16 Oct भारत ने बाकू में सीआईसीए शिखर सम्मेलन में लिया सक्रिय भाग
✎ CICA एशिया का व्यापक बहुपक्षीय संवाद-मंच है (सचिवालय: अस्ताना, प्रस्ताव: कज़ाखस्तान, 1992), जहाँ विश्वास-निर्माण उपायों के माध्यम से क्षेत्रीय शांति और सहयोग को बढ़ावा दिया जाता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — अंतरराष्ट्रीय संबंध (क्षेत्रीय और बहुपक्षीय संगठन, भारत के हित) | GS Paper I — समकालीन विश्व (एशिया का भू-राजनीतिक परिदृश्य)
- Prelims: CICA (Conference on Interaction and Confidence-Building Measures in Asia) का मुख्यालय और सचिवालय अस्ताना (कज़ाखस्तान) में है, CICA की स्थापना का प्रस्ताव कज़ाखस्तान के राष्ट्रपति नूरसुल्तान नज़रबायेव ने 1992 में रखा था, विश्वास-निर्माण उपाय (Confidence-Building Measures: CBMs) का सैद्धांतिक आधार और इसके सैन्य व गैर-सैन्य आयाम, CICA शिखर सम्मेलन एक बहुपक्षीय मंच है; इसके निर्णय बाध्यकारी नहीं, सहमति पर आधारित होते हैं, CICA में पर्यवेक्षक राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय संगठनों की भूमिका; सदस्यता व्यापक एशियाई भौगोलिक क्षेत्र तक फैली है, SCO, ASEAN, BIMSTEC जैसे अन्य एशियाई मंचों से CICA का अंतर (विषय-क्षेत्र और सदस्यता का), अज़रबैजान की राजधानी बाकू; कैस्पियन सागर के तट पर स्थित देश; काकेशस क्षेत्र का भाग
- Essay: बहुध्रुवीय एशिया में विश्वास-निर्माण: संवाद मंच बनाम शक्ति-संतुलन, क्षेत्रीय सहयोग की संस्थाएँ: सीमित प्रभाव, पर संवाद की निरंतरता का महत्व
त्वरित पुनरावृत्ति: CICA एशिया का व्यापक बहुपक्षीय संवाद-मंच है (सचिवालय: अस्ताना, प्रस्ताव: कज़ाखस्तान, 1992), जहाँ विश्वास-निर्माण उपायों के माध्यम से क्षेत्रीय शांति और सहयोग को बढ़ावा दिया जाता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
भारत ने अज़रबैजान की राजधानी बाकू में आयोजित एशिया में अंतःक्रिया और विश्वास-निर्माण उपाय सम्मेलन (CICA) के 7वें शिखर सम्मेलन में भाग लिया। विदेश मंत्रालय द्वारा जारी इस सूचना से स्पष्ट है कि भारत इस बहुपक्षीय मंच में अपनी सक्रिय उपस्थिति बनाए हुए है। CICA एशिया के विभिन्न देशों को सुरक्षा, आर्थिक सहयोग और सांस्कृतिक आदान-प्रदान जैसे विषयों पर संवाद के लिए एक साथ लाता है। ऐसे शिखर सम्मेलन में भारतीय भागीदारी यह दर्शाती है कि भारत एशियाई क्षेत्रीय ढाँचे में अपने राजनयिक हितों और संवाद-आधारित दृष्टिकोण को आगे रखता है।
पृष्ठभूमि
- CICA की संकल्पना कज़ाखस्तान की पहल पर 1992 में सामने आई। उद्देश्य था कि एशिया के देश आपसी संवाद से विश्वास बढ़ाएँ और सुरक्षा-सहयोग की संस्थागत व्यवस्था विकसित करें।
- CICA का सिद्धांत यूरोप की CSCE (बाद में OSCE) जैसी प्रक्रिया से प्रेरित माना जाता है, किंतु इसका ढाँचा एशियाई परिस्थितियों के अनुरूप रखा गया है।
- इसका स्थायी सचिवालय अस्ताना में स्थित है, और शिखर सम्मेलन समय-समय पर होते रहे हैं; 7वाँ शिखर सम्मेलन बाकू में हुआ।
- CICA का कार्य आधार सहमति और स्वैच्छिक प्रतिबद्धता है; सदस्य देश संवाद, विश्वास-निर्माण के उपायों और परस्पर सहयोग की परियोजनाओं के माध्यम से अपने संबंध सुदृढ़ करते हैं।
- भारत CICA का सदस्य है और इसकी गतिविधियों में विदेश मंत्रालय के माध्यम से भाग लेता है; यह भारत की ‘पश्चिम एशिया’ और ‘मध्य एशिया’ दोनों से जुड़ी व्यापक नीति का भी हिस्सा है।
CICA क्या है?
- CICA का पूरा नाम एशिया में अंतःक्रिया और विश्वास-निर्माण उपाय सम्मेलन (Conference on Interaction and Confidence-Building Measures in Asia) है।
- यह एशिया के देशों का एक बहुपक्षीय मंच है, जिसका उद्देश्य क्षेत्रीय शांति, सुरक्षा और स्थिरता के लिए संवाद और विश्वास-निर्माण को बढ़ावा देना है।
- विश्वास-निर्माण उपाय (CBMs) वे कदम हैं जिनसे राष्ट्रों के बीच पारदर्शिता, पूर्वानुमेयता और आपसी भरोसा बढ़ता है; ये प्रायः संघर्ष की रोकथाम के साधन के रूप में देखे जाते हैं।
- CICA की नींव सहयोग के सिद्धांतों पर है, जिसमें सदस्य देश समान आधार पर संवाद करते हैं और निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाते हैं।
- इसके शिखर सम्मेलन सदस्य राष्ट्रों के प्रमुखों के स्तर पर होते हैं, जिनमें सुरक्षा, आर्थिक सहयोग, मानवीय आदान-प्रदान और नए खतरों जैसे विषयों पर चर्चा होती है।
- CICA अंतरराष्ट्रीय संगठनों और कुछ राष्ट्रों को पर्यवेक्षक की भूमिका भी देता है, जिससे व्यापक संवाद-नेटवर्क बनता है।
- CICA का कार्य क्षेत्रीय संस्थाओं के एक व्यापक ढाँचे का हिस्सा है, जहाँ SCO जैसे मंच आर्थिक और सुरक्षा सहयोग पर अधिक केंद्रित हैं, जबकि CICA का फोकस व्यापक विश्वास-निर्माण पर है।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| सदस्यता और भौगोलिक विस्तार | CICA (Conference on Interaction and Confidence-Building Measures in Asia) एशिया के अनेक देशों का बहुपक्षीय मंच है, जिसमें मध्य, पश्चिम, दक्षिण और पूर्वी एशिया के सदस्य शामिल हैं। भारत इसका सदस्य है, इसलिए यह मंच भारत की एशियाई कूटनीति का एक हिस्सा है। |
| मूल प्रकृति | यह सुरक्षा और सहयोग का सामूहिक मंच है। इसकी प्रमुख कार्यप्रणाली विश्वास-निर्माण उपाय (Confidence-Building Measures) हैं, यानी संवाद, पारदर्शिता और सहयोगी परियोजनाओं के ज़रिए परस्पर अविश्वास कम करना। इसके निर्णय बाध्यकारी संधि-दायित्व नहीं बनाते। |
| शिखर सम्मेलन की व्यवस्था | शिखर सम्मेलन सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों या शासनाध्यक्षों के स्तर पर होता है और मंच की राजनीतिक दिशा तय करता है। अध्यक्षता सदस्य देशों के बीच बारी-बारी से जाती है, जिससे हर देश को नेतृत्व की भूमिका मिलती है। |
| मेज़बान देश की भूमिका | अज़रबैजान की राजधानी बाकू में आयोजित सम्मेलन कैस्पियन क्षेत्र और दक्षिण काकेशस के सामरिक महत्व को रेखांकित करता है। यह क्षेत्र ऊर्जा-मार्गों और परिवहन गलियारों की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। |
| सहयोग के विषय-क्षेत्र | सहयोग राजनीतिक-सैन्य, आर्थिक-पर्यावरणीय, मानवीय आयाम और नई चुनौतियों (जैसे आतंकवाद, साइबर सुरक्षा और मादक पदार्थों की तस्करी) तक फैला है। इससे मंच का दायरा सुरक्षा से आगे आर्थिक और सामाजिक सहयोग तक जाता है। |
महत्व
रणनीतिक (Strategic)
- परस्पर भिन्न हितों और अविश्वास वाले देशों को एक ही मंच पर संवाद का अवसर मिलता है, जिससे तनाव घटाने के लिए अनौपचारिक चैनल खुले रहते हैं।
- बहुध्रुवीय एशिया में किसी एक शक्ति के प्रभुत्व के बजाय सामूहिक सुरक्षा-संवाद को बढ़ावा मिलता है।
- भारत के लिए यह मध्य एशिया और पश्चिम एशिया के देशों के साथ सुरक्षा-संवाद का उपयोगी माध्यम है।
आर्थिक और संपर्क (Economic and Connectivity)
- अज़रबैजान भारत की अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (International North-South Transport Corridor) परियोजना से जुड़ा देश है, इसलिए मेज़बान देश के साथ द्विपक्षीय आर्थिक संबंध सुदृढ़ होने की संभावना बनती है।
- कैस्पियन क्षेत्र में ऊर्जा-संसाधन और व्यापार-मार्ग हैं, जो क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग के लिए आधार बन सकते हैं।
कूटनीतिक (Diplomatic)
- भारत की मध्य एशिया नीति, जिसे कनेक्ट सेंट्रल एशिया नीति (Connect Central Asia Policy) के रूप में जाना जाता है, के अंतर्गत बहुपक्षीय मंच द्विपक्षीय पहलों को पूरक बनाते हैं।
- बहुपक्षीय मंचों पर उपस्थिति भारत की सामरिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) की नीति को व्यावहारिक रूप देती है।
वैश्विक शासन (Global Governance)
- संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 52 के तहत क्षेत्रीय व्यवस्थाएँ अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा में योगदान दे सकती हैं, और CICA इसी भावना का उदाहरण है।
- क्षेत्रीय मंच वैश्विक संस्थाओं के पूरक के रूप में काम करते हैं और बहुपक्षवाद को विकेंद्रित रूप देते हैं।
चुनौतियाँ
1. बाध्यकारी तंत्र का अभाव
- CICA के निर्णय मुख्यतः घोषणाओं और स्वैच्छिक प्रतिबद्धताओं पर आधारित हैं, इसलिए उनके क्रियान्वयन की जवाबदेही सीमित रहती है।
- विवाद-निपटान के लिए कोई बाध्यकारी न्यायिक या अर्ध-न्यायिक तंत्र नहीं है।
यूपीएससी लिंक: अंतरराष्ट्रीय संबंध: क्षेत्रीय संगठन और बहुपक्षवाद
2. सर्वसम्मति आधारित निर्णय-प्रक्रिया
- सभी सदस्य देशों की सहमति आवश्यक होने से निर्णय धीमे होते हैं और विवादित मुद्दों पर प्रगति रुक सकती है।
- सदस्य देशों की प्राथमिकताएँ अलग होने से साझा एजेंडा तय करना कठिन होता है।
यूपीएससी लिंक: अंतरराष्ट्रीय संबंध: क्षेत्रीय संगठन और बहुपक्षवाद
3. क्षेत्रीय संघर्ष और अविश्वास
- सदस्य देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे क्षेत्रीय विवाद और सुरक्षा-चिंताएँ संवाद की गति को प्रभावित करती हैं।
- विश्वास-निर्माण उपायों की सफलता इस पर निर्भर है कि संवाद कितना निरंतर और परिणाम-उन्मुख है।
यूपीएससी लिंक: अंतरराष्ट्रीय संबंध: विश्वास-निर्माण उपाय और क्षेत्रीय सुरक्षा
4. संपर्क-परियोजनाओं में भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा
- परिवहन और ऊर्जा गलियारों में विभिन्न शक्तियों की भागीदारी से सहयोग और प्रतिस्पर्धा दोनों एक साथ बढ़ते हैं।
- बड़ी परियोजनाओं के लिए वित्त, पारदर्शिता और सतत ऋण-प्रबंधन जैसे प्रश्न उठते हैं।
यूपीएससी लिंक: भूगोल और अर्थव्यवस्था: परिवहन गलियारे और ऊर्जा सुरक्षा
5. सचिवालय की सीमित क्षमता
- मंच का सचिवालय संसाधनों और कर्मचारियों की दृष्टि से सीमित है, जिससे लंबी अवधि की परियोजनाओं का समन्वय कठिन होता है।
- सदस्य देशों के योगदान और प्राथमिकताओं में असमानता से निरंतरता प्रभावित होती है।
यूपीएससी लिंक: अंतरराष्ट्रीय संगठन: संस्थागत क्षमता और वित्तपोषण
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| बाध्यकारी तंत्र का अभाव | घोषणाओं का क्रियान्वयन स्वैच्छिक रहता है और उल्लंघन पर कोई औपचारिक दंड या विवाद-निपटान तंत्र नहीं है। |
| सर्वसम्मति की बाध्यता | एक भी सदस्य की आपत्ति से महत्त्वपूर्ण निर्णय रुक सकते हैं, जिससे मंच की गति धीमी रहती है। |
| क्षेत्रीय विवाद | सदस्य देशों के बीच लंबित सीमा और सुरक्षा विवाद संवाद की ईमानदारी और निरंतरता को प्रभावित करते हैं। |
| संपर्क-परियोजनाओं में प्रतिस्पर्धा | परिवहन और ऊर्जा गलियारों पर अलग-अलग शक्तियों के हित टकराते हैं, जिससे साझा परियोजनाएँ जटिल होती हैं। |
| सचिवालय की क्षमता | सीमित संसाधनों के कारण दीर्घकालिक कार्यक्रमों का समन्वय, निगरानी और मूल्यांकन कमजोर रह सकता है। |
आगे की राह
- शिखर सम्मेलन के घोषणापत्र और अंतिम दस्तावेज़ का मूल पाठ देखकर यह पहचानना चाहिए कि कौन-सी प्रतिबद्धताएँ स्पष्ट और समयबद्ध हैं।
- विश्वास-निर्माण उपायों को मापने योग्य संकेतकों से जोड़ा जाए, ताकि प्रगति का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन हो सके।
- आतंकवाद-विरोधी सहयोग, साइबर सुरक्षा और आपदा-प्रबंधन जैसे गैर-विवादित क्षेत्रों से व्यावहारिक सहयोग आरंभ किया जाए।
- INSTC जैसे परिवहन गलियारों को CICA के संपर्क-एजेंडे से जोड़कर बहुपक्षीय वित्तपोषण और तकनीकी सहयोग के नए रास्ते खोजे जाएँ।
- सचिवालय की संस्थागत क्षमता बढ़ाने के लिए सदस्य देशों का वित्तीय और मानव-संसाधन योगदान नियमित और पारदर्शी बनाया जाए।
- क्षेत्रीय संगठनों जैसे SCO और ASEAN के साथ समन्वय से दोहराव के बजाय पूरक भूमिका तय की जाए।
- नागरिक-समाज, शोध-संस्थानों और थिंक टैंकों को संवाद प्रक्रिया में शामिल कर ट्रैक-टू कूटनीति को प्रोत्साहित किया जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
विश्वास-निर्माण उपाय (Confidence-Building Measures) · एशिया में विश्वास-निर्माण के उपायों पर सम्मेलन (CICA) · बहुपक्षीय क्षेत्रीय मंच · मध्य एशिया नीति · कनेक्ट सेंट्रल एशिया नीति (Connect Central Asia Policy) · अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC) · कैस्पियन सागर क्षेत्र · सर्वसम्मति आधारित निर्णय-प्रक्रिया · गैर-बाध्यकारी राजनीतिक प्रतिबद्धता · अनुच्छेद 51 और अंतरराष्ट्रीय विधि के प्रति सम्मान · संधि-निर्माण की शक्ति (संघ सूची, प्रविष्टि 14) · आर्थिक कूटनीति और संपर्क
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 51: अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा का संवर्धन
- अनुच्छेद 73: विदेश-नीति में संघ की कार्यकारी शक्ति
अवधारणा प्रवाह
एशिया में सुरक्षा-चुनौतियाँ और परस्पर अविश्वास बने रहते हैं। → CICA जैसे बहुपक्षीय मंच विश्वास-निर्माण उपायों के माध्यम से संवाद का ढाँचा प्रदान करते हैं। → सदस्य देश शिखर सम्मेलन में राजनीतिक दिशा और साझा प्राथमिकताएँ तय करते हैं। → घोषणापत्र और सहमत उपायों के आधार पर सहयोगी परियोजनाएँ और संस्थागत पहलें शुरू होती हैं। → सहयोग से आर्थिक संपर्क, सुरक्षा-समन्वय और कूटनीतिक विश्वास बढ़ता है, जिससे क्षेत्रीय स्थिरता में योगदान मिलता है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. एशिया में विश्वास-निर्माण के उपायों पर सम्मेलन (CICA) की संकल्पना वर्ष 1992 में कज़ाखस्तान के प्रस्ताव से उभरी।
2. इस मंच के निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाते हैं और वे किसी संधि की भाँति कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होते।
3. इस मंच का सचिवालय अल्माटी (कज़ाखस्तान) में स्थित है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: सभी — कथन 1 सही है: कज़ाखस्तान के राष्ट्रपति नज़रबायेव ने 1992 में यह विचार रखा था। कथन 2 सही है: CICA की कार्यप्रणाली सर्वसम्मति पर आधारित है और इसके घोषणापत्र राजनीतिक प्रतिबद्धताएँ हैं, विधिक बाध्यता नहीं। कथन 3 सही है: सचिवालय अल्माटी में है। अतः तीनों कथन सही हैं।
Q2. निम्नलिखित में से प्रत्येक दो कथनों को ध्यान से पढ़िए:
अभिकथन (A): एशिया-व्यापी विश्वास-निर्माण मंचों के निर्णय सामान्यतः गैर-बाध्यकारी होते हैं।
कारण (R): ऐसे मंचों के निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाते हैं और उनसे कोई विधिक रूप से प्रवर्तनीय दायित्व उत्पन्न नहीं होता।
दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए।
- (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
- (A) और (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
- (A) सही है, किंतु (R) गलत है।
- (A) गलत है, किंतु (R) सही है।
उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — अभिकथन और कारण दोनों सही हैं। ऐसे मंच राजनीतिक संवाद और सहमति के उपकरण हैं, इसलिए उनके निर्णय गैर-बाध्यकारी होते हैं। सर्वसम्मति की प्रक्रिया और विधिक दायित्व का अभाव ही इस गैर-बाध्यकारी स्वरूप का कारण है, अतः (R) (A) की सही व्याख्या है।
Q3. निम्नलिखित सुमेलों पर विचार कीजिए:
सूची-I (संस्था/पहल)
A. एशिया में विश्वास-निर्माण के उपायों पर सम्मेलन (CICA)
B. अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC)
C. दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्रों का संगठन (ASEAN)
सूची-II (विवरण)
1. बहु-मार्गीय परिवहन गलियारा, जो भारत को ईरान और रूस से जोड़ता है और जिसमें अज़रबैजान एक पारगमन-राष्ट्र है
2. एशिया-व्यापी सुरक्षा संवाद और विश्वास-निर्माण का मंच
3. दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों का क्षेत्रीय संगठन
सही सुमेलन चुनिए:
- A-2, B-1, C-3
- A-1, B-2, C-3
- A-2, B-3, C-1
- A-3, B-1, C-2
उत्तर: A-2, B-1, C-3 — CICA एशिया-व्यापी विश्वास-निर्माण मंच है (2)। INSTC भारत, ईरान, रूस आदि को जोड़ने वाला बहु-मार्गीय गलियारा है, जिसमें कैस्पियन क्षेत्र होकर अज़रबैजान पारगमन-मार्ग है (1)। ASEAN दक्षिण-पूर्व एशिया का क्षेत्रीय संगठन है (3)।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत की विदेश नीति में बहुपक्षीय क्षेत्रीय मंच अब केवल संवाद का साधन नहीं रहे, बल्कि आर्थिक संपर्क और सुरक्षा-सहयोग के उपकरण भी बन गए हैं। एशिया-व्यापी विश्वास-निर्माण मंचों पर भारत की सहभागिता का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही बताइए कि गैर-बाध्यकारी प्रकृति वाले ऐसे मंच भारत के दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों को किन सीमाओं के साथ साधते हैं। (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर संरचना: (1) भूमिका: CICA का उद्भव (1992 में कज़ाखस्तान की पहल; एशिया में विश्वास-निर्माण और सुरक्षा-संवाद का बहु-पक्षीय ढाँचा) और इसका समकालीन महत्व। (2) संवैधानिक और नीतिगत आधार: अनुच्छेद 51 (अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा का संवर्धन, अंतरराष्ट्रीय विधि और संधि-दायित्वों के प्रति सम्मान, विवादों का मध्यस्थता द्वारा निपटारा); संघ सूची की प्रविष्टि 14 (संधियों और करारों के संबंध में संघ की शक्ति); अनुच्छेद 253 (अंतरराष्ट्रीय संधियों के कार्यान्वयन हेतु संसद की विधायी शक्ति); पंचशील और गुटनिरपेक्षता की परंपरा; ‘कनेक्ट सेंट्रल एशिया’ नीति (2012)। (3) आलोचनात्मक विश्लेषण के आयाम: (क) सकारात्मक पक्ष: मध्य एशिया और कैस्पियन क्षेत्र में संपर्क, INSTC के माध्यम से अज़रबैजान और ईरान/रूस के साथ पारगमन-सहयोग, ऊर्जा और व्यापार के नए मार्ग; आतंकवाद और उग्रवाद के विरुद्ध साझा समझ का मंच। (ख) सीमाएँ: निर्णयों का गैर-बाध्यकारी होना; सर्वसम्मति के कारण प्रगति की धीमी गति; सदस्य देशों के परस्पर विरोधी हित और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा; मंच की सीमित संस्थागत क्षमता। (4) दृष्टिकोणों का संतुलन: यथार्थवादी दृष्टिकोण (हांस मॉर्गेन्थाऊ: शक्ति-संतुलन में राज्य का स्व-हित प्राथमिक) बनाम उदारवादी-संस्थावादी दृष्टिकोण (रॉबर्ट कियोहेन: संस्थाएँ सहयोग की लागत घटाती हैं और विश्वास बनाती हैं)। ऐसे मंचों को ‘नरम शक्ति’ और ‘विश्वास-निर्माण’ के रूप में देखने का तर्क तथा उन्हें केवल प्रतीकात्मक मानने की आलोचना। (5) निष्कर्ष: द्विपक्षीय संबंधों, बहुपक्षीय संस्थाओं (जैसे SCO, ASEAN से जुड़ाव) और आर्थिक कूटनीति का संतुलित समन्वय; गैर-बाध्यकारी मंचों को ठोस परियोजनाओं और संस्थागत अनुवर्ती कदमों से जोड़ने की आवश्यकता।
स्रोत: Ministry of External Affairs
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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