में निजी क्षेत्र की भागीदारी कम हो सकती है। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- भारत अर्धचालक मिशन (India Semiconductor Mission)
- सेमीकंडक्टर इंडिया कार्यक्रम (Semiconductor India Programme)
आगे की राह
- रक्षा-उपयोगी अर्धचालक और चिप के लिए DRDO, उद्योग और शैक्षणिक संस्थानों के बीच स्पष्ट सहयोग-ढाँचा तैयार किया जाए।
- उन्नत चिप डिज़ाइन, वीएलएसआई और सत्यापन में विश्वविद्यालय स्तर से विशेषज्ञता विकसित करने के लिए पाठ्यक्रम और प्रशिक्षण को उद्योग-उन्मुख बनाया जाए।
- प्रयोगशाला की प्रौद्योगिकियों के व्यावसायीकरण के लिए तकनीक-हस्तांतरण और लाइसेंसिंग की पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई जाए।
- संवेदनशील घटकों की आपूर्ति-शृंखला में विविधता लाकर किसी एक स्रोत पर निर्भरता घटाई जाए।
- बौद्धिक संपदा अधिकारों की सुरक्षा और स्पष्ट लाइसेंसिंग नीति से निजी निवेश को प्रोत्साहित किया जाए।
- स्टार्टअप और लघु उद्यमों को परीक्षण सुविधाओं और प्रारंभिक वित्तीय सहायता तक पहुँच दी जाए।
- रक्षा और सिविल अनुप्रयोगों के बीच दोहरे उपयोग वाली प्रौद्योगिकियों के लिए समन्वित अनुसंधान-कार्यक्रम बनाए जाएँ।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
सेमीकंडक्टर · नेक्स्ट-जेनरेशन चिप्स · DRDO · इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण · आत्मनिर्भर भारत · डिजिटल इंडिया · अनुसंधान एवं विकास · रणनीतिक क्षेत्र · घरेलू क्षमता · वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 246 और सातवीं अनुसूची (संघ सूची): रक्षा और संबंधित विषय संघ के अधीन
अवधारणा प्रवाह
वैश्विक स्तर पर अर्धचालक और उन्नत चिप आधुनिक रक्षा प्रणालियों की मूल आवश्यकता बन गए हैं। → रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) इस विषय पर सत्र का नेतृत्व कर अपनी अनुसंधान प्राथमिकताएँ सार्वजनिक करता है। → ESTIC 2026 में उन्नत प्रौद्योगिकियों के प्रदर्शन से अनुसंधान की उपलब्धियाँ नीति-निर्माताओं, उद्योग और शिक्षा जगत तक पहुँचती हैं। → इससे स्वदेशी क्षमता, आपूर्ति-शृंखला की सुरक्षा और कुशल मानव संसाधन की आवश्यकता पर सहमति बनती है। → इन आवश्यकताओं के आधार पर अर्धचालक मिशन जैसी नीतियों और उद्योग-शैक्षणिक सहयोग को दिशा मिलती है। → अंततः रक्षा-तकनीक में आत्मनिर्भरता और आर्थिक संवृद्धि के दोहरे लक्ष्य की प्राप्ति होती है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत में सेमीकंडक्टर विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए ‘सेमीकॉन इंडिया’ कार्यक्रम शुरू किया गया है।
2. DRDO रक्षा क्षेत्र के लिए उन्नत सेमीकंडक्टर प्रौद्योगिकी के अनुसंधान और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
3. भारत का लक्ष्य 2030 तक सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। भारत में सेमीकंडक्टर विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए ‘सेमीकॉन इंडिया’ कार्यक्रम शुरू किया गया है। कथन 2 सही है। DRDO रक्षा क्षेत्र के लिए उन्नत सेमीकंडक्टर प्रौद्योगिकी के अनुसंधान और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कथन 3 गलत है। भारत का लक्ष्य 2030 तक सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना नहीं है, बल्कि इस क्षेत्र में एक मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) विकसित करना है।
Q2. कथन (A): भारत सरकार सेमीकंडक्टर और डिस्प्ले विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहन प्रदान कर रही है।
कारण (R): सेमीकंडक्टर आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स, सूचना प्रौद्योगिकी और रक्षा प्रणालियों के लिए महत्वपूर्ण घटक हैं।
उपर्युक्त कथनों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा सही है?
- कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं, और कारण (R) कथन (A) की सही व्याख्या करता है।
- कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं, लेकिन कारण (R) कथन (A) की सही व्याख्या नहीं करता है।
- कथन (A) सही है, लेकिन कारण (R) गलत है।
- कथन (A) गलत है, लेकिन कारण (R) सही है।
उत्तर: कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं, और कारण (R) कथन (A) की सही व्याख्या करता है। — कथन (A) सही है क्योंकि सरकार सेमीकंडक्टर और डिस्प्ले विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न प्रोत्साहन योजनाएं चला रही है। कारण (R) भी सही है क्योंकि सेमीकंडक्टर आधुनिक तकनीक के मूल में हैं। कारण (R) कथन (A) की सही व्याख्या करता है क्योंकि सेमीकंडक्टर के महत्व को देखते हुए ही सरकार इस क्षेत्र को बढ़ावा दे रही है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत में सेमीकंडक्टर और नेक्स्ट-जेनरेशन चिप्स के विकास में DRDO जैसी संस्थाओं की भूमिका का परीक्षण कीजिए। साथ ही, इस क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने की चुनौतियों और अवसरों पर भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: सेमीकंडक्टर और नेक्स्ट-जेनरेशन चिप्स के महत्व और भारत के लिए इनकी रणनीतिक आवश्यकता का संक्षिप्त परिचय। (20-30 शब्द)
2. DRDO की भूमिका: DRDO (रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन) द्वारा रक्षा और रणनीतिक क्षेत्रों के लिए उन्नत सेमीकंडक्टर प्रौद्योगिकियों के अनुसंधान, विकास और प्रदर्शन में निभाई गई भूमिका का विस्तार से वर्णन। ESTIC 2026 जैसे आयोजनों में DRDO की भागीदारी का उल्लेख। (60-70 शब्द)
3. आत्मनिर्भरता की चुनौतियाँ: इस क्षेत्र में भारत के सामने आने वाली प्रमुख चुनौतियों का विश्लेषण, जैसे कि उच्च पूंजी निवेश, जटिल विनिर्माण प्रक्रियाएँ, कुशल जनशक्ति की कमी, अनुसंधान एवं विकास में निवेश का अभाव, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर निर्भरता और भू-राजनीतिक कारक। (70-80 शब्द)
4. आत्मनिर्भरता के अवसर: भारत के लिए उपलब्ध अवसरों की पहचान, जैसे कि ‘सेमीकॉन इंडिया’ कार्यक्रम, उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) योजनाएँ, डिजाइन और अनुसंधान में बढ़ती क्षमता, घरेलू मांग, वैश्विक कंपनियों के साथ सहयोग और रणनीतिक साझेदारी। (60-70 शब्द)
5. निष्कर्ष: भारत के लिए सेमीकंडक्टर क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के महत्व पर जोर देते हुए एक संतुलित निष्कर्ष, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक संवृद्धि और तकनीकी संप्रभुता शामिल हो। (20-30 शब्द)
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
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